महाराष्ट्र
के विदर्भ क्षेत्र में कर्ज़ में डूबे चार और किसानों ने आत्महत्या कर ली
है और इसी के साथ इस क्षेत्र में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या
1000 हो गई है.
आत्महत्याओं का यह ताज़ा मामला ऐसे समय में सामने आया है जब पूरा देश दिवाली का पर्व मना रहा है.
एक अनुमान के मुताबिक पिछले वर्ष जून से लेकर अभी तक 1000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.
जानकारों
का मानना है कि इस तरह की घटनाओं के सामने आने की एक वजह यह भी है कि
राज्य सरकार इन किसानों से कपास खरीदने में देर कर रही है.
उधर किसानों ने भी माँग की है कि सरकार को उनसे जल्द ही फसल ख़रीद लेनी चाहिए और उसके बदले में उन्हें उचित दाम दिया जाना चाहिए.
किसानों का कहना है कि अगर सरकार उनसे तुरंत कपास नहीं ख़रीदती है तो स्थितियाँ और भी बदतर हो सकती हैं.
ग़ौरतलब
है कि यह क्षेत्र बड़े पैमाने पर कपास की खेती के लिए जाना जाता है पर
पिछले 16 महीनों से यहाँ किसानों की आत्महत्या के मामले लगातार सामने आ रहे
हैं.
चिंता
किसानों
की आत्महत्याओं से संबंधित विवरण अपने पास रखने वाले किशोर तिवारी बताते
हैं कि इस बार फसल के समय की स्थितियाँ पिछले वर्ष की तुलना में और ज़्यादा
चिंताजनक हैं.
वो
बताते हैं, "अभी फसल का समय ख़त्म भी नहीं हुआ है और मरने वालों की तादाद
464 हो चुकी है. पिछले वर्ष फसल के समय में केवल 77 किसानों ने आत्महत्या
की थी."
तिवारी बताते हैं कि सरकारी ख़रीद केंद्र
अभी तक बंद हैं और इस वजह से किसान अपनी फसल कम दामों पर बिचौलियों के
हाथों बेचने के लिए मजबूर हैं.
कपास के लिए मौजूदा दाम 20,000 रूपए प्रति क्विंटल है. किसानों का कहना है कि इसे बढ़ाकर 27,000 रूपए प्रति क्विंटल किया जाना चाहिए.
ग़ौरतलब है कि लगभग 32 लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र में 90 प्रतिशत ग्रामीण कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं.
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दिल्ली भले ही देश का दिल हो, मगर इसके दिल का किसी ने हाल नहीं लिया। पुलिस मुख्यालय, सचिवालय, टाउनहाल और संसद देखने वाले पत्रकारों की भीड़ प्रेस क्लब, नेताओं और नौकरशाहों के आगे पीछे होते हैं। पत्रकारिता से अलग दिल्ली का हाल या असली सूरत देखकर कोई भी कह सकता है कि आज भी दिल्ली उपेक्षित और बदहाल है। बदसूरत और खस्ताहाल दिल्ली कीं पोल खुलती रहती है, फिर भी हमारे नेताओं और नौकरशाहों को शर्म नहीं आती कि देश का दिल दिल्ली है।
शनिवार, 3 सितंबर 2016
क्यों रुक नहीं रहीं किसानों की आत्महत्याएँ
महेन्द्र सिंह टिकैत
टिकैत की गिरफ़्तारी के प्रयास तेज़
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उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की गिरफ़्तारी के लिए दबाव बढ़ा दिया है.
इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने टिकैत के सिसौली गाँव से अविलंब पुलिस बल वापस बुलाने
की माँग की है.
भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख और वरिष्ठ किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत पर आरोप है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती
के लिए जातिसूचक टिप्पणियों का इस्तेमाल किया.
महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे और भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत को उत्तर प्रदेश पुलिस ने हिरासत में ले लिया है, लेकिन
महेंद्र सिंह टिकैत के नज़दीकी सूत्रों ने बताया है कि वे आत्मसमर्पण नहीं करेंगे.
उत्तर प्रदेश के मुख्य गृह सचिव जेएन
चंबर ने लखनऊ में पत्रकारों को बताया कि मुजफ़्फ़रनगर स्थित उनके गाँव
सिसौली में उनकी गिरफ़्तारी
के लिए अतिरिक्त अर्धसैनिक बल भेजे जा रहे हैं.
मुख्य गृह सचिव ने बताया कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का एक दल एक विशेष विमान से उनकी गिरफ़्तारी को शांतिपूर्ण तरीक़े से अंजाम
देने के लिए मुज़फ्फ़रनगर पहुँच गया है.
तनाव
स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि सिसौली में टिकैत के घर को चारों तरफ़ से घेर लिया गया है और वहाँ काफ़ी तनाव है क्योंकि गाँव
के लोग उनकी गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे हैं.
पुलिस पिछले दो दिनों से उनकी गिरफ़्तारी की कोशिश कर रही है, पुलिस को सोमवार को पीछे हटना पड़ा था कि क्योंकि पथराव और पुलिस
फायरिंग में कई लोग घायल हो गए थे.
पुलिस ने टिकैत उनके चार बेटों और 14 अन्य लोगों के ख़िलाफ़ जातिवादी टिप्पणी के लिए आपराधिक मामला दर्ज किया है.
बताया जा रहा है कि मायावती टिकैत की कथित टिप्पणी से आहत हैं और उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों की खिंचाई की है कि वे अब तक टिकैत
को गिरफ़्तार नहीं कर सके हैं.
राजनीतिक दाँव-पेंच
दूसरी ओर विपक्षी पार्टियाँ खुलेआम टिकैत के समर्थन में आ गई हैं और उनका कहना है कि सरकार बेकार के मुद्दे को बढ़ावा दे रही है.
मुख्यमंत्री मायावती जाटव समुदाय से हैं जिसकी गिनती कथित तौर पर निचली जाति के रुप में होती है जबकि टिकैत जाट समुदाय से आते
हैं.
यो दोनों समुदाय राजनीतिक बिसात पर भी बँटे हुए हैं. जहाँ जाटव बसपा समर्थक माने जाते हैं, वहीं जाट विरोधी खेमे के समर्थक माने
जाते हैं.
प्रेक्षकों का कहना है कि मुख्यमंत्री मायावती टिकैत के ख़िलाफ़ बेहद कड़ा रूख़ अपना रही हैं ताकि पिछड़ी और दलित जातियों में
पैठ को और मज़बूत किया जा सके.
लेकिन ये रणनीतिक चूक भी साबित हो सकती है क्योंकि टिकैत इस देश के चर्चित किसान नेता हैं और उनकी भारतीय किसान यूनियन की शाखाएँ
कई इलाक़ों में फ़ैली हुई हैं.
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गुरुवार, 1 सितंबर 2016
सोनागाछी की मिट्टी से क्यों बनती है मूर्तियां
डॉ. विशाखा बिस्सा
कोलकाता। । भारत उत्सवों का देश है। यहां के हर प्रांत के अपने पर्व और त्योहार है। दुर्गा पूजा एक ऐसा पर्व है, जो संपूर्ण बंगालवासियों के मन-मस्तिष्क में ऊर्जा और ताजगी भर देता है। अठारहवीं सदी में हमारा देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब भी जबलपुर में दुर्गा पूजा का आयोजन होता था।
महालया के दिन से ही चंडीपाठ का मंत्र घर-घर में सुनाई देता है। घर में टीवी होने पर भी रेडियो पर चंडी पाठ सुनने की प्रथा को आज भी कोलकाता में तोड़ा नहीं गया है। चंडी पाठ में महिषासुर मर्दिनी की कथा एक मधुर और लयबद्ध सुर में संस्कृत और बंगाल में मंत्रोच्चार के साथ सुनाते हैं बीरेंद्र कृष्ण भद्र। आज वो तो जीवित नही हैं, मगर उनकी आवाज अमर है।
नवरात्र चाहे जितने भी पवित्र तरीके से क्यों न मनाए जाते हों, लेकिन इस अवसर पर देवी की मूर्तियां बनाने में जिस खास तरह की मिट्टी का इस्तेमाल होता है, वह मिट्टी सोनागाछी से आती है। सोनागाछी कोलकाता का रेडलाइट इलाका है।

दुर्गा मां ने अपनी भक्त वेश्या को वरदान दिया था कि तुम्हारे हाथ से दी हुई गंगा की चिकनी मिट्टी से ही प्रतिमा बनेगी। उन्होंने उस भक्त को सामाजिक तिरस्कार से बचाने के लिए ऐसा किया। तभी से सोनागाछी की मिट्टी से देवी की प्रतिमा बनाने की परम्परा शुरू हो गई।
महालया के दिन ही दुर्गा मां की अधूरी गढ़ी प्रतिमा पर आंखें बनाई जाती हैं, जिसे चक्षु-दान कहते हैं। इस दिन लोग अपने मृत संबंधियों को तर्पण अर्पित करते हैं और उसके बाद ही शुरू हो जाता है देवी पक्ष। दुर्गा अपने पति शिव को कैलाश में ही छोड़ गणेेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ दस दिनों के लिए अपने पीहर आती है।
यहां लोग ग्रह-नक्षत्र देखकर यह पता लगाते हैं कि दुर्गा मां किस पर सवार होकर आ रही हैं। अगर हाथी पर सवार होकर आती हैं तो खेती, मनुष्य के जीवन में, पृथ्वी पर चारों ओर खुशहाली होती है, घोड़े पर बैठकर आती है तो पृथ्वी पर सूखा पड़ता है और बारिश नहीं आती।
मां अगर झूले पर बैठकर आती हैं तो चारों ओर बीमारियां फैलती हैं और यदि देवी नौका पर बैठकर आती हैं तो माना जाता है कि बारिश अच्छी होगी, फसल अच्छी होगी, नए साल का आगमन भी अच्छा होगा, पृथ्वी पर चारों ओर खुशहाली छा जाएगी। इस बार के नवरात्र के बारे में बंगाल के लोगों का मानना है कि देवी घोड़े पर बैठकर आ रही हैं।

छठे दिन (षष्ठी) दुर्गा की प्रतिमा को पांडाल तक लाया जाता है। बंगाल का कुमारटुली प्रसिद्ध है दुर्गा की सुंदर प्रतिमाएं गढ़ने के लिए, जहां मिट्टी से ये मूर्तियां बनाई जाती हैं। कोलकाता में होने वाली दुर्गा पूजाओं में लगभग 95 फीसदी प्रतिमाएं कुमारटुली से बनकर आती है।
इन प्रतिमाओं को बनाने के लिए पहले लकड़ी के ढांचे पर जूट आदि बांध कर ढांचा तैयार करते हैं और उसके बाद मिट्टी के साथ धान के छिलके मिलाकर मूर्ति तैयार की जाती है। फिर प्रतिमा की साज-सज्जा की जाती है, जिसमें नाना प्रकार के गहने और वस्त्र उपयोग में लाए जाते हैं।
केवल दुर्गा की प्रतिमा को ही नहीं, बल्कि पांडालों को भी बहुत सुंदर तरह से बनाया जाता हैं। कोलकाता में बांस और कपड़े से अमृतसर का स्वर्ण मंदिर, पेरिस के एफिल टावर जैसा दुर्गा पांडाल बनाया जाता है। पंडालों की रोशनी से सारा शहर दुल्हन जैसा लगता है।
षष्ठी की शाम को बोधन के साथ दुर्गा के मुख से आवरण हटाया जाता है। फिर महाषष्ठी के दिन सुबह-सुबह औरतें लाल बॉर्डर की साड़ी पहने पूजा करती हैं। महाअष्टमी के दिन का अपना महत्व है। अष्टमी के दिन संधिपूजा होती है।

इसका अपना एक निश्चित मुहूर्त होता है और उस मुहूर्त में बलि चढ़ाई जाती है। पुराने जमाने में लोग बकरे की बलि चढ़ाते थे, मगर ये प्रथा अब न के बराबर रह गई है। ज्यादातर जगहों पर किसी फल या कद्दू आदि की बलि चढ़ाई जाती है। मंत्रोच्चार के साथ 108 जलते दीयों के बीच उस संधिक्षण की बलि के लिए लोग निर्जल उपवास रखते हैं और उन कुछ क्षणों के लिए सारा जग जैसे शांत हो जाता है। कहते हैं उस संधिक्षण में मां के प्राण आते हैं।
बंगाल में धूनुचि नाच होता है। धूनुचि मिट्टी की बड़े सुराही नुमा प्रदीप होते हैं, जिसमें नारियल के छिलकों को जलाया जाता है और धूनो नामक सुगंधित पदार्थ डाल कर उन प्रदीपों को हाथ में लेकर सभी लोग अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं। एक साथ 4-5 धूनुचि लेकर और उसमें से गिरती आग के बीच नाचते हैं।

दशमी को सुबह विवाहिताएं मां दुर्गा की प्रतिमा को सिंदूर लगाने पांडाल आती हैं और वहां होली की तरह सुहागिनें सिंदूर से खेलती हैं। इसे सिंदूर खेला कहा जाता है। मंत्रोच्चार के साथ ही मां दुर्गा की प्रतिमा को विसर्जित कर दिया जाता है।
प्रतिमाओं के विसर्जन के समय शाम को माहौल कुछ ऐसा बन जाता है, जैसे कि लाडली बेटी दुर्गा मायके से ससुराल जा रही हो। दशहरे के दिन छोटे अपने से बड़ों के पैर छू कर आशीर्वाद लेते हैं और मुंह मीठा करते हैं। लोग एक-दूसरे से मिलने सबके घर जाते हैं और इस तरह संपूर्ण होता है दुर्गा पूजा उत्सव।
डॉ. विशाखा बिस्सा
दुर्गा पूजा
मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
प्रस्तुति- स्वामी शरण
| दुर्गा पूजा | |
|---|---|
दुर्गा पूजा |
|
| आधिकारिक नाम | दुर्गा पूजा |
| अन्य नाम | अकाल बोधन |
| मनाने वाले | हिन्दू |
| प्रकार | हिन्दू |
| शुरु | अश्विन शुक्ल पक्ष की छटी तिथि को[1] |
| अन्त | अश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को[1] |
| 2015 तिथि | 19 अक्टूबर - 23 अक्टूबर[2] |
| संबन्धित | महालय, नवरात्रि, दशहरा |
| अवधि | 5 दिन |
| आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) | वार्षिक |
| हिन्दू धर्म पर एक श्रेणी का भाग |
| इतिहास · देवता |
| सम्प्रदाय · आगम |
| विश्वास और दर्शनशास्त्र |
|---|
| पुनर्जन्म · मोक्ष |
| कर्म · पूजा · माया |
| दर्शन · धर्म |
| वेदान्त ·योग |
| शाकाहार · आयुर्वेद |
| युग · संस्कार |
| भक्ति {{हिन्दू दर्शन}} |
| ग्रन्थ |
| वेदसंहिता · वेदांग |
| ब्राह्मणग्रन्थ · आरण्यक |
| उपनिषद् · श्रीमद्भगवद्गीता |
| रामायण · महाभारत |
| सूत्र · पुराण |
| शिक्षापत्री · वचनामृत |
| सम्बन्धित विषय |
| दैवी धर्म · |
| विश्व में हिन्दू धर्म |
| गुरु · मन्दिर देवस्थान |
| यज्ञ · मन्त्र |
| शब्दकोष · हिन्दू पर्व |
| विग्रह |
| प्रवेशद्वार: हिन्दू धर्म |
| हिन्दू मापन प्रणाली |
दुर्गा पूजा का पर्व हिन्दू देवी दुर्गा की बुराई के प्रतीक राक्षस महिषासुर पर विजय के रूप में मनाया जाता है। अतः दुर्गा पूजा का पर्व बुराई पर भलाई की विजय के रूप में भी माना जाता है।
दुर्गा पूजा भारतीय राज्यों असम, बिहार, झारखण्ड, मणिपुर, ओडिशा, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में व्यापक रूप से मनाया जाता है जहाँ इस समय पांच-दिन की वार्षिक छुट्टी रहती है।[3] बंगाली हिन्दू और आसामी हिन्दुओं का बाहुल्य वाले क्षेत्रों पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा में यह वर्ष का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। यह न केवल सबसे बड़ा हिन्दू उत्सव है बल्कि यह बंगाली हिन्दू समाज में सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से सबसे महत्त्वपूर्ण उत्सव भी है। पश्चिमी भारत के अतिरिक्त दुर्गा पूजा का उत्सव दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, कश्मीर, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में भी मनाया जाता है। दुर्गा पूजा का उत्सव 91% हिन्दू आबादी वाले नेपाल और 8% हिन्दू आबादी वाले बांग्लादेश में भी बड़े त्यौंहार के रूप में मनाया जाता है। वर्तमान में विभिन्न प्रवासी आसामी और बंगाली सांस्कृतिक संगठन, संयुक्त राज्य अमेरीका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैण्ड, सिंगापुर और कुवैत सहित विभिन्न देशों में आयोजित करवाते हैं। वर्ष 2006 में ब्रिटिश संग्रहालय में विश्वाल दुर्गापूजा का उत्सव आयोजित किया गया।[4]
दुर्गा पूजा की ख्याति ब्रिटिश राज में बंगाल और भूतपूर्व असम में धीरे-धीरे बढ़ी।[5] हिन्दू सुधारकों ने दुर्गा को भारत में पहचान दिलाई और इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलनों का प्रतीक भी बनाया।
नाम
दुर्गापूजा की सप्तमी की सुबह में नबपत्रिका स्नान
पूजा को गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, केरल और महाराष्ट्र में नवरात्रि के रूप में[7] कुल्लू घाटी, हिमाचल प्रदेश में कुल्लू दशहरा,[8] मैसूर, कर्नाटक में मैसूर दशहरा,[9] तमिलनाडु में बोमाई गोलू और आन्ध्र प्रदेश में बोमाला कोलुवू के रूप में भी मनाया जाता है।[10]
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा
पांडाल में दुर्गा मूर्ति
क्रित्तिबस रामायण में राम, रावण से युद्ध के दौरान देवी दुर्गा को आह्वान करते हैं। यद्यपि उन्हें पारम्परिक रूप से वसन्त के समय पूजा जाता था। युद्ध की आकस्मिकता के कारण, राम ने देवी दुर्गा का शीतकाल में अकाल बोधन आह्वान किया।[11]
सन्दर्भ
- "What the epics say - 'Akalbodhan'" (अंग्रेज़ी में). Durga-puja.org. 2012-10-06. अभिगमन तिथि: 30 अगस्त 2015.
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