शनिवार, 9 मई 2015

मीडिया मैनेजमेंट के (बेताज) सज्जन बादशाह सज्जन कुमार





अनामी शरण बबल
प्रस्तुति-- रिद्धि सिन्हा नुपूर 

दिल्ली के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को दुर्ज्जन मानने या साबित करने का मेरे पास कोई ठोस तर्क सबूत या पुख्ता आधार नहीं है। सज्जन कुमार से मेरा
कोई गहरा या घनिष्ठ सा रिश्ता भी नहीं रहा है। पिछले कई सालों से हमारी मुलाकात भी नहीं है। हो सकता है कि रोजाना सैकड़ों लोगों से मिलने वाले
सज्जन कुमार को मेरा चेहरा या नाम भी अब याद ना हो। इसके बावजूद मीडिया मैनेजमेंट की वजह माने या इनके सहायक कैलाश का कमाल की सज्जन कुमार
को सामने फोकस किए बगैर वह मीडिया के सैकड़ों लोगों की उम्मीदों पर हमेशा खरा उतरते हुए सज्जन की सज्जन छवि को कायम रखने में सफल है।
मीडिया से परहेज करने वाले सज्जन को मीडिया में लोकप्रिय बनाए रखने में भी इसी कैलाश का हाथ रहा है।
आमतौर पर सज्जन के मन में मीडिया को लेकर ना कोई आदर है ना ही मीडियाकर्मियो से बड़ा प्यार दुलार ही है। इसके बावजूद दिल्ली के समस्त पत्रकारों
में सज्जन कुमार के प्रति ( तमाम आरोपों के बावजूद) सद्भाव वाला रिश्ता है। यही कारण है कि 1984 का मामला चाहे कोई भी करवट बदले, मगर
अखबरों में सज्जन को लेकर हमेशा सहानुभूतिपूर्ण नजरिया ही रहा है।
बात हम सज्जन को लेकर 1996 चुनाव से शुरू करते है। पहली बार लोकसभा चुनाव कवर करने की वजह से मैं काफी उतेजित और उत्साहित था। सज्जन
को लेकर मैंने पूरी तैयारी कर रखी थी। करीब एक माह तक लगातार खबरें देने की योजना के तहत मैने उन इलाकों को चुना, जहां पिछले पांच साल में सज्जन
कभी दोबारा ताकने भी नहीं गए थे। सज्जन के सामने बीजेपी ने वरिष्ठ नेता कृष्ण लाल शर्मा को मैदान में उतारा। आमतौर पर माना जा रहा था कि चुनाव
से पहले ही शर्मा को बलि का बकरा बनाकर चुनाव से पहले ही बीजेपी ने घुटने टेक दिए। मगर मुख्यमंत्री साहब सिंह वर्मा एंड पूरी पार्टी ने चुनावी
तस्वीर को ही दिन रात की मेहनत और लगन से बदल दिया।
एक तरफ चुनावी धूम तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय सहारा में एंटी सज्जन खबरों का दौर चालू हो गया। इन खबरों से इलाके में क्या असर पड़ रहा था, यह तो
मैं नहीं जानता, मगर सज्जन एंड कंपनी खेमे में जरूर बैचेनी थी। दिन में कैलाश तो कभी भी बेसमय, सज्जन कुमार ने भी तीन चार बार फोन करके यह जरूर
पूछा कि अनामी भाई क्या दुश् मनी है। मैंने पलटते ही कहा, 'सज्जन भाई दोस्ती कब थी?' एंटी खबरों पर हैरानी प्रकट की। इसकी सफाई में मुझे कहना
पड़ा, 'भाईसाब, खबर गलत है, तो बताइए? चारा डालते हुए सज्जन ने कहा था अरे अनामी जी खबर चाहे जैसी भी हो, मगर असर तो पड़ता ही है।
मानना पड़ेगा कि पूरे चुनाव के दौरान एंटी खबरों के बावजूद फिर दोबारा सज्जन या कैलाश ने फिर ना कभी टोका और ना शिकायत ही की। चुनाव खत्म हो
गया और एक लाख 98 हजार वोट से सज्जन कुमार पराजित हो गए।
चुनाव के बाद सबकुछ सामान्य सा हो गया था, मगर दो साल के भीतर ही एक बार फिर लोकसभा चुनाव सिर पर आ गया। चुनावी सिलसिला शुरू होने से
काफी पहले ही एक बार फिर पत्रकारों को पटाने का खेल चालू हो गया। उस समय तक मोबाइल नामक खिलौने का इजाद इंडिया में नहीं हुआ था। सज्जन
खेमे की तरफ से हर चार छह दिन के बाद कभी रेवाड़ी का गजक, तो सोनीपत का हलवा, तो कभी किसी और शहर की धमाल मिठाई का डिब्बा सज्जन कुमार
की तरफ से मेरे घर पर आने लगा।
कैलाश के इस गेम को मैं समझ रहा था। फोन पर तो मैंने मिठाई ना भेजने की गुजारिश की, फिर भी मेरे घर पर कम से कम सात आठ मिठाई के डिब्बे आ चुके थे। एक दिन दफ्तर में कैलाश से मुलाकात हो गई, तो मैंने इसका विरोध जताया कि सज्जन से मेरा होली दीवाली का भी कोई नाता कभी नहीं रहा है, लिहाजा
सबसे पहले मिठाईयों के डिब्बे भेजना बंद करें। इस पर कैलाश ने दो टूक कहा, 'अनामीजी भाईसाहब ने मुझे बस आपको मैनेज करने के लिए कहा है।' बकौल
कैलाश, 'भाईसाहब ने कहा है कि तू केवल अनामी को फिक्स कर ले, मैं पूरी दिल्ली की मीडिया को मैनेज कर लूंगा।' एक सांसद का यह दावा कि मैं पूरी दिल्ली
की मीडिया को मैनेज कर लूंगा। यह बात मुझे चुभ गई। फौरन इसका प्रतिवाद करते किया, 'कैलाश भाई, सज्जन भले ही पूरी दिल्ली की मीडिया को मैनेज
कर लें, मगर वे अनामी शरण बबल को मैनेज नहीं कर सकते। मीडिया मेरे गरूर का हिस्सा है. मैं साधारण सा एक सिपाही भर हूं, मगर बात जब मीडिया को
अपनी रखैल बनाने पर आ गई है, तब तो मुझे मीडिया की लाज रखनी ही होगी।' एकदम साफ लहजे में कैलाश को फिर मिठाई ना भेजने के लिए आगाह
किया। इसके बावजूद अगले चार पांच दिनों के भीतर ही सज्जन की मिठाई का डिब्बा फिर मेरे घर पर आ धमका। इस बार हमने बंजारा कालम में मिठाईयों
से पत्रकारों को पटाने का मजाक उड़ाते हुए टिकट मिलने पर ही संदेह जताया। 1984 के भूत की वजह से 1998 के लोकसभा चुनाव में सज्जन का टिकट
एक बार फिर कट गया। यानी सज्जन के नाम पर कैलाश का पूरा एक्सरसाइज फालतू और मेरे घर भेजे गए तमाम डिब्बे बेकार हो गए।
चुनाव हारने के बावजूद शोर शराबा या हंगामा खड़ा करने की बजाय सज्जन इलाके में सक्रिय रहते हैं। जनता से इनका नाता रहे या ना रहे, मगर जिसे
इन्होंने अपना बनाया है, वह हमेशा सज्जन के लिए काम करते हुए दिख जाते हैं। सही मायने में सज्जन की असली ताकत यही लोग हैं, जो दिखावे के
बगैर सज्जन के लिए जान देने के लिए भी तैयार रहते हैं। हर साल पत्रकारों को सज्जन कुमार अपने सरकारी आवास (सांसद नहीं रहने पर भी किसी और
सांसद के आवास पर) पत्रकारों को सालाना पार्टी देना कभी नहीं भूलते। पार्टी के दिन सैकड़ों पत्रकारों को लाने और वापस पहुंचाने के वास्ते दर्जनों गाड़ी
हमेशा खड़ी रहती हैं। ठेठ देहाती अंदाज में सज्जन की पार्टी में गंवई अंदाज में लिट्टी-चोखा से लेकर गन्ना, मकई भूंजा समेत लजीज खाने का मजमा
सा लग जाता है। दो या तीन बार मुझे भी इसमें शामिल होने का अवसर मिला है। शायद यह इकलौता पत्रकार पार्टी होता है जिसमें नवोदित से लेकर
संपादकों को भी आना रास आता है। संपादकों में सर्वसुलभ आलोक मेहता के दर्शन भी यहां पर होना परम आवश्यक है।
सज्जन में शालीनता कूट-कूट कर भरी है। यही शराफत मीडिया को भाता है। मीडिया से नाता होने के बावजूद क्या कमाल है अगर कोई सज्जन का इंटरव्यू
लेकर दिखाए या 1984 के बारे में बात भी कर ले। मुलाकात की पहला ही शर्त होती है कि 1984 पर नो एनी सवाल। महज एक सांसद होने के बाद भी
आन बान और शान में सज्जन के सामने वीआईपी लोग भी दम मारते नजर आएंगे। इसमें कोई शक नहीं यदि 1984 के साथ सज्जन का कोई नाता नहीं
होता तो इनका पोलटिकल सफर कुछ और होता। शायद सज्जन का सूरज कभी नहीं डूबता(वैसे सूरज आज भी चमक रहा है)। अपने पराजित विधायक भाई
रमेश को सांसद बनवा देना केवल सज्जन के बूते में ही था। इसके ठोस आधार भी है कि पिछले 15 साल में केवल एक बार सांसद होने के बाद भी जनता से
भले ही इनका साथ कम हो गया हो, मगर साथ देने वाले अपनों से सज्जन का साथ कभी कम नहीं हुआ है, जिसके बूते ही सज्जन को दुर्ज्जन कहने का
साहस आज किसी में नहीं है। भले ही परिसीमन के बाद राजधानी के राजनीतिक क्षेत्रों में भौगोलिक बदलाव आ गया, मगर विभिन्न आरोपों के बाद भी
मादीपुर गांव के मूल निवासी भूत(पूर्व) सांसद सज्जन कुमार को आज भी बाहरी दिल्ली और मीडिया को मैनेज करने में बेताज बादशाह ही माना जाता है।

रमाकांत गोस्‍वामी : पत्रकार से मंत्री बनने का सफर

अनामी शरण बबल PDF
अनामीशरणपत्रकारिता से राजनीति में आने वाले पत्रकारों की कोई कमी नहीं रही है, मगर दिल्ली की राजनीति में पिछले 15 साल के दौरान एकाएक (भाग्य) से चमकने वाले राजनीतिज्ञों में कम से कम तीन नामों पर चर्चा जरूर होनी चाहिए। हम यहां पर बात तो करेंगे केवल दिल्ली की शीला सरकार में कल (16 फरवरी) ही जगह पाने वाले (भूत) पूर्व पत्रकार रमाकांत गोस्वामी की। मगर गोस्वामी के बहाने कमसे कम दो और नेताओं का कोई जिक्र ना करना एक बड़ा अपराध सा होगा।
तीनों से मेरा साबका पड़ा है। लिहाजा पार्षद से विधायक और ( जनता के वोट से ज्यादा) किस्मत के धनी महाबल मिश्रा और लाटरी (बाजी) टिकट की बिक्री के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले विजय गोयल की सफलता की कहानी को सामने रखना भी जरूरी है।महज 10 साल के भीतर लाटरी(बाजी) नेता से सांसद और कैबिनेट मंत्री तक बनने वाले विजय गोयल की परियों जैसी सफलता की कहानी के पीछे दिवंगत नेता प्रमोद महाजन की हर प्रकार की भूमिका रही है। दिवंगत प्रमोद महाजन की वजह से आसमानी सफलता हासिल करने वाले गोयल कभी डीयू नेता भी रहे हैं। अखबार के दफ्तरों में अपने प्रेस नोट्स को लेकर अक्सर ठीक से छपने के लिए अनुनय विनय और प्रार्थना करने वाले गोयल सांसद तक तो पत्रकारों के संपर्क में रहे, मगर पीएम अटल बिहारी वाजपेयी कैबिनेट में मंत्री बनते ही गोयल भाजपा के वरिष्ठ मंत्री बनकर पत्रकारों से परहेज करने लगे।
यही हाल लगभग, पार्षद से सांसद बनने वाले महाबल मिश्रा की रही। पत्रकारों को देखते ही हाथ जोड़ने (इस मामले में सपा नेता मुलायम को भी शर्मसार करने वाले) के लिए मशहूर महाबल में छपास रोग इतना था कि अपने प्रेस रिलीज को लेकर अखबार के दफ्तर तक जाने में कोई गुरेज नहीं होता था। अपनी मासूमियत और इनोसेंट फेस की वजह से महाबल पत्रकारों में काफी लोकप्रिय हो गए और उम्मीद से ज्यादा प्रेस में जगह पाने में हमेशा कामयाब रहे। हालांकि विधायक बनने के बाद महाबल में थोड़ा गरूर आ गया और सांसद बनने के बाद तो थोड़ा बौद्धिक होने का घंमड़ सिर चढ़कर बोलने लगा। यही वजह है कि अब महाबल दिल्ली की राजनीति में महा होने के बाद भी बली बनने का सपना शायद पूरा नहीं कर पाएंगे।
हां तो अभी बात हो रही थी, रमाकांत गोस्वामी की। अपनी पत्रकारीय प्रतिभा से ज्यादा बिरला मंदिर में अपने पुजारी रिश्तेदारों की सिफारिश से दैनिक हिन्दुस्तान में रिपोर्टर की नौकरी पाने वाले रमाकांत गोस्वामी दैनिक हिन्दुस्तान में चीफ रिपोर्टर भी बनने में कामयाब रहे। बात 1996 लोकसभा चुनाव की है। मैं गोस्वामी को जानता तो था, मगर मिलने का मौका कभी नहीं मिला था। कई तरह से बदनाम होने के बावजूद खासकर पत्रकारों में खासे लोकप्रिय भूत(पूर्व) सांसद सज्जन कुमार की जेब में रहने के लिए गोस्वामी ज्यादा बदनाम थे। तालकटोरा रोड़ वाले प्रदेश कांग्रेस दफ्तर में सज्जन की प्रेस कांफ्रेस थी। हिन्दुस्तान की तरफ से संतोष तिवारी हमलोग के साथ ही बैठे थे, मगर सज्जन के बगल में एक मोटा सा आदमी बैठा था। प्रेस कांफ्रेस के दौरान कई बार सज्जन उससे सलाह लेते तो कई बार अपना मुंह आगे बढ़ाकर वह आदमी भी सज्जन को सलाह देता। आधे घंटे की प्रेस कांफ्रेस के दौरान सज्जन को आठ-दस बार अनमोल सलाह देने वाले के प्रति मेरे मन में कोई खास उत्कंठा नहीं जगी।
प्रेस वार्ता खत्म होने के बाद मैं और ज्ञानेन्द्र सिंह (दैनिक जागरण कानपुर से दिल्ली आए चंद माह भी तब नहीं हुए थे) डीपीसीसी के बाहर खड़े होकर बातचीत में मशगूल थे। तभी मेरी नजर सज्जन कुमार के उसी चम्‍मचे की तरफ गई, जो अब तक दो बार डीपीसीसी के अंदर से निकल कर बाहर खड़ी अपनी कार तक जाकर कोई सामान लेकर अंदर जा चुका था। चंद मिनटों में ही एक बार फिर वही चम्‍मचा एक बार फिर बाहर निकल कर अपनी कार की तरफ जाता हुआ दिखा। मैने ज्ञानेन्द्र से कहा चलो जरा माजरा क्या है देखें? अपनी कार से कुछ सामान निकाल कर वापस डीपीसीसी लौट रहे मोटे सज्जन को देखकर हाथ जोड़ते हुए मैंने कहा, सर आप कौन, पहचाना नहीं? तब तपाक से वह बोला तुम कौन? अपना आपा खोए बगैर धीरज के साथ मैंने जवाब दिया मैं राष्‍ट्रीय सहारा से अनामी और ये दैनिक जागरण से ज्ञानेन्द्र। तब थोड़ा सहज होकर सज्जन के चम्मचे ने कहा अरे, तुमने मुझे नहीं पहचाना? मैं एचटी से गोस्वामी। तब पूरी विनम्रता के साथ हाथ जोड़कर मैंने फिर कहा नहीं सर नहीं पहचाना। तब सज्जन के चमच्चे ने कहा कमाल है, अरे भाई मैं रमाकांत गोस्वामी हिन्दुस्तान से। अब चौंकने की बारी मेरी थी। मेरी आंखे विस्मय से लगातार फैल रही थी। मैंने कहा कमाल है, सर आप और सज्जन के साथ, तो फिर संतोष तिवारी जी? लगभग सफाई देते हुए गोस्वामी ने कहा अरे सज्जन तो अपने भाई हैं, साथ देना पड़ता है। संतोष कवरेज के लिए आया था। इस सफाई के बाद भी मेरी हैरानी कम नहीं हो रही थी। बात को मोड़ने के लिए गोस्वामी ने शराब की कुछ बोतल और लिफाफे में रखे पकौड़े को दिखाते हुए पूछा खाओगे? जबाव देने की बजाय तपाक से मैंने पूछा क्या आप खाते है? इस पर जोर देते हुए गोस्वामी ने कहा, नहीं मैं तो पंड़ित हूं। तब मैंने पलटवार किया। नहीं सर, मैं तो महापंड़ित हूं, इसे छूता तक नहीं। मेरी बातों से वे लगभग झेंप से गए। इसके बावजूद अपने दफ्तर में कभी आने का न्यौता देकर अपनी पिंड़ छुड़ाई।
लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद मतगणना से एक दिन पहले तालकटोरा स्टेडियम में हो रही तैयारियों का जायजा लेने गया था। वहां पर एक बार फिर गोस्वामी से टक्कर हो गई। इस बार हम दोनों एक दूसरे को पहचान गए। मैंने गोस्वामी से पूछा- सर, परिणाम में क्या होने वाला है? एकदम बेफ्रिक होकर गोस्वामी ने कहा होने वाला क्या है? बस देखते रहो सज्जन भाईसाहब किस तरह जीतते है। इस पर मैंने आपत्ति की और बोला कि मामला कुछ दूसरा ही होने वाला है। तब ठठाकर हंसते हुए गोस्वामी ने कहा, 'तुम अनुभवहीन लोग पोलिटिकल हवा को नहीं जानते।' खैर बात को तूल देने की बजाय मैं दफ्तर लौट आया और अगले ही दिन बीजेपी के कृष्णलाल शर्मा ने सज्जन कुमार को एक लाख 98 हजार मतों से हरा कर सज्जन कुमार एंड़ कंपनी का बोलती ही बंद कर दी थी। हालांकि इसे शर्मा की जीत की बजाय इसे तत्कालीन सीएम साहिब सिंह वर्मा और पूरी बीजेपी की जीत कहें तो भी कोई हैरानी नहीं।
हिन्दुस्तान में नौकरी करने के बावजूद बिरला से ज्यादा सज्जन की वफादारी के लिए (कु) या विख्यात गोस्वामी को सज्जन सेवा का पूरा फल मिला और दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान सज्जन की पैरवी से रमाकांत 1998 में पत्रकारिता से अलग होकर अपने चेहरे पर पोलिटिकल मुखौटा लगाने में कामयाब रहे। निगम सदस्य विधायक होने के नाते गोस्वामी से मेरी एक और मुठभेड़ 2000 या 2001 में हुई। जब वे निगम की एक बैठक में बतौर विधायक एमसीडी सदन में आए। हम पत्रकारों को देखते ही गोस्वामी ने सबों को बेटा- बेटा कहकर प्यार दिखाना शुरू कर दिया। अपने पिता के रूप में थोड़ी देर तक बर्दाश्त करने के बाद अंततः मैने टोका गोस्वामीजी नेता का चेहरा तो ठीक है, मगर हम पत्रकारों के बाप बनने की चेष्टा ना करें। कई और पत्रकारों ने भी जब आपत्ति की तो फिर गोस्वामी खिसक लिए।
सज्जन की वफादारी निभाते हुए ही गोस्वामी ने शीला दीक्षित के भी वफादार साबित हुए। जिसके ईनाम के रूप में गोस्वामी को मंत्री होने का परम या चरम सुख भी हासिल हो गया है। मेरी गोस्वामी से कोई शिकवा शिकायत वाला रिश्ता भी कभी नहीं रहा, इसके बावजूद मंत्री बनने की खबर सेमुझे कोई खुशी नहीं हुई। इसके बावजूद मैं कामना करूंगा कि वे मंत्री की पारी को 2013 तक  नाबाद जरूर रहे।

गुरुवार, 7 मई 2015

औरतों का गांव बाराटांड इर्फ माओका वाद






लेखक--गौतम सरकार भागलपुर, बिहार से

प्रस्तुति-- रिद्धि सिन्हा नुपूर  

हम औरतों वाले गांव में थे. बाराटांड. टांड यानी अनुपजाऊ ज़मीन... रेणु ने सिमराहा को लेकर लिखा था-धूसर, वीरान, अन्तहीन प्रान्तर... नहीं-नहीं, बाराटांड की धरती तो ऐसी नहीं है. लेकिन इस गांव में लोगों के कलेजे ऐसे ही हो गये हैं. गांव की गलियों में खामोशी पसरी रहती है और घरों में हवा की भांय-भांय करती आवाज. गांव में जब आप घुसेंगे तो आपको केवल औरतें नज़र आएंगी... लेकिन सब की सब चुप.
कमली देवी

अब जैसे कमली देवी को ही लें. कमली देवी के लिये यह अजीब सा इंतजार है, जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेता. वे हर रोज बहुत उम्मीद के साथ अपने पति भोला तांती का इन्तजार करती हैं और गांव के देवी-देवताओं को याद करते हुये दूसरी औरतों की तरह अपने मांग के सिन्दुर को सहेजती हैं.

बिहार के बांका जिले के जंगल और पहाड़ियों के बीच बसे जिस बाराटांड गाँव में कमली देवी रहती हैं, वहां ऐसा करने वाली वे कोई अकेली औरत नहीं हैं. 49 परिवारों वाले इस गांव में 37 से ज्यादा घरों में औरतें ऐसा ही करती हैं. उनके मरद इस गांव में नहीं रहते. ये औरतें अपनी मांग के सिन्दुर को छूकर अपने-अपने सुहाग की रक्षा की कामना करती हैं. गांव में जब कोई डाकिया आता है या कहीं से कोई संदेश आता है तो सबकी छाती धड़कने लग जाती है. कौन जाने, किसकी कैसी खबर आई हो...!

दो साल पहले तक ऐसा नहीं था. बाराटांड भी देश के दूसरे गांवों की तरह ही था लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि गांव की यह कहानी बदल गई. गांव के सारे वयस्क पुरुष पलायन कर गये. यह रोजी-रोटी के लिये किया गया पलायन नहीं था. यह पलायन धमकी के कारण हुआ था. ऐसी धमकी कि जिसकी दहशत आज भी कायम है.

कमली देवी को वो तारीख आज भी याद है. 5 अक्टूबर 2010 की शाम. दीवाली का दिन था और लोग घरों में दीया-बाती की तैयारी कर रहे थे. गांव में माओवादियों के एक दस्ते ने धावा बोला और फिर वो दीवाली गांव की आखिरी दीवाली बन गई. कमली देवी के 22 साल के जवान बेटा गुलाबी तांती और गांव के घनश्याम तांती को वहीं मौत के घाट उतार दिया गया. इस हमले में घायल संजय तांती तो दो महीने तक मौत से लड़ता रहा लेकिन पटना के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उसने भी दम तोड़ दिया. कमली देवी खुद भी तीन महीने तक अस्पताल में भर्ती रहीं. लेकिन तीन महीने बाद जब वे गांव लौटीं तो इनका संसार बदल चुका था. जवान बेटे की मौत के बाद इनके पति भी गांव छोड़ कर जा चुके थे.

माओवादियों के इस हमले के पीछे की कहानी भी हमें कमली ने ही सुनाई.

अगस्त के महीने में गांव में भटक रहे एक अजनबी से गांव वालों का झगड़ा हो गया. अजनबी शाम को फिर गांव में जब पहुंचा तो उसके साथ हथियारबंद लोग थे. गांव के लोगों के साथ फिर विवाद हुआ और हथियारों की धौंस दिखाई गई. जब बात, बात से नहीं बनी तो हथियार सामने आये. लेकिन अधिक संख्या में मौजूद गांव वालों के सामने यह हथियारबंद दस्ता नहीं ठहर सका. भारी आक्रोश से भरे हुये गांव वालों ने एक हथियारबंद युवक को पीट-पीट कर मार डाला और उससे बरामद हथियार पुलिस को सौंप दिये गये. यह तो बाद में पता चला कि जो हथियारबंद दस्ता गांव में आया था, वह भाकपा माओवादी के लोग थे.

इसके बाद दीवाली की शाम माओवादियों ने गांव पर हमला बोल दिया. पड़ोस के धोबरणा गांव के एक निवासी अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं- “माओवादियों ने परचा छोड़ा कि इस गांव के हरेक ग्रामीण को सबक सिखाया जाएगा.”
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धधकती आग पर झरिया में जीवन का सफर






 
प्रस्तुति-- रिद्धि सिन्हा नुपूर 
झरिया
झरिया कोयला खदानों में आग का फैलाव लगभग सवा सौ साल से जारी है.
झरिया के कोयला खदानों में 100 साल से भी लंबे अरसे से धधक रही आग की समस्या अब और गहरा गई है और प्रशासन ने नागरिकों को इलाके से हटाने का काम शुरू कर दिया है.
प्रशासन का कहना है कि वो नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है और उन्हें दूसरे क्षेत्र में बसाने के व्यापक इंतजाम किए गए हैं.
हालांकि 'कोकिंग कोल' के लिए प्रसिद्ध खदानों में उन्नीसवीं सदी के अंत से ही आग लगी हुई है लेकिन इससे पहले नागरिकों को वहां से हटाने की जरूरत नहीं महसूस की गई थी.
आज झरिया का आठ वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाका आग की चपेट में है जिनके बीच ऐसी अनगिनत बसाहटें मौजूद हैं जहां चारों तरफ सिर्फ आग, धूंए और जहरीली गैसों का बोलबाला है.
इस कारण लोग बड़ी तादाद में फेफड़े और दूसरी तरह की बीमारियों के शिकार हैं. जमीन के भीतर धधक रही आग से मकानों को धंसने का खतरा भी बराबर बना रहता है.

'धीमी मौत को मजबूर'

"आग प्रभावित आबादी वाले इन इलाकों में कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है जिसमें सैकड़ों जानें जा सकती हैं. इसके अलावा इन बस्तियों के आस-पास रिस रहे जहरीले गैस के कारण लोग गंभीर बीमारियों के शिकार होकर धीमी मौत मरने को मजबूर हैं."
सतीश पूरी, महानिदेशक, खनन सुरक्षा विभाग
धनबाद स्थिति खनन सुरक्षा विभाग के महानिदेशक सतीश पुरी कहते हैं, ''आग प्रभावित आबादी वाले इन इलाकों में कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है जिसमें सैकड़ों जानें जा सकती हैं. इसके अलावा इन बस्तियों के आस-पास रिस रहे जहरीले गैस के कारण लोग गंभीर बीमारियों के शिकार होकर धीमी मौत मरने को मजबूर हैं.''
सतीश पुरी का कहना है कि लोगों की सुरक्षा और राष्ट्रीय संपदा को बर्बाद होने से बचाने का एक ही रास्ता है कि लोगों को दूसरे इलाकों में बसाया जाए.
लेकिन सालों से कई तरह की समस्याएं झेल रहे नागरिक वहां से हटने को तैयार नहीं.
चारों तरफ आग से घिरी बस्ती बोकापहाड़ी में रहने वाली उमा देवी कहती है, ''जलते कोयले के बीच रहते हुए भी ये जगह मेरे लिए स्वर्ग है, मुझे यहीं रोजगार मिलता है, जिसकी सुविधा विस्थापित कॉलोनियों में नहीं.''
क्लिक करें इस कहानी को सुनने के लिए यहां क्लिक करें-
अब्दुल जब्बार कहते हैं, ''जिस बेलगड़िया कॉलोनी में उन लोगों को विस्थापित किया जा रहा है वहां की ना तो आबो-हवा अच्छी है ना ही माहौल. हम भी बहू-बेटी वाले हैं, ऐसी जगह कैसे चले जाएं जहां ना तो हमारे घर की महिलाएं सुरक्षित हैं और ना हीं हमारे बच्चों का विकास हो सकता है.''

रोजी-रोटी

कुजामा इलाके में अपने तीन बच्चों और पति के साथ रहने वाली अफसाना खातून कहती है, "मेरे पति किराए पर टेंपो चलाते हैं अगर प्रशासन विस्थापितों के लिए बनी बेलगढ़िया कॉलोनी में उन्हें एक टेंपो दे दे तो वो वहां अपने परिवार के साथ जा सकती है वर्ना हमारा घर कैसे चलेगा?"
लेकिन झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकरण का दावा है कि उसने विस्थापन के लिए कई योजनाएं चलाई हैं, जिनमें इन्हें छह महीने तक आर्थिक मदद देने, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, तकनीकी शिक्षा देने और इलाज की सुविधा है, लेकिन इसके बावजूद प्रशासन को लोगों का समर्थन नहीं मिल पा रहा है.
"मैं बोकापहाड़ी में एक प्राइवेट स्कूल चलाया करता था, जिससे इन गरीब मां-बाप के बच्चों को शिक्षा भी मिलती थी और मेरे बच्चे भी पल रहे थे. अगर मुझे बेलगढ़िया में स्कूल खोलने के लिए दो कमरा मिल जाए तो शायद अपने परिवार को भूखे मरने से बचा पाऊं."
अनंत प्रसाद, बोकापहाड़ी निवासी
झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकरण के प्रभारी गोपालजी कहते हैं, ''विस्थापन अपने आप में एक कष्टप्रद स्थिति है जिस कारण इन निजी कॉलोनियों में रहने वाले लोगों के मन में प्रशासन और बीसीसीएल के प्रति अविश्वास की भावना पैदा हो गई है जिस कारण वे इस पुनर्वास प्रक्रिया में सहयोग नहीं कर रहे हैं.''
लेकिन बेलगढ़िया में क्वार्टर मिलने के बाद भी वहां नहीं जाने वाले परिवारों में से एक मुन्नी देवी कहती हैं, ''प्रशासन हमें सिर्फ वहां जाकर छोड़कर आ रही है. फिर हम क्या खाते हैं, कैसे जीते हैं ये देखने कोई नहीं आता. जो आर्थिक मदद दी जा रही है उससे हमारा घर कब तक चलेगा, बेहतर ये होता कि हमारे लिए स्थायी रोजगार का इंतजाम किया जाता.''
वो कहती हैं कि मदद चाहे कितनी भी बड़ी क्यों ना हो जाए वो आपके जीने का साधन नहीं बनती.
एक विस्थापित परिवार के मुखिया अनंत प्रसाद कहते हैं कि, ''मैं बोकापहाड़ी में एक प्राइवेट स्कूल चलाया करता था, जिससे इन गरीब मां-बाप के बच्चों को शिक्षा भी मिलती थी और मेरे बच्चे भी पल रहे थे. अगर मुझे बेलगढ़िया में स्कूल खोलने के लिए दो कमरा मिल जाए तो शायद अपने परिवार को भूखे मरने से बचा पाऊं.''

आग का फैलाव

झरिया
इलाके में कुजामा बस्ती जैसी दर्जनों बसाहटें हैं जहां हर तरफ धधकती आग नजर आती है.
कहा जाता है कि भारत ही नहीं बल्कि पूरे एशिया में प्राइम कोकिंग कोल का 90 प्रतिशत उत्पादन झरिया में होता है. इसका इस्तेमाल इस्पात, लोहा, सीमेंट और बिजली के उत्पादन में किया जाता है.
लेकिन सवा-सौ साल से इस इलाके में जारी खनन के कारण कृषि भूमि का नाश भी हुआ है, धरती बंजर हुई है, खानों से जहरीले गैसों का रिसाव और खदानों में आग के विस्तार के कारण भू-धंसान की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.
सेंट्रल माइनिगं रिसर्च स्टेशन यानि सीएमआरआई के पूर्व निदेशक और सेवानिवृत वैज्ञानिक त्रिभूवन नाथ सिंह कहते हैं, ''साल 1973 में जब कोलफील्ड को राष्ट्रीयकृत किया गया तब भी यहां भूतल में 70 स्थानों पर आग सक्रिय थी लेकिन तब उन इलाकों में आबादी नहीं थी. इसलिए आग का बढ़ने और खनन का काम साथ-साथ चलता रहा और लोग बेफिक्र रहे.
"इसकी एक वजह ये भी रही कि उस समय अंडरग्राउंड माइनिंग की जाती थी.''
वो कहते हैं, ''आग का फैलाव साल भर में एक से 15 मीटर तक हो सकता है. इसलिए अगर कोई घर पच्चीस मीटर की जमीन पर बना है तो उसे धंसने में सामान्यत: तीन साल का वक्त लगता है.
इसी कारण लंबे समय तक इससे इक्का-दुक्का परिवार हीं प्रभावित हुए और लोगों में दहशत का माहौल भी नहीं तैयार हुआ. लेकिन इस बीच आग का विस्तार लगातार जारी रहा.''
आज झरिया का 8.9 वर्ग किलोमीटर इलाका आग की चपेट में है जो गंभीर स्थिति है.
समाजसेवी पीनाकी मजूमदार कहते हैं, ''हमें ध्यान रखना होगा कि इस पुनर्वास के दौरान दूसरी जगह ले जाकर बसाए जा रहे लोग शरणार्थी ना बन जाएं, क्योंकि देश में नर्मदा से लेकर बोकारो स्टील प्लांट तक के मामले में हुए विस्थापनों का उदाहरण लें तो पाएंगे कि लोगों को अपने ही देश में शरणार्थी बनने की स्थिति में पहुंचा दिया गया है.''
वो कहते हैं कि कोयला राष्ट्रीय संपत्ति है और उसे बचाना बेहद जरूरी है लेकिन जो लोग यहां दशकों से रहते आए हैं उनके लिए सम्मानजनक जीवन का इंतजाम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

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शुक्रवार, 1 मई 2015

सबसे सुदंर अभयारण्य





प्रस्तुति-- डा. ममता शरण,रिद्धि सिन्हा नुपूर


 अगर आप प्राकृतिक प्रेमी हैं आपको पक्षी बेहद लुभाते हैं तो क्यों न इस वेकेशन अपने शौक को पूरा करें। करीब से खूबसूरत पक्षियों को देख कैमरे में कैद करें। तो चलिए दोस्तों इस वेकेशन सैर करते हैं भारत के 5 पक्षी अभयारण्यों की। जहाँ पक्षियों की चहचहाहट आपके जीवन की सारी थकान हर लेगी। यूँ तो भारत अनेकों धर्मों, जातियों, ऐतिहासिक इमारतों, आलीशान मस्जिदों, नक्काशीनुमा विशाल मंदिरों, झीलें, झरनें, नदियां, गार्डन्स, चिड़ियाघर आदि के लिए विश्व प्रसिद्ध है। पर क्या आप जानते हैं कि भारत पक्षी अभ्यारण के लिए भी खासा लोकप्रिय है। पक्षी प्रेमियों के लिए बेमिसाल हैं भारत के यह 5 अभ्यारण पक्षी प्रेमियों के लिए ख़ास हैं ये अभ्यारण Photo Courtesy: Koshy Koshy आप इन अभयारण्यों में अनेकों पक्षियों, सुन्दर मोर, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, भारतीय सींग के बिल, किंगफिशर और भारतीय ईगल आदि को देख सकते हैं। भारत में तक़रीबन 1,200 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। आप इन पक्षी अभयारण्यों में आकर बेहद सुकून अनुभव कर सकेंगे। यह पक्षी प्रेमियों के लिए एक आदर्श स्थल है। पक्षी प्रेमियों के लिए बेमिसाल हैं भारत के यह 5 अभ्यारण राजस्थान का भरतपुर पक्षी अभ्यारण भारत के सबसे अच्छे अभ्यारण में माना जाता है Photo Courtesy: Greg Schechter भरतपुर पक्षी अभयारण्य भरतपुर पक्षी अभयारण्य केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान के रूप में जाना जाता है जो पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। यह पक्षी अभ्यारण राजस्थान के भरतपुर में है। यह भारत के सबसे अच्छे पक्षी अभयारण्यों में माना जाता है। यहाँ हर साल सर्दियों के मौसम में दुर्लभ और लुप्तप्राय पक्षी हज़ारों की तादाद में आते हैं। भरतपुर पक्षी अभ्यारण न सिर्फ देशी बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है। पक्षी प्रेमियों के लिए बेमिसाल हैं भारत के यह 5 अभ्यारण सुल्तानपुर पक्षी अभ्यारण पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग है Photo Courtesy: River Wanderer सुल्तानपुर पक्षी अभ्यारण सुल्तानपुर पक्षी अभ्यारण पक्षी प्रेमियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है। यह सरकार द्वारा पक्षी अभ्यारण 1972 में घोषित किया गया था। यहाँ पक्षियों की लगभग 250 प्रजातियां पाई जाती हैं। यह स्थल निवासी और प्रवासी दोनों पक्षियों का घर माना जाता है। पक्षी के आलावा यह स्थल पर्यटकों के लिए बेहद खूबसूरत पिकनिक स्पॉट है। यहाँ पुस्तकालय, घड़ी टॉवर, बच्चों की पार्क आदि है। पक्षी प्रेमियों के लिए बेमिसाल हैं भारत के यह 5 अभ्यारण सलीम अली पक्षी अभ्यारण पक्षियों का खूबसूरत झुरमुट दर्शाता है Photo Courtesy: David Stanley सलीम अली पक्षी अभ्यारण गोवा में मंडोवी नदी के पास सलीम अली पक्षी अभ्यारण स्थित है। यह निवासी प्रवासी पक्षियों का घर है। यह भारत के सबसे अच्छे पक्षी अभयारण्यों में से एक है। यहाँ गौरैयों, मोर, तोते, हवासील और कई तरह के पक्षियों को देखा जा सकता है। गोवा के सबसे अच्छे स्थानों में से एक है यह स्थल जहाँ शांत वातावरण और चिड़ियों की चहचहाहट ही रहती है। पक्षी प्रेमियों के लिए बेमिसाल हैं भारत के यह 5 अभ्यारण कुमारकोलम पक्षी अभ्यारण पक्षियों का आना जाना रहता है Photo Courtesy: Indiandevu कुमारकोम पक्षी अभ्यारण वेम्बानद झील के तट पर कुमारकोम पक्षी अभ्यारण स्थित है। जहाँ सैंकड़ों प्रवासी पक्षियों के घर हैं जो यहाँ रहते हैं। यह स्थल पक्षी प्रेमियों के लिए बेहद खूबसूरत स्थल है। इस अभ्यारण में आप कोयल, जलपक्षी, बगला, जलकाग, उल्लू, चैती, लवा, इग्रेट, साइबेरियन क्रेन, डार्टर, ब्राह्मिनी चील, तोता, और फ्लाईकैचर आदि पक्षियों को देख सकते हैं। यहाँ का दृश्य पेंटिंग की तरह नज़र आता है मानों किसी ने अपनी कल्पना से चित्रकारी की हो। खुला आसमान और एक साथ झुण्ड में उड़ते पक्षी, हरे भरे पेड़, सूर्यास्त और सूर्योदय का मनमोहक नज़ारा अद्भुत लगता है। पक्षी प्रेमियों के लिए बेमिसाल हैं भारत के यह 5 अभ्यारण गुजरात का मान सरोवर पक्षी अभ्यारण विश्व भर में मशहूर है Photo Courtesy: Shaunak Modi गुजरात का नल सरोवर गुजरात के अहमदाबाद शहर के बेहद खूबसूरत दर्शनीय स्थलों में से एक है। जहाँ हर साल सर्दियों के मौसम में पक्षियों की भीड़ उमड़ी रहती है। यहाँ तक़रीबन 200 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। जिनमें भूरी और सफेद बेडिग बर्ड, ब्‍लैक टेल्‍ड गोडविट, स्‍टीन्‍ट, प्‍लोवर्स और सैंडपाइपर्स फ्लॉक आदि पाएं जाते है। यह स्थल पक्षी प्रेमियों के लिए एक स्वर्ग है। पक्षी प्रेमियों के लिए बेमिसाल हैं भारत के यह 5 अभ्यारण Photo Courtesy: Hari Prasad Nadig Read more about: adventure travel, wildlife travel, अभ्यारण, पर्यटन स्थल Hotels In Chennai www.stayzilla.com/Stays_Chennai Easy, Safe & Quick. Book Your Budget Stay With Stayzilla Today. 75% Off Hotels In Goa wego.co.in/Goa Plan To Visit Goa For Holiday? Find Hotels On Wego.Com Start a Nursery School shemrock.com/StartaSchool Start Earning From First Month. Low Investment and High Returns. 1 Year Online MBA Rs.7500 www.nibmglobal.com/Online-MBA 100% 1 Year Online MBA. Approved & Accredited By IAO & AACBE. Join Now

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