सोमवार, 19 मार्च 2018

कवि केदारनाथ की कविताएं




 

केदारनाथ सिंह

प्रस्तुति-  अनामी शरण बबल
केदारनाथ सिंह
केदारनाथ सिंह
जन्म
1934
चकिया गाँव, बलिया जिला, उत्तर प्रदेश
मृत्यु
19 मार्च 2018
राष्ट्रीयता
भारतीय
व्यवसाय
कवि
केदारनाथ सिंह (जन्म १९३४ ई.) हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार थे। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उन्हें वर्ष 2013 का 49 वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने का निर्णय किया गया।[1] वे यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के 10 वें लेखक थे।[2][3]

अनुक्रम

जीवन परिचय

केदारनाथ सिंह का जन्म 1 july 1934 ई॰ में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गाँव में हुआ था। उन्होंने बनारस विश्वविद्यालय से 1956 ई॰ में हिन्दी में एम॰ए॰ और 1964 में पी-एच॰ डी॰ की उपाधि प्राप्त की। वे जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र में बतौर आचार्य और अध्यक्ष काम कर चुके हैं।[4]

मुख्य कृतियाँ

कविता संग्रह
  • अभी बिल्कुल अभी
  • जमीन पक रही है[5]
  • यहाँ से देखो[6]
  • बाघ[5]
  • अकाल में सारस[5]
  • उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ[6]
  • तालस्ताय और साइकिल[6]
  • सृष्टि पर पहरा
आलोचना
  • कल्पना और छायावाद[6]
  • आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान[6]
  • मेरे समय के शब्द[6]
  • मेरे साक्षात्कार[6]
संपादन
  • ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन)[6]
  • समकालीन रूसी कविताएँ[6]
  • कविता दशक[6]
  • साखी (अनियतकालिक पत्रिका)[6]
  • शब्द (अनियतकालिक पत्रिका)[6]

पुरस्कार

केदारनाथ सिंह को मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, कुमारन आशान पुरस्कार, जीवन भारती सम्मान, दिनकर पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान आदि पुरस्कारों मिल चुके हैं।[6]

सन्दर्भ

केदारनाथ सिंह  

केदारनाथ सिंह
पूरा नाम
केदारनाथ सिंह
जन्म
जन्म भूमि
चकिया गाँव, बलिया (उत्तर प्रदेश)
कर्म-क्षेत्र
कवि, लेखक
मुख्य रचनाएँ
अभी बिल्कुल अभी, ज़मीन पक रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, बाघ, तालस्ताय और साइकिल
भाषा
विद्यालय
शिक्षा
एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.
पुरस्कार-उपाधि
ज्ञानपीठ पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, कुमारन आशान पुरस्कार, जीवन भारती सम्मान, दिनकर पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान
नागरिकता
भारतीय
अन्य जानकारी
इनकी कविताओं के अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन और हंगेरियन आदि विदेशी भाषाओं में भी हुए हैं।
इन्हें भी देखें
केदारनाथ सिंह (अंग्रेज़ी: Kedarnath Singh) प्रमुख आधुनिक हिंदी कवियों एवं लेखकों में से हैं। केदारनाथ सिंह चर्चित कविता संकलन ‘तीसरा सप्तक’ के सहयोगी कवियों में से एक हैं। इनकी कविताओं के अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन और हंगेरियन आदि विदेशी भाषाओं में भी हुए हैं। कविता पाठ के लिए दुनिया के अनेक देशों की यात्राएँ की हैं।

जीवन परिचय

केदारनाथ सिंह का जन्म 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के चकिया गाँव में हुआ था। इन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से 1956 में हिन्दी में एम.ए. और 1964 में पी.एच.डी की। केदारनाथ सिंह ने कई कालेजों में पढ़ाया और अन्त में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए। इन्होंने कविता व गद्य की अनेक पुस्तकें रची हैं और अनेक सम्माननीय सम्मानों से सम्मानित हुए। आप समकालीन कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। केदारनाथ सिंह की कविता में गाँव व शहर का द्वन्द्व साफ नजर आता है। 'बाघ' इनकी प्रमुख लम्बी कविता है, जो मील का पत्थर मानी जा सकती है।

साहित्यिक परिचय

यह कहना काफ़ी नहीं कि केदारनाथ सिंह की काव्‍य-संवेदना का दायरा गांव से शहर तक परिव्‍याप्‍त है या यह कि वे एक साथ गांव के भी कवि हैं तथा शहर के भी। दरअसल केदारनाथ पहले गांव से शहर आते हैं फिर शहर से गांव, और इस यात्रा के क्रम में गांव के चिह्न शहर में और शहर के चिह्न गांव में ले जाते हैं। इस आवाजाही के चिह्नों को पहचानना कठिन नहीं हैं, परंतु प्रारंभिक यात्राओं के सनेस बहुत कुछ नए दुल्‍हन को मिले भेंट की तरह है, जो उसके बक्‍से में रख दिए गए हैं। परवर्ती यात्राओं के सनेस में यात्री की अभिरुचि स्‍पष्‍ट दिखती है, इसीलिए 1955 में लिखी गई ‘अनागत’ कविता की बौद्धिकता धीरे-धीरे तिरोहित होती है, और यह परिवर्तन जितना केदारनाथ सिंह के लिए अच्‍छा रहा, उतना ही हिंदी साहित्‍य के लिए भी। बहुत कुछ नागार्जुन की ही तरह केदारनाथ के कविता की भूमि भी गांव की है। दोआब के गांव-जवार, नदी-ताल, पगडंडी-मेड़ से बतियाते हुए केदारनाथ न अज्ञेय की तरह बौद्धिक होते हैं न प्रगतिवादियों की तरह भावुक। केदारनाथ सिंह बीच का या बाद का बना रास्‍ता तय करते हैं। यह विवेक कवि शहर से लेता है, परंतु अपने अनुभव की शर्त पर नहीं, बिल्‍कुल चौकस होकर। केदारनाथ सिंह की कविताओं में जीवन की स्‍वीकृति है, परंतु तमाम तरलताओं के साथ यह आस्तिक कविता नहीं है।[1]
मैं जानता हूं बाहर होना एक ऐसा रास्‍ता है



जो अच्‍छा होने की ओर खुलता है


और मैं देख रहा हूं इस खिड़की के बाहर

एक समूचा शहर है

मुख्य कृतियाँ

कविता संग्रह
  • अभी बिल्कुल अभी
  • जमीन पक रही है
  • यहाँ से देखो
  • बाघ
  • अकाल में सारस
  • उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ
  • तालस्ताय और साइकिल
आलोचना
  • कल्पना और छायावाद
  • आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान
  • मेरे समय के शब्द
  • मेरे साक्षात्कार
संपादन
  • ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन)
  • समकालीन रूसी कविताएँ
  • कविता दशक
  • साखी (अनियतकालिक पत्रिका)
  • शब्द (अनियतकालिक पत्रिका)

सम्मान और पुरस्कार

ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रतीकः वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा

समाचार

शुक्रवार, 20 जून, 2014

प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह को मिला ज्ञानपीठ पुरस्कार

हिंदी की आधुनिक पीढ़ी के रचनाकार केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 के लिए देश का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। वह यह पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के 10वें लेखक हैं। ज्ञानपीठ की ओर से शुक्रवार 20 जून, 2014 को यहां जारी विज्ञप्ति के अनुसार सीताकांत महापात्रा की अध्यक्षता में हुई चयन समिति की बैठक में हिंदी के जाने माने कवि केदारनाथ सिंह को वर्ष 2013 का 49वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने का निर्णय किया गया। केदारनाथ सिंह इस पुरस्कार को हासिल करने वाले हिंदी के 10वें रचनाकार है। इससे पहले हिन्दी साहित्य के जाने माने हस्ताक्षर सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन अज्ञेय, महादेवी वर्मा, नरेश मेहता, निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को यह पुरस्कार मिल चुका है। पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार मलयालम के लेखक गोविंद शंकर कुरुप (1965) को प्रदान किया गया था। पुरस्कार के रूप में प्रो. केदारनाथ सिंह को 11 लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और वाग्देवी की प्रतिमा प्रदान की जाएगी।


केदारनाथ सिंह
जन्म
20 नवम्बर 1934
निधन
19 मार्च 2018
जन्म स्थान
ग्राम चकिया, जिला बलिया, उत्तर प्रदेश, भारत
कुछ प्रमुख कृतियाँ
अभी बिल्कुल अभी, ज़मीन पक रही है, यहाँ से देखो, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, बाघ, तालस्ताय और साइकिल
विविध
कविता संग्रह " अकाल में सारस" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार (1989), मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान (उड़ीसा) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित।
जीवन परिचय

कविता संग्रह

कुछ रचनाएँ

·          
·          

शनिवार, 17 मार्च 2018

लुप्त होती चमक दमक




 


अनामी शरण बबल

साहित्यिक पत्रिका हंस की भी एक अजब गजब कहानी है। जिस हंस को हिन्दी के मूर्धन्य कथाकार प्रेमचंद ने आरंभ किया था। वह हंस कब की काल कवलित हो गयी थी। मगर कथाकार राजेन्द्र यादव ने जिस हंस को 1987 में प्रेमचंद के हंस के नाम शुरू किया। यह पाठकों के साथ छलावा था। दिल्ली यूनीवर्सिटी के हंसराज कालेज की पत्रिका हंस को प्रेमचंद का हंस बनाकर प्रस्तुत किया गया। मगर हंस और प्रेमचंद को इसके संपादक राजेन्द्र यादव ने कुछ इस तरह परोसा कि हंस की पहचान यादव की हो गयी। अपने जीवनकाल में यादव ने इसकी लगन के साथ सेवा की और हंस को समय समाज साहित्य लोक सरोकार का चेहरा बना दिया। मगर यादव के देहांत के साथ ही हंस के संपादन की बागडोर एक कुबेरी साहित्यकार संजय सहाय ने संभाली। सहाय के हंस में सत्तासीन होते ही आर्थिक संकट से जूझते हंस की हालत में तो सुधार हुआ, मगर वैचारिक और रचनाओं के चयन प्रस्तुति के स्तर पर हंस की चमक दमक फीकी होती चली जा रही है।  करीब पांच साल से संपादन कर रहे संजय सहाय की अगुवाई में हंस के चेहरे पर निखार  की लौ मंद है।

हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं के आंदोलन को जन जन तक मुखर करने की कोशिश करके यादव ने पत्रिकाओं की एक नयी फसल पैदा की और देखते ही देखते करीब तीन दशक के दौरान देशभर से सैकड़ों पत्रिकाओं के प्रेरक बिंदु बने। हालांकि जिस समय मैं हंस की जब समीक्षा लिख रहा हूं ठीक उसी समय खबर है कि हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह अचेत हाल में एम्स में दाखिल है। वही हंस के मार्च अंक में अनामिका ने केदार बाबू से लंबी बातचीत की है। एकदम अलग तरह से की गयी यह बातचीत बहुत ही प्रेरक और पठनीय है जिसमें उन्होने कहा है कि अच्छे लेखन का प्रभाव धीरे धीरे होता है। नौ पेजी यह इंटरव्यू इस अंक की एक बड़ी उपलब्धि है। मगर उससे भी बड़ी उपलब्धि यह होगी कि केदार बाबू पिर से स्वस्थ्य होकर हमसबों के बीच रहे। इस अंक में पांच कहानियों के अलावा लेख समीक्षाएं कविताएं भी हैं जो अमूमन तमाम पत्रिकाओं में होती हैं मगर गुणवत्ता की कसौटी पर पाठकों को पहले जैसी उष्मा रचनात्मक संतुष्टि और उर्जा की भूख बाकी रह जाती है। और तो और इस बार संपादकीय तक संजय सहाय की ना होकर हंस के मई 1999 की इतिहास के मोड़ पर भूत और भविष्य का वर्तमान को दी गयी है। करीब 19 साल पुराने संपादकीय को क्यों दी जा रही है कमसे कम संपादक सहाय इसका औचित्य तो बताते। यादव के बाद संपादकीय उष्मा की कमी निरंतर महसूस हो रही है। संपादक होने के बाद भी हंस को देखकर लगता है मानों यह संपादक के बगैर निकलने वाली हंस है। यादव की कमी की खाई और चौड़ी हो गयी है और यही चिंता हंस के लिए नुकसानदेह है।    

हंस (मार्च2018) संपादक- संजय सहाय 2/36 असारी रोड दरियागंज नयी दिल्ली- 110002 पृष्ठ 100 मूल्य- 40 रूपये।

महिला लेखन को सलाम

हंस के साथ साथ पिछले 22 सालों से लगातार प्रकाशित कहानियों की पत्रिका कथादेश का मार्च अंक महिला लेखन पर एकाग्र है। ताजा अंक में इस बार 15 लेखिकाओं की कहानियां दी गयी है। इस अंक में कोई भी पुरूष लेखक नहीं है, लिहाजा इस अंक को इस नजरिये से देखना पढना ज्यादा रोचक और प्रेरक लगेगा। ज्यादातर कहानियों में एक नयापन और ताजगी है। जिससे महिला कथाकारों को लेकर कोई भी पाठक उत्साहित होगा। कथादेश के साथ जबसे अर्चना वर्मा जुड़ी हैं तो कथादेश की रचनाधर्मिता और चयन में अनायास सुधार हुआ है।  अर्चना जी के कारण कथादेश और सुगंधित हो गयी है। वहीं ज्यादातर संपादक अपनी पत्रिका से ज्यादा खुद को ही बड़ा बनाकर पेश करते हैं। वहीं हरिनारायण इस मामले में बिरले हैं। .संपादक होने के बाद भी खुद को  हमेशा हाशिये पर रखने वाले हरिनारायण हर जगह मौजूद होकर भी पाठकों को कहीं नहीं दिखते। संपादन स्वतंत्रता के मामले में वे लगभग संत समान हैं। यहां पर काम करने का एक लोकतांत्रिक माहौल है। और इसी माहौल में अर्चना वर्मा की उपस्थिति से कथादेश पाठकों की कसौटी पर निरंतर पास हो रहा है। यही इसकी खासियत है कि हंस के वैभवकाल में भी इसकी गूंज कायम रही।

कथादेश (मार्च 2018) संपादक - हरिनारायण एल -57बी, दिलशाद गार्डन दिल्ली-110095 पृष्ठ 100 मूल्य- 30 रूपये।

 सरकारी पत्रिका में खांटी साहित्य की महक

हिन्दी अकादमी दिल्ली की मासिक पत्रिका इंद्रप्रस्थ भारती  के प्रकाशन के तीन दशक के दौरान कई संपादकों ने इसे संवारा और बेहतर बनाया है। चर्चित महिला कथाकार मैत्रेयी पुष्पा के संपादन में इंद्रप्रस्थ भारती को देखना एक सुखद अनुभव है। वहीं हंस के लगातार रंगहीन होने की तस्वीर भी साफ हो गयी है। राजेन्द्र यादव काल में चाहे मैत्रेयी पुष्पा हों या अर्चना वर्मा सब हंस के संग इसकी उर्जा और वैचारिक गरमी के सूत्रधार थे। मगर यादव के दिवगंत होते ही हंस के साथ अपरोक्ष तौर पर सक्रिय टीम अलग हो गयी।  मैत्रेयी का भी हिंदी अकादमी की मासिक पत्रिका के साथ जुड़ गयी। हंस के संपादक सहाय राजेन्द्र यादव की टीम को हंस के संग साथ नहीं रख सके जिससे हंस की चाल ढाल और रंग रूप बदल गयी। मैत्रेयी ने इसे समय समाज शोध लेखन की नयी धारा को नयी धार दी है। इस अकादमिक पत्रिका को मुख्यधारा में लाकर इसको  साहित्य और सोच की मुख्यधारा में स्थापित किया है। जनवरी 2018 के अंक में रचना चयन के प्रति सजगता तो है। विरासत कॉलम में विख्यात गीतकार बलवीर सिंह रंग की काव्यात्मर उर्जा को देखना सुखद है। खासकर  मेरे पास ना आओ मैं सिंहासन हूं गीत में राजनीति के विवेकहीन चरित्र का मार्मिक बखान किया है।

मेरे पास ना आओ मैं सिंहासन हूं / सुख समृद्दि के नाम पर युद्द का ज्ञापन हूं। सकल सृष्टि के आकार का मंत्र हूं / सम्मोहन हूं, वशीकरण हूं, उच्चाटन हूं।

दिवंगत रंग की इस गीत से सहसा डा. धर्मवीर भारती की एक कविता याद आती है जब आपातकाल में आह्वान किया था कि खाली करो सिंघासन की जनता आने वाली है । मगर एक ही काल के दो बड़े कवि ने इसको अलग अलग ढंग से परिभाषित किया है। गीतकार रंग की कविताएं आज के हालात से जूझती हुई पाठको को बल देती है।  

 सिनेमा और सोशल मीडिया को जगह देना भी इसी सोच की उपज है, मगर मैत्रेयी जी को सब एक ही कवर में देने की बजाय एक अलग मौलिक रास्ता अख्तियार करना होगा ताकि इसमें संपादक की क्षमता की गूंज फैल सके। सज्जा और चमक दमक से स्पष्ट है कि सरकारी मैग्जीन को कोई धनसंकट नहीं है।     

इंद्रप्रस्थ भारती ( जनवरी 2018) संपादक - मैत्रेयी पुष्पा, हिन्दी अकादमी समुदाय भवन, पदम नगर किशनगंज दिल्ली- 110007 पृष्ठ 86 मूल्य- 30 रूपये।

आजकल के साहित्य में आजकल

सरकारी साहित्यिक पत्रिकाओं की चल रही चर्चा में  पिछले 73 साल से लगातार छप रही प्रकाशन विभाग की साहित्यिक पत्रिका आजकल की चर्चा ना करना सरासर गलत होगा। जिस पत्रिका को देवेन्द्र सत्यार्थी के संपादन में शुरू की गयी थी वह आज भी एक विशुद्द साहित्यिक धारा में ही प्रवाहित है। पिछले सात दशक के दौरान देश की राजनीति में बेशुमार बदलाव आए। समय ने करवट बदली.। सोच और विचार के स्त्तर पर कई तरह की धाराएं रंग बदलती रही, मगर आजकल की साहित्यिक धारा एक समान रही। इसके प्रवाह में राजनीति कभी बाधक नहीं बनी। यही इस पत्रिका के महत्व को कालजयी बनाती है। आजकल का मार्च अंक महिला लेखन पर केंद्रित है। कहानियों के नाम पर केवल छह कहानी है, मगर कहानी लेखन की दशा दिशा की जांच परख करती कई लेखों से बेहद संतोष होता है। भूमंडलोतर कहानियों के साथ साथ इधर के कहानीकार और  बदलते जीवन का कहानियों पर होने वाले असर को रोचकता के साथ प्रस्तुत किया गया है। इन लेखों में दर्जनों कहानियों और कथाकारों का उल्लेख है, जिससे इधर की कहानियों की तस्वीर ज्यादा स्पष्ट ठोस आकार लेती है। भविष्य में कहानियों से बड़े फलक की अनुभूति होती है।  कहानी पर एकाग्र परिचर्चा में नासिरा शर्मा और सुनीता की तार्किक अभिव्यक्ति भी काफी महत्वपूर्ण है। स्वाति स्नेहा , सिनीवाली और पल्लवी प्रसाद की कहानियां पाठकों को रोचक लगेगी। वहीं सिनेमा में मां की भूमिका पर यशस्विनी पांडेय का लेख स्त्री विमर्श को नया आयाम देती है। फिल्म स्पर्श चश्मेबद्दूर दिशा, साज और कथा आदि फिल्म को बनाने  वाली महिला डायरेक्टर सई परांजये के योगदान पर प्रकाश डालती है।

आजकल का साहित्यिक चेहरा कल भी संतोष देता था और आज भी आजकल का साहित्य लेखकों पाठकों की उम्मीदों पर अव्वल है। इसके प्रकाशन के 75 साल होने वाले हैं तब यह देखना दिलचस्प होगा कि उस समय आजकल के खजाने में और क्या नया अध्याय जुड़ेगा। 

आजकल (मार्च 2018) संपादक - राकेश रेणु , प्रकाशन विभाग कमरा नंबर 601 डी, सूचना भवन, सीजीओ कॉम्पलेक्स नयी दिल्ली- 110003 पृष्ठ 64 मूल्य- 22 रूपये।

 

अनियमितता के रोग से बचाव जरूरी

किसी भी पत्रिका का बड़े धूमधाम से आरंभ किया तो जाता है, मगर दो एक अंक आते आते ज्यादातर पत्रिकाओं के संचालकों की उर्जा चूकने लगती है। मासिक पत्रिका हिम आकाश का प्रकाशन स्थल दिल्ली भले ही हो मगर हर पेज पर उत्तराखंड दिखता और झलकता है। हिम आकाश केवल और केवल उत्तराखंडी नागरिकों की ताकत और रिपोर्ट के बल पर सामने है। इसके हर पन्ने पर उत्तराखंड धड़कता है। यही इसकी ताकत है और सीमा भी।  हालांकि पत्रिका में इस प्रांत की खोजपरक खबरों को जगह दी गयी है। खासकर 20-13 में केदारनाथ त्रासदी के बाद की हालातों पर करीब साढ़े चार साल के बाद की खोजपरक आवरण खता बहुत ही बेहतर है। सरकारी उपेक्षा और नौकरशाही प्रपंच के सामने बेबस जनता की त्रासदी को समझने में यह काफी सहायक होगी।  पहाडी इलाके की पहाड़ जैसी समस्याओं को हिम आकाश के जरिये समझा जा सकता है। मगर इसका निरंतर प्रकाशन जरूरी है. अनियमितता के रोग से बचना होगा तभी हिम को एक नया आकाश सुलभ होगा

हिम आकाश (नवम्बर 2017) संपादक - रणजीत सिंह, 185 एफ, पॉकेट एक मयूर विहार फेज -1 दिल्ली- 110091 पृष्ठ 52 मूल्य- 30 रूपये।


मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

पत्रकारिता का इतिहास




प्रस्तुति- अमन कुमार अमन


इतिहास

लगता है कि विश्व में पत्रकारिता का आरंभ सन 131 ईस्वी पूर्व रोम में हुआ था। उस साल पहला दैनिक समाचार-पत्र निकलने लगा। उस का नाम था – “Acta Diurna” (दिन की घटनाएं)। वास्तव में यह पत्थर की या धातु की पट्टी होता था जिस पर समाचार अंकित होते थे। ये पट्टियां रोम के मुख्य स्थानों पर रखी जाती थीं और इन में वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति, नागरिकों की सभाओं के निर्णयों और ग्लेडिएटरों की लड़ाइयों के परिणामों के बारे में सूचनाएं मिलती थीं।
मध्यकाल में यूरोप के व्यापारिक केंद्रों में ‘सूचना-पत्र ‘ निकलने लगे। उन में कारोबार, क्रय-विक्रय और मुद्रा के मूल्य में उतार-चढ़ाव के समाचार लिखे जाते थे। लेकिन ये सारे ‘सूचना-पत्र ‘ हाथ से ही लिखे जाते थे।
15वीं शताब्दी के मध्य में योहन गूटनबर्ग ने छापने की मशीन का आविष्कार किया। असल में उन्होंने धातु के अक्षरों का आविष्कार किया। इस के फलस्वरूप किताबों का ही नहीं, अख़बारों का भी प्रकाशन संभव हो गया।
16वीं शताब्दी के अंत में, यूरोप के शहर स्त्रास्बुर्ग में, योहन कारोलूस नाम का कारोबारी धनवान ग्राहकों के लिये सूचना-पत्र लिखवा कर प्रकाशित करता था। लेकिन हाथ से बहुत सी प्रतियों की नकल करने का काम महंगा भी था और धीमा भी। तब वह छापे की मशीन ख़रीद कर 1605 में समाचार-पत्र छापने लगा। समाचार-पत्र का नाम था ‘रिलेशन’। यह विश्व का प्रथम मुद्रित समाचार-पत्र माना जाता है।

भारत में पत्रकारिता का आरंभ

छापे की पहली मशीन भारत में 1674 में पहुंचायी गयी थी। मगर भारत का पहला अख़बार इस के 100 साल बाद, 1776 में प्रकाशित हुआ। इस का प्रकाशक ईस्ट इंडिया कंपनी का भूतपूर्व अधिकारी जेम्स अगस्तस हिक्की था। यह अख़बार स्वभावतः अंग्रेज़ी भाषा में निकलता था तथा कंपनी व सरकार के समाचार फैलाता था।
सब से पहला अख़बार, जिस में विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त किये गये, वह 1780 में जेम्स ओगस्टस हीकी का अख़बार ‘बंगाल गज़ेट’ था। अख़बार में दो पन्ने थे और इस में ईस्ट इंडिया कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों की व्यक्तिगत जीवन पर लेख छपते थे। जब हीकी ने अपने अख़बार में गवर्नर की पत्नी का आक्षेप किया तो उसे 4 महीने के लिये जेल भेजा गया और 500 रुपये का जुरमाना लगा दिया गया। लेकिन हीकी शासकों की आलोचना करने से पर्हेज़ नहीं किया। और जब उस ने गवर्नर और सर्वोच्च न्यायाधीश की आलोचना की तो उस पर 5000 रुपये का जुरमाना लगाया गया और एक साल के लिये जेल में डाला गया। इस तरह उस का अख़बार भी बंद हो गया।
  • 1790 के बाद भारत में अंग्रेज़ी भाषा की और कुछ अख़बार स्थापित हुए जो अधिक्तर शासन के मुखपत्र थे। पर भारत में प्रकाशित होनेवाले समाचार-पत्र थोड़े-थोड़े दिनों तक ही जीवित रह सके।
  • 1819 में भारतीय भाषा में पहला समाचार-पत्र प्रकाशित हुआ था। वह बंगाली भाषा का पत्र – ‘संवाद कौमुदी’ (बुद्धि का चांद) था। उस के प्रकाशक राजा राममोहन राय थे।
  • 1822 में गुजराती भाषा का साप्ताहिक ‘मुंबईना समाचार’ प्रकाशित होने लगा, जो दस वर्ष बाद दैनिक हो गया और गुजराती के प्रमुख दैनिक के रूप में आज तक विद्यमान है। भारतीय भाषा का यह सब से पुराना समाचार-पत्र है।
  • 1826 में ‘उदंत मार्तंड’ नाम से हिंदी के प्रथम समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह साप्ताहिक पत्र 1827 तक चला और पैसे की कमी के कारण बंद हो गया।
  • 1830 में राममोहन राय ने बड़ा हिंदी साप्ताहिक ‘बंगदूत’ का प्रकाशन शुरू किया। वैसे यह बहुभाषीय पत्र था, जो अंग्रेज़ी, बंगला, हिंदी और फारसी में निकलता था। यह कोलकाता से निकलता था जो अहिंदी क्षेत्र था। इस से पता चलता है कि राममोहन राय हिंदी को कितना महत्व देते थे।
  • 1833 में भारत में 20 समाचार-पत्र थे, 1850 में 28 हो गए और 1953 में 35 हो गये। इस तरह अख़बारों की संख्या तो बढ़ी, पर नाममात्र को ही बढ़ी। बहुत से पत्र जल्द ही बंद हो गये। उन की जगह नये निकले। प्रायः समाचार-पत्र कई महीनों से ले कर दो-तीन साल तक जीवित रहे।
उस समय भारतीय समाचार-पत्रों की समस्याएं समान थीं। वे नया ज्ञान अपने पाठकों को देना चाहते थे और उसके साथ समाज-सुधार की भावना भी थी। सामाजिक सुधारों को लेकर नये और पुराने विचारवालों में अंतर भी होते थे। इस के कारण नये-नये पत्र निकले। उन के सामने यह समस्या भी थी कि अपने पाठकों को किस भाषा में समाचार और विचार दें। समस्या थी – भाषा शुद्ध हो या सब के लिये सुलभ हो? 1846 में राजा शिव प्रसाद ने हिंदी पत्र ‘बनारस अख़बार’ का प्रकाशन शुरू किया। राजा शिव प्रसाद शुद्ध हिंदी का प्रचार करते थे और अपने पत्र के पृष्ठों पर उन लोगों की कड़ी आलोचना की जो बोल-चाल की हिंदुस्तानी के पक्ष में थे। लेकिन उसी समय के हिंदी लखक भारतेंदु हरिशचंद्र ने ऐसी रचनाएं रचीं जिन की भाषा समृद्ध भी थी और सरल भी। इस तरह उन्होंने आधुनिक हिंदी की नींव रखी है और हिंदी के भविष्य के बारे में हो रहे विवाद को समाप्त कर दिया। 1868 में भरतेंदु हरिशचंद्र ने साहित्यिक पत्रिका ‘कविवच सुधा’ निकालना प्रारंभ किया। 1854 में हिंदी का पहला दैनिक ‘समाचार सुधा वर्षण’ निकला।

इन्हें भी देखें

बाहरी कड़ियाँ