सोमवार, 5 अप्रैल 2021

गीतकार भरत व्यास

 हिंदी फिल्मो के मशहूर गीतकार भरत व्यास जी की पुण्यतिथि 4 जुलाई पर विशेष ...


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फिल्म 'जनम जनम के फेरे’ (1957 ) के गीतों ने लोकप्रियता की नई ऊँचाइयों को छुआ और हिट हुए' शायद आपको पता न हो इस संगीतमय फिल्म 'जनम जनम के फेरे 'के गीतकार भरत व्यास के जीवन से एक दर्दनाक वाकया भी जुड़ा है जिसे उन्होंने अपने गीत ‘ज़रा सामने तो आओ छलिये’ में व्यक्त भी किया......अगर आप ये गाना सुनेगे तो उनका दर्द महसूस भी करेंगे मोहम्मद रफ़ी और लता जी की आवाज़ में ये गाना अमर हो गया भरत व्यास जी ने पीड़ा से भरे ये शब्द इस गाने में लिखे जिसे संगीतकार एस.एन त्रिपाठी ने गाने में शामिल करके उनके दर्द का भी सम्मान किया ..

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पवन मेहरा

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कुंदन लाल सहगल

 आज 18 जनवरी को देश के पहले संगीत सम्राट दिवंगत के एक सहगल जी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि.🙏.

जब कभी भी हिंदुस्तानी फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास को देखा जाएगा तो के.एल सहगल का नाम उन चंद हस्तियों में पाया जाएगा साल 1932 से लेकर 1946 के सिनेमा के समय को 'सहगल युग' के तौर पर जाना जाता है सहगल ने ‘जब दिल ही टूट गया’, ‘दिया जलाओ’, ‘चाह बर्बाद करेगी’, ख्याल, ठुमरी, चैती, दादरा, ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’ और ‘गम दिए मुस्तकिल’ जैसे गाने गाए थे के.एल सहगल की काफी इज्जत करने वालों में दिलीप कुमार भी शामिल थे। एक बार उन्होंने के एल सहगल के बारे में कहा था, ..... ''उस जमाने में फिल्मों में काम करने वाले लोगों को लोग इज्जत की नजरों से नहीं देखते थे'' 

 कुंदन लाल सहगल उन चुनिंदा हस्तियों में से हैं जिन्होंने इस कला को समाज के पटल पर स्थान दिलाया। 'कभी पंजाबी होने के कारण उन्हें बंगाली गाना गाने और एक्टिंग करने से मना कर दिया गया था लेकिन उन्होंने इसके बावजूद ऐसा मुकाम बनाया कि उनके बंगाली गायन को इस फिल्म में खूब पसंद किया गया। खुद रबीन्द्रनाथ टैगोर ने सहगल के तारीफ में कहा था..

 '' तुम्हारा गला कितना सुंदर है ''

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 Kundan Lal Saigal

Died: 18 January 1947

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 पवन मेहरा

#ब्लॉग_सुहानी_यादें_बीते_सुनहरे_दौर_की ✍️


 

रविवार, 4 अप्रैल 2021

Tv का सहारा tha...

 the great show man of the bollywood 

 🌷🌻🌷🌻🌷🌻

#raaj_kapoor ❣️❣️❣️❣️

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उन दिनों #टीवी ही एकमात्र #मनोरंजन का माध्यम था । 

हर रविवार को एक #सीरीज में फिल्में आती थी ।

#आरकेबैनर की फिल्में प्रति #रविवार को एक आती थी ।

मैंने कभी राज कपूर की कोई फ़िल्म नही देखी थी । न ही उन दिनों मुझे #ब्लैक एंड वाइट #फिल्मों आकर्षण नजर आता था ।

लेकिन #संयोग से जाने #अनजाने वह मुझे देखनी पड़ गई ..

टीवी मेरे सामने था तो देखनी पड़ी ।

#टीवी पर ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म चल रही थी ।

कभी कभी मैं टीवी की तरफ भी देख लेता था । लेकिन

जैसे ही मैंने देखना शुरू किया तो देखता चला गया ।

सबसे पहले मैंने जो फ़िल्म देखी वह आरके बैनर की #आह

फ़िल्म थी । बहुत पसंद आई , मै #राजकपूर का फैन बन गया । हर हफ्ते आने वाली #राजकपूर की फ़िल्म का बेताबी से इन्तजार करने लगा ।

मैंने क्रमशः #आह_आग_आवारा_श्री_420_अब_दिल्ली #दूर_नहीं_बूट_पोलिस_जिस_देश_मे_गंगा_बहती_है , #संगम_मेरा_नाम_जोकर_बॉबी_प्रेमरोग_सत्यम_शिवम #सुन्दरम_धर्मकर्म_हिना_राम_तेरीगंगा_मैली , आदि फिल्मे जिनमे खास रूप से राजकपूर का निर्देशन रहा सभी देख डाली ।


उनकी फिल्मों के #गीत , #संगीत , #कहानी , #लोकेशन्स , #एक्टिंग , #फोटोग्राफी , व #संदेश का जो #खूबसूरत तरीके से प्रदर्शन किया गया है,  वह अविस्मरणीय है , दुर्लभ है , सदा याद किया जाएगा । सभी फिल्मों की कहानियों , घटनाओं प्रसंगों गीतों को इस तरह गढ़ा गया है कि यथार्थ से जुड़ी कहानी सीधी दिल को छू जाती है 

#जन्मदिवस_14_दिसंबर_पर_ग्रेट_शोमैन_को_नमन 

   

       ____  #MUNEESH

        

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गुलाम अली. खां साहब

 याद पिया की आए !


भारतीय शास्त्रीय संगीत के पुरोधा मरहूम उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब संगीत जगत के शिखर पुरूषों में एक रहे हैं। धीर-गंभीर आवाज़ और विलक्षण अदायगी के लिए जाने जाने वाले खां साहब की संगीत-यात्रा सारंगी वादन से शुरू हुई थी। कालांतर में उन्होंने खयाल और ठुमरी गायन में महारत हासिल की। पटियाला घराने के खां साहब की भारतीय शास्त्रीय संगीत को सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने विभिन्न संगीत शैलियों - ध्रुपद, ग्वालियर घराने और जयपुर घराने के खूबसूरत संयोजन से गायकी की एक बिल्कुल नई शैली, नया अंदाज़ विकसित किया जिसमें मधुरता और लचीलेपन के साथ संक्षिप्तता का भी अनोखा गुण भी शामिल हुआ। दिखने में पहलवानी डील -डौल और बेहद कड़क मिज़ाज के खां साहब अपनी गायिकी और संवेदनाओं में बहुत मुलायम थे। भारत विभाजन के बाद परिस्थतिवश वे पाकिस्तान चले गए, लेकिन जल्द ही वहां की कट्टरता और धर्मांधता से निराश होकर भारत लौट आए। देश के बंटवारे पर उनकी संगीतमय टिप्पणी यह थी - अगर हर घर के एक बच्चे को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी गई होती तो इस मुल्क़ का बंटवारा कभी नहीं होता।


खां साहब की गाई कुछ ठुमरियां-याद पिया की आये, आये न बालम का करूं सजनी, नैना मोरे तरस गये, तिरछी नजरिया के बान, पिया बिना नाहीं चैन, कटे ना बिरहा की रात आदि आज भी ठुमरी के प्रेमियों की पहली पसंद बनी हुई हैं। उनके भजन ‘राधेकृष्ण बोल’ ने महात्मा गांधी को बहुत प्रभावित किया था। खां साहब को सिनेमा का अगंभीर माहौल कभी पसंद नहीं आया। तमाम प्रलोभनों के बावजूद फिल्मों से उन्होंने हमेशा एक दूरी बनाकर रखी, लेकिन अंततः फिल्म 'मुगल-ए-आज़म' के फिल्मकार के. आसिफ़ और संगीतकार नौशाद की ज़िद के आगे वे हार गए। वे 'मुग़ल-ए-आज़म' में तानसेन की आवाज़ बने थे। राग सोहनी और रागेश्वरी पर आधारित दो गीत - 'प्रेम जोगन बन के' तथा 'शुभ दिन आयो' गाकर उन्होंने उस फिल्म को गंभीरता और ऊंचाई दी थी। खां साहब की संगीत विरासत आज भी ग़ज़ल गायक गुलाम अली सहित उनके कई नामचीन शागिर्दों के रूप में जीवित है। आज मरहूम उस्ताद की जयंती  पर उन्हें खिराज-ए-अक़ीदत !


(चित्र में लता मंगेशकर के साथ उस्ताद बड़े गुलाम अली खां)


Dhruv Gupt

शशि चमकती रहेंगी सदा सदा

 बॉलीवुड की अब तक की सबसे ज्यादा ग्लैमरस,हसीन वेम्प,खलनायिका शशिकला जी का आज 4 अप्रैल को दुपहर में 88 वर्ष की आयु मर निधन हो गया,विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है।

  उनके फिल्मी जीवन से जुड़ी संक्षिप्त जानकारी संकलन से, निम्न अनुसार दी गयी है...

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*


*शशिकला जी का जन्म दिन 4 अगस्त 1933 है*


*जन्म नाम-शशिकला जावलकर(भावसार-नामदेव)*

*पहली फ़िल्म-करोड़पति (1936 बाल कलाकार)*

*पहली फ़िल्म-1952 में जीनत में कव्वाली सिन में*

*पहली फ़िल्म-सुजाता जिससे पहचान मिली*

*पहला फिल्मफेयर अवार्ड-आरती*

*दूसरा फिल्मफेयर अवार्ड-गुमराह*

*शादी-पति ओम प्रकाश सहगल (के एल सहगल परिवार)*

*प्रमुख फिल्में-सुजाता,आरती,गुमराह,अनपढ़,फूल और पत्थर, वक्त,खूबसूरत,तीन बहुरानिया, तीन बस्ती चार रास्ता*

*पद्मश्री अवार्ड से नवाज़ी गई*

*सबसे खूबसूरत खलनायिका-पहचान*

*फिल्मी नग़मे-प्रमुख*

1)-आगे भी जाने न तो पीछे भी जाने न तो

2)-शीशे से पी या पैमाने से पी,या मेरी आँखों के मैखाने से पी,तू पी दीवाने तू पी

3)-तुम जियो हजारों साल साल के दिन हो पचास हजार

4)-दिल जो न कह सका,वही राजे दिल कहने की रात आई

5)-कंकरिया मार के जगाया,कल तू मेरे सपनों में आया

6)-ये शहर बड़ा अलबेला लगा है हसीनों का मेला

7)-नैन तुम्हारे मजेदार ओ जनाबे आली

8)-भीगी भीगी फ़िज़ा, सुन सुन क्या कहे हवा

9)-ऊँचे हिमालय के नीचे

10)-आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैय्या

11)-प्यार मोहब्बत के सिवा ये जिंदगी क्या जिंदगी

12)-ये रास्ते है प्यार के चलना संभल संभल के

*सँकलनसे-संतोष कुमार मस्के*

शशि कला जो अब नही रही

 शशिकला.... खुबसूरत और  तुफानी  मुसकराहट की मालकिन...! 


शशिकला का जन्म ता.4.8.1932  के रोज  सोलापुर में एक महाराष्ट़ियन फेमीली में हुआ था.. उनके पिता जी अनंत राव जावलकर  कपडे़ के व्यापारी थे.. धनवान शिक्षीत और गौरवशाली फेमीली था... पर न जाने कया हुआ....!  जावलकर फेमीली के  बुरे दिन आये..! परिवार गरीब हो गया और  बडे परिवार को निभाने का फर्ज शशिकला को अदा करना पडा...! 


शशिकला के भाई को चार्टर एकाउंटेंट बनाने के लिए इंग्लैंड भेजा गया था.. आशा थी कि  वह परिवार की देखभाल करेगा.... पर अफ़सोस..! वह वापिस आया ही नहीं... परिवार को गरीबी में छोड़ कर वह इंग्लैंड में ही सेटल हो गया!. 


शशिकला को बचपन से ही अभीनय का शौक था.


शशिकला के पिताजी के एक मित्र ने शशिकला को फिल्मों में नशीब आजमाने की नशिहत दी.. 


और शशिकला और उनके पिताजी ने फिल्म स्टुडियो के चककर काटना शुरू किया..!. 


एक बार उस समय की  जानी मानी अभीनेत्री नूरजहां ने शशिकला को देखा और उसे फिल्म जीन्नत के लिए पसन्द करली...! इस तरह जीन्नत  शशिकला की पहेली फिल्म थी.


शशिकला  इस फिल्म में एक कव्वाली  आहे न भरी शिकवे न किये कुछ भी न जुबां से काम लीया..मे परदे पर दिखाई दी.. मेरा खयाल हे.. शायद अभीनेत्री शयामा भी इसी फिल्म में इसी कव्वाली में परदे पर दिखाई दी थी...! 


उसके बाद 1947 में नुरजहा दिलीप कुमार की फिल्म जुगनू आइ.. इस फिल्म में गायिका रोशन आरा बेगम का गाया हुआ   देश की पुरफेंक दिलकश हवा ओ मे रंगी.. गीत शशिकला पर फिलमाया गया... उस वक्त शशिकला बेहद खुबसूरत लगती थी तो उस गीत मे शशिकला के  बहोत सारे कलोज अप परदे पर दिखाये गये... फिल्म की हिरोइन नुरजहा से भी ज्यादा...! 


उसके बाद  1950 मे दिलीप कुमार कामीनी कौशल की फिल्म आरजू में भी शशिकला कमला के रोल में दिखाई दी.


शशिकला  बहोत ही प़तीभाशाली और खुबसूरत होते हुए भी उसे हिरोइन की भुमिकाए जयादा मिली नहीं.और जीस फिल्म में वह हिरोइन थी वह फिलमें फलोप हो गई..! 1953 में शम्मीकपुर के साथ शशिकला की एक  फिल्म जिवन जयोती आइ थी.इस फिल्म में  चांद उस्मानी और शशिकला हिरोइनें थी.शायद शम्मीकपुर की भी शुरूआत की फिल्म थी. फिल्म खास चली नहीं


शशिकला को हिरोइन के रोल न मिले तो उसने जो भी फिलमें मिले वह लेना शुरू कर दिया.. केरेक्टर रोल करने लगी.. घर जो चलाना था..! पैसे की बहोत जरूरत थी..! 


1962 में ताराचंद बडजातया की फिल्म आरती आइ. अशोक कुमार  मीना कुमारी और प़दिप कुमार भी थे इस फिल्म में.. एक मराठी नाटक पर आधारित थी इस फिल्म.शशिकला को फिल्म में झगडालू और कमिनी भाभी का रोल ओफर किया गया.. शशिकला के फेमीली वालों ने उस रोल को स्विकार लेने को दुराग्रह किया.. शशिकला ने रोल किया.. शशिकला के अभीनय की बहुत प़संसा हुइ..  फिल्म आरती के लिए शशिकला को सन 1962 का बेस्ट  सपोर्टिंग एकट़ेश का फिल्म फेर एवोर्ड भी मिला था..! 


फिर कया...! शशिकला को बहोत सारी फिलमें मिलने लगी.. जयादातर वेंप के रोल मिलते थे...! फिल्म फूल और पत्थर और अनुपमा के रोल के लिए  नोमीनेशन मिला पर फिल्म फेर एवोर्ड न मिलने से निराश भी हुई.....! पर  फिल्मों से पैसे मिलने से फेमीली को सेट कर शकी... 


1970 के दशक का पूर्वांध शशिकला के जीवन का सबसे खराब समय रहा... फिल्मों में काम मिलना कम हो रहा था.. शशिकला  व्यवसायीक और  पारावारिक समस्याओं से दुखी हो गई...! वह ईगतपुर चली गई.. ! 


कइ साल योगासन और ध्यानासन में गुजारे.. मधर टेरेसा के साथ रहे कर  दुखी लोगों की सेवा भी की. और मन की शांति  पाइ.. शशिकला की एक बेटी केंसर ग़सित होकर परलोक सिधार  ग इ.... लेकिन शशिकला ने अपने आप को संभाला...! 


उसके बाद... 


आठ साल के बाद  शशिकला ने फिल्म और  टीवी के छोटे परदे पर  फिर से पुरनागमन  किया... 


कूछ टीवी सीरीयलो और महाराजा.. लहुके दो रंग.. सलमा पे दिल आ गया जैसी फिलमों में भी काम किया... सावन कुमार ने कहा था.. मीना कुमारी के लिये जो रोल लिखा था वह शशिकला ने अदा किया...! 


शशिकला ने फिल्म आरती.. गुमराह.. हरियाली और रास्ता.. अनपढ़.. जंगली.. यह रास्ते हे प्यार के.. वक्त जैसी कई फिलमों में काम किया.. 


फिल्म पदमश्री लालू प्रसाद यादव में शायद शशिकला को आखिरी बार देखा था.


फिल्म वक्त 1965 की रानी साहेबा.. जिस के गले में से राजा(राजकुमार) हार चुराता हे.. और फिल्म फूल और पतथर का वह मशहूर गाना शिशे से पी या पैमाने से पी.. या मेरी आंखों के मैखाने से पी... वाले शशिकला के रोल आज भी नजर के सामने घुमते हे..! 


और...! 

फिल्म गुमराह की असली हिरोइन तो शशिकला ही थी..! कैसी हसीन लगती थी वोह..! Killer smile  के साथ उंगली में  चेइन हिलाते चलना.. फिल्म गुमराह में उनकी लाक्षणिक अदा थी..! फिल्म गुमराह में शशिकला का अभीनय जानदार था और उसके लिए शशिकला को सन 1964 में बेस्ट सपोर्टिंग एकट़ेस का फिल्म फेर एवोर्ड भी मिला था..! 


शशिकला ने ओम प्रकाश सयगल से शादी की हे.


शशिकला मेरी फेवरिट अदाकारा हे.


आज  तारीख 4.4.2021  के रोज  बंबई  मे शशीकला जी का देहांत हो गया...समाचार सुनकर बडा दुख हुआ. !!

हामिद अली खान उर्फ़ अजीत ( मोना डार्लिंग )

 Remembering Actor 'AJIT 'on his 99th birth anniversary... ......................................................................................................................

आकर्षक कद काठी और मजबूत शरीर वाले अभिनेता अजीत का असल नाम 'हामिद अली खान'  था वो आये तो फिल्मो में हीरो बनने थे पर नायक के रूप में उनकी पारी लगभग असफल रही उनको फिल्मो में बतौर खलनायक ही सफलता मिली खलनायक बन कर वो सिनेमा के परदे पर छाए रहे लेकिन आज भी नायक के तौर पर उनकी कुछ चुनिंदा फिल्मे पसंद की जाती है 1956 में आई उनकी फिल्म 'हलाकू 'एक ऐसी ही फिल्म है जो अपने मधुर संगीत के कारण आज भी पसंद की जाती है   

आज अभिनेता 'अजीत' 99 वा जन्मदिन है 🌷🌷🌷

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 HAMID ALI KHAN 

 Born: 27 January 1922

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 पवन मेहरा 

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