शनिवार, 6 जुलाई 2013

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली



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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली
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विवरण दिल्ली देश के उत्तरी मध्य भाग में गंगा की एक प्रमुख सहायक यमुना नदी के दोनों तरफ बसी है। दिल्ली भारत का तीसरा बड़ा शहर है। यह एक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली है।
भौगोलिक स्थिति उत्तर- 28°36′36, पूर्व- 77°13′48
मार्ग स्थिति दिल्ली, राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर और आगरा के रास्ते कोलकता से जुड़ी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से सूरत, अहमदाबाद, उदयपुर, अजमेर और जयपुर के रास्ते मुंबई से जुड़ी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 1 से जालंधर, लुधियाना और अंबाला होते हुए अमृतसर और राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से रामपुर और मुरादाबाद के रास्ते लखनऊ से जुड़ी है।
हवाई अड्डा इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा
रेलवे स्टेशन पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, हज़रत निज़ामुद्दीन
बस अड्डा आई.एस.बी.टी, सराय काले ख़ाँ, आनंद विहार
यातायात साईकिल रिक्शा, ऑटो रिक्शा, टैक्सी, लोकल रेल, मेट्रो रेल, बस
क्या देखें दिल्ली पर्यटन
कहाँ ठहरें होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह
क्या खायें पंजाबी खाना, चाट, पराठें वाली गली के 'पराठें'
एस.टी.डी. कोड 011
सावधानी आतंकवादी गतिविधियों से सावधान, लावारिस वस्तुओं को ना छुएं, शीत ऋतु में कोहरे से और ग्रीष्म ऋतु में लू से बचाव करें।
Map-icon.gif गूगल मानचित्र, इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा
संबंधित लेख लाल क़िला, इण्डिया गेट, जामा मस्जिद, राष्ट्रपति भवन ।
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भारत के इतिहास में दिल्ली का उल्लेख महाभारत काल से ही मिलता है। महाभारत काल में दिल्ली का नाम इन्द्रप्रस्थ था। दूसरी शताब्दी के 'टालेमी' के विवरण में ट्राकरूट पर मौर्य शासकों द्वारा बसाई गई नगरी 'दिल्ली' नाम से उल्लिखित है। बाद में मौर्य, गुप्त, पाल आदि अनेक राजवंशों का दिल्ली पर शासन रहा। दिल्ली शहर की स्थापना के सन्दर्भ में कई कथाएँ प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि तोमर वंश के अनंगपाल ने 11 वीं शताब्दी में इसकी स्थापना की थी, जबकि कुछ पुस्तकों में वर्णित है कि तोमर राजपूतों के सरदार अनंगपाल ने 737 ई. में 'दिल्ली का गाँव' में लालकोट नामक नगर बसाकर राजधानी स्थापित की। 12वीं शताब्दी में यह राज्य तोमर राजपूतों से चौहान राजपूतों के क़ब्ज़े में आ गया। तत्पश्चात् दिल्ली बीसलदेव चौहान तथा अनके वंशज पृथ्वीराज चौहान के हाथों में पहुँचा। कुछ पुस्तकों में यह भी उल्लिखित है कि प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व एक राजा 'ढिलू' के नाम पर इसका नाम दिल्ली पड़ा, जो बाद में देलही, देहली, दिल्ली आदि नामों से जाना गया।
टिप्पणी दिल्ली का इतिहास व संस्कृति के लिए देखें:- दिल्ली
तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद दिल्ली पर मुसलमानों का आधिपत्य क़ायम हो गया। इसके बाद 16वीं सदी में दिल्ली पर मुग़लों का अधिकार हो गया। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ के वर्षों में दिल्ली पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो गया। सन् 1911 में यह कलकत्ता की जगह भारत की राजधानी बनायी गई। सन् 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस भारत की राजधानी के रूप में स्वीकार किया गया। संविधान के 69वें संशोधन (1991) द्वारा दिल्ली में विधान सभा का गठन किया गया। इस विधेयक में दिल्ली को देश की राजधानी होने के नाते केन्द्रशासित प्रदेशों में विशेष दर्जा दिया गया है। इस केन्द्रशासित प्रदेश को 1 फ़रवरी, 1992 से नया नाम 'राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली' दिया गया।

इतिहास

  • दिल्ली का आरम्भिक नाम इन्द्रप्रस्थ था। महाभारत में पाण्डवों की राजधानी के रूप में इसकी चर्चा है।
  • यमुना तट पर अवस्थित यह नगर वर्तमान फ़िरोज़शाह कोटला स्टेडियम एवं हुमायूँ के मक़बरे के बीच अवस्थित था।
  • पाँच प्रस्थों में एक इन्द्रप्रस्थ के अस्तित्व का प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। अन्य चार प्रस्थ-पानीपत, सोनीपत, बागपत और तिलपत थे। इन्हीं पाँचों स्थानों पर प्रसिद्ध महाभारत का युद्ध लड़ा गया था।
  • इस प्रदेश को खण्डप्रस्थ और योगिनीपुर के नाम से भी जाना जाता था।
  • बाद के काल में यह क्षेत्र मौर्य, गुप्त, पाल आदि शासकों के अधीन रहा।
  • इन्द्रप्रस्थ के गौतवंशीय राजाओं के परवर्ती मयूर वंश के अन्तिम कन्नौज शासक राजा दिलू द्वारा इस प्रदेश को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया गया।
  • 736 ई. में तोमर राजपूतों द्वारा दिल्ली या ढिल्लिका के नाम से एक नए नगर को बसाया गया।
  • 1052 में अनंगपाल द्वितीय द्वारा उस नगर का पुनद्धार एवं पुनर्निर्माण कर इस नगर की सुरक्षा के लिए लाल कोट नामक क़िले का निर्माण करवाया गया।
  • अनंगपाल तृतीय के शासनकाल में चौहान शासक विग्रहराज द्वारा 1151 ई. में इस प्रदेश पर क़ब्ज़ा कर लिया गया। लेकिन दोनों घरानों में वैवाहिक सम्बन्धों की स्थापना के बाद तोमरवंशी वहाँ चौहान शासकों के अधीन शासन करते रहे।
  • विग्रहराज के पौत्र पृथ्वीराज चौहान (रायपिथौरा) लालकोट क़िले का विस्तार कर एवं 'क़िला रायपिथौरा' के नाम से एक बड़े क़िले का निर्माण करवाया गया। इसे दिल्ली का पहला ऐतिहासिक शहर माना जाता है।
  • तराइन के द्वितीय युद्ध 1192 में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद 1193 में मुहम्मद ग़ोरी के एक ग़ुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा दिल्ली पर अधिकार कर लिया गया।
  • 1206 में मुहम्मद ग़ोरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने खुद को दिल्ली का सुल्तान घोषित कर दिया।
  • 1210 में पोलो खेलते समय घोड़े से गिर जाने के कारण ऐबक की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसका दामाद इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान बना।
  • कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद सात मुस्लिम वंशों—ग़ुलाम वंश, ख़िलजी वंश, तुग़लक़ वंश, सैयद वंश, लोदी वंश, सूरी वंश तथा मुग़ल वंश ने एक के बाद एक दिल्ली पर राज किया और अपनी-अपनी रुचि तथा रुझान की छाप दिल्ली पर छोड़ी।
  • दिल्ली के प्रसिद्ध क़ुतुबमीनार की नींव 1199 में कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा डाली गई थी।
  • क़ुतुबुमीनार के समीप ही अलाउद्दीन ख़िलजी के द्वारा दूसरा नगर सीरी बसाया गया। उसने 1305 में हौज ख़ास का भी निर्माण करवाया।
  • ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने 1321 में सीरी के पूर्व में तुग़लकाबाद नगर की नींव डाली। यह नगर केवल 6 वर्षों तक तुग़लक़ साम्राज्य की राजधानी रह पाया।
  • तुग़लक़ वंश के दूसरे बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ द्वारा सीरी और कुतुब के बीच 'जहाँपनाह' के नाम से एक नये नगर की स्थापना की गई। जिसे आज चिराग दिल्ली के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर बादशाह द्वारा 8 किमी के घेरे में 13 दरवाज़ों वाला एक परकोटा बनवाया गया।
  • तुग़लक़ वंश के तृतीय बादशाह फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ द्वारा 1354 में फ़िरोज़ाबाद नाम से एक नया राजधानी नगर बसाया गया। इस नगर को आज फ़िरोजशाह कोटला के नाम से जाना जाता है।
  • क़रीब दो शताब्दी के बाद हुमायूँ ने अपनी एक अलग नगरी दिल्ली, फ़िरोजाबाद नगर के चार किलोमीटर दक्षिण में स्थापित की। यह स्थल आज पुराने क़िले के नाम से मशहूर है। इस नगर की बसावट का काम शेरशाह सूरी के द्वारा पूरा किया गया। इसी के द्वारा 1540-44 के दौरान पुराने क़िले का निर्माण करवाया गया।
  • 1638 में शाहजहाँ के द्वारा आज के पुरानी दिल्ली को शाहजहाँनाबाद के नाम से बसाया गया। उसके द्वारा वहाँ पर 1648 में लाल क़िला तथा 1650-1656 के बीच ज़ामा मस्जिद का निर्माण करवाया गया।
  • शाहजहाँनाबाद के चारों तरफ़ क्वार्टजाइट पत्थर की एक चहार दिवारी बनवाई गई, जिसके चारों तरफ़ मुख्य द्वार-दिल्ली गेट, कश्मीरी गेट, अजमेरी गेट और लाहौरी गेट के नाम से लगे हुए थे।
  • 1724 ई. में राजा जयसिंह द्वारा जंतर-मंतर बनवाया गया तथा शुजाउद्दौला द्वारा 1753-54 में सफ़दरगंज का मक़बरा बनवाया गया।
  • अंग्रेज़ों द्वारा पहले भारत की राजधानी कलकत्ता (कोलकाता) बनाई गई, परन्तु 1911 में सम्राट जार्ज पंचम द्वारा दिल्ली को राजधानी बनाने का निश्चय किया गया।
  • वर्तमान पुरानी दिल्ली के दक्षिण में नई दिल्ली के नाम से एक नया नगर बसाया गया।
  • नई दिल्ली की नगर योजना एडविन ल्यूटेन्स तथा बेकर द्वारा तैयार की गई थी। नई दिल्ली नगर योजना वांशिगटन तथा लन्दन नगरों के योजना से काफ़ी मिलता-जुलता है।
  • सन् 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् इस भारत संघ की राजधानी के रूप में स्वीकार किया गया।
  • 1956 में इसे केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा प्रदान किया गया।
  • 69वें संविधान संशोधन के द्वारा राष्ट्रीय क्षेत्र अधिनियम 1991 प्रभाव में आया। इसके फलस्वरूप दिल्ली में विधानसभा का गठन किया गया।

प्रशासन


अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
Akshardham Temple, Delhi
दिल्ली पर विधिवत् शासन की शुरुआत अंग्रेज़ों द्वारा 1805 में शुरू की गई। प्रारम्भ में प्रशासनिक नियंत्रण ब्रिटिश शासन के प्रतिनिधि एवं मुख्य आयुक्त के अधीन था। 1857 तक सामान्य अधिनियमों के द्वारा ही कुछ फेर-बदल के साथ प्रशासन चलता रहा। 1858 में अंग्रेज़ों द्वारा दिल्ली को सीमान्त प्रान्त के प्रान्तीय शहर का दर्जा दिया गया। बाद में इस उपराज्यपाल के अधीन नवगठित पंजाब प्रान्त में स्थानान्तरित कर दिया गया। राजधानी का कलकत्ता से दिल्ली स्थानान्तरित होने के बाद यहाँ के प्रशासनिक कार्यों की देखरेख के लिए इम्पोरियल दिल्ली समिति का गठन किया गया। 1916 में इस समिति को पंजाब म्यूनिसिपल एक्ट 1911 के तहत रायसीना म्यूनिसिपल समिति के रूप में अधिसूचित किया गया। 16 मार्च 1927 को इसे दिल्ली म्यूनिसिपल समिति के रूप में पुनर्गठित किया गया। 1932 में प्रथम श्रेणी का म्यूनिसिपैलिटी का दर्जा प्रदान किया गया। नई दिल्ली नगर परिषद् अधिनियम, 1994 के अंतर्गत नई दिल्ली नगर समिति का पुनर्गठन किया गया। दिल्ली को 1951 में भाग 'ग' राज्यों में शामिल किया गया, जिसमें मंत्रिपरिषद् और विधायिका का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया। 1957 में संसद द्वारा पारित दिल्ली नगर अधिनियम के तहत निगम के गठन के उद्देश्य से 1958 में चुनाव करवाये गये। 1957 में ही दिल्ली विकास अधिनियम पारित हुआ जिसके तहत दिल्ली विकास प्राधिकरण की स्थापना हुई। प्राधिकरण द्वारा पहला मास्टर प्लान (1961-81) 1962 में प्रकाशित किया गया। दिल्ली प्रशासन अधिनयम, 1966 द्वारा महानगर परिषद् (56 निर्वाचित + 5 मनोनीत सदस्य) के गठन का प्रावधान कर दिल्ली में सीमित प्रतिनिधित्व वाली सरकार की स्थापना की गई। संविधान में 69वें संविधान संशोधन द्वारा दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम, 1991 प्रभाव में आया। 1992 से लागू इस अधिनियम के तहत एक विधानसभा तथा दिल्ली के प्रशासन-संचालन के लिए एक उपराज्यपाल तथा उनको इस विषय में सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री के अधीन मंत्रीपरिषद् का प्रावधान किया गया। इस अधिनियम द्वारा विधानसभा को राज्य सम्बन्धी मामलों एवं केन्द्र शासित क्षेत्रों के मुतल्लिक मामलों पर क़ानून बनाने का अधिकार दिया गया। लेकिन क़ानून व्यवस्था, पुलिस एवं भूमि सम्बन्धी विषय विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखे गए। 1993 के चुनाव के पश्चात् इस अधिनयम के तहत पहली विधानसभा का गठन किया गया। नवम्बर 1998 में दूसरी विधानसभा का गठित की गई। जनवरी 1997 से पूर्व दिल्ली केवल एक ज़िला था, लेकिन वर्तमान में यहाँ 9 ज़िले तथा 27 सबडिवीजन/तहसील हैं।
  • विधानमण्डल - एक संदनात्मक (विधानसभा)
  • विधानसभा सदस्यों की संख्या - 70
  • लोकसभा सदस्यों की संख्या - 7
  • राज्य सभा के सदस्यों की संख्या - 3

भूगोल


इंडिया गेट, दिल्ली
India Gate, Delhi
  • स्थिति – उत्तर, पश्चिम तथा दक्षिण में हरियाणा एवं पूर्व में उत्तर प्रदेश।
  • कृषि क्षेत्र – लगभग 70,000 हेक्टेयर।
  • वन क्षेत्र – 1,443 हेक्टेयर।
  • राजकीय पशु – हनुमान।
  • राजकीय पक्षी – धूसर तीतर।
  • उच्च न्यायालय क्षेत्र – दिल्ली।
  • पर्वत – अरावली पर्वतमाला के कटक (रिज)।
  • शहरी क्षेत्रों का क्षेत्रफल – 924.68 वर्ग किमी.।
  • ग्रामीण क्षेत्रों का क्षेत्रफल – 558.32 वर्ग किमी.।
  • नगर निकाय – 3
  • गाँव – 165
  • ज़िले – 9
  • तहसीलें – 27
  • औसत वार्षिक वर्षा – 114 मिमी.
  • नदी – यमुना नदी।
  • भू-आकृतिक दृष्टि से दिल्ली को तीन भागों में विभाजित किया जाता है–
  1. यमुना बाढ़ एवं गरिपादीय मैदान।
  2. पहाड़ी प्रदेश तथा
  3. मैदानी प्रदेश।
दिल्ली का सबसे ऊँचा स्थान भाटी गाँव है, जिसकी ऊँचाई समुद्रतल से 322 मीटर है। दिल्ली की भू-आकृति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व पहाड़ी है जो राजस्थान की अरावली पहाड़ियों के पर्वत स्कन्ध की भाँति बना है। दक्षिण में महरौली और तुग़लकाबाद के पास का क्षेत्र कोही या पहाड़ी कहलाता है। यमुना के किनारे का मैदान बांगर के नाम से जाना जाता है। भूगर्भिक दृष्टि से दिल्ली की शैलें मध्य प्रोटेरोजोइक और अभिनवकाल की हैं। यह दिल्ली प्रक्रम और अलवर शृंखला का भाग है।

अर्थव्यवस्था


जामा मस्जिद, दिल्ली
Jama Masjid, Delhi
  • कुल बोया गया क्षेत्र – 60,885 हेक्टेयर।
  • बोया हुआ शुद्ध क्षेत्र – 41,385 हेक्टेयर।
  • शुद्ध सिंचित क्षेत्र – 40,000
  • वर्तमान क़ीमतों पर निबल राज्य घरेलू उत्पाद (वर्ष 2002-03)-68743 करोड़ रुपये।
  • वर्तमान क़ीमतों पर प्रति व्यक्ति निबल राज्य घरेलू उत्पाद – 47477 रुपये।
  • कुल उपलब्ध भूमि (1999) – 147 हज़ार हेक्टेयर।
  • वनाच्छादित क्षेत्र (1999) – 1000 हेक्टेयर।
  • वन क्षेत्र – 1443 हेक्टेयर।
  • सड़क मार्ग – 28,508 किमी. (5 राष्ट्रीय मार्ग)
  • रेल मार्ग – 200 किमी. मुनरिका (रिंग) रेलवे।
  • अन्तराज्यीय बस अड्डे – कश्मीर गेट, सराय काले ख़ाँ, आनन्द बिहार।
  • हवाई अड्डे – इंदिरा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (अन्तर्राष्ट्रीय उड़ानों के लिए), पालम हवाई अड्डा (घरेलु उड़ानों के लिए), सफदरजंग हवाई अड्डा (प्रशिक्षण हेतु)।
  • ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों का प्रतिशत – 8.23%
  • सार्वजनिक क्षेत्र की बैकिंग संस्थाओं की संख्या – 1251
  • प्रति व्यक्ति बिजली की खपत – 69 किलो वाट प्रति घंटा (1999)
  • प्राथमिक विद्यालयों की संख्या – 2415
  • मध्य विद्यालयों की संख्या – 680
  • उच्च/उच्चतर विद्यालयों की कुल संख्या – 1578
  • महाविद्यालयों की संख्या – 59
  • व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं की संख्या - 45
  • औद्योगिक इकाईयाँ – 1.29 लाख (31 मार्च, 02)
  • विश्वविद्यालय - (कुल 6); दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय, गुरु गोविन्द सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ।
  • विशिष्ट संस्थान - अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, (आई आई टी) भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, एन. आई. एफ. टी., इंडियन इस्टीट्यूट आफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन आदि।
  • प्रमुख उद्योग - रेजर ब्लेड्स, खेल का सामान, रेडियो, टेलीविजन सेट एवं कल-पुर्जे, साइकिल एवं उसके कल-पुर्जे, प्लास्टिक उद्योग, जूते-चप्पल, वस्त्र, रसायन, उर्वरक, दवाएँ, हौजियरी का सामान, शीतल पेय, हाथ के औज़ार, स्टेशन बैगन, पी0 वी0 सी0 की वस्तुएँ आदि।

क़ुतुब मीनार, दिल्ली
Qutub Minar, Delhi
  • सड़क मार्ग - 15,800 किमी0 (5 राष्ट्रीय राजमार्गां का सम्मिलन स्थल)।
  • रेलमार्ग - 168 किमी0 लम्बी मुद्रिका (रिंग) रेलवे।
  • रेलवे स्टेशन - दिल्ली, नई दिल्ली, हजरत निज़ामुद्दीन तथा सराय रोहिल्ला।
  • पंजीकृत मोटर वाहनों की संख्या - 2.75 मिलियन।

समाज एवं संस्कृति

राष्ट्रीय राजधानी होने के नाते यहाँ का समाज विभिन्न प्रान्तों तथा वर्गों से आने वाले भिन्न भाषा-भाषी लोगों के मिलने से बना है। जिनके परम्परा, पहनाबा, ओढ़ाबा विश्वास-मत आदि अलग-अलग हैं। यह विविधता प्रदेश के समाज को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। प्रदेश की संस्कृति राष्ट्रीय संस्कृति की प्रतिनिधि प्रतीत होती है। प्रदेश में लगभग सभी धर्म और सम्प्रदाय से जुड़े सांस्कृतिक धरोहर मौजूद हैं।

पर्यटन

हुमायूँ का मक़बरा, कुतुब मीनार, हौज ख़ास, इंडिया गेट तथा बहाई मन्दिर, लोटस टैंपल, राष्ट्रपति भवन, मुग़ल गार्डन, संसद भवन, चाँदनी चौक, लाल क़िला, जामा मस्जिद, राजघाट, शान्तिवन, विजयघाट, शक्ति स्थल, पुराना क़िला (इन्द्रप्रस्थ), सफ़दरगंज का मक़बरा, जन्तर-मन्तर, बिड़ला मन्दिर, विज्ञान भवन, चिड़ियाघर, राष्ट्रीय संग्रहालय, कनॉट प्लेस, बुद्ध जयन्ती पार्क, रवीन्द्र रंगशाला, नेहरू मेमोरियल, कश्मीरी गेट आदि।

इन्हें भी देखें

Seealso.jpg इन्हें भी देखें: दिल्ली, दिल्ली का इतिहास, दिल्ली पर्यटन एवं दिल्ली विश्वविद्यालय


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख


शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

क्या है वास्तव में दिल्ली की समस्या ?


Friday, July 05, 2013

06:23:45 PM
delhi-
ब्रजेश कुमार झा
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने एक समय कहा था कि, ‘उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की वजह से यहां की समस्याएं बढ़ जाती हैं। और ये लोग वापस जाना भी नहीं चाहते हैं।’ यहां गौर करने पर मालूम पड़ता है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री ने कोई नई बात नहीं कही।
भारतीय जनता पार्टी की हेमा मालिनी का विचार भी गौर करने लायक हैं कि मुंबई शहर में आने वाले बाहरी लोगों के कारण ही समस्याएं उत्पन्न होती हैं। शिवसेना की पूरी राजनीति का एक आधार यही है। महाराष्ट्र के कई जगहों पर ऐसी घटनाएं हुई जिससे शंका उत्पन्न होती है। कई ऐसे हुनरमंद लोग भी हैं जो सफाई से अपनी बात कह देते हैं जिससे ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।’ ऐसी प्रवृत्ति का जन्म लेना निश्चय ही भयावह है।
असम में इसकी झलक लोग देख चुके हैं। पुणे की घटना भी एक उदाहरण है। मुंबई महानगर तो इसके लिए बदनाम है ही, जहां बाहर से आने वालों को पीटा जाता है। बेशक दिल्ली इससे बची हुई है। लेकिन, बाहरी लोगों के प्रति विराग यहां काफी दिखता है। ‘जिम्मेदार’ लोगों द्वारा कभी-कभार ऐसे विचार अभिव्यक्त करना विराग को और अधिक बढ़ा देता है।
कुछेक साल पहले सीएसडीएस ने इससे जुड़े मसले पर सर्वेक्षण करवाया था। इसके रिपोर्ट चौंकाने वाले हैं। सर्वेक्षण में दिल्ली के मूल निवासियों या यूं कहें कि देश के अन्य भागों से आकर बस चुके लोगों से एक सवाल किया गया था। सवाल था कि दिल्ली में बाहर से आने वाले लोगों को बसने दिया जाना चाहिए या नहीं? इसके जबाव में साठ प्रतिशत लोगों ने उनके बसने पर अपना एतराज जताया था। चौंतीस प्रतिशत लोगों ने इनके बसने का समर्थन किया। जबकि, छह प्रतिशत लोगों ने चुप्पी साध ली।
वैसे तो चुप्पी को मौन स्वीकृति मान लिया जाता है। फिर भी, हम इस समस्या का खुले दिमाग से विश्लेषण करेंगे। इस सर्वेक्षण में आर्थिक और सामाजिक रूप से बंटे दिल्ली के नये-पुराने बाशिंदों के विचारों को शामिल किया गया था। इससे मालूम हुआ कि बंटवारे के दौरान बाहर से आये लोग नये बसने वालों के प्रति ज्यादा असहनशील हैं। सरकारी और अन्य सुविधाओं को ये लोग अब और साझा करना नहीं चाहते हैं। जबकि, बंटवारे के वक्त जब इनका आना हुआ था तो सबों ने सहिष्णुता की भावना व्यक्त की थी। इन्हें बसाया गया, रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये गए थे।
इन्होंने भी पूरी निष्ठा के साथ मेहनत की। आगे इन्हीं लोगों का दिल्ली में सबसे ज्यादा विकास हुआ। अब लोग रोजगार की तलाश में अपनी राजधानी आ रहे हैं तो उनका विरोध हो रहा है। मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार लोग भी बोल पड़ते हैं। जबकि, यहां आ रहे मजदूरों की स्थिति बंटवारे के समय आये लोगों से अधिक भिन्न नहीं है। अंतर सिर्फ इतना है कि वो ऐतिहासिक त्रासदी के कारण अचानक मजदूर बना दिये गये थे। लेकिन, आज तो व्यवस्था की अकर्मण्यता ने लोगों को मजदूर और पलायनवादी बना दिया है। इसके बावजूद आनेवाले नए लोग पुराने लोगों की आंखों में चुभ रहे हैं। साथ ही उन्हें दिन-ब-दिन पैदा हो रही कठिनाईयों का कारण बताया जा रहा है।
राजधानी दिल्ली में बढ़ रही भीड़ के अनेक कारण हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और रोजगार जैसी सभी मूलभूत सुविधाएं दिल्ली में अन्य जगहों की तुलना में बेहतर हैं। कई जगहों पर रोजगार के अवसर समाप्त हो चुके हैं। जबकि, दिल्ली में रोजगार सहजता से उपलब्ध है। ऐसे में स्वाभाविक है कि लोग दिल्ली की ओर रुख करेंगे। कौन अपने जीवन को बेहतर बनाना नहीं चाहता है! पहले भी तो लोग कमोबेश इसी चाहत में दिल्ली आते रहे होंगे।
आज अपनी राजधानी आने को लेकर लोगों के मन में उल्लास नहीं है, बल्कि अपने भविष्य को लेकर चिंता ज्यादा है। यदि दिल्ली की तरह अन्य जगहों पर भी समान विकास होता और रोजगार के अवसर उपलब्ध होते तो आज ये स्थितियां नहीं होतीं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को यह सोचना चाहिए था। आखिर, उनकी पार्टी ने ही देश का पचास साल तक राज-काज चलाया है।
समृद्ध लोग, मध्यम वर्ग, ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों और डीडीए फ्लैट में रहने वालों में औसतन 65 प्रतिशत लोग बाहरी लोगों के बसने पर पाबंदी चाहते हैं। बेशक, दिल्ली चारों तरफ फैल रही है। लेकिन, बढ़ती आबादी लोगों की परिधि को निश्चित करती जा रही है। सुविधा के दायरे सिकुड़ते जा रहे हैं। ऐसे में आत्मकेंद्रित, सुविधाभोगी लोगों द्वारा ऐसे विचार व्यक्त करना हमें आश्चर्यचकित नहीं करता है। यहां चिंता का विषय तो गांव वालों द्वारा किया जाने वाला विरोध है। इसके कुछ बुनियादी कारण हैं।
बाहर से आने वाले लोग समृद्ध होते गए। जबकि, दिल्ली तथा उसके आसपास का गरीब तबका वैसी तरक्की नहीं कर पाया। नतीजतन गांव अपने में सिमटता चला गया। अब समृद्ध हो रही कालोनियों का दबाव महसूस कर रहा है। दूसरी तरफ इसमें रहने वाले लोग अपने वास्ते रोजगार के अच्छे साधन नहीं जुटा पा रहे हैं। अब, मजदूरों के हुजूमों का आना इनकी रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फेर देता है। 64 प्रतिशत ग्रामीणों द्वारा नवागंतुकों के विरोध की मूल वजह यही है। आखिर ये लोग कहां जाएं जबकि, सभी लोग दिल्ली आ रहे हैं।
इन ग्रामीणों के प्रति हमारे मन में पूरी सहानुभूति होनी चाहिए। क्योंकि, इन लोगों ने हमेशा आने वालों के साथ हुई हिस्सेदारी को स्वीकारा है। अब जबकि, इन्हें अपना भविष्य इन मजदूरों के कारण धूमिल होता दिख रहा है तो घबराहट स्वाभाविक है। लेकिन, एक सुखद आश्चर्य है कि भविष्य हाशिये पर होने के बावजूद इनमें आने वालों के प्रति संवेदना और सहनशीलता अन्य लोगों के मुकाबले अधिक है। इससे स्पष्ट होता है कि हमारे पुराने संस्कार गांवों में अब भी सुरक्षित हैं। जो कुछ खोखलापन, दिखावा और असहिष्णुता है वह नए बसे शहरी माहौल में ही है।
सर्वेक्षण के अनुसार आज नये बसने वालों के खिलाफ दिल्ली में औसतन 60 प्रतिशत लोग हैं। आगे समस्याएं बढेंग़ी, असंतोष फैलेगा, हंगामें होंगे और इसी हंगामें रूपी तंदूरी में कुछ राजनेता अपनी रोटी सेकेंगे। झारखंड, असम, मुंबई आदि जगहों पर इसी असंतोष को देखा जा सकता है जो किसी बहाने की आड़ में फूट पड़ता है। एसे में जरा सी चिंगारी ही काफी हैं जनता के गुस्से को भडकाने के लिए, जरा सी चूक या गलत बयानबाजी का नतीजा विस्फोटक हो सकता हैं। जनप्रतिनिधियों को इस बात का खयाल होना चाहिए। क्योंकि, स्थितियां विकट हो सकती हैं। उस समय माफी मांग कर स्थितियों को बिगड़ने से नहीं रोका जा सकता है। अत: जरूरी है कि राष्ट्रीय दृष्टि स्थापित हो न कि संकीर्ण क्षेत्रीय राजनीति।

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जाज को समझें

जल प्रलय : पहाड़ के मिजाज को समझें  बिमल कुमार

चारधाम की यात्रा पर पुण्‍य कमाने गए हजारों जिंदगियों ने कभी इस बात की कल्‍पना भी नहीं की होगी कि उन्‍हें इस तरह की भीषण दैवीय आपदा का सामना करना पड़ेगा। कुछ ऐसा अप्रत्‍याशित घटा कि इस देवभूमि में आए जल प्रलय में हजारों लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ी। यह त्रासदी ऐसी है जो कई सबक और संदेश दे गई। मानव और मानवता के कल्‍याण के लिए ऐसी गंभीर पहल करनी होगी, जिससे इस तरह की आपदा की घड़ी में जान-माल और संपत्ति का कम से कम नुकसान हो। इस बात में कोई संशय नहीं रहा कि इस त्रासदी के समय में ‘महाचूक’ हुई, जिसके लिए शासनिक व प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह जिम्‍मेवार है। हालांकि, सिर्फ उनकी जवाबदेही तय कर देने भर से जिंदगियां वापस लौट नहीं जाएंगी। पर इतना जरूर है कि ऐसे सभी जरूरी कदम उठाए जाएं जिससे भविष्‍य में इस तरह ‘जिंदगी’ के लिए संघर्ष न करना पड़े।

भूस्‍खलन और बाढ़ पहले भी पहाड़ों पर आते रहे हैं। बादल फटने की घटना आए दिन होती रहती है। भारी बारिश हिमालयी क्षेत्र में मौसम का सामान्‍य हिस्‍सा है। ये सब पहाड़ की प्रकृति में निरंतर चलने वाली प्रकिया है। फर्क केवल इतना रहा कि इस बार ये तबाही में बदल गई, मगर इसके पीछे कई प्रमुख कारण हैं। दुर्भाग्‍य यह है कि अब तक की सभी सरकारों ने पहाड़ और इसकी प्रकृति को समझने की कोशिश तक नहीं की और न ही कभी इस दिशा में गंभीरता से विचार ही किया। यहां जिंदगी को राम भरोसे छोड़ने की आदत भलीभांति डाल ली। जिसका भयावह दुष्‍परिणाम आज सबके सामने है। पहाडों के सीने पर विकास रूपी धारा में इसके मूल की अब तक घोर अनदेखी का क्रम जारी है।

नदियों की धारा को बांधने का दुस्‍साहस और जगह-जगह डैम बनाकर बिजली उत्‍पादन व सिंचाई समेत अन्‍य कार्यों में उपयोग लाने के लिए विध्‍वंसकारी विकास की जो पटकथा लिखी जा रही है, क्‍या वह सचमुच में विकास है या विनाश है? नदियों की धारा को बांधने का दुस्‍साहस ही है कि केदारघाटी समेत उत्‍राखंड के अधिकांश हिस्‍से में आज तबाही का मंजर पसरा है। उत्‍तराखंड में हुआ जल प्रलय मूलरूप से प्रकृति के प्रकोप का ही नतीजा है। इस हिमालयी क्षेत्र में पहाड़ों का गिरना व भारी बारिश अथवा बादल फटने की घटना स्‍वाभाविक है। वैसे भी हिमालय के नवनिर्मित पहाड़ भूस्‍खलन के दृष्टिकोण से खासे संवेदनशील माने जाते हैं। घाटियों में बहने वाली नदी अपना रास्‍ता बदलते रहती है। इसके लिए कोई क्षेत्र सीमा या समय सीमा तय नहीं का जा सकती हैं।

यदि हम केदारनाथ की बात करें तो वहां मंदाकिनी की कभी दो धाराएं थी, हालांकि वह पूर्वी ओर की धारा में बह रही थी। बीते कुछ सालों में लोगों ने इसके दूसरी ओर की जगह पर अपने मकान आदि बना लिए थे। पानी की धारा जब दोनों दिशाओं से बहने लगी तो इसकी चपेट में वहां सबकुछ आ गया।

मौत और बड़े पैमाने पर हुए विनाश ने सभी झकझोर कर रख दिया। हजारों लोगों की अकाल मौत का कारण बनने वाली आपदा का कारण सिर्फ बादल फटना नहीं रहा। इसके पीछे भारी वर्षा बड़ी कारण रही। इस आपदा में भूस्‍खलन को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। मूसलाधार बारिश के चलते केदारनाथ के ऊपर गांधी सरोवर में पानी लबालब भर गया। पानी के दबाव के चलते सरोवर का एक हिस्‍सा फट गया। तीन दिशाओं से पानी की तेज धारा में मलबा और पत्‍थर भी बहकर आए। जो नीचे के क्षेत्रों में जाकर विनाश को और बढ़ाता चला गया। अचानक आई बाढ़ में कई गांव और छोटे शहर बह गए। पूरी की पूरी सड़क समाप्त हो गई। व्यापक स्तर पर बिजली की लाइनें छिन्न-भिन्न हो गईं। तीर्थस्थलों पर भी काफी बुरा असर हुआ है।

यह नहीं भूलना चाहिए कि नदियां अपना पथ बदलते रहती है। नदी के फ्लड क्षेत्र में बसावट पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए, जबकि बीते कुछ सालों में इन क्षेत्रों में बसावट ज्‍यादा हो गई है। जिक्र योग्‍य है कि पहाड़ों में गांव की बसावट हमेशा ठोस व ऊपरी हिस्‍से में की जाती रही है। विकास की मौजूदा अंधी दौड़ में हमने नदी के रास्‍तों को भी नहीं बख्‍शा है। ऐसे में नदी आज विकराल रूप धारण करती है तो इसमें नदी का क्‍या कसूर है। यदि आपदा के कुछ क्षेत्रों में नजर डालें तो ज्‍यादातर नुकसान उन क्षेत्रों में ही हुआ है, जहां लोगों ने फ्लड एरिया में अपने ठिकाने बना लिए थे। ऐसे में यह जिम्‍मेवारी सरकार व प्रशासन की है वह इन क्षेत्रों में लोगों की बसावट पर पूरी तरह रोक लगाए। साथ ही तमाम तरह के आधुनिक विकास भी इसके लिए दोषी हैं, जो पहाड़ों में पर्यावरण के प्रतिकूल हैं।

वैसे भी विकास पर्यावरण के अनुकूल हो तो उत्तराखंड की तरह की भीषण मानवीय त्रासदी को टाला जा सकता है। पहाड़ों में पेड़ों को काटने की बजाय पौधरोपण को जमकर बढ़ावा देना चाहिए। नदियों के किनारे से कम से कम 100 मीटर की दूरी पर मकान बनाए जाने चाहिए। चारधाम जैसे तीर्थयात्रा पर जा रहे लोगों के लिए पूरा नियमन तैयार किया जाना चाहिए। यदि पहाड़ों में बारिश और बाढ़ के असर को कम नहीं किया जाता है तो फिर हमारे पास करने के लिए बिल्कुल सीमित विकल्प है। अधिक से अधिक हरियाली को बढ़ावा देना आज पहाड़ों की जरूरत है।

पर्यावरण अनुकूल विकास से प्राकृतिक त्रासदी टाली जा सकती है। पहाड़ों पर सड़क बनाते वक्त भी सावधानी बरती जानी चाहिए। पहाड़ के किनारे को काट कर सड़क बनाने से उसकी ढलान कमजोर हो जाती है। यदि उसकी बनावट का ध्यान नहीं रखा जाए, तो भूस्खलन की संभावना बढ़ जाती है। पहाड़ों की बनावट के साथ छेड़छाड़ करने पर छोटे-बड़े भूस्खलन होते हैं। इस तरह के नियम बनाने चाहिए जिसमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि मकान नदियों के किनारे से 100 मीटर दूर स्थित होने चाहिए। इस त्रासदी पर नजर डालें तो केदारनाथ सहित उत्तराखंड में नदियों के किनारे बने सैकड़ों मकान बाढ़ में ढह गए। इससे सरकारी तंत्र को सबक लेने की जरूरत है।

इसके अलावा, तीर्थ यात्रा को भी नियमित करने के लिए दिशानिर्देश की जरूरत है। कुछ साल पहले गंगोत्री-गौमुख में हिमनद के पिघलने को लेकर चिंता जताई जा रही थी। उसके बाद सरकार ने तीर्थयात्रियों की संख्या को सीमित किया था। यदि यह वहां हो सकता है, तो अन्य तीर्थस्थलों पर क्यों नहीं हो सकता है। इस घटना से स्पष्ट है कि सरकार को कहीं न कहीं हर जरूरी पहलू पर विचार कर इससे संतुलन स्थापित करना होगा।

एक फौरी अनुमान के तौर पर राज्य को सामान्य स्थिति में लौटने में अभी तीन साल लगेंगे। आपदाओं से निपटने के लिए सभी कारगर कदम उठाने में अब यदि चूक हुई तो निश्चित तौर पर इसके और गंभीर परिणाम भविष्‍य में सामने आएंगे। इसलिए जरूरी है कि सभी जरूरी एजेंसियों को मिलाकर एक ऐसा एकीकृत सिस्‍टम बनाया जाए तो पहाड़ों में विकास को पर्यावरण हितैषी बनाए। प्राकृतिक आपदाओं को तभी कम किया जा सकता है जब पहाड़ी क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर गंभीरता से गौर किया जाएगा।

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First Published: Sunday, June 30, 2013, 23:44

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अरविंद केजरीवाल



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अरविन्द केजरीवाल

अरविन्द केजरीवाल
जन्म 16 अगस्त 1968 (आयु 44)
Flag of भारत हिसार, हरियाणा
संस्था परिवर्तन -
नागरिक आंदिलन
राजनीतिक आंदोलन सूचना का अधिकार
जन लोकपाल विधेयक
पुरस्कार रमन मैग्सेसे सम्मान
अरविंद केजरीवाल (जन्म: १६ अगस्त १९६८) एक भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता हैं और सरकार में अधिक पारदर्शिता लाने के लिए संघर्षरत हैं। उन्हें २००६ में उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए रमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया, क्योंकि उन्होंने भारत के सूचना अधिकार अर्थात सूचना कानून (सूका) के आन्दोलन को जमीनी स्तर पर सक्रिय बनाया, और सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बना कर सबसे गरीब नागरिकों को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सशक्त बनाने हेतु सामाजिक आन्दोलन किया.[1]

अनुक्रम

जीवनी

अरविंद केजरीवाल का जन्म १९६८ में हरियाणा[2] के हिसार शहर में हुआ[3], और उन्होंने १९८९ में आईआईटी खड़गपुर से यांत्रिक अभियांत्रिकी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। बाद में, १९९२ में वेभारतीय नागरिक सेवा (आईसीएस) के एक भाग, भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) में आ गए, और उन्हें दिल्ली में आयकर आयुक्त कार्यालय में नियुक्त किया गया। शीघ्र ही, उन्होंने महसूस किया कि सरकार में बहुप्रचलित भ्रष्टाचार के कारण प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है। अपनी अधिकारिक स्थिति पर रहते हुए ही उन्होंने, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग शुरू कर दी.[4] प्रारंभ में, अरविंद ने आयकर कार्यालय में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जनवरी २००० में, उन्होंने काम से विश्राम ले लिया और दिल्ली आधारित एक नागरिक आन्दोलन-परिवर्तन की स्थापना की, जो एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन को सुनिश्चित करने के लिए काम करता है। इसके बाद, फरवरी २००६ में, उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया, और पूरे समय के लिए सिर्फ 'परिवर्तन' में ही काम करने लगे।[5] अरुणा रॉय और कई अन्य लोगों के साथ मिलकर, उन्होंने सूचना अधिकार अधिनियम के लिए अभियान शुरू किया, जो जल्दी ही एक मूक सामाजिक आन्दोलन बन गया, दिल्ली में सूचना अधिकार अधिनियम को 2001 में पारित किया गया[2] और अंत में राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संसद ने 2005 में सूचना अधिकार अधिनियम (आरटीआई) को पारित कर दिया।
इसके बाद, जुलाई २००६ में, उन्होंने पूरे भारत में आरटीआई के बारे में जागरूकता फ़ैलाने के लिए एक अभियान शुरू किया.[6] दूसरों को प्रेरित करने के लिए अरविन्द ने अब अपने संस्थान के माध्यम से एक आरटीआई पुरस्कार की शुरुआत की है.[7] सूचना का अधिकार गरीब लोगों के लिए तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही आम जनता और पेशेवर लोगों के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण है। आज भी कई भारतीय सरकार के निर्वाचन की प्रक्रिया में निष्क्रिय दर्शक ही बने हुए हैं. अरविंद सूचना के अधिकार के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को अपनी सरकार से प्रश्न पूछने की शक्ति देते हैं. अपने संगठन परिवर्तन के माध्यम से वे लोगों को प्रशासन में सक्रिय रूप से हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करते हैं। आरटीआई को आम नागरिक के लिए एक शक्तिशाली उपकरण बनने में लम्बा समय लगेगा. हालांकि अरविन्द ने हमें दिखा दिया है कि वास्तव में इसके लिए एक सम्भव रास्ता है.[8]
६ फरवरी २००७ को, अरविन्द को वर्ष 2006 के लिए लोक सेवा में सीएनएन आईबीएन 'इन्डियन ऑफ़ द इयर' के लिए नामित किया गया। अरविंद ने सूचना अधिकार अधिनियम को स्पष्ट करते हुए गूगल पर भाषण दिया।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

राजनीति मे पदार्पण

२ अक्टूबर २०१२ को गांधीजी और शास्त्रीजी के चित्रों से सजी पृष्ठभूमि वाले मंच से अरविंद केजरीवाल ने अपने राजनीतिक सफर की औपचारिक शुरुआत कर दी. उन्होंने बाकायदा गांधी टोपी, जो अब "अण्णा टोपी" भी कहलाने लगी है, पहनी थी. वो शायद वही नारा लिखना पसंद करते जो पूरे "अन्ना आंदोलन" के दौरान टोपियों पर दिखाई देता रहा, "मैं अन्ना हजारे हूं." लेकिन उन्हें अन्ना के नाम और तस्वीर के इस्तेमाल की इजाज़त नहीं है. इसलिए उन्होंने लिखवाया, "मैं आम आदमी हूं." उन्होंने २ अक्टूबर २०१२ को ही अपने भावी राजनीतिक दल का दृष्टिकोण पत्र भी जारी किया.
राजनीतिक दल बनाने की विधिवत घोषणा के साथ उन्होंने कांग्रेस नेता सोनिया गाँधी जो नेहरू परिवार की उत्तराधिकारी और संप्रग की मुखिया हैं , के दामाद रॉबर्ट वढेरा और भूमि-भवन विकासकर्ता कम्पनी डीएलएफ के बीच हुए भ्रष्टाचार का खुलासा किया है और बाद में केन्द्रीय विधि मंत्री सलमान खुर्शीद और उनकी पत्नी लुई खुर्शीद के ट्रस्ट में हो रही धांधलियों के खिलाफ आन्दोलन छेड़ रखा है.


पुरस्कार

  • 2009: विशिष्ट पूर्व छात्र पुरस्कार, उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए आईआईटी खड़गपुर.

पुस्तकें

  • सूचना का अधिकार: व्यवहारिक मार्गदर्शिका - सह लेखक - विष्णु राजगडिया, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2007 में प्रकाशित.

यह भी देखें

संदर्भ

  1. ↑ सिटेशन उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए रमन मेगसेसे अवार्ड- प्रशस्ति पत्र
  2. ↑ 2.0 2.1 2.2 प्रोफाइल आई आई टी कानपुर छात्र संघ. सत्येन्द्र के. दुबे मेमोरियल पुरस्कार प्रशस्ति पत्र.
  3. ↑ इन इलेक्टिंग केजरीवाल, 38 ,..... टाइम्स ऑफ इंडिया, 31 जुलाई 2006.
  4. ↑ अशोक फेलो वेबसाईट पर प्रोफाइल प्रशस्ति पत्र.
  5. ↑ हमारे बारे में परिवर्तन आधिकारिक वेबसाइट.
  6. ↑ डोंट थ्रोटल आरटीआई अरविंद केजरीवाल, लाइवमिंट, 6 जुलाई 2007
  7. ↑ [1] आरटीआई पुरस्कार वेबसाइट.
  8. ↑ अरविन्द केजरीवाल का प्रोफाइल 6bridges.com - वैश्विक भारतीय पेशेवरों के लिए एक समुदाय साइट
  9. ↑ सीएनएन आईबीएन इंडियन ऑफ़ द इयर विजेता 2006

बाह्य सूत्र

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