मंगलवार, 24 जून 2014

कोर्स विवाद के बाद डीयू के वीसी का इस्तीफा





प्रस्तुति- साक्षी बादल/ संतोष तिवारी
 
दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने दाखिले पर रोक के बाद इस्तीफा दे दिया है. विश्वविद्यालय ने पिछले साल चार साल का ग्रेजुएशन कोर्स शुरू किया है, जिस पर पूरे भारत में विवाद चल रहा है. यहां दाखिला भी रुक गया है.
इस मुद्दे के तूल पकड़ने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर दिनेश सिंह ने इस्तीफा दे दिया. यूनिवर्सिटी के मीडिया कोऑर्डिनेटर मलय नीरव ने बताया, "वीसी ने इस्तीफा दे दिया." इससे दो दिन पहले यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने डीयू से कहा था कि वह चार साल के कोर्स में दाखिला न ले. इसके बाद से ही गणित के प्रोफेसर और करीब चार साल से यूनिवर्सिटी के उप कुलपति सिंह के इस्तीफे की अटकलें लग रही थीं.
यूजीसी का कहना था कि चार साल के कोर्स को हटा कर दोबारा से तीन साल का स्नातक कोर्स शुरू किया जाना चाहिए. लेकिन सिंह इस मुद्दे पर दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्वायत्तता की दुहाई दे रहे थे. बाद में मानव संसाधन मंत्रालय ने इस मुद्दे पर किसी तरह की दखल से इनकार कर दिया और दोनों पक्षों से आपस में समझौता करने की अपील की.
इससे एक दिन पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेजों ने दाखिले को टालने का फैसला किया क्योंकि विवाद बढ़ता जा रहा था. दिल्ली के 64 कॉलेजों में करीब 54,000 सीटें होती हैं, जिनके लिए पौने तीन लाख छात्रों ने आवेदन किया है.
कोर्स को लेकर विवाद और प्रदर्शन
सिंह के इस्तीफे के बाद यूनिवर्सिटी के कुछ हिस्सों में छात्रों ने जश्न मनाया और अपनी "जीत" की बात कही. कई छात्र संघ चार साल के कोर्स का विरोध कर रहे थे. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्ष और यूजीसी की सदस्य नंदिता नारायण ने इस्तीफे का स्वागत किया है, "उन्होंने इस सीट पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो दिया था." नारायण ने स्वायत्तता वाली बात को नकारते हुए कहा कि किसी भी डिग्री को मान्यता देने या न देने का अधिकार यूजीसी के पास होता है.
हालांकि वाइस चांसलर का समर्थन करने वालों की भी कमी नहीं. डीयू के एक्जक्यूटिव काउंसिल सदस्य एएन मिश्रा ने इस्तीफे को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा, "वीसी को यह फैसला लेने पर बाध्य होना पड़ा ताकि यूनिवर्सिटी की स्वायत्तता को बचाया जा सके. इसके साथ ही यूनिवर्सिटी का पतन भी शुरू हो गया है."
इस बीच राजनीतिक दलों से भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया आने लगी है. यूपीए के शासनकाल में स्वास्थ्य मंत्री रहे गुलाम नबी आजाद ने कहा कि यूजीसी का फैसला जल्दबाजी में लिया गया लगता है और इससे एनडीए को नुकसान होगा, "यह दिमाग से लिया गया फैसला नहीं है और इसका पलटवार होगा."
बीजेपी ने दिल्ली में चुनाव के दौरान अपने घोषणापत्र में कहा था कि अगर उनकी सरकार बनती है तो चार साल वाले कोर्स को खत्म किया जाएगा. आजाद का कहना है कि 60,000 छात्रों ने नए कोर्स में दाखिला लिया है और हड़बड़ी में उठाए गए कदम की वजह से उनके भविष्य पर खतरा मंडरा सकता है.
हालांकि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने भी दखल देने से इनकार कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रमजीत सिंह और एसके सिंह की खंडपीठ ने केस करने वाले प्रोफेसर आदित्य नारायण मिश्र से कहा है कि वह इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट जाएं. मिश्र ने यूजीसी के निर्देश को अदालत में चुनौती देने की कोशिश की थी. मिश्रा का दावा है कि चार सालों वाला एफवाईयूपी वैध है और उसे यूजीसी की सहमति भी मिली हुई है.
एजेए/ओएसजे (पीटीआई)

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रविवार, 22 जून 2014

यूनिवर्सिटियों में छुपा भारत का भाग्य



प्रस्तुति निम्मी नर्गिस , दक्षम द्विवेदी

भारतीय मूल के मशहूर उद्योगपति लॉर्ड स्वराज पॉल भारतीय शिक्षा प्रणाली से खुश नहीं हैं. विश्व के टॉप 200 विश्वविद्यालयों में एक भी भारतीय यूनिवर्सिटी नहीं है. पॉल इसे युवाओं से भरे देश का दुर्भाग्य मानते हैं.
ब्रिटेन के प्रतिष्ठित कारोबारी लॉर्ड स्वराज पॉल शुक्रवार को जालंधर में पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में पहुंचे. इस मौके पर उन्होंने भारतीय शिक्षा प्रणाली को लेकर अपनी मायूसी जाहिर की. लॉर्ड स्वराज पॉल ने कहा, "यह चिंता की बात है कि हमारे ज्यादातर संस्थानों में शिक्षा का स्तर मानक से भी नीचे है. भारत का कोई भी विश्वविद्यालय दुनिया की शीर्ष 200 यूनिवर्सिटियों में नहीं है."
उन्होंने बहुसांस्कृतिक माहौल वाली अच्छी शिक्षा प्रणाली की वकालत की. एनआरआई उद्योगपति के मुताबिक ऐसा करने से भारतीय छात्रों और दूसरे देशों के नागरिकों के बीच विचारों का खुला आदान प्रदान होगा और तकनीक के नए रास्ते खुलेंगे. स्वराज पॉल को लगता है कि अगर भारत में उच्च शिक्षा की स्थिति बेहतर होती है तो दूसरे देशों के टीचर और छात्र भी वहां आना पसंद करेंगे.
आईटी कंपनियों को कामगारों की किल्लत
अच्छी शिक्षा को मजबूत अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते हुए उन्होंने कहा, "शिक्षा वो आधार है जो लोकतांत्रिक समाज को बढ़ावा देती है और अर्थव्यवस्था और विकास को आगे बढ़ाती है."
भारत की आधी आबादी युवा है. देश को बेहतर आर्थिक विकास के लिए 2020 तक 50 करोड़ लोगों की इस युवा आबादी को अच्छी ट्रेनिंग देनी होगी. पॉल मानते हैं कि अच्छी ट्रेनिंग के बिना ज्यादातर युवा रटे रटाये काम ही करते रहेंगे, लेकिन अगर बढ़िया शिक्षा मिली तो इन्हीं में से अद्वितीय कलाकार और महान आविष्कारकों जैसी प्रतिभाएं भी निकलेंगी.
हाल ही में भारतीय आईटी कंपनी इंफोसिस के एक्जक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट क्रिस गोपालकृष्णन ने कहा था कि भारत में क्लासरूम में होने वाली पढ़ाई और उद्योग की जरूरतों के बीच नाता टूट गया है. उन्होंने कहा कि शिक्षक का काम किताब का ज्ञान देना नहीं उसे व्यवहार में लाने की शिक्षा देना है, क्योंकि आजकल संसाधनों तक छात्रों की पहुंच शिक्षकों के बराबर या उससे अधिक है.
ओएसजे/एमजे(पीटीआई)

शुक्रवार, 20 जून 2014

संत कबीर की विरासत




धार्मिक नगरी के रूप में विश्व प्रसिद्ध वाराणसी के कबीर मठ में रखी एक पत्थर की चक्की कबीर पंथियों के लिए आर्कषण का केन्द्र बनी हुई है. अपने साहित्य से कबीर ने जन चेतना को जगा कर समाज में व्यवस्था परिवर्तन के बीज बोये थे.
अरब देश के बुखारा शहर में सुल्तान इब्राहीम ने कैदखाने में यह चक्की लगवायी थी जिसे उसके शासन में गिरफ्तार किए गये साधु संतों से चलवाया जाता था. सुल्तान इब्राहीम साधु संतों और फकीरों को अपने दरबार में बुलवाता था और उनसे अनेक प्रश्नों का समाधान पूछता था. साधु संत जब उसकी शंकाओं और जिज्ञासा का समाधान नहीं कर पाते थे तो उन्हें कैदखाने में डालकर इस भारी चक्की को चलाने का दंड दिया जाता था.
चक्की की कहानी
संत कबीरदास को पंजाब भ्रमण के दौरान उनके अनुयायियों ने बुखारा में संतों को दी जा रही यातना की जानकारी दी और उनसे इस बारे में कुछ करने को कहा. कबीरदास सच जानने के लिये बुखारा पहुंचे और वहां संतों और फकीरों को दी जा रही यातना देखकर बहुत दुखी हुए. कबीर ने उनसे कहा कि भगवत भजन कीजिए, जिसकी कृपा से यह चक्की अपने आप चलेगी और उन्होंने यह कह कर चक्की को छू दिया.
उनके छूते ही चक्की चलने लगी और माना जाता है कि तबसे वह चक्की लगातार चल रही है. बाद में कबीर पंथ के पांचवें संत लाल साहब उस चक्की को भारत लाये और कबीर मठ में स्थापित किया. जीवन के सत्य को दोहों और चौपाइयों में परिभाषित करने वाले संत कबीर दास की वह चक्की वाराणसी में दशकों से पर्यटकों को लुभा रही है.
जहां पड़े 'बीजक' के बीज
वाराणसी के सिद्धपीठ कबीर चौरा मठ परिसर में संत कबीर ने अपनी कई साहित्य रचनाएं की. 'बीजक' उनकी मूल रचना है और कबीर पंथ के संत और अनुयायी बीजक को ही अपना धर्मग्रंथ मानते हैं. कबीरदास के परिनिर्वाण के बाद 'बीजक' की हस्तलिखित पांडुलिपि को मंदिर के स्मृति कक्ष में उनकी जर्जर खड़ाऊं और उनके इस्तेमाल किए लकड़ी के बर्तन के साथ ही रखा गया है. वहां एक हजार से अधिक लकड़ी की मणिकाओं वाली एक माला भी है जो स्वामी रामानन्द ने संत कबीर को दी थी.
मठ में कबीर साहित्य और संत साहित्य का एक समृद्ध पुस्तकालय भी है. करीब सात सौ पांडुलिपियां भी पुस्तकालय में रखी गई है. कबीर चौरा मठ स्वतंत्रता आंदोलन के समय क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था. अंग्रेज गवर्नरों ने नाराज होकर तीन तीन बार मठ को तोड़कर अस्पताल में मिला देने का आदेश दिया. मठ में मौजूद कबीर के जीवन दर्शन पर आधारित मूर्तियां और तैल चित्र भी आकर्षण का केंद्र हैं. कबीर दास ने समाज में फैले पाखन्ड, कुरीतियों और अन्धविश्वासों का विरोध कर सद्भाव का संदेश दिया.
आरआर/एमजे (वार्ता)

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