शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

राहुल गांधी का सफरनामा


Click Here
Dainik Jagran Hindi News
www.jagran.com
July 05,2013
congress leader
राहुल गांधी का सफरनामा
कांग्रेस उपाध्यक्ष एवं सांसद राहुल गांधी का जन्म 19 जून 1970 को नई दिल्ली में हुआ था। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी और वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने बहुत प्यार और उम्मीदों के साथ अपने इस पुत्र का नाम राहुल रखा था। राहुल गांधी अपने माता-पिता की दो संतानों में बड़े हैं और उनकी छोटी बहन प्रियंका गांधी वढेरा हैं। राहुल गांधी की दादी भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं।
राहुल गांधी भारतीय संसद के निचले सदन लोकसभा में उत्तर प्रदेश के अमेठी संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। राहुल गांधी उस नेहरू गांधी परिवार से हैं जो भारत का प्रमुख राजनीतिक परिवार है। राहुल गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से संबद्ध हैं। 2009 के आम चुनावों में राहुल गांधी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और उसमें मिली भारी सफलता का श्रेय उन्हें दिया जाता है। राजनीतिक जीवन में उन्होंने भारत की ग्रामीण जनता से बहुत निकट का संबंध स्थापित किया और कांग्रेस दल के संगठन को मजबूती दी।
उनकी राजनीतिक रणनीतियों में जमीनी स्तर की सक्रियता को बल देना, ग्रामीण भारत के साथ गहरे संबंध स्थापित करना और कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिश करना प्रमुख हैं। सतह से जुड़ने, अनुभव प्राप्त करने और भारत को निकट से जानने के लिए उन्होंने मनमोहन सिंह के नेतृत्व की सरकार में कोई भी पद लेने से मना कर दिया। राहुल गांधी आजकल अपना सारा ध्यान राजनीतिक अनुभव प्राप्त करने और पार्टी को जड़ से मजबूत करने पर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए हैं।
शिक्षा
राहुल गांधी की प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के मॉर्डन स्कूल में हुई। इसके बाद वह शिक्षा के लिए दून स्कूल भेजे गये जहां पर उनके पिता स्वर्गीय राजीव गांधी ने भी शिक्षा प्राप्त की थी। सुरक्षा कारणों से 1981 से 1983 तक उन्होंने घर पर ही शिक्षा प्राप्त की। फ्लोरिडा के हावर्ड विश्वविद्यालय से 1994 में उन्होंने कला स्नातक की परीक्षा दी और सफलता प्राप्त की। 1995 में अपनी शिक्षा में उन्होंने ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में एमफिल किया। इसके पश्चात तीन साल तक माइकल पोर्टर की प्रबंधन परामर्श कंपनी मानीटर ग्रुप के साथ कार्य किया। इस कंपनी में वह रॉस विंसी नाम से कार्य करते थे और उनके सहकर्मियों को अनके विषय में जानकारी नहीं थी। राहुल के आलोचक उनके इस कदम को उनके भारतीय होने से उपजी उनकी हीनभावना मानते हैं जबकि, कांग्रेसी उनके इस कदम को उनकी सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं। सन 2002 में वह भारत लौट आये और मुंबई से अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी से संबंधित कंपनी चलाई।
राजनीतिक सफर
2003 में, राहुल गांधी के राजनीति में प्रवेश को लेकर समाचारपत्रों में समाचार छपते रहे हालांकि उन्होंने इसकी कभी पुष्टि नहीं की। सार्वजनिक उत्सवों और कांग्रेस की बैठकों में वह अपनी मां सोनिया गांधी के साथ दिखायी देते थे और बहन प्रियंका गांधी के साथ एकदिवसीय क्रिकेट श्रृंखला देखने सद्भावना यात्रा पर पाकिस्तान भी गये। 2004 में जब प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने अपने पिता स्वर्गीय राजीव गांधी के क्षेत्र अमेठी का दौरा किया, जो इस समय उनकी माता सोनिया गांधी का भी क्षेत्र है, उस समय उनके राजनीति में प्रवेश को लेकर मीडिया में अटकलें रहीं। लेकिन उन्होंने स्पष्ट कहा, मैं राजनीति के विरुद्ध नहीं हूं। मैंने यह तय नहीं किया है कि मैं राजनीति में कब प्रवेश करूंगा और वास्तव में, करूंगा भी कि नहीं।
मार्च 2004 में राहुल गांधी ने मई में होने वाले चुनाव में भाग लेकर राजनीति में प्रवेश की घोषणा की और अपने पिता के चुनाव क्षेत्र उत्तर प्रदेश के अमेठी क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड़ा। इससे पहले, उनके चाचा संजय ने, एक विमान दुर्घटना से पहले, इस कुर्सी का नेतृत्व किया। यह कुर्सी उनकी मां के नेतृत्व में थी जब तक वह पड़ोसी कुर्सी रायबरेली में स्थानान्तरित नहीं हुई थी। उस समय कांग्रेस संकट में थी। कांग्रेस के पास 80 में से 10 सीट थीं। उस समय राजनीति विशेषज्ञों को आश्चर्य हुआ क्योंकि वह प्रियंका गांधी के राजनीति में आने की अपेक्षा कर रहे थे। मीडिया में चर्चा थी कि क्या भारत के प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार का युवा सदस्य भारत की युवा आबादी के बीच में क्या कांग्रेस पार्टी की राजनीति को पुनर्जीवित करेगा? मीडिया के साथ अपने पहले इंटरव्यू में, राहुल गांधी ने विभाजनकारी राजनीति की निंदा की और कहा कि वह भारतीय जाति व्यवस्था और धार्मिक तनाव को कम करने का प्रयत्न करेंगे। उनके इस कदम का अमेठी के लोगों ने उत्साहपूर्वक स्वागत किया। अमेठी का इस परिवार के साथ एक लंबा संबंध था।
उन्होंने कहा, कभी-कभी मैं यह सोच कर उदास हो जाता हूं कि चुनाव प्रचार में यहां केवल एक दिन के लिए आ पाया और इस नाते मै अपनी बहन प्रियंका को धन्यवाद भी देना चाहता हूं, जो यहां काफी समय दे रही हैं। राहुल गांधी ने अमेठी और रायबरेली के विकास के लिए किए गए कार्य और प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा मेरे पिता अपने दोनों हाथों से इस क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाते थे, मगर मेरा एक हाथ बंधा हुआ है। कारण, मुझे राज्य सरकार से सहयोग नहीं मिल पा रहा है, बल्कि वह विकास में बाधा डालती है। उन्होंने जनता से अपील की कि हम चाहते हैं आपके सहयोग से उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस की सरकार बने और मैं दोनों हाथों से आपकी मदद कर सकूं। उन्होंने कहा कि अमेठी मेरे लिए परिवार जैसा है। राहुल ने एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मेरा रिश्ता केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि परिवार जैसा है। यह रिश्ता मेरी दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी के समय से है। मेरा प्रयास हमेशा यह रहेगा कि मैं अमेठी के विकास को सुनिश्चित कर सकूं।
मई 2004 लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी विशाल बहुमत से जीते। 1,00,000 मतों के बड़े अंतर से उनकी जीत हुई। जब कांग्रेस ने सत्तारूढ़ भाजपा को अप्रत्याशित रूप से हराया। इस अभियान में उनकी छोटी बहन प्रियंका गांधी उनके साथ क़दम से कदम मिलाकर उनके साथ थीं।
सन 2006 तक उन्होंने कोई अन्य पद ग्रहण नहीं किया और निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया। भारत और अंतरराष्ट्रीय प्रेस में व्यापक रूप से चर्चा थी कि सोनिया गांधी उन्हें राष्ट्रीय स्तर का कांग्रेस नेता बनाने के लिए तैयार कर रही हैं।
राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी ने 2006 के चुनाव में रायबरेली से पुन: निर्वाचित होने के लिए अपनी मां सोनिया गांधी के चुनाव अभियान को संभाला और सोनिया गांधी 4,00,000 मतों से विजित हुईं। दिवंगत राजीव गांधी की इस मंशा और उनके सपनों को उनके पुत्र और अमेठी के सांसद राहुल गांधी ने पढ़ा है जिसे वह निरंतर अमेठी की जमीन पर उतारने में अपना कदम बढ़ाते जा रहे हैं। राहुल गांधी की भी मंशा नई तकनीक और विज्ञान की हर लाभकारी योजना अमेठी के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है।
साफ्टवेयर के बादशाह बिल गेट्स का राहुल के साथ दौरा अमेठी में कंप्यूटर योजना को उतारने का ही संकेत माना जा रहा है। दिवंगत राजीव गांधी ने 1985 में अमेठी में विज्ञान प्रदर्शनी का आयोजन कर अमेठी की जनता में विज्ञान के प्रति जागरुकता पैदा करना तथा विकसित हो रही नयी तकनीक के प्रति उस समय पैदा किए जा रहे भ्रम को दूर करना था। इस प्रदर्शनी में विज्ञान के करीब-करीब सारे प्रयोगों के माडल व उनके कार्य व्यवहार, लाभ-हानि को दर्शाया गया था। उस समय कंप्यूटर और मोबाइल संचार क्रांति का सूत्रपात नहीं हुआ था।
जनवरी 2006 में, हैदराबाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सम्मेलन में, कांग्रेस पार्टी के हजारों कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी को पार्टी में महत्वपूर्ण नेतृत्व की भूमिका के लिए प्रोत्साहित किया और प्रतिनिधियों को संबोधित करने की मांग की। राहुल गांधी ने कहा, मैं आपकी भावनाओं और समर्थन के लिए आप सबका आभारी हूं। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैं आपको निराश नहीं करूंगा। उन्होंने कहा कि धैर्य बनाये रखें और महत्वपूर्ण पद लेने से मना कर दिया। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, जो 2007 में हुए, वह कांग्रेस अभियान में प्रमुख व्यक्ति थे। इस चुनाव में कांग्रेस ने 8.53 फीसद मतदान के साथ 22 सीटें जीती, इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का वर्चस्व रहा।
24 सितंबर 2007 में राहुल गांधी को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव नियुक्त किया गया। इसी समय उन्हें युवा कांग्रेस और भारत का राष्ट्रीय छात्र संघ का निरीक्षण अधिकार दिया गया और इस तरह राहुल गांधी को युवा नेतृत्व का अवसर मिला। युवा नेता के रूप में नवंबर 2008 को उन्होंने नई दिल्ली में अपने आवास पर कम से कम 40 लोगों को सूक्षमता से चुनने के लिए साक्षात्कार आयोजित किया,सक्षात्कार में चुने गये युवा भारतीय युवा कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब से वह सितंबर 2007 में महासचिव नियुक्त हुए हैं तब से इस संगठन को परिणत करने के इच्छुक हैं।
लोकसभा चुनाव 2009
लोकसभा चुनाव 2009 में उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी से अपने प्रतिद्वंदी को 3,33,000 मतों के भारी अंतर से पराजित किया। इन चुनावों में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 21 सीट जीतकर पुनर्जीवन प्राप्त किया और इसका श्रेय राहुल गांधी को दिया गया। इस चुनाव में उन्होंने छह सप्ताह में 125 जन सभाओं को संबोधित किया था।
राहुल गांधी का व्यक्तिगत जीवन
राहुल गांधी अविवाहित हैं। अप्रैल 28, 2004 में इंडियन एक्सप्रेस में स्पेन की एक वास्तुकार वरौनिका के साथ उनके संबंध होने की सूचना छपी थी। दोनों विश्वविद्यालय में मिले थे।
रुचियां
गांधी व नेहरू परिवार की चौथी पीढ़ी से संबंधित राहुल गांधी युवा कांग्रेस का एक महत्वपूर्ण चेहरा हैं। राजनीति में उनकी रुचि होनी स्वाभाविक ही है। इसके अलावा उन्हें विभिन्न जगहों पर घूमना और तैराकी करना भी बहुत पसंद है। पढऩा, इंटरनेट, संगीत, शतरंज और फ्लाइंग। उन्हें तेज बाइक चलाने का भी शौक है। वह राजीव गांधी फाउंडेशन, संजय गांधी मेमोरियल ट्रस्ट, राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट, जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल फंड से भी जुड़े हुए हैं।
आलोचना
राजनीति के युवा चेहरा राहुल गांधी के साथ भी कई विवाद भी जुड़े हुए है
- 2006 में न्यूजवीक ने कहा कि उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की अपनी डिग्री पूरी नहीं की थी या मॉनिटर ग्रुप में काम नहीं किया था, तब राहुल गांधी ने कानूनी नोटिस भेजा, बाद में न्यूजवीक इस बात से मुकर गया।
- राहुल गांधी ने बांग्लादेश मुक्ति युद्ध को, अपने परिवार की सफलताओं में माना। इस बयान से भारत के कई राजनीतिक दलों को आलोचना करने का अवसर मिला।
- 2007 के उत्तर प्रदेश चुनाव अभियान में उन्होंने कहा, यदि गांधी-नेहरू परिवार से कोई राजनीति में सक्रिय होता तो बाबरी मस्जिद नहीं गिरी होती। 1992 में मस्जिद के विध्वंस के समय भारत के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव थे, गांधी के इस बयान को नरसिंह राव की आलोचना कहा गया।
- 2008 में, राहुल गांधी की शक्ति का पता चला। राहुल गांधी को चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय में छात्रों को संबोधित करने के लिए सभागार का उपयोग करने से रोका गया, मुख्यमंत्री मायावती की राजनीतिक चालबाजियों के कारण बाद में, विश्वविद्यालय के कुलपति वीके सूरी को राच्यपाल श्री टीवी राजेश्वर, जो कुलाधिपति भी थे, ने बाहर कर दिया, जो गांधी परिवार के समर्थक थे। इस घटना को शिक्षा की राजनीति के रूप में जाना गया और टाइम्स ऑफ इंडिया में एक हास्यचित्र में लिखा गया वंश संबंधित प्रश्न का उत्तर राहुल जी के पैदल सैनिकों द्वारा दिया जा रहा है।
- जनवरी 2009 में ब्रिटेन के विदेश सचिव डेविड मिलीबैंड के साथ, उत्तर प्रदेश में उनके संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में, अमेठी के पास एक गांव में, उनकी गरीबी यात्रा के लिए आलोचना की गई।
- एक निजी चैनल में इंटरव्यू देने के दौरान राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक दल जैसे हिंदूवादी संगठन को सिमी जैसे आतंकी संगठन के समान कहा था। ऐसा बयान देने पर आरएसएस और कांग्रेस में दरार पैदा हो गई थी।
- वर्ष 2006 में अमेठी में प्रचार के दौरान अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर कांग्रेस कार्यकर्ता की बेटी सुकन्या देवी का बलात्कार करने जैसा संगीन आरोप भी राहुल गांधी पर लगा।
- हाल ही में मुंबई धमाकों के बाद प्रेस के सामने राहुल गांधी ने कह दिया कि हर हमले को रोका जाना संभव नहीं है। किसी जिम्मेदार जन नेता का ऐसा बयान नि:संदेह विवाद पैदा करने वाला था।
मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर

Web Title: rahul gandhi profile
(Hindi news from Dainik Jagran, news national Desk)

प्रतिक्रिया दें

English Hindi
Characters remaining

लॉग इन करें
यानिम्न जानकारी पूर्ण करें
नाम*
ईमेल*
Word Verification:*
Type the characters you see in the picture below
  • vinod19 Jun 2013, 07:45:52 PM
    दुर्भाग्य की बात है कि उत्तराखन्द मे लोग मर रहे है और सारा देश दुख मना रहा है और दूसरि तरफ कोन्ग्रेस्स के लोग राहुल के जन्म दिन पर धोल नगादे बजा रहे है. वाह रे कोन्ग्रेस्स. v
  • test19 Jun 2013, 07:08:12 PM
    fucking media

क्या राज्य सरकार द्वारा नरेंद्र मोदी को उत्तराखंड के दौरे की अनुमति देने से इन्कार करने के बाद राहुल गांधी को दौरे की अनुमति देना सही है?
  • उपाध्यक्ष की कुर्सी पर राहुल गांधी

शुक्रवार, 10 मई 2013

दार्जीलिंग यात्रा की कहानी



बृहस्पतिवार, 9 मई 2013


  1.  मेरे साले जगत मेहता ने फेसबुक के अपने और मेरे पेज पर दो पुराने फोटो चस्पां कर दिए, जिनमें मैं, मेरी पत्नी द्रौपदी और बेटा पुरु हैं. ये फोटो १९८८ में दार्जीलिंग के हैं. बहुत सारे मित्रों ने कहा यह बहुत अच्छा फोटो है. भाई अतीत हमेशा ही अच्छा लगता है, चाहे वह कितना ही बुरा क्यों न रहा हो. खैर फोटोओं को देख कर मेरे दिमाग की रील घूमने लगी और मुझे लगा कि उस यात्रा की कहानी लिखी जाए. तो पेश है पूरी कहानी: 
    अभी ठीक से याद नहीं आ रहा कि वह दिसंबर १९८७ था या दिसंबर १९८८. शायद ८८ ही रहा होगा. हम कलकत्ते में थे. जून १९८६ में नवभारत टाइम्स, मुंबई की नौकरी छोड़ कर मैं हिन्दी अफसर बनकर आईडीबीआई के पूर्वी क्षेत्रीय कार्यालय कलकत्ता चला गया था. बड़ी ठाट की नौकरी थी. बांसद्रोणी में सुन्दर मकान मिला हुआ था. हम दो और हमारा एक, साथ में मेरी ईजा. मुम्बई की भागम भाग की अखबारी नौकरी के बाद जैसे अचानक आराम की ऐय्याशी भरी नौकरी मिल गयी थी. फ्रीलांसिंग भी जारी थी. धर्मयुग, नभाटा, दिनमान, चौथी दुनिया और परिवर्तन जैसी पत्रिकाओं में लिखता और खुद को धन्य समझता.
    सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. तभी जिंदगी में एक तूफ़ान सा आया. एक दिन अचानक मेरी पत्नी ने बोलना बंद कर दिया. उसका मुंह ही नहीं खुल रहा था. बाईं तरफ का गाल फूल गया था. रोने लगी. मेरी समझ में कुछ नहीं आया. डॉ मजूमदार के पास ले गया. वह बोले कि कुछ भी हो सकता है. दांत में कुछ इन्फेक्शन भी हो सकता है और मम्स भी हो सकते हैं. फिर बोले मम्स एक ही तरफ नहीं हो सकते. उन्होंने कुछ एंटीबायोटिक दी, बोले कल तक कुछ सूजन घट जायेगी, तब बात करेंगे. दूसरे दिन गए. तो बोले कुछ ख़तरा लगता है. फिर बोले डरिए नहीं, हमसे बड़े डॉ. हैं चक्रबर्ती, उनके पास जाइए. हम और डर गए. चक्रबर्ती के पास गए. उसने ढेर सारी दवाइयां लिख दी. और बोले ऑपरेशन होगा. बाएं जबड़े में सिस्ट है. मैंने पूछा, वह क्या होता है, डॉ. बोला, समझो कैंसर की तरह है. बीच-बीच में ढाढस भी देता. कोई बात नहीं, हम हैं तो. ऑपरेशन जल्दी करना होगा. चार हज़ार लगेगा. ( तब चार हज़ार बहुत होते थे.) मैं मन ही मन बहुत घबरा गया. शादी हुए अभी दो-तीन वर्ष ही हुए थे. बहुत बुरे-बुरे ख़याल आने लगे. लेकिन मैंने हिम्मत की, ऑपरेशन के लिए तैयार हो गया. दूसरे दिन एडमिट होना था.
    मैं कभी कभी बिरला फाउन्डेशन जाया करता था. यह मेरे शेक्सपीयर सरणी वाले दफ्तर के नजदीक ही था. वहाँ से कुछ अनुवाद आदि का काम मिलता था. वहाँ एन्साक्लोपीडिया के संपादक पृथ्वीनाथ शास्त्री थे. बड़े विवादास्पद व्यक्ति थे लेकिन मुझे बहुत चाहते थे. उन्होंने मेरे चेहरे पर परेशानी के संकेत पढ़े. बोले क्या बात है? मैंने बता दिया. बोले, चिंता मत करो, यह मामूली बात है. हाँ, एक और डॉ हैं अपने मित्र, उनकी भी राय ले लो. वह मेडिकल कालेज में डेंटल विभाग के हेड हैं. कलकत्ता के सारे दांतों के डॉ. उनके चेले हैं. वह सही राय देंगे. उन्होंने कहा, मैं टाइम लेता हूँ, तुम अभी घर जा कर पत्नी को ले आओ और रिपोर्ट्स भी. उन्होंने फोन लगाया. डॉक्टर घर जा चुके थे. लेकिन उन्होंने घर पर ही बुलाया. बहुत दूर रहते थे. शायद साल्ट लेक की तरफ. शाम को उनके घर पहुंचे. अपनी भोलू (सिल्वर प्लस नामक मोपेड, जिसका नाम हमने भोलू रखा हुआ था.) पर सवार होकर. डॉ बहुत भले आदमी थे. उन्होंने मुंह देखा. कागज़ देखे. बोले, जो बीमारी पकड़ी है, वह सही है. स्कीम भी सही है. हाँ, पैसे कुछ ज्यादा बोले हैं. फिर बोले, वैसे चक्रबर्ती भी मेरा ही विद्यार्थी है, लेकिन मैं तुम्हें अपने सबसे अच्छे विद्यार्थी के पास भेजता हूँ. वह कलकत्ता का सबसे अच्छा डॉ. है. अरविन्द दत्त. उसके पास चले जाओ. यह पर्ची दे देना. इन्तजार कर लेना, लेकिन आज दिखा कर ही जाना. हम भोलू पर सवार हुए. साल्ट लेक से भवानीपुर के लिए चल दिए. रात आठ बजे डॉ के पास पहुंचे. पर्ची भिजवाई. सन्देश मिला कि बैठ जाइए. दस बजे तक नंबर नहीं आया. द्रौपदी को तो नींद ही आ गयी थी. जब सब लोग चले गए, डॉ. ने बुलाया. जबड़ा देखा. कागज़ देखे. बोला, ऑपरेशन परसों करेंगे. सैमरिटन क्लिनिक में.
    ऐसा गंभीर डॉ. पहले कभी नहीं देखा था. हर शब्द तौल कर बोलता था. पर्ची पर शब्द नहीं, जैसे फूल लिख रहा हो. क्या कमाल की रायटिंग थी! ऑपेरशन के दिन हम सुबह ही पहुँच गए. मैं अकेला ही था. बेटे को पड़ोसियों के पास छोड़ आया था. द्रौपदी बहुत घबरा गयी थी. हरे वस्त्रों में लपेट कर ऑपरेशन थिएटर ले जाने लगे तो वह रोने लगी. घबराया तो मैं भी था, पर दिल थाम कर बैठा था. इतने में डॉ. आया. उसने धीरे से द्रौपदी से माथे पर हाथ फेरा तो उसका भय छूमंतर हो गया. डेढ़ घंटे ऑपरेशन चला. एक अन्य बैंक में हिन्दी अफसर विजय कुमार शर्मा मुझे ढाढस देने क्लिनिक पहुंचे. तब लगा परदेश में रहने का क्या मतलब होता है. मैंने दिल्ली अपनी ससुराल फोन लगाया. द्रौपदी की मदद के लिए वहाँ से मेरी साली शांति चली आयी, राजधानी में बैठकर. मेरी ससुराल वालों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे हमेशा मदद के लिए आ खड़े होते हैं. सेवा का भाव उनमें कूट-कूट कर भरा है. सबसे बड़ी बेटी होने के नाते द्रौपदी से वे बेतहाशा प्यार करते हैं. तब पहली बार मुझे लगा कि नौकरी घर के आस-पास ही होनी चाहिए. 

    शान्ति आयी तो थी अपनी दीदी की मदद और दुर्गा पूजा देखने के लिए लेकिन हावडा स्टेशन पर उतरते ही उसे इतनी गरमी लगी कि घर पहुँचते-पहुँचते वह खुद ही बीमार पड़ गयी. डॉ. के पास ले गया. दवा भी बेअसर रही. एक हफ्ता पड़ी रही. सेवा करने आयी थी, सेवा ले रही थी. तब तक पूजा भी खत्म हो गयी. अंतिम दिनों कुछ पंडाल ही दिखा पाया.
    दो हफ्ते बड़े तनाव में गुजरे. नवंबर का महीना जा रहा था. हमें लगा कि चलो कहीं घूम आया जाए. मन बदल जाएगा. तभी मैंने दार्जीलिंग का प्लान बनाया. यह सुनकर दोनों बहनें बहुत खुश हुईं. ईजा शायद उन दिनों पहाड़ गयी हुई थीं. मैंने एलटीसी लिया और दार्जिलिंग की तैयारी शुरू हुई. रेल से सिलीगुड़ी पहुंचे. फिर टॉय ट्रेन से दार्जीलिंग जाना चाहते थे, लेकिन उन दिनों गोरखालैंड आंदोलन के कारण ट्रेन बंद थी, लिहाजा बस से ही यह पहाड़ी यात्रा करनी पड़ी. दार्जीलिंग यात्रा और वह भी बिना टॉय ट्रेन के. मजा नहीं आया. मैं अपने कॉलेज के दिनों में ही इस ट्रेन की सैर कर चुका था. उसकी मनोरम यादें शेष थीं. खैर हम दार्जीलिंग पहुंचे. कोई होटल आदि बुक नहीं किया था. एक आदमी का पता था. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. खुद ही होटल आदि के बारे में पूछा तो अनाप-शनाप किराया माँगने लगे. इतने तो अपनी जेब में थे भी नहीं. तभी अखबारों की एक दूकान दिखी. सोचा अपनी लाइन का आदमी है, शायद कुछ मदद करेगा. कुछ जान-पहचान लगाई. अपने लेखक होने की बात बताई. दुकानदार सयाना था. नाम था पदम दत्त शर्मा. बोले किस नाम से लिखते हैं. बोला, गोविंद खोलिया. (तब मैं सरकारी नौकरी में होने के कारण इसी नाम से लिखता था). वह बोले कि क्या कभी धर्मयुग में भी लिखा. मैंने कहा, हाँ. वह सज्जन तहखाने में गए और तीन-चार पत्रिकाएं ले आये. वे सब नेपाली में थीं. बोले, आपके लेख हमने अनुवाद करवाके रिप्रिंट किए हैं और जनता में बांटे हैं. ये सारी पत्रिकाएं भूमिगत हैं. आप तो हमारे समर्थक हैं. आपने हमारी बात को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया है, इसलिए हम आपके आभारी हैं. अब बताइए, हम आपकी क्या मदद करे?
    मैं गदगद था. एक लेखक को और क्या चाहिए? पत्रकारिता का क्या असर होता है, यह मैंने उसी दिन जाना. मैंने कहा, मुझे कुछ नहीं चाहिए. आप ज़रा मुझे एक कमरा दिला दीजिए. मैं बच्चों सहित दार्जीलिंग घूमने आया हूँ. बाक़ी बातें बाद में होंगी. उन्होंने एक लड़का भेजा. एक माध्यम दर्जे के होटल में एक बड़ा सा कमरा दिला दिया, बहुत ही सस्ते किराए में. शायद एक-तिहाई में. और हमने चार-पांच दिन बड़े आनंद से दार्जीलिंग भ्रमण किया. दोनों बहनों ने गोर्खाली लड़कियों की पोशाक पहन कर चाय की पत्तियां तोड़ते हुए फोटो खिंचवाईं. हमने टायगर हिल में सूर्योदय देखा. बेता पुरु तब दो-ढाई साल का था. ठण्ड से उसके होठ लाल हो गए. वह रोने लगा. लेकिन जैसे ही बाल सूर्य कंचनजंघा के ऊपर प्रकट हुआ, सारी ठण्ड दूर हो गयी. पुरु भी रोते-रोते अंगुली से कहने लगा, देखो- सूरज! एक दिन लोगों ने मुझे सुभाष घीसिंग से भी मिलवाया. तब उत्तरी बंगाल में उनकी तूती बोलती थी. उनके एक इशारे पर तूफ़ान मच जाता था. हम लोग घीसिंग के गाँव मिरिक भी गए. डीयर पार्क, एच एम आई, और भी कई जगहें देखीं. दार्जीलिंग की वह छाप मानस पटल से कभी नहीं मिटती. – गोविंद सिंह

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

भारतीय सिनेमा में अभिनेत्रियाँ महज़ एक 'सेक्स सिंबल'?


 

 

 

 सोमवार, 29 अप्रैल, 2013 को 13:20 IST तक के समाचार
विद्या बालन
प्रकृति का नियम है जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे चीज़ें ढलने लगती हैं. लेकिन बात अगर भारतीय सिनेमा की हो तो 100 साल का होने जा रहा ये सिनेमा दिन ब दिन जवान होता जा रहा है.
सन 1913 में दादा साहेब फ़ाल्के की मूक फिल्म 'राजा हरिश्चन्द्र' से अपनी शुरुआत करने वाले भारतीय सिनेमा की शतकीय पारी तीन मई 2013 को पूरी हो रही है.
इन 100 सालों में सिनेमा ने एक नहीं कई बदलाव देखें हैं. लेकिन एक बात जो नहीं बदली वो है फिल्मों में अभिनेत्रियों की प्रस्तुति.
शायद अभिनेत्रियों को मात्र एक खूबसूरत वस्तु की तरह प्रस्तुत करने की सोच की वजह से ही ज़्यादातर फिल्मों में उन्हें कम और उत्तेजक वस्त्रों में दिखाया गया और ये सिलसिला आज भी बरक़रार है.

कैसे हुई शुरुआत

बिपाशा बासु
भट्ट कैंप की फिल्म 'जिस्म' में बिपाशा ने कई बोल्ड दृश्य किए.
क्या आप जानते हैं कि फिल्मों में इस सिलसिले की शुरुआत हुई कहां से?
बीडी गर्गा ने अपनी किताब 'सो मेनी सिनेमाज़- द मोशन पिक्चर इन इंडिया' में लिखा है कि सन 1921 में आई फिल्म 'सती अनुसूया' में पहली बार किसी भारतीय फ़िल्म में नग्न दृश्य दिखाया गया था. इस दृश्य में सकीनाबाई नाम की एक अभिनेत्री को पूर्ण नग्न दिखाया गया. इस किताब के मुताबिक ये सीन फिल्म में कुछ ही क्षणों के लिए था.
हालांकि किताब में लिखे इस तथ्य को फिल्म शास्त्री और समीक्षक जय प्रकाश चोकसे सत्यापित नहीं करते. वो कहते हैं, ''इसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है लेकिन ये संभव इसलिए है क्योंकि 1918 में जब ब्रितानी सरकार ने भारत में 'सेंसरशिप एक्ट' लागू किया उस वक़्त इस एक्ट में सिर्फ एक धारा थी कि देश भक्ति का प्रचार करने वाली फिल्मों को रोक दिया जाए. नग्नता और चुंबन के खिलाफ इस एक्ट में कोई धारा नहीं थी.''
चोकसे की अगर मानें तो 1922 में आई फिल्म 'पति पत्नी' में इटली की अभिनेत्री मिनैली ने कुछ बहुत ही बोल्ड दृश्य दिए थे. उसके बाद 1942 में बेगम पारा नाम की अभिनेत्री ने 'चांद' फिल्म में कुछ बेहद उत्तेजक दृश्य किए.
मल्लिका
मल्लिका तो जानी ही जाती है अपनी बोल्डनेस के लिए.
चोकसे कहते हैं, ''बेगम पारा की एक बहुत ही बोल्ड तस्वीर 1943 में छपी 'लाइफ' पत्रिका के कवर पर भी आई. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सैनिक अपने बंकरों में बेगम पारा की यही तस्वीर चिपका के रखते थे.''
कम या ज्यादा लेकिन फिल्मों में अंगप्रदर्शन करने वाली अभिनेत्रियों की सूची बहुत लम्बी है. इस सूची में आप बेगम पारा से लेकर नलिनी जयवंत, नर्गिस, वैयजंती माला, शर्मीला टैगोर, बिंदु, ज़ीनत अमान, डिंपल कपाडिया, सिमी ग्रेवाल, मन्दाकिनी से लेकर आज के दौर की कई अभिनेत्रियां जैसे नंदिता दास, मल्लिका शेरावत, ईशा गुप्ता, विद्या बालन और बिपाशा बासु के नाम शामिल कर सकते हैं. इस सूची में प्रादेशिक सिनेमा की अभिनेत्रियों भी शामिल हैं.

राजा रवि वर्मा का प्रभाव

भारतीय सिनेमा में स्त्री को यूं कामुक रूप में या फिर नग्न या अर्धनग्न रूप में प्रस्तुत किए जाने की बात हो और महान् चित्रकार राजा रवि वर्मा का ज़िक्र न हो ये कैसे हो सकता है.
जयप्रकाश चोकसे कहते हैं, ''हिंदुस्तानी सिनेमा में आप जब भी नग्नता, बोल्डनेस या फिर कामुकता की बात करें तो आपको राजा रवि वर्मा की तस्वीरों की बात करनी ही चाहिए क्योंकि उनकी चित्रकारी का भारतीय सिनेमा पर गहरा प्रभाव रहा है. अगर आपको ‘राम तेरी गंगा मैली’ में मंदाकिनी का वो दृश्य याद है जिसमें वो झरने के नीचे सफ़ेद साड़ी में नहा रही हैं तो ठीक वैसी ही एक पेंटिंग राजा रवि वर्मा की भी है.''
ये सब तो ठीक है लेकिन फिर भी एक सवाल जो अकसर कई लोग उठाते हैं वो ये कि क्या फिल्मों में अभिनेत्रियों का यूं 'सेक्स सिंबल' के तौर पर इस्तेमाल करना सही है?
करीना कपूर
करीना कपूर हाल ही में 'हीरोइन' फिल्म में नज़र आई.
इस बारे में क्या राय रखती हैं टीवी और फिल्म निर्माता एकता कपूर जिन्होंने 'रागिनी एमएमएस', 'लव सेक्स और धोका' और 'द डर्टी पिक्चर' जैसी फिल्मों का निर्माण किया है.

एकता का जवाब

दिल्ली में सिनेमा के 100 सालों पर आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंची एकता कहती हैं, ''जहां तक फिल्मों में नग्नता का सवाल है हम हमेशा से ये सुनते आ रहे हैं कि फिल्मों में औरतों को एक भोग विलास की वस्तु की तरह पेश मत करो, हीरोइन को कम कपड़ों में मत दिखाओ. जो लोग ऐसी बातें करते हैं मैं उनसे ये पूछना चाहती हूं कि जब जॉन अब्राहम अपने कपड़े उतारते हैं तब किसी को कोई आपत्ति क्यों नहीं होती?''
अपनी फिल्म 'द डर्टी पिक्चर' के बारे में बात करते हुए एकता कहती हैं, ''जब हमने ये फिल्म बनाई सबने हमसे ये कहा कि आप कैसे एक औरत की कामुकता को इस तरह से दिखा सकते हैं. मुझे पता था कि इस फिल्म को बनाकर मुझे पैसों का भरी नुकसान झेलना पड़ सकता है लेकिन फिर भी मैंने ये फिल्म इसलिए बनाई क्योंकि मैं चाहती थी कि समाज एक स्त्री की शारीरिक ज़रूरतों के बारे में भी समझे और एक स्त्री के शरीर को सिर्फ अपने भोग की वस्तु न समझे.''
विद्या
विद्या को 'द डर्टी पिक्चर' के लिए राष्ट्रिय पुरस्कार मिला
एकता जो कह रही हैं शायद वो अपनी जगह ठीक हो. लेकिन कुछ फिल्मकार ऐसे भी हैं जो इस बारे में ये दलील देते आए हैं कि वो तो अपनी फिल्मों में वही दिखाते हैं जो दर्शक देखना चाहते हैं.
फिल्मों में स्त्री की अभिव्यक्ति कैसे हो इस बात पर बहस और मतभेद शायद हमेशा रहे. ये सवाल भी हमेशा उठे कि फिल्मों में अभिनेत्रियों को कामुक अंदाज़ में पेश करना ठीक है या नहीं. शायद फिल्मकार इसे अपनी कलात्मक स्वतंत्रता कहें.
लेकिन ये सवाल शायद अब भी बरक़रार है कि क्या कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी करना या दिखाना ठीक है. इस सवाल का जवाब खोजने में अगले 100 तो नहीं पर हां एक लम्बा समय ज़रूर लग सकता है.

इसे भी पढ़ें



मंगलवार, 26 मार्च 2013

कृष्ण के वृंदावन में अब गोपियाँ नहीं विधवाएं हैं




 सोमवार, 25 मार्च, 2013 को 07:20 IST तक के समाचार
वृंदावन में हजारों विधवाएं दयनीय स्थिति में जी रही हैं
भारत में हर साल हजारों विधवाएं उत्तर प्रदेश के वृंदावन का रुख़ करती हैं. परिवार वालों ने उन्हें छोड़ दिया है और अब इस दुनिया में वे अकेली हैं. इनमें से कुछ तो सैकड़ों मील का सफ़र तय करने के बाद वृंदावन पहुंचती हैं लेकिन कोई नहीं जानता कि वो ऐसा क्यों करती हैं.
भारत में मंदिरों और धार्मिक स्थलों की भरमार है. लेकिन यमुना के तट पर स्थित वृंदावन का खास महत्व है क्योंकि ये कृष्ण की नगरी है.
वृंदावन में सैकड़ों मंदिर हैं और यहां हर किसी की जुबान पर कृष्ण और उनकी प्रेमिका राधा का ही नाम है. हर साल दुनियाभर से लाखों की संख्या में कृष्ण भक्त यहां पहुंचते हैं.
लेकिन इस सबसे दूर वृंदावन का एक स्याह पहलू भी है. इसे विधवाओं के शहर के नाम से भी जाना जाता है.
मंदिरों के बाहर आपको सादी सफेद साड़ियां पहने ये विधवाएं भीख मांगते मिल जाएंगी. इनमें से अधिकांश उम्रदराज होती हैं.

बदतर जिंदगी

भारत में विधवाएं अब सती नहीं होती हैं लेकिन जिंदगी अब भी उनके लिए बदतर है.
विधवाओं को अशुभ माना जाता है. तमाम कानूनों के बाद आज भी उन्हें पति की संपत्ति से बेदखल कर दिया जाता है और वे दर-दर भटकने के लिए मजबूर हो जाती हैं.
धार्मिक ज्ञान से भरे लोग हो या समाजशास्त्री इस सवाल का ठोस जवाब किसी के पास नहीं है कि वृंदावन में ऐसा क्या है कि पूरे भारत से खासकर बंगाल से विधवाएं यहां का रुख़ करती हैं.
केवल वृंदावन में ही छह हजार विधवाएं हैं और आसपास के इलाक़ों में भी बड़ी संख्या में विधवाओं ने अपना ठिकाना बना रखा है.
वृंदावन में विधवाएं
दूर दूर से विधवाएं वृंदावन में आकर रहती हैं
इनमें से कई तो अपनी बची खुची जिंदगी को राधा कृष्ण की सेवा में लगाने के इरादे से यहां पहुंचती है जबकि बाकी अपने परिजनों की बेरुखी और ज्यादतियों से बचने के लिए वृंदावन का रुख करती हैं.
ये भारतीय समाज का ऐसा पहलू है जिसे सरकार दुनिया की नज़रों से छिपाना चाहेगी क्योंकि लाख कोशिशों के बावजूद ये समस्या सुलझाई नहीं जा सकी.
दिल्ली के एक गैर सरकारी संगठन मैत्री ने इनमें से कुछ विधवाओं को भोजन और आश्रय देने का जिम्मा उठा रखा है.

दया पर गुजरती जिंदगी

एक छोटे मंदिर में कुछ विधवाएं पालथी मारकर फर्श पर बैठी हैं जबकि युवा स्वयंसेवक उन्हें चावल और दाल परोस रहे हैं.
इनमें से कुछ पश्चिम बंगाल से 1000 मील से भी अधिक दूरी तय करके यहां पहुंची हैं. कई बार वे खुद यहां पहुंचती हैं और कई बार उनके परिजन उन्हें यहां छोड़ जाते हैं.
सैफ अली दास 60 साल की हैं लेकिन जमाने की मार ने उन्हें वक्त से पहले ही बूढ़ा बना दिया है. उन्होंने कहा कि उनके पति पियक्कड़ थे और 12 साल पहले उनका देहांत हो गया था.
उनकी एक बेटी थी जो अस्पताल में चल बसी और बेटे का संपत्ति विवाद में खून हो गया. बेटे की मौत के बाद उनकी दुनिया वीरान हो गई और उन्होंने बाकी का जीवन वृंदावन में बिताने का फैसला किया.
वहीं सोंदी 80 साल की हैं. उनके पति का जवानी में ही निधन हो गया था. उनके बच्चे हैं लेकिन जीवन की सांध्य बेला में बहू ने उन्हें बेघर कर दिया.

भक्ति ही विकल्प

वृंदावन में विधवाएं
बहुत सी विधवाएं मंदिरों में भजन गाती हैं या फिर भीख मांग कर गुजारा करती हैं
विधवाओं के लिए चार आश्रम संचालित किए जा रहे हैं लेकिन अधिकांश किराए के मकान में रहती हैं और किराया चुकाने के लिए भीख मांगती हैं.
इनमें कुछ महिलाओं का कहना है कि स्थानीय लोग उनसे ठीक से पेश नहीं आते हैं. सिर्फ वृंदावन आने वाले श्रद्धालुओं की दी गई भीख से उनका जीवन चलता है.
गौरी दास 1971 में भारत और बांग्लादेश सीमा पर तनाव की वजह से वृंदावन चली आई थीं. तब उनके पति भी उनके साथ आए थे. उन दोनों की तीन बेटियां थीं.
वो अब बीते 15 साल से वृंदावन में अकेली रह रही हैं और मानती हैं कि राधा की भक्ति के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है.
मंदिर में भजन गाने के लिए उन्हें कुछ सिक्के मिलते हैं. गौरी दासी उन करोड़ों लोगों में शामिल हैं जो आध्यात्मिक रास्ते के लिए दुनियादारी को छोड़ते हैं. लेकिन भगवान के इन सेवकों में बहुत से लोग दयनीय जिंदगी जीने को मजबूर हैं.

इसे भी पढ़ें