मंगलवार, 16 अगस्त 2011

प्‍लेसमेंट एजेंसियां: जिस्म से कमाई के नए सौदागर नरेंद्र सैनी |



पश्चिम बंगाल के 24 परगना के एक सुदूर गांव की सकीना (बदला हुआ नाम) अपने परिवार को पस्त आर्थिक हालातों से उबारना चाहती थी. वह अपने एक पहचान वाले के नौकरी के वादे पर दो साल पहले दिल्ली आ गई. लेकिन यहां कदम रखते ही उसके पांव तले की जमीन खिसक गई.
उसे काम दिलाने की बजाए देह व्यापार के गर्त में धकेल दिया गया. वह कुछ समझ पाती, उसने खुद को हरियाणा के रोहतक में अनजान लोगों के रहमोकरम पर पाया. अब वह इस चंगुल से बाहर आ चुकी है. लेकिन उसके साथ हुई ज्‍यादतियों का खौफ उसके चेहरे पर अब भी साफ नजर आता है.
वह टूटी-फूटी हिंदी में सिर्फ इतना ही बता पाती है, ''वह खुद को प्लेसमेंट एजेंसी का एजेंट बताता था. यहां लाया, हम नहीं जानते थे हम कहां हैं. उन्होंने हमारा जिस्म लूटा. सब बुरे थे.'' अब सकीना वापस अपने घर लौट चुकी है.
सकीना जैसी गरीब परिवारों की हजारों लड़कियां रोजगार की तलाश में दिल्ली सरीखे महानगरों का रुख कर रही हैं और इसी बात का फायदा उठा रही हैं फर्जी प्लेसमेंट एजेंसियां. पुलिस उपायुक्त (अपराध) अशोक चांद बताते हैं, ''पिछले कुछ समय में फर्जी प्लेसमेंट एजेंसियों के मामले बढ़े हैं और हमने कई लोगों को धरा भी है.''
इस बात की पुष्टि काफी हद तक 18 जून, 2011 को दिल्ली के राजौरी गार्डन की राजधानी प्लेसमेंट एजेंसी पर दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा की मानव तस्करी निरोधक इकाई की कार्रवाई से हो गई. पुलिस की इस कार्रवाई में 9 नाबालिग लड़कियां को छुड़ाया गया और प्लेसमेंट एजेंसी के मालिक मुन्ना चौधरी (41) को धरा गया.
चांद बताते हैं, ''असम का रहने वाला मुन्ना पिछले छह साल से प्लेसमेंट एजेंसी चला रहा था. यह एजेंटों के जरिए असम के गरीब परिवारों की लड़कियों को यहां लाता था. एजेंटों को प्रति लड़की 12,000 रु. मिलते थे जबकि एजेंसी जिन घरों में लड़कियां घरेलू काम के लिए जाती थीं उनसे 20,000-25,000 रु. वसूलती थी. इन लड़कियों को कुछ नहीं मिलता था.''
बताया जाता है कि मुन्ना चौधरी लगभग 320 बच्चियों को अभी तक रोजगार के बहाने ला चुका है और उस पर लड़कियों के यौन शोषण के भी आरोप हैं.
इस अभियान में अहम भूमिका निभाने और मानव तस्करी के खिलाफ काम करने वाले स्वयंसेवी संगठन शक्तिवाहिनी के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर निशिकांत कहते हैं, ''जब से प्लेसमेंट एजेंसियों पर निगरानी बढ़ी है तबसे एजेंसियां खुद को फर्जी एनजीओ के नाम से पंजीकृत करा रही हैं. ये एजेंसियां लड़कियों का यौन उत्पीड़न तो करती ही हैं साथ ही इनके काम का पैसा भी इन्हें नहीं देतीं.''

सोमवार, 15 अगस्त 2011

मजबूरी नहीं हाईप्रोफाइल धंधा बन गया है देहव्यापार



10-Feb-2011 0
मजबूरी नहीं हाईप्रोफाइल धंधा बन गया है देहव्यापार
पिछले एक सप्ताह में हमें दो खबरे पढऩे को मिली। एक तो यह की जेएनयू में किस तरह सेक्स रैकेट का जाल फैल रहा है और दूसरी यह की उत्तर मध्य मुंबई की सांसद प्रिया दत्त ने मध्यप्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर यह कहकर एक नई बहस छेड़ दी है कि देह व्यापार को कानूनी मान्यता दे देना चाहिए।
मुंबई के रेड लाइट एरिया की महिलाओं पर रिसर्च कर चुकीं प्रिया ने संवाददाताओं से चर्चा में कहा,'उन पर काम के दौरान मैंने महसूस किया कि हर महिला की अलग ही कहानी है। यह बहुत पुराना पेशा है,जिसे चाहकर भी नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि बंद कमरों की अपनी दुनिया में हम इन महिलाओं को नजरअंदाज करते हैं। साथ ही उन्हें कई तरह के शोषण का शिकार होना पड़ता है। उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए कानूनी मान्यता देना जरूरी है। अब सवाल यह उठता है कि किस को कानूनी मान्यता दी जाए। क्योंकि देश भर के रेड लाइट एरिया में जो देहव्यापार हो रहा है उसका कारण मजबूरी है और बिना कानूनी मान्यता के वर्षो से चल रहा है तथा चलता रहेगा।
तो क्या फिर जो देहव्यापार जेएनयू या आलीशान होटलों और बंगलों में चल रहा उसको कानूनी मान्यता देनी चाहिए। भारत के कुछ राज्यों के कुछ क्षेत्रों में आज भी देहव्यापार भले ही एक छोटी आबादी के लिए रोजी रोटी का जरिया बना हुआ है लेकिन पिछले कुछ महिनों में जिस देहव्यापार के हाईप्रोफाइल मामले सामने आए हैं उससे यह बात तो साफ हो गई है कि देहव्यापार अब केवल मजबूरी न होकर धनवान बनने का एक हाईप्रोफाइल धंधा बन गया है। नेता,अभिनेता और धर्माचार्य भी इस धंधे को चला रहे हैं। देहव्यापार दुनिया के पुराने धंधों में से एक है। बेबीलोन के मंदिरों से लेकर भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा वेश्यावृत्ति का आदिम रूप है। गुलाम व्यवस्था में उनके मालिक वेश्याएं पालते थे। अनेक गुलाम मालिकों ने वेश्यालय भी खोले। तब वेश्याएं संपदा और शक्ति की प्रतीक मानी जाती थीं। मुगलों के हरम में सैकड़ों औरतें रहती थीं। मुगलकाल के बाद, जब अंग्रेजों ने भारत पर अधिकार किया तो इस धंधे का स्वरूप बदलने लगा।
इस समय राजाओं ने अंग्रेजों को खुश करने के लिए तवायफों को तोहफे के रूप में पेश किया जाता था। आधुनिक पूंजीवादी समाज में वेश्यावृत्ति के फलने-फूलने की मुख्य वजह सामाजिक तौर पर स्त्री का वस्तुकरण है। यह तो पूराने दौर की कहानी है, जहां आपको मजबूरी दिखती होगी। पुराने वक्त के कोठों से निकल कर देह व्यापार का धंधा अब वेबसाइटों तक पहुंच गया है। इंफॉरमेशन टेक्नोलॉजी के मामले में पिछड़ी पुलिस के लिए इस नेटवर्क को भेदना खासा मेहनत वाला सबब बन गया है। सिर्फ सर्च इंजन पर अपनी जरूरत लिखकर सर्च करने से ऐसी दर्जनों साइट्स के लिंक मिल जाएंगे। कुछ वेबसाइटों पर लड़कियों की तस्वीरें भी दिखाई गई हैं। यहां कालेज छात्राएं, मॉडल्स और टीवी व फिल्मों की नायिकाएं तक उपलब्ध कराने के दावे किए गए हैं। इस कारोबार में विदेशी लड़कियों के साथ मॉडल्स, कॉलेज गल्र्स और बहुत जल्दी ऊंची छलांग लगाने की मध्यमवर्गीय महत्वाकांक्षी लड़कियों की संख्या भी बढ़ रही है। अब दलालों की पहचान मुश्किल हो गई है। इनकी वेशभूषा, पहनावा व भाषा हाई प्रोफाइल है और उनका काम करने का ढंग पूरी तरह सुरक्षित है।
यह न केवल विदेशों से कॉलगर्ल्स मंगाते हैं बल्कि बड़ी कंपनियों के मेहमानों के साथ कॉलगर्ल्स को विदेश की सैर भी कराते हैं। सेक्स एक बड़े कारोबार के रूप में परिवर्तित हो चुका है। इस कारोबार को चलाने के लिए बाकयादा ऑफिस खोले जा रहे हैं। इंटरनेट और मोबाइल पर आने वाली सूचनाओं के आधार पर कॉलगर्ल्स की बुकिंग होती है। ईमेल या मोबाइल पर ही ग्राहक को डिलीवरी का स्थान बता दिया जाता है। कॉलगर्ल्स को ठेके पर या फिर वेतन पर रखा जाता हैं। भीमानंद, इच्छाधारी बाबा का चोला पहन कर देह व्यापार का धंधा करवाता था। उसके संपर्क में 600 लड़कियां थीं। इनमें से 50 लड़कियां केवल बाबा के लिए ही काम करती थी। लड़कियों के रेट का 40 फीसदी कमीशन बाबा अपने पास रखता था। बाबा ने अलग-अलग लड़कियों के अलग-अलग रेट रख रखे थे। मॉडल के लिए 50 हजार, स्टूडेंट के लिए 20 हजार और हाउसवाइफ के लिए 10 हजार। इन लड़कियों को देश भर में फैले बाबा के एजेंट लाते थे। हाल ही में कई सेक्स रैकेट का खुलास हुआ है। इसमें दक्षिण भारत के बेंगलूरू और हैदराबाद में बड़े-बड़े रैकेट पकड़े गए हैं। बेंगलूरू के सेक्स रैकेट ने तो पूरे देश को हिला रखा है। एक पांच सितारा मशहूर होटल से दक्षिण भारतीय फिल्मों की अभिनेत्री यमुना के साथ दलाल सुमन और एक आईटी कंपनी के सीईओ वेणुगोपाल को गिरफ्तार किया गया था। जो शहर के तमाम बड़े होटलों में बड़ी-बड़ी पार्टियों के बहाने सेक्स रैकेट चलता था। जांच से पता चला है कि यमुना, सोची-समझी नीति के तहत करती थी, ताकि पकड़े जाने पर वह आपसी सहमति से सेक्स की दलील देकर खुद को रैकेट में शामिल होने के आरोप से बचा सके। यह रैकेट किसी कोठे पर नहीं थ्री स्टार और फाइव स्टार होटलों में ही चलता था। रैकेट में मजबूर नहीं ग्लैमरस महिलाएं शामिल हैं।
बड़ी और नामी हिरोइन भी बड़े-बड़े अधिकारियों की 'सेवा के लिए तैयार रहती हैं। हैदराबाद में तेलुगू फिल्म अभिनेत्रियों सायरा बानू और च्योति के साथ सात अन्य लोगों को रंगे हाथ पकड़कर वेश्यावृत्ति से जुड़े एक गिरोह का भंडाफोड़ किया गया। कुंदन बाग के एक नजदीकी इलाके के एक अपार्टमेंट से कथित तौर पर सायरा और च्योति को उज्बेकिस्तान की एक महिला व उनके ग्राहकों के साथ गिरफ्तार किया गया। गिरोह में कुछ रईसों और जाने माने लोगों शामिल हैं। हाल ही में गोवा में एक सेक्स रैकेट पकड़ा गया है। यहां के पाउला क्षेत्र से दो दलालों सहित चार नेपाली लड़कियों को पकड़ा गया। इन लड़कियों से जबरन देह व्यापार कराया जा रहा था। इनमें से एक लड़की नाबालिग थी। पुलिस के मुताबिक इस तरह के रैकेट आई टी के मशहूर बैंगलोर में भी काफी संख्या में हैं।
फिलहाल पुलिस के पास पुख्ता सबूत नहीं है इसलिए वो कुछ भी कहने से बच रही है। 21 जनवरी को अहमदाबाद के इनकम टेक्स चार रस्ता के नजदीक कॉमर्शियल सेंटर में आने वाले होटल देव पैलेस से सेक्स रैकेट में शामिल एक भोजपूरी हिरोइन को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के दौरान केवल जवान और अय्याश ही नहीं बच्चे भी शामिल थे। देश का ख्यातिनाम विश्वविद्यालय जेएनयू या फिर देश का कोई अन्य कॉलेज वहां पढऩे वाली कई छात्राएं अपनी पढ़ाई का खर्च जुटाने के लिए देह व्यापार करती हैं। पिछले दस वर्षों में विद्यार्थियों में देह व्यापार तीन फ़ीसदी से बढ़कर 25 फ़ीसदी तक पहुंच गया है। कॉलेज में ट्यूशन फीस ज़्यादा होने के वजह से विद्यार्थियों को 'इंटरनेट पर अश्लील फि़ल्मÓ, 'अश्लील बातेंÓ और 'लैप डांसÓ जैसा काम करना पड़ता है। देश में कऱीब 5 फ़ीसदी विद्यार्थी एस्कोर्ट का काम करने के विकल्प को मान लेते हैं या विचार करते हैं। हाई प्रोफाइल सेक्सकर्मी को एस्कोर्ट कहा जाता है। वहीं, कई अमीर लड़कियां अपने महंगे शौक को पूरा करने के लिए भी धंधा करती हैं। भारत में देहव्यापार के व्यवसाय में गोरी चमड़ी वाली विदेशी बालाओं का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है। इनमें खासकर सोवियत संघ से अलग हुए राष्ट्रों खूबसूरत और मस्त अदाओं वाली लड़कियां, जो पूरी तरह से देखने में आकर्षित लगती हैं, इस धंधे में भाग ले रही है। एक अनुमान के मुताबिक पाटनगर दिल्ली में मौजूदा समय में 3000 विदेशी लड़कियां मौजूद हैं। यहां पर लड़कियां अपने खूबसूरत चेहरे के दम पर अच्छा-खासा पैसा कमा रही हैं। इन लड़कियों का मकसद एकदम साफ है। भारत में अपना शरीर बेचने के बाद लड़कियां अपने वतन वापस जाकर घर बनाती है, कुछ परिवार को पैसा भेजती रहती है। जांच में पता चला कि इन लड़कियों को भारत लाने के लिए व्यवस्थित नेटवर्क बना हुआ है। उपरोक्त राष्ट्रों की अनेक आंटियां काफी समय से दिल्ली में स्थायी रुप से निवास कर चुकी हैं। इन आंटियों का भारत में वेश्या दलालों के साथ गठबंधन है। विदेश से आती गोरी युवतियों का संपूर्ण संचालन ये आंटियां ही करती हैं साथ ही देशी दलाल और ग्राहक ढूढ़कर कमीशन भी बनाती है। देह व्यापार का यह धंधा सिर्फ दिल्ली और मुंबई में ही नहीं चलता बल्कि पूरे भारत में यह धंधा जोर पकड़ चुका है।
देहव्यापार करके कई तरह के शौख पूरा करना इन गोरी लड़कियों का पेशा बन गया है। लड़कियां प्लेजर ट्रीप्स, बिजनेस मीट्स, कॉर्पोरेट इवेंट्स, फंक्शन और डिन डेट्स के लिए भी उपलब्ध होती हैं। कई लड़कियां तो नाइट क्लबों में वेटर्स या बेले डांसर का रुप धारण कर धंधे के लिए तैयार हो जाती हैं। हिंदुस्तानी पुरुषों को अब सांवली या फिर खूबसूरत वेश्या या कॉलगर्ल में रस नहीं रह गया है। अब भारतीय पुरुष गोरी बालाओं के दीवाने हो गए हैं। इसके लिए वे अच्छा-खासा पैसा खर्च करने के लिए तैयार भी हो जाते हैं। रशियन लड़कियों का मिनिमम चार्ज दो हजार से 8 हजार रुपया है। अधिकतम चार्ज की कोई सीमा नहीं है। लड़कियों के पीछे काफी पैसा खर्च करके ग्राहकों से मोटी रकम वसूल की जाती है। अमीर और अधिकारी वर्ग के लोगों में गोरी त्वचा वाली विदेशी लड़कियों का क्रेज चल रहा है। यहां पर पहले तो नेपाली लड़कियों की ज्यादा डिमांड थी।
भारतीय युवतियों की अपेक्षा नेपाली लड़कियों की कीमत 40 फीसदी ज्यादा थी लेकिन अब जमाना रशियन लड़कियों का है। देहव्यापार के धंधे में शामिल एक भारतीय लड़की का कहना है कि रशियन लड़की अपने शरीर को पूरी तरह से ग्राहक के हवाले कर देती हैं लेकिन हम ऐसा नहीं कर पाते। भारत में देहव्यापार का धंधा लगातार बढ़ रहा है। 1956 में पीटा कानून के तहत वेश्यावृत्ति को कानूनी वैद्यता दी गई, पर 1986 में इसमें संशोधन करके कई शर्तें जोड़ी गई। इसके तहत सार्वजनिक सेक्स को अपराध माना गया। इसमें सजा का भी प्रावधान है। वूमेन एंड चाइल्ड डेवलेपमेंट मिनिस्ट्री ने 2007 में एक रिपोर्ट दिया, इसके मुताबिक, 30 लाख औरतें देहव्यापार का धंधा करती हैं। इममें 36 फीसदी तो नाबालिग हैं। अकेले मुंबई में 2 लाख सेक्स वर्कर का परिवार रहता है, जो पूरे मध्य एशिया में सबसे बड़ा है।

सेक्स को लेकर दोहरा चरित्र ?



सतीश सिंह
आज भी भारत में सेक्स को वर्जना की तरह देखा जाता है। जबकि हमारे देश में खजुराहो से लेकर वात्सायन के कामसूत्र जैसी कृतियों में सेक्स के हर पहलू पर रोशनी डाली गई है। स्वस्थ व सुखी जीवन के लिए संयमित सेक्स को उपयोगी बताया गया है। सेक्स का स्थान जीवन में पहला तो नहीं कह सकते हैं। पर इसका स्थान गेहूं के बाद पर गुलाब के साथ जरुर है। सेक्स शरीर की एक जरुरत है और साथ ही इंसान के जीवन चक्र को जारी रखने वाला जरिया भी।

आम जीवन में सेक्स को लेकर बहुत सारी भ्रांतियाँ हैं। जानकारी के अभाव में, परिस्थितियों के कारण या फिर मनोविकार के कारण इंसान बलात्कार जैसा घिनौना कृत्य करके सामाजिक बहिष्कार का पात्र बन जाता है। बलात्कार आज भारत में सबसे ज्वलंत मुद्दा है। बावजूद इसके इस समस्या के तह में जाने का कभी प्रयास नहीं किया गया है।

आज भी स्कूलों व कॉलेजों में सेक्स शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। किसी-किसी स्कूल में सेक्स शिक्षा को लागू किया गया है। किंतु उसको अमलीजामा अभी तक कागजों पर पहनाया जा रहा है। आमतौर पर सेक्स को घर में गुनाह के तौर पर देखा जाता है। माता-पिता अपने बच्चों को यौन संबंधित जानकारी देने से परहेज करते हैं। हालांकि इंसान की फितरत वर्जित माने जाने वाले विषयों के बारे में जानकारी हासिल करने की जिज्ञासा सबसे उत्कट होती है। मानसिक स्तर पर वैचारिक मतांतर की वजह से बच्चा अश्‍लील साहित्य पढ़ने का या साइबर सेक्स का आदी हो जाता है। इस क्रम में कुछ बच्चे मनोविकृति के शिकार हो जाते हैं। मनोविकार से ग्रसित बच्चे बाद में जाकर बलात्कार जैसे क्रूर व घिनौने जुर्म को अंजाम देते हैं। दरअसल सामाजिक सोच में टकराव के कारण युवक व युवतियों के बीच सेक्स के लिए आपसी सहमति बन ही नहीं पाती है। वैसे अब दूसरी वजहों से सहमति के इक्का-दुक्का मामले हमारे सामने आ रहे हैं।

गाँवों में
हालत और भी खराब हैं। वहाँ गाली या अपशब्द के आदान-प्रदान के दरम्यान पूरे कामसूत्र की झांकी आपको मिल सकती है। परन्तु उस कामसूत्र में मनोविकृति ज्यादा होती है। इसका दूसरा पहलू यह है कि गाँवों में नारी को महज वस्तु माना जाता है। आपसी दुश्‍मनी निकालने के लिए भी औरत को निशाना बनाया जाता है।

मनोवैज्ञानिकों
का मानना है कि तकरीबन 3 से 5 फीसदी लोगों में सेक्स नशा की तरह होता है। ऐसे लोगों को सेक्सोहॉलिक कहा जाता है। यह नशा शराब, जुआ या फिर ड्रग्स के माफिक होता है।

अभी हाल में
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा का यह बयान आया था कि सेक्स अभी भी उनके जीवन का अहम हिस्सा है। मशहूर गोल्फर टाइगर बुडस के विवाहोपरांत दूसरी स्त्रियों से संबंध रहे हैं। हॉलीवुड के अभिनेता डेविड डुकोवनी ने सार्वजनिक रुप से माना है कि वे सेक्सोहॉलिक हैं और वे 2008 से पुर्नवास केन्द्र में सेक्स विसंगति का ईलाज करवा रहे हैं। अमेरिका में कांगेस के प्रतिनिधि एंथोनी वीनर के सेक्सोहॉलिक होने के कारण ही अपने पद से हाथ धोना पड़ा।

सच कहा जाए तो
भारत में सेक्स के प्रति दीवानगी अधिक है। अपितु भारत में खुला समाज नहीं है। इस देश में सेक्स स्कैण्डल अक्सर दबा दिये जाते हैं। फिर भी बहुत सारे सेक्स स्कैण्डल मीडिया की सक्रियता से दब नहीं पाते हैं।

अभी कुछ दिनों पहले
फिल्म स्टार शाइनी आहूजा बलात्कार के आरोप के कारण सुर्खियों में थे। उनपर अपनी नौकरानी के साथ बलात्कार करने का आरोप था।

आंध्रप्रदेश के पूर्व राज्यपाल
और वरिष्ठ कांगेस नेता नारायण दत्त तिवारी को सेक्स स्कैण्डल के कारण 2009 में अपने पद से हाथ धोना पड़ा था। सेक्स से ही जुड़े दूसरे मामले में रोहित शेखर नाम के एक नौजवान ने दावा किया है कि नारायण दत तिवारी उसके पिता हैं। दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी जानबूझकर नारायण दत तिवारी डीएनए टेस्ट करवाने से कतरा रहे हैं।

2009
के लोकसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान पर अभिनेत्री से राजनीतिज्ञ बनी जयाप्रदा की तथाकथित नंगी तस्वीरों का वितरण आम जनता के बीच करवाने का आरोप लगा था।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री
अमरमणि त्रिपाठी पर 2003 में अपनी प्रेमिका मधुमिता शुक्ला के कत्ल का आरोप लगा था। बाद में अदालत में यह साबित भी हो गया और अब मंत्री महोदय जेल में सजा काट रहे हैं। उल्लेखनीय है कि मधुमिता शुक्ला मरने के समय गर्भवती थी।

1982 में
पटना में बॉबी का कत्ल हुआ था। वह सचिवालय में काम करती थी। उसके कत्ल के पीछे तत्कालिक मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा के नेतृत्व वाली सरकार के कबीना मंत्रियों का हाथ बताया गया था। पटना में ही 1999 में शिल्पी जैन और गौतम सिंह ने संदेहास्पद तरीके से या तथाकथित तौर पर आत्महत्या किया था। किन्तु लोगों का मानना है कि यह घटना आत्महत्या के बजाए कत्ल था और यह राजद के कुछ वरिष्ठ नेताओं की करतूत थी।

1978 में
जब बाबू जगजीवन राम जनता पार्टी के शासनकाल के दौरान रक्षा मंत्री थे तब उनके 46 वर्षीय पुत्र की तस्वीर दिल्ली कॉलेज की एक 21 वर्षीय छात्रा सुषमा चौधरी के साथ तब की एक पत्रिका ‘सूर्या’ में प्रकाशित हुई थी। कहा जाता है कि उस सेक्स स्कैण्डल के कारण ही श्री राम देश के पहले दलित प्रधानमंत्री बनने से वंचित रह गए।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता
और उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री जेवी पटनायक पर 1998 में दो सरकारी मुलाजिमों ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था।

महाराष्ट्र के जलगाँव में
चल रहे सेक्स रैकेट में राजनीतिज्ञ, नौकरशाह व कॉरपोरेट जगत की संलिप्तता थी। 1994 में भंडाफोड़ हुए इस स्कैण्डल में 300 से लेकर 500 तक लड़कियाँ शामिल थीं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि अधिकांश लड़कियाँ सकूल जाने वाली थीं और उनका संबंध अच्छे घरों से था।

1997 में मुस्लिम लीग
के वरिष्ठ नेता पी के कुंजालिकुट्टु उत्तरी केरल में आईसक्रीम पार्लर के माध्यम से वेश्‍यालय चलाते हुए पकड़े गए थे। यदि भारत के सिर्फ नामचीन लोगों से जुड़े हुए सेक्स कांड की चर्चा की जाए इसकी फेहरिस्त बेहद लंबी हो जाएगी। लब्बोलुबाव के रुप में कहा जा सकता है कि भारत में इस तरह के सेक्स स्कैण्डलों की भरमार है।

पश्चिमी देशों
की तरह हमारे देश में खुलकर सेक्स पर परिचर्चा आयोजित नहीं की जाती है। विदेशों में स्त्री एवं पुरुष आपसी सहमति से सेक्स का आनंद लेते हैं। खुलापन से युक्त सामाजिक संरचना के कारण बलात्कार जैसे मामले वहाँ कम प्रकाश में आते हैं।

भारत में एक जमाने से
सेक्स को टैबु के रुप में देखा जाता रहा है। पर इसी भारत में वैसे लोग रहते हैं जो अपने घर की कुंवारी कन्याओं का हमल गिरवाने में संकोच नहीं करते हैं, लेकिन इसके साथ ही साथ घर के बाहर जाकर निर्बंध समाज के प्रति बड़ी आसानी से घृणा का इजहार भी कर देते हैं।

मेरा मत खुले सेक्स
की वकालत करना नहीं है। पर आम आदमी के मन में सेक्स के प्रति समझ तो होनी ही चाहिए और उन्हें दोहरा चरित्र जीने की बजाए यौन जनित भावनाओं पर नियंत्रण रखने के लिए अपनी मानसिक क्षमता का विकास करना चाहिए। ताकि सामाजिक शुचिता की संकल्पना का विखंडन नहीं हो। इस संदर्भ में हम भी पश्चिमी देशों की तरह पुनर्वास केन्दों की म दद से सेक्स जनित विसंगतियों पर काबू पा सकते हैं।


परिचय

सतीश सिंह
- सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से हिन्दी पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह से satish5249@gmail.com This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या मोबाईल संख्या 09650182778 के जरिये संपर्क किया जा सकता है।

बाजार में औरत और औरत का बाजार



हिंदुस्तानी औरत इस समय बाजार के निशाने पर है। एक वह बाजार है जो परंपरा से सजा हुआ है और दूसरा वह बाजार है जिसने औरतों के लिए एक नया बाजार पैदा किया है। औरत की देह इस समय मीडिया के चौबीसों घंटे चलने वाले माध्यमों का सबसे लोकप्रिय विमर्श है। लेकिन परंपरा से चला आ रहा देह बाजार भी नए तरीके से अपने रास्ते बना रहा है। देह की बाधाएं हटा रहा है, गोपन को ओपन कर रहा है।

बहस हुई तेजः

समय-समय पर देहव्यापार को कानूनी अधिकार देने की बातें इस देश में भी उठती रहती हैं। हर मामले में दुनिया की नकल करने पर आमादा हमारे लोग वैसे ही बनने पर उतारू हैं।
जाहिर तौर पर यह संकट बहुत बड़ा है। ऐसा अधिकार देकर हम देह के बाजार को न सिर्फ कानूनी बना रहे होंगें वरन मानवता के विरूद्ध एक अपराध भी कर रहे होगें। हम देखें तो सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद एक बार फिर वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देने की बातचीत तेज हो गयी है। यह बहस हाल में ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में वकीलों के पैनल व विशेषज्ञों से राय उस राय के मांगने के बाद छिड़ी है जिसमें कोर्ट ने पूछा है कि क्या ऐसे लोगों को सम्मान से अपना पेशा चलाने का अधिकार दिया जा सकता है? उनके संरक्षण के लिए क्या शर्तें होनी चाहिए ? कुछ समय पहले कांग्रेस की सांसद प्रिया दत्त ने वेश्यावृत्ति को लेकर एक नई बहस छेड़ दी थी, तब उन्होंने कहा था कि “मेरा मानना है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता प्रदान कर देनी चाहिए ताकि यौन कर्मियों की आजीविका प्रभावित न हो।” प्रिया के बयान के पहले भी इस तरह की मांगें उठती रही हैं। कई संगठन इसे लेकर बात करते रहे हैं। खासकर पतिता उद्धार सभा ने वेश्याओं को लेकर कई महत्वपूर्ण मांगें उठाई थीं। हमें देखना होगा कि आखिर हम वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाकर क्या हासिल करेंगें? क्या भारतीय समाज इसके लिए तैयार है कि वह इस तरह की प्रवृत्ति को सामाजिक रूप से मान्य कर सके। दूसरा विचार यह भी है कि इससे इस पूरे दबे-छिपे चल रहे व्यवसाय में शोषण कम होने के बजाए बढ़ जाएगा। आज भी यहां स्त्रियां कम प्रताड़ित नहीं हैं।

चौंकानेवाले आंकड़ेः


दुनिया भर की नजर इस समय औरत की देह को अनावृत करने में है। ये आंकड़े हमें चौंकाने वाले ही लगेगें कि 100 बिलियन डालर के आसपास का बाजार आज देह व्यापार उद्योग ने खड़ा कर रखा है। हमारे अपने देश में भी 1 करोड़ से ज्यादा लोग देहव्यापार से जुड़े हैं। जिनमें पांच लाख बच्चे भी शामिल हैं। सेक्स और मीडिया के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे मूल्यों को शीर्षासन करवा दिया है । फिल्मों, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चेनलों से आगे अब वह मुद्रित माध्यमों पर पसरा पड़ा है। प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है। अखबारों में ग्लैमर वर्ल्र्ड के कॉलम ही नहीं, खबरों के पृष्ठों पर भी लगभग निर्वसन विषकन्याओं का कैटवाग खासी जगह घेर रहा है। वह पूरा हल्लाबोल 24 घंटे के चैनलों के कोलाहल और सुबह के अखबारों के माध्यम से दैनिक होकर जिंदगी में एक खास जगह बना चुका है। शायद इसीलिए इंटरनेट के माध्यम से चलने वाला ग्लोबल सेक्स बाजार करीब 60 अरब डॉलर तक जा पहुंचा है। मोबाइल के नए प्रयोगों ने इस कारोबार को शक्ति दी है। एक आंकड़े के मुताबिक मोबाइल पर अश्लीलता का कारोबार भी पांच सालों में 5अरब डॉलर तक जा पहुंचेगा।

बाजार के केंद्र में भारतीय स्त्रीः


बाजार के केंद्र में भारतीय स्त्री है और उद्देश्य उसकी शुचिता का उपहरण । सेक्स सांस्कृतिक विनिमय की पहली सीढ़ी है। शायद इसीलिए जब कोई भी हमलावर किसी भी जातीय अस्मिता पर हमला बोलता है तो निशाने पर सबसे पहले उसकी औरतें होती हैं । यह बाजारवाद अब भारतीय अस्मिता के अपहरण में लगा है-निशाना भारतीय औरतें हैं। ऐसे बाजार में वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहनाने से जो खतरे सामने हैं, उससे यह एक उद्योग बन जाएगा। आज कोठेवालियां पैसे बना रही हैं तो कल बड़े उद्योगपति इस क्षेत्र में उतरेगें। युवा पीढ़ी पैसे की ललक में आज भी गलत कामों की ओर बढ़ रही है, कानूनी जामा होने से ये हवा एक आँधी में बदल जाएगी। इससे हर शहर में ऐसे खतरे आ पहुंचेंगें। जिन शहरों में ये काम चोरी-छिपे हो रहा है, वह सार्वजनिक रूप से होने लगेगा। ऐसी कालोनियां बस जाएंगी और ऐसे इलाके बन जाएंगें। संभव है कि इसमें विदेशी निवेश और माफिया का पैसा भी लगे। हम इतने खतरों को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं। जाहिर तौर पर स्थितियां हतप्रभ कर देने वाली हैं। इनमें मजबूरियों से उपजी कहानियां हैं तो मौज- मजे के लिए इस दुनिया में उतरे किस्से भी हैं। भारत जैसे देश में लड़कियों को किस तरह इस व्यापार में उतारा जा रहा है ये किस्से आम हैं। आदिवासी इलाकों से निरंतर गायब हो रही लड़कियां और उनके शोषण के अंतहीन किस्से इस व्यथा को बयान करते हैं। खतरा यह है कि शोषण रोकने के नाम पर देहव्यापार को कानूनी मान्यता देने के बाद सेक्स रैकेट को एक कारोबार का दर्जा मिल जाएगा। इससे दबे छुपे चलने वाला काम एक बड़े बाजार में बदल जाएगा। इसमें फिर कंपनियां भी उतरेंगी जो लड़कियों का शोषण ही करेगीं। लड़कियों के उत्पीड़न, अपहरण की घटनाएं बढ़ जाएंगी। समाज का पूरी तरह से नैतिक पतन हो जाएगा।

पैदा होंगें कई सामाजिक संकटः


सबसे बड़ा खतरा हमारी सामाजिक व्यवस्था को पैदा होगा जहां देहव्यापार भी एक प्रोफेशन के रूप में मान्य हो जाएगा। आज चल रहे गुपचुप सेक्स रैकेट कानूनी दर्जा पाकर अंधेरगर्दी पर उतर आएंगें। परिवार नाम की संस्था को भी इससे गहरी चोट पहुंचेगी। हमें देखना कि क्या हमारा समाज इस तरह के बदलावों को स्वीकार करने की स्थिति में है। यह भी बड़ा सवाल है कि क्या औरत की देह को उसकी इच्छा के विरूद्ध बाजार में उतारना और उसकी बोली लगाना उचित है? क्या औरतें एक मनुष्य न होकर एक वस्तु में बदल जाएगीं? जिनकी बोली लगेगी और वे नीलाम की जाएंगीं। स्त्री की देह का मामला सिर्फ श्रम को बेचने का मामला नहीं है। देह और मन से मिलकर होने वाली क्रिया को हम क्यों बाजार के हवाले कर देने पर आमादा हैं, यह एक बड़ा मुद्दा है। औरत की देह पर सिर्फ और सिर्फ उसका हक है। उसे यह तय करने का हक है कि वह उसका कैसा इस्तेमाल करना चाहती है। इस तरह के कानून औरत की निजता को एक सामूहिक प्रोडक्ट में बदलने का वातावरण बनाते हैं। अपने मन और इच्छा के विरूद्ध औरत के जीने की स्थितियां बनाते हैं। यह अपराध कम से कम भारत की जमीन पर नहीं होना चाहिए। जहां नारी को एक उंचा स्थान प्राप्त है। वह परिवार को चलाने वाली धुरी है।

स्त्री के सामर्थ्य का आदर कीजिएः


स्त्री आज के समय में वह घर और बाहर दोनों स्थानों अपेक्षित आदर प्राप्त कर रही है। वह समाज को नए नजरिये से देख रही है। उसका आकलन कर रही है और अपने लिए निरंतर नए क्षितिज खोल रही है।ऐसी सार्मथ्यशाली स्त्री को शिखर छूने के अवसर देने के बजाए हम उसे बाजार के जाल में फंसा रहे हैं। वह अपनी निजता और सौंदर्यबोध के साथ जीने की स्थितियां और आदर समाज जीवन में प्राप्त कर सके हमें इसका प्रयास करना चाहिए। हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति धारणा निरंतर बदल रही है। वह नए-नए सोपानों का स्पर्श कर रही है। माता-पिता की सोच भी बदल रही है वे अपनी बच्चियों के बेहतर विकास के लिए तमाम जतन कर रहे हैं। स्त्री सही मायने में इस दौर में ज्यादा शक्तिशाली होकर उभरी है। किंतु बाजार हर जगह शिकार तलाश ही लेता है। वह औरत की शक्ति का बाजारीकरण करना चाहता है। हमें देखना होगा कि भारतीय स्त्री पर मुग्ध बाजार उसकी शक्ति तो बने किंतु उसका
संजय द्विवेदी
संजय द्विवेदी
शोषण न कर सके। आज में मीडियामय और विज्ञापनी बाजार में औरत के लिए हर कदम पर खतरे हैं। पल-पल पर उसके लिए बाजार सजे हैं। देह के भी, रूप के भी, प्रतिभा के भी, कलंक के भी। हद तो यह कि कलंक भी पब्लिसिटी के काम आ रहे हैं। क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं। बाजार इसी तरह से हमें रिझा रहा है और बोली लगा रहा है। हमें इस समय से बचते हुए इसके बेहतर प्रभावों को ग्रहण करना है। सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह ऐसे लोगों की मंशा को समझे जो औरत को बाजार की वस्तु बना देना चाहते हैं।

( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि, भोपाल से जुड़े हैं)

राजधानी बन रही बाल व्यापार की मंडी

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-विनय ठाकुर
देश की राजधानी दिल्लीClick here to see more news from this city तेजी से बाल व्यापार की मंडी के रूप में बदल रही है। बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष आमोद कंठ के अनुसार घर से भागने वालों बच्चों का पहला ठिकाना अब मुंबईClick here to see more news from this city की बजाय दिल्ली बन गया है।

बचपन बचाओ आंदोलन के भुवन के अनुसार चाहे पंजाब के ईंट भट्ठे हों, हरियाणा के अवैध पत्थर खदान या दिल्ली के आसपास के देह व्यापार में धकेले जाने वाले बच्चे।

इन सभी को दिल्ली होकर भेजा जाता है। स्वयं दिल्ली में जरी उद्योग, होटल, ढाबे, चमड़ा उद्योग और घरेलू नौकरी में बाल मजदूरों की बड़ी खपत है। हाल में बिहार में आई बाढ़ के बाद बाल मजदूरों के दलाल ज्यादा सक्रिय हो गए हैं और दिल्ली में बाल मजदूरों की आमद बढ़ गई है। निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर शुक्रवार को तिब्बती दलालों के चंगुल से छत्तीसगढ़ से फुसलाकर लाए जा रहे बच्चों को मुक्त कराया गया।

आईजीएसएस द्वारा दिल्ली के आश्रय रहित लोगों के हाल के सर्वे में यह सामने आया है कि दिल्ली में आश्रय रहित लोगों में बच्चों व महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्वयंसेवी संस्था प्रयास एवं साथी द्वारा नई दिल्लीClick here to see more news from this city रेलवे स्टेशन पर दिल्ली के बाहर के राज्यों से आने वाले बच्चों का सर्वे किया गया।

इस सर्वे में 5 दिनों के अंदर ही 795 बच्चों का ब्योरा इकट्ठा किया गया। इनमें से कई दूसरी-तीसरी बार घर से भागे थे। एक महीने में लगभग 20-30 हजार बच्चे दिल्ली आते हैं। ये बच्चे दिल्ली में देश के अन्य राज्यों से ही नहीं, भारत के पड़ोसी देश नेपाल, बांग्लादेश और तिब्बत से भी बच्चे दिल्ली आते हैं।

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दिल्ली और आसपास में देहव्यापार का धंधा


जोशीला सेक्स जीवन जीते हैं भारतीय

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कामसूत्र’ की धरती भारत में प्रेमी युगल सर्वाधिक जोशीला सेक्स जीवन व्यतीत कर रहे हैं और वह बिस्तर पर एक-दूसरे की सेक्स इच्छाओं और जरूरतों पर बिना हिचक खुलकर बातें करने में यकीन रखते हैं।
‘ड्यूरेक्स सेक्सुअल वेल बीइंग’ द्वारा विश्व भर के कई देशों में कराए गए एक सेक्स सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है। सर्वेक्षण के मुताबिक दस में से सात भारतीयों का दावा है कि वह अपने जीवन साथी के साथ जोशीला और सुखमय सेक्स जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
‘इन द बेडरूम’ नाम से किए गए इस सर्वेक्षण के आँकड़ों के अनुसार भारतीय पुरुषों की औसतन छह प्रेमिकाए हैं, जबकि भारतीय महिलाओं ने सिर्फ दो पुरुषों में दिलचस्पी दिखाई। वहीं ब्रिटेन में यह आँकड़ा क्रमश: 16 और 10 है, जबकि विश्व भर के औसत के मुताबिक पुरुषों के 13 स्त्रियों तथा महिलाओं के सात पुरुषों से संबंध थे। इन आँकड़ों के लिए ड्यूरेक्स ने 26 देशों में लगभग 26 हजार लोगों से उनके सेक्स जीवन के बारे में सवाल किए।
सर्वेक्षण के मुताबिक तीन चौथाई भारतीय अपने साथी के साथ खुश और संतुष्ट थे, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आँकड़ा 58 फीसदी है। हालाँकि 76 फीसदी यूनानी और 80 फीसदी मेक्सिकोवासी अपने साथियों से संतुष्ट थे, जबकि 49 फीसदी ब्रिटेनवासियों ने अपने साथियों के साथ बेहतर सेक्स जीवन की बात कही।
ड्यूरेक्स द्वारा कराए गए इस प्रकार के दूसरे सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि दो तिहाई भारतीयों का मानना है कि उनका सेक्स जीवन रोमांचक और जोशीला है, जो कि ब्रिटेन में 38 फीसदी और फ्रांस में 36 फीसदी है।
सर्वेक्षण के मुताबिक 71 फीसदी भारतीय सप्ताह में एक बार सेक्स जरूर करते हैं, जबकि 19 फीसदी सप्ताह में पाँच बार सेक्स क्रीड़ा का आनंद उठाते हैं, लेकिन इसके साथ सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि 26 फीसदी भारतीय अपने साथी से बात करने में शर्म महसूस करते हैं।
सर्वेक्षण में कहा गया कि पूरे विश्व भर में एक समस्या जो सभी जगह सामने आई वह थी सेक्स क्रीड़ा के दौरान अपने साथी से बातचीत में कमी की।
इस सर्वेक्षण में ऑस्ट्रिया, चीन, ब्राजील, कनाडा, स्विट्‍जरलैंड, रूस, स्पेन, मेक्सिको, ऑस्ट्रेलिया, इटली, ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका में लोगों से सवाल किए गए।
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on नवम्बर 27, 2007 at 5:51 पूर्वाह्न  Leave a Comment  

देह व्यापार – कानून में बदलाव जरूरी

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केंद्र सरकार इमोरल ट्रैफिकिंग पर रोक लगाने के लिए 1956 में बने कानून में संशोधन करने जा रही है। सरकार जहां इस संशोधन को सेक्स वर्करों की समस्याओं को कम करने की दिशा में अहम बता रही है वहीं देश भर के सेक्स वर्कर सरकार के कदम का खुल कर विरोध कर रहे हैं। इस कानून में बदलाव के लिए एक संसदीय समिति ने संसद में 23 नवंबर, 2006 को संशोधन प्रस्ताव रखा। समिति ने कानून में संशोधन संबंधी सुझाव भी दिए। अब महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने भी इसमें कुछ संशोधन कर सरकार को अंतिम मुहर लगाने के लिए भेजा है। हालांकि जिनके लिए यह कानून बनाया जा रहा है उनको सरकार विश्वास में नहीं ले पाई है।
महिला बाल कल्याण मंत्रालय मौजूदा कानून की धारा 2 (एफ) के तहत परिभाषित वेश्यावृति की नई व्याख्या करना चाहता है। वह धारा 2 (जे)और 2 (के) में व्यावसायिक यौन शोषण और शोषण के शिकार की व्याख्या को शामिल करना चाहता है। देश भर के सेक्स वर्करों का विरोध इसी संशोधन को लेकर है। महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने वेश्यावृति की जो नई परिभाषा दी है, उसके मुताबिक पैसे या किसी अन्य कारण से सेक्स को अपराध माना जाएगा। सरकार अगर इन संशोधनों को मान लेती है तो ट्रैफिकिंग और वेश्यावृत्ति एक ही कानून के दायरे में आएंगे। वेश्यावृत्ति फिलहाल देश में अपराध नहीं है लेकिन कानून में संशोधन के बाद वह अपराध के दायरे में होगी। इससे देश की लाखों सेक्स वर्करों की मुश्किलों का अंदाजा लगाया जा सकता है। अपने देश में ऐसी सेक्स वर्करों की संख्या बहुत ज्यादा है जो गरीबी और भुखमरी से बचने के लिए जिस्म का सौदा करने पर मजबूर हैं। महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने इस संबंध में संसदीय समिति के सुझावों को भी नहीं माना है।
नवंबर, 2006 में जब संसदीय समिति ने कानून में संशोधन के प्रस्ताव दिए थे, तब भी सेक्स वर्करों ने संशोधन प्रस्तावों का विरोध किया था। उस प्रस्ताव में एक प्रस्ताव यह भी था कि जो कोई भी वेश्यालय या रेडलाइट इलाके में धरा जाता है उस पर आपराधिक कार्यों में संलिप्तता के तहत कार्रवाई की जाएगी। इस पर काफी हाय तौबा मचने के बाद महिला बाल कल्याण मंत्रालय ने इसे बदला है, मगर बदलाव कोई राहत देने वाला नहीं है। अब जो प्रस्ताव है उसके मुताबिक वेश्यालय या फिर रेड लाइट इलाके में आने वाले ग्राहकों पर आपराधिक मामले बनेंगे। जाहिर है जब ये कानून का रूप लेगा तो बदनामी और मुकदमे से बचने के लिए सेक्स वर्करों के पास ग्राहकों का जाना कम होगा। कोलकाता के सोनागाछी के सेक्स वर्करों की संस्था दरबार महिला समन्वय समिति की अध्यक्ष भारती डे का कहना है, ‘अगर हमारे ग्राहकों को पकड़ा जाएगा तो वो हमारे पास नहीं आएंगे। क्या ये हमारे पेट पर लात मारने जैसा नहीं है?।’दरअसल देश के विभिन्न राज्यों के सेक्स वर्करों की 14 संस्थाएं पिछले एक साल से लगातार महिला बाल कल्याण मंत्रालय से कानून में तर्कसंगत बदलाव की मांग कर रही है, लेकिन अब इन संगठनों को लगता है कि इनके साथ धोखा हुआ है। नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर के डॉ एस जेना सरकार से ट्रैफिकिंग पर रोक लगाने की बात करते हैं लेकिन कहते हैं कि सरकार को समझना चाहिए कि यह लाखों महिलाओं की आजीविका का साधन है। जेना के मुताबिक सेक्स वर्करों के लिए लेबर एक्ट संबंधित कानून बनाया जाना चाहिए ना कि क्रिमनल कानून। जेना बताते हैं कि सेक्स वर्कर खुद इमोरल ट्रिैफकिंग रोकने के लिए काम कर रही हैं। जरूरत है तो सिर्फ उनके भरोसे को मजबूत करने की। जेना कोलकाता के जाधवपुर विश्वविघालय के उस रिसर्च अध्ययन का हवाला देते हैं जिसमें ये उभरा है कि कोलकाता और उसके आसपास सेक्स वर्करों के संगठन दरबार महिला समन्वय समिति ने कई नबालिग बच्चे और बच्चियों को इस दलदल से बाहर निकाला है। कर्नाटक के मैसूर में सेक्स वर्करों के लिए काम कर रहे संगठन आशुद्ध समिति के सलाहकार सुशेना रजा पाल कहती हैं, ‘हाल के सालों में इमोरल ट्रैफिकिंग बहुत बढ़ी है और इसकी मार भी सेक्स वर्करों को झेलनी पड़ रही है, ऐसे में हम सरकार की मदद करने के लिए तैयार हैं। अगर सरकार हमारी मांगों पर ध्यान दे तो हम अपने अपने इलाके में नाबालिगों की इमोरल ट्रैफिंिकंग रोकने के हरसंभव उपाय करेंगे।’इसके अलावा संशोधन में एक प्रस्ताव ये भी है कि पुलिस इंस्पेक्टर के नीचे भी सब इंस्पेक्टर रैंक के पुलिसकर्मी को विशेष अधिकार दिए जाएं ताकि इमोरल ट्रैफिकिंग को कम किया जा सके। इस प्रस्ताव को लेकर भी सेक्स वर्करों में चिंता है। ज्यादातर सेक्स वर्करों का मानना है कि इमोरल ट्रैफिकिंग के ज्यादातर मामलों में स्थानीय पुलिस और माफिया तत्वों की मिलीभगत होती है, लेकिन पुलिस प्रताड़ित सेक्स वर्करों को करती है। सरकार के संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में भाग लेने आंध्र प्रदेश से दिल्ली आई सेक्स वर्कर सत्यवती का कहना है कि कानून बनने के बाद पुलिस को ज्यादा पैसे देने पड़ेंगे। उनकी वसूली बढ़ेगी तो लालच में वो हमें बार-बार तंग करने पहुंचेंगे। पता नहीं सरकार इस कानून के जरिए किस मदद की बात कर रही है।
इसके अलावा सेक्स बाजार और रेडलाइट इलाकों के समाजिक आर्थिक तानबाने पर नजर रखने वालों का मानना है कि कानून में संशोधन से एचआईवी एडस के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों को धक्का पहुंचेगा। बजाहिर है कि मौजूदा प्रस्तावों के कानून बनते ही सेक्स वर्कर चोरी छुपे धंधा करेंगी। ऐसे में उन तक एड्स रोकथाम संबंधी जानकारी और जागरूकता पहुंचाना संभव नहीं होगा। इस संकट को भांपते हुए भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने मौजूदा प्रस्तावों से अपनी असहमति जताई है। नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन ने अपनी आपत्ति जताई है।हालांकि अब यह सरकार को तय करना है कि वह मौजूदा प्रस्ताव को कानून का रूप दे दे या फिर से संशोधन के लिए महिला बाल कल्याण मंत्रालय को लौटा दे। हालांकि यह जरूरी है कि सरकार सेक्स वर्करों की मांगों को भी सुने। नहीं तो मुंबई बार-बालाओं का उदाहरण सामने है। महाराष्ट्र सरकार ने बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के डांस बारों को बंद कर दिया। आए दिन बार-बालाओं की गिरफ्तारी से पता चलता है कि यह चोरी-छुपे अब भी जारी है वहीं आकलन यह भी बताता है कि इस रोक के बाद हजारों बार-बालाएं पेट पालने के लिए जिस्मफरोशी के धंधे में उतर पड़ीं। बेहतर तो यही होता कि सरकार किसी कड़े कानून लाने के बदले इन लोगों के लिए रोजगार के अन्य विकल्पों पर विचार करती, हालांकि हर किसी को रोजगार देना व्यावहारिक रूप से असंभव ही है। ऐसे में सरकार को चाहिए को वो सेक्स वर्करों के संगठनों के सुझावों पर भी ध्यान दे। सेक्स वर्करों की सबसे बड़ी मांग ये है कि ट्रैफिकिंग और वेश्यावृत्ति दोनों अलग-अलग हैं और इसके लिए एक समान कानून नहीं होना चाहिए । सेक्स वर्करों का कहना है कि ट्रैफिकिंग के पीछे प्राय: एक गिरोह काम कर रहा होता है जबकि वेश्यावृत्ति आजीविका के चलते महिलाओं के लिए मजबूरी भी है। पिछले सप्ताह दिल्ली में देश भर के सेक्स वर्करों के प्रतिनिधियों ने इक्ट्ठा हो कर इस प्रस्ताव का विरोध किया है। इन प्रतिनिधियों का मानना है कि उनकी रोजी रोटी का सवाल है वो हर संभव संघर्ष जारी रखेंगी।
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on नवम्बर 21, 2007 at 5:28 पूर्वाह्न  Leave a Comment  

कैसे चलता है देह व्यापार का धंधा?

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कई समय से कालगर्ल के धंधे के बारे में जानने की जिज्ञासा थी कि क्यों हाई सोसाइटी में रहने वाली लड़कियां इसे कर रही हैं? आजकल तो इस धंधे के बढाने में इंटरनेट के योगदान को भी कम नहीं आंका जा सकता। यह माध्यम पूरी तरह से सुरक्षित है। इसमें सारी डीलिंग ई-मेल द्वारा की जाती है। इन्टरनेट पर दिल्ली की ही कई सारी साइटें उपलब्ध है, जिसमें कई माडल्स के फोटो के साथ उनके रेट लिखे होते हैं। एक परिचित के माध्यम से मेरी मुलाकात लवजीत से हुई जो दिल्ली के सबसे बड़े दलाल के लिए काम करता है। उसने एक पांच सितारा होटल में माया से मेरी मुलाकात का समय तय किया। उसका कहना था कि माया एक इज्जतदार घर की लड़की है और इंगलिश बोलती है। बातचीत के दौरान लवजीत का मोबाइल फोन बजता रहता है। एक के बाद एक इंक्वाइरी जारी रहती है। इस धंधे में हमेशा बिजी रहना पड़ता है’, उसका कहना है। चलने से पहले वो मुझे ठीक वक्त पर पहुंचने की ताकीद करता है। अगर जगह या समय बदलना है तो उसे बताना होगा। पीले टॉप और नीली जीन्स में माया बिल्कुल सही वक्त पर पहुंच जाती है। अभिवादन खत्म और उसे यह जानकर हैरत होती है कि मैं सिर्फ उससे जानकारी चाहता हूं। थोड़ा वक्त जरूर लगता है लेकिन वह अपने धंधे के बारे में बात करने के लिए राजी हो जाती है। हां, अब मुझे इस जिंदगी की आदत हो चली है। अच्छा पैसा और मौज मजा।उसके अधिकतर ग्राहक बिजनेसमैन हैं और उनमें से कुछ तो वफादार भी। क्या उसे अजनबियों से डील करना अजीब नहीं लगता? वह कहती है, ‘देखिए हम लोग एक स्थापित नेटवर्क के जरिये काम करते हैं जो बिना किसी रूकावट के धंधे में मददगार है। टेंशन की कोई बात ही नहीं। माया का दावा है कि महज एक सप्ताह के काम के उसे साठ से अस्सी हजार मिल जाते हैं। जब उसने शुरूआत की थी तो अच्छे घरों की लड़कियां इस धंधे में बहुत नहीं थीं, लेकिन अब बहुत हैं, ‘अब तो यह लगभग आदरणीय हो गया है’, वह व्यंग्य करते हुए कहती है। दिल्ली के उच्च वर्ग, पार्टी सर्किल और सोशलाइटों के बीच गुड सेक्स फॉर गुड मनीएक नया चलताऊ वाक्य बन गया है। यही वजह है कि दिल्ली पर भारत की सेक्स राजधानी होने का एक लेबल चस्पां हो गया है। आंकड़ों की बात करें तो मुंबई में दिल्ली से ज्यादा सेक्स वर्कर हैं। लेकिन जब प्रभावशाली और रसूखदार लोगों को सेक्स मुहैया करवाने की बात आती है तो दिल्ली ही नया हॉट स्पॉट है। ये प्रभावशाली और रसूखदार लोग हैं राजनेता, अफसरशाह, व्यापारी, फिक्सर, सत्ता के दलाल और बिचौलिए। यहां इसने पांच सितारा चमक अख्तियार कर ली है।पुलिस का अनुमान है कि राजधानी में देह व्यापार का सालाना टर्न आ॓वर 600 करोड़ के आसपास है। पांच सितारा कॉल गर्ल्स पारंपरिक चुसी हुई शोषित और पीड़ित वेश्या के स्टीरियोटाइप से बिल्कुल अलग हैं। न तो ये भड़कीले कपड़े पहनती हैं और न बहुत रंगी-पुती होती हैं और न ही उन्हें बिजली के धुंधले खंभों के नीचे ग्राहक तलाश करने होते हैं। पांच सितारा होटलों की सभ्यता और फार्महाउसों की रंगरेलियों में वे ठीक तरह से घुलमिल जाती हैं। वे कार चलाती हैं, उनके पास महंगे सेलफोन होते हैं। जैसा कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है कि हाल ही के एक छापे के दौरान पकड़ी गई लड़कियों को देखकर उन्हें धक्का लगा। वे सब इंगलिश बोलने वाली और अच्छे घरों से थीं। कुछ तो नौकरी करने वाली थीं, जो जल्दी से कुछ अतिरिक्त पैसा बनाने निकली थीं।34 साल की सीमा भी एक ऐसी ही कनवर्ट है। उसे इस धंधे में काफी फायदा हुआ है। किसी जमाने में वह फैशन की दुनिया का एक हिस्सा थी लेकिन उसके करियर ने गोता खाया और वह सम्पर्क के जरिये अपनी किस्मत बदलने में कामयाब हो गई। अब वह दिल्ली की एक पॉश कॉलोनी में रहती है और कार ड्राइव करती है। उसे सस्ती औरत कहलाने में कोई गुरेज नहीं है। उसके मां-बाप चंडीगढ मे रिटायर्ड जीवन जी रहे हैं। सीमा हर तीन महीने में उनसे मिलने जाती है, हालांकि उन्हें मालूम नहीं है कि वो क्या करती है। लेकिन कई औरतों के लिए इस तरह की दोहरी जिंदगी जीना इतना सरल नहीं है। सप्ताह के दिनों में पड़ोस की एक स्मार्ट लड़की की तरह रहना और वीकएंड पर अजनबियों के साथ रातें गुजारना- अनेक पर काफी भारी पड़ता है। अगर आप अकेले हैं तो तो ठीक है, लेकिन अगर परिवार के साथ रहते हैं तो काफी मुश्किल हो जाती है। कुछ लड़कियां दकियानूसी परिवारों से आती हैं और रात को बाहर रहने के लिए उन्हें बहाने खोजने पड़ते हैं’, सीमा कहती है। मध्यवर्गीय परिवारों की लड़कियां इस धंधे में किक्स और त्वरित धन की खातिर उतरती हैं। हालांकि कुछ एक या दो बार ऐसा करने के बाद धंधे से किनारा कर लेती हैं पर कई इसमें लुत्फ लेने लगती हैं। जैसा कि माया कहती है, ‘चूंकि पैसा अच्छा है, इसलिए हम बेहतर वक्त बिता सकते हैं, गोआ में वीकएंड या फिर विदेश यात्रा।कुछ लड़कियां बगैर दलाल के स्वतंत्र रूप से काम करती हैं लेकिन किसी गलत किस्म का ग्राहक फंस जाने का खतरा उनके साथ हमेशा रहता है। हालांकि पुलिस का कहना है कि औरतें दलाल के बगैर बेहतर धंधा करती हैं। गौर से देखें तो दिल्ली के रूझान के हिसाब से कॉल गर्ल्स आजाद हो चुकी हैं। दलालों की संख्या कम हो रही है। दिल्ली में धंधा इसलिए बढ़ा है कि बतौर राजधानी सारे बड़े-बड़े सौदे यहीं होते हैं। राजनेताओं और अफसरशाहों को इंटरटेन किए जाने की जरूरत होती है। इसके अलावा आसपास काफी पैसा बहता रहता है। कनॉट प्लेस के खेरची दूकानदार से लेकर रोहिणी के रेस्टोरेंट मालिक और गुडगांव के रियल एस्टेट डेवलपर तक सब खर्च करने को तैयार हैं। उनकी सुविधा के लिए ऐसे कई गेस्ट हाउस कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं जो चकलों का काम भी करते हैं। दक्षिण दिल्ली में तो धंधा आवासीय कॉलोनियों से भी चलता है और सामूहिक यौनाचार के लिए किराये पर लिए गए फार्महाउसों पर तो पुलिस के छापे पड़ते ही रहते हैं। हाल ही में दक्षिण पश्चिम दिल्ली के वसंतकुंज में पड़े एक छापे में तीन औरतें और पांच दलाल पकड़े गए थे। उनमें से एक महिला जो बंगलूर से अर्थशास्त्र में स्नातक थी, महीने में पंद्रह दिन दिल्ली में रहती थी और उस दौरान दो लाख रूपया बना लेती थी। बाकी औरतें भी एक रात के दस से पन्द्रह हजार रूपये वसूला करती थीं। उनके ग्राहक बिजनेसमैन और वकील थे। दिल्ली में इस धंधे में सबसे बड़ा नाम क्वीन बी का है जो ग्रेटर कैलाश से सारे सूत्र संभालती है। एक पंजाबी परिवार की यह 44 वर्षीय महिला जिसका उपनाम दिल्ली के एक पांच सितारा होटल से मिलता-जुलता है, लड़कियों की सबसे बड़ी सप्लायर है और इसका नेटवर्क काफी लंबा-चौड़ा है। वो न सिर्फ अच्छीभारतीय लड़कियां मुहैया करवाती है बल्कि मोरक्कन, रूसी और तुर्की लड़कियां भी अपने घर में रखती है। नब्बे के दशक की शुरूआत में छापे के दौरान एक पांच सितारा होटल से पकड़ी गई क्वीन बी के नेटवर्क को प्रभावशाली नेताओं और रसूख वाले व्यापारियों का सहारा मिला हुआ है। उसके संबंधों के मद्देनजर उसे तोड़ने में बहुत मेहनत लगेगी’, यह कथन है एक पुलिसकर्मी का, जिसका अनुमान है कि क्वीन बी सिर्फ सिफारिशों पर काम करती है और उसकी एक दिन की कमाई चार लाख रूपया है। फिर दिल्ली में बालीवुड की एक अभिनेत्री भी सिय है, जिसके पास अब कोई काम नहीं है। उसके नीचे सात से आठ जूनियर अभिनेत्रियां काम करती हैं। उनका अभिनय करियर खत्म हो जाने के बाद वे सब धंधे में उतर आई हैं। एक दलाल के अनुसार, अफसरशाहों और राजनेताओं में बड़े नाम वाली लड़कियों की काफी मांग है। हाल ही के एक छापे में पकड़ी गई एक युवती दिल्ली की एक फर्म में जूनियर एक्जीक्यूटिव के पद पर थी। गु़डगांव के एक लाउंज बार में एक दलाल की नजर उस पर पड़ गई। उसके चेहरे और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उसने उसे धंधे में उतार दिया, लेकिन अपने ग्राहक वह खुद तय करती है। वीक एंड को बाहर जाने पर उसे 60 से 70,000 रूपये मिल जाते है। इसके अलावा ग्राहक उसे महंगे तोहफों से भी नवाजते हैं।राजधानी के एक जाने-माने दलाल का कहना है, ‘चुनाव करने के लिए दिल्ली में अनंत लड़कियां हैं। सही सम्पर्क और सही कीमत के बदले आप जो चाहें हासिल कर सकते हैं। यहां एक पांच सितारा होटल में पकड़ी गई एक 29 वर्षीय युवती और एक दूसरी लड़की केवल अमीरों और रसूख वालों के काम आती थीं। युवती एक स्कोडा कार ड्राइव करती थी और उसका पता दक्षिण दिल्ली का था। उसकी साथी दिल्ली के जाने-माने स्कूल में पढ़ी थी। उनके पास ग्राहकों का एक अच्छा खासा डेटाबेस था। ये मोबाइल फोन के जरिए धंधा करती थीं और संभ्रांत परिवारों से थीं।
लेकिन यह धंधा चलता कैसे है? ‘दलालों और एक सपोर्ट सिस्टम के जरिए सब कुछ सुसंगठित है, जहां युवावर्ग उठता-बैठता है। ऐसी जगहों पर लोग भेजे जाते हैं। शहर के बाहरी छोर पर स्थित पब और लाउंज बार इस मामले में काफी मददगार साबित होते हैं। यहीं पर नई भर्ती की पहचान होती है। सही जगह पर सही भीड़ में आप पहुंच जाइए, आप पाएंगे कि ऐसी कई महिलाएं हैं जो पैसा बनाना और मौज-मजा करना चाहती हैं।यह कथन है एक ऐसे शख्स का जो धंधे के लिए लड़कियों की भर्ती करता है। एक बार दलाल की लिस्ट में लड़की आई नहीं कि धंधा मोबाइल फोन पर चलने लगता है। सामान्यतया मुलाकात की जगह होती है कोई पांच सितारा होटल, ग्राहक का गेस्ट हाउस या फिर उसका घर। पुलिस के अनुसार अधिकतर दलाल केवल उन लोगों के फोन को तरजीह देते हैं जिनका हवाला किसी ग्राहक द्वारा दिया जाता है। इससे सौदा न सिर्फ आपसी और निजी रहता है, बल्कि एक चुनिंदा दायरे तक ही सीमित होता है।पांच सितारा कॉल गर्ल्स के साथ ही बढ़ती हुई तादाद में मसाज पार्लर, एस्कॉर्ट और डेटिंग सेवाएं भी दैहिक आनंद के इस व्यवसाय को और बढ़ावा दे रही हैं। ये सब सेक्स की दूकानों के दूसरे नाम हैं। दिल्ली के अखबार इन सेवाओं के वर्गीकृत विज्ञापनों से भरे रहते हैं। कुछ समय पहले इन पार्लरों का सरगना पकड़ा गया था जिसके दस से अधिक पार्लर आज भी दिल्ली में चल रहे हैं। मजेदार बात यह है कि यह शख्स इंजीनियरिंग ग्रेजुएट है और आईएएस की परीक्षा में भी बैठा था। अपने तीन दोस्तों के साथ इसने देह व्यापार के धंधे में उतरना तय किया और साल भर में उसने शहर में आठ मसाज पार्लर खोल दिए। कुख्यात कंवलजीत का नाम आज भी पुलिस की निगरानी सूची में है। किसी जमाने में दिल्ली के वेश्यावृत्ति व्यवसाय का उसे बेताज बादशाह कहा जाता था। जब दिल्ली में उस पर पुलिस का कहर टूटा तो वह मुम्बई चला गया। पुलिस के अनुसार अभी भी अपनी दो पूर्व पत्नियों के जरिये उसका सिक्का चलता है। उसके दो खास गुर्गे- मेनन और विमल अपने बूते पर धंधा करने लगे हैं। पुलिस मानती है कि वेश्यावृत्ति के गिरोहों की धर पकड़ अक्सर एक असफल प्रयास साबित होता है क्योंकि थोड़े समय बाद ही यह फिर उभर आती है। चूंकि यह एक जमानती अपराध है और पकड़ी गई औरतें कोर्ट द्वारा छोड़ दी जाती हैं इसलिए वे फिर धंधा शुरू कर देती हैं। पुलिस का यह भी मानना है कि चूंकि यह सामाजिक बुराई है इसलिए छापे निष्प्रभावी हैं। इसे कानूनी बना देना शायद बेहतर साबित हो। लेकिन राजनेता दुनिया के सबसे पुराने पेशे पर कानूनी मोहर लगाना नहीं चाहते, लिहाजा यह धंधा फल-फूल रहा है।
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on नवम्बर 20, 2007 at 6:10 पूर्वाह्न  टिप्पणियाँ (1)  

शारीरिक सुख…पैसे की चकाचौंध या फिर आधुनिकता?

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आधुनिकता की चकाचौंध ने सबको अपनी तरफ आकर्षिक किया है। समाज के हर तबके की मानसिकता बदल गई है। लोगों की मानसिकता का बदलाव समाज से तालमेल स्थापित नहीं कर पा रहा है। आज लोगों की महत्वाकांक्षा बढ़ गई है और वह उसे हर हाल में पूरा करना चाहते हैं। कुछ समय पहले तक किसी भी अपराध या दुराचार को व्यक्तिगत मामला कहकर टाला नहीं जा सकता था लेकिन आज हर किसी ने अपने को सामाजिक जिम्मेदारी से मुक्त कर लिया है। रही-सही कसर संयुक्त परिवारों के टूटने से पूरी हो गई। व्यक्ति आत्मकेंद्रित हो गया है।समाज और परिवार दो महत्वपूर्ण इकाई थे जो व्यक्ति के लिए सपोर्ट सिस्टम का काम करते थे। व्यक्ति सिर्फ अपने बीबी-बच्चों के प्रति ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार के प्रति जिम्मेदार होता था। पास-पड़ोस से मतलब होता था, आज वह पूरी तरह खत्म हो गया है। आज हमारे पड़ोस में कौन रहता है, इसकी खबर न तो हमको रहती है और न करना चाहते हंै। आज यदि आप अपने पड़ोसी से संबंध बनाना भी चाहें तो शायद वह ही संबंध बनाने का इच्छुक न हो। पड़ोस का डर और सम्मान अब नहीं रहा। अपनी जड़ों, समाज और संस्कृति से हम कट गए हंै। पुराने मूल्यों का टूटना लगातार जारी है।आधुनिकतम जीवनशैली अभी तक कोई मूल्य स्थापित नहीं कर पाई है, जिसकी मान्यता और बाध्यता समाज पर हो। आज समाज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। कोई मूल्य न रहने से नैतिक बंधन समाप्त हो चुका है। यह स्वच्छंदता ही गलत राह पर ले जाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है। आज हर आदमी उच्च वर्ग की नकल कर रहा है, इसके लिए चाहे जो रास्ता अपनाना पड़े। मेरे पास भी वह कार होनी चाहिए जो पड़ोसी के पास है। दफ्तर में सब के बराबर भले ही वेतन न हो, लेकिन हम किसी से कम नहीं।एक समय था जब समाज के निचले तबके अथवा छल कपट से कोठे पर पहुंचा दी गई महिलाएं ही इस पेशे में थीं, अब तो समाज के हर वर्ग के लोग इसमें शामिल हैं। खास कर पढ़ी-लिखी उच्च और मध्यम घराने की लड़कियां तो ज्यादा हैं। अभी दिल्ली के स्कूल की अध्यापिका ने जो किया वह तो मानवता के लिए कलंक के समान है। संकुचित मानसिकता, परिवारों का विघटन और अल्प लाभ के लिए यह पेशा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे विकृति कहा जाता है। पहले हम वही सामान खरीदते थे जिसकी जरूरत होती थी। कुछ लोगों में मालसिंड्रोम होता है। वे दुकानों में घुसने पर सब कुछ खरीद लेना चाहते हंै। घर-परिवार से तो हर आदमी को एक निश्चित राशि ही मिलती है। इसके लिए उन्हें गलत रास्ता अख्तियार करना पड़ता है। छात्रवासों में रहने वाली लड़कियां हमारे पास आती हंै। उनको अपने इस काम से कोई अपराधबोध नहीं होता है। कुछ तो पैसे के लिए फार्म हाउस में जाती हंै। फार्म हाउस और कोठियां सबसे सुरक्षित स्थान बन गए हैं। ऐसे स्थानों पर जाने वाली लड़कियां एक रात में ही हजारों कमा लेती हैं। इसका कारण पूछने पर पता चलता है कि अपनी असीमित इच्छाओं की पूर्ति के लिए आज बड़े घरों की लड़कियां भी इस पेशे में उतर आई हैं। विदेशों में तो डॉक्टर और इंजीनियर की सम्मानित नौकरी पर लात मार कर ढेर सारी महिलाएं इसमें आई हैं। कम समय में ज्यादा पैसा कमाना ही इसका मुख्य कारण है।
सेक्स की कुंठा से भी कुछ महिलाएं इस पेशे में आती हंै। इस बीमारी को निम्फोमेनिया कहते हैं। ऐसी महिलाएं पैसा तो नहीं लेती हैं, लेकिन यह भी अनैतिक ही है। सेक्स कारोबार में इनका प्रतिशत सिर्फ आठ है। आज का सारा सेक्स रैकेट पढ़े-लिखे सफेदपोश लोग संचालित कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण धैर्य की कमी, तात्कालिक लाभ, मानसिक असंतुलन और अमीर बनने की चाहत है।सेक्स रैकेट आज प्रोन्नति, ठेके, पैसे और बड़े-बड़े कामों में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुका है। शारीरिक सुख और पैसा सबसे ऊपर हो गए हैं। आज जिसके पास पैसा नहीं है उसके पास लोगों की निगाह में कुछ भी नहीं है। पैसे में ही मान-सम्मान, इज्जत और सारा सुख निहित मान लिया गया है। एक दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि शहरों की आबादी जिस तरह से बढ़ रही है उसमें देश के एक छोर से दूसरे छोर के लोग आसपास रहते हुए भी एक दूसरे से घुल मिल नहीं पाते हैं। यही कारण है कि गांवों की अपेक्षा शहरों में सेक्स रैकेट ज्यादा है।
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on नवम्बर 19, 2007 at 7:39 पूर्वाह्न  Leave a Comment  

बढ रहा देह व्यापार

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अब सेक्स की मंडी में ग्राहकों की भीड़ केवल मौज मस्ती या शारीरिक सुख के लिए ही नहीं लगती। इस मंडी से खरीदा गया माल आफिस में तरक्की का मार्ग खोल देता है, चुनाव का टिकट दिला देता है, बड़े से बड़े टेंडर दिला देता है। यही कारण है कि अब सेक्स के बाजार में सिक्कों की चमक पहले से कहीं ज्यादा है और बड़ी तादाद में लड़कियां इस कारोबार की आ॓र आकर्षित हो रही हैं।एक जमाना था जब रेड लाइट एरिया से पकड़ी जाने वाली औरतें अपनी मजबूरियां बताती थीं, लेकिन अब पकड़ी जाने वाली अधिकतर लड़कियों के सामने मजबूरी नहीं बल्कि फाइव स्टार होटलों का ग्लैमर, सिक्कों की चमक और बढ़ती महत्वाकांक्षा है। कभी रेडलाइट एरिया और गली मोहल्लों में सिमटा यह धंधा अब बड़ी कोठियों, फार्म हाउस और बड़े होटलों तक पहुंच गया है। अब मसाज सेंटर या ब्यूटी पार्लर का भी इस्तेमाल इस धंधे में कम होता है ताकि इसमें शामिल लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा बरकरार रहे। रेड लाइट एरिया तक जाने में बदनामी का डर रहता है लेकिन आज के हाई प्रोफाइल सेक्स बाजार में कोई बदनामी नहीं, क्योंकि ग्राहक को मनचाही जगह पर मनचाहा माल उपलब्ध हो जाता है और किसी को कानों कान खबर तक नहीं होती। बस मोबाइल पर एक कॉल और इंटरनेट पर एक क्लिक से मनचाही कॉलगर्ल आसानी से उपलब्ध हो जाती है। हालांकि मजदूर वर्ग और लो प्रोफाइल लोगों के लिए अब भी रेडलाइट एरिया की गलियां खुली हैं लेकिन एचआईवी संक्रमण के खतरों ने वहां भीड़ कम जरूर कर दी है।अब इस कारोबार में न केवल विदेशी लड़कियां शामिल हैं बल्कि मॉडल्स, कॉलेज गर्ल्स और बहुत जल्दी ऊंची छलांग लगाने की मध्यमवर्गीय महत्वाकांक्षी लड़कियों की संख्या भी बढ़ रही है। पुलिस के बड़े अधिकारी भी मानते हैं कि अब कॉलगर्ल और दलालों की पहचान मुश्किल हो गई है क्योंकि इनकी वेशभूषा, पहनावा व भाषा हाई प्रोफाइल है और उनका काम करने का ढंग पूरी तरह सुरक्षित है। यह न केवल विदेशों से कॉलगर्ल्स मंगाते हैं बल्कि बड़ी कंपनियों के मेहमानों के साथ कॉलगर्ल्स को विदेश की सैर भी कराते हैं। कॉलगर्ल्स और दलालों का नेटवर्क दो स्तरों पर है। एक अत्यंत हाईप्रोफाइल है जिसमें फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाली और आधुनिक वेशभूषा वाली हाई फाई कॉलगर्ल हैं तो दूसरा नेटवर्क महाराष्ट्र, सिक्किम, पश्चिमी बंगाल, बिहार, नेपाल और भूटान से लाई गई बेबस लड़कियों का है। ग्राहक की मांग के अनुसार ही कॉलगर्ल उपलब्ध कराई जाती है।सेक्स के इस कारोबार में नये ग्राहक को प्रवेश बहुत मुश्किल से मिलता है। पकडे़ जाने के डर से केवल पुराने व नियमित ग्राहकों को ही प्राथमिकता दी जाती है। जगह की व्यवस्था करने का रिस्क भी इस धंधे में लगे लोग नहीं लेते। यह व्यवस्था ग्राहक को स्वयं करनी होती है। ग्राहक को एक निश्चित स्थान पर कॉलगर्ल की डिलीवरी किसी मंहगी कार के माध्यम से कर दी जाती है। वहां से ग्राहक अपने वाहन से उसको मनचाहे स्थान पर ले जाता है। अमूमन यह स्थान बड़े होटल, बड़ी कोठियां या फिर फार्म हाउस होते हैं। दलाल पोर्न वेबसाइटों के जरिए एक-दूसरे से सम्पर्क साध कर अपना नेटवर्क मजबूत बनाते हैं। इंटरनेट पर हजारों ऐसी साइटें हैं जहां कॉलगर्ल्स की फोटो व उनका प्रोफाइल उपलब्ध रहता है जिन्हें देखकर ग्राहक अपना ऑर्डर बुक कर सकते हैं। दिल्ली पुलिस के उपायुक्त देवेश चंद श्रीवास्तव के अनुसार, ‘विश्वसनीयता इस धंधे का प्रमुख हिस्सा है। कॉलगर्ल सीधी डील नहीं करती और किसी भी कीमत पर किसी नये ग्राहक से डील नहीं की जाती। पुराने सम्पर्क के आधार पर ही डील की जाती है। यही कारण है कि पुलिस जल्दी से इनकी पहचान नहीं कर पाती। इस धंधे में लगे लोगों के अपने कोडवर्ड हैं जिनका इस्तेमाल कर वह ग्राहकों से बातचीत करते हैं।वो जमाना गया जब किसी भी कॉलगर्ल या सेक्स वर्कर तक पहुंचने के लिए टैक्सी ड्राइवर, ऑटो चालक या किसी नुक्कड़ के पान विक्रेता को टटोलना पड़ता था, क्योंकि वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाओं के दलाल अक्सर इसी वर्ग के होते थे। यह दलाल ग्राहक को ठिकाने तक पहुंचाने के बाद बाकायदा वसूली करते थे। ऐसे कुछ दलाल ग्राहक और वेश्या दोनों से दलाली लेते थे जबकि कुछ केवल वेश्या से ही अपना हिस्सा मांगते थे लेकिन अब इस तरह के दलालों का जमाना गये वक्त की बात हो गई है।
सेक्स के कारोबार में अब दलालों की पहचान बदल गई है। वे हाई प्रोफाइल हो गये हैं, सेक्स कारोबारी बन गये हैं। ये सुसज्जित कार्यालयों में बैठते हैं और इनकी रिशेप्सनिस्ट ईमेल और मोबाइल पर आने वाली सूचनाओं के आधार पर कॉलगर्ल्स की बुकिंग करती है। ईमेल या मोबाइल पर ही ग्राहक को डिलीवरी का स्थान बता दिया जाता है और फिर निश्चित स्थान पर पूरी रकम एडवांस लेने के बाद कॉलगर्ल की डिलीवरी कर दी जाती है। जिस तरह व्यापारी अपने व्यापार में माल की क्वालिटी, ग्राहकों की पसंद, दुकान की ख्याति, स्टेंडर्ड आदि का ध्यान रखता है, उसी तरह सेक्स के ये कारोबारी भी अपने व्यापार को लेकर बहुत सजग हैं। वह अपने पास हर तरह का माल रखना पसंद करते हैं ताकि कोई ग्राहक खाली न लौटे। ग्राहक की पुलिस से सुरक्षा व पूर्ण संतुष्टि का भी दलाल ख्याल रखते हैं ताकि वह उनका स्थायी ग्राहक बना रहे। अब कॉलगर्ल या ग्राहक से इन्हें दलाली नहीं मिलती बल्कि यह खुद सौदा करते हैं और कॉलगर्ल्स को अपने यहां ठेके पर या फिर वेतन पर रखते हैं। उस अवधि में ठेकेदार इनकी सप्लाई कर कितना कमाता है इससे इन्हें कोई मतलब नहीं होता। जिस प्रकार किसी कर्मचारी के लिए काम के घंटे व छुट्टी के दिन निर्धारित होते हैं, उसी पर ठेके या वेतन पर काम करने वाली कॉलगर्ल्स के भी काम और आराम के दिन निर्र्धारित होते हैं। काम की एक रात के बाद उनकी अगली रात अमूनन आराम की होती है लेकिन अगली रात की भी मांग हो तो इन्हें अतिरिक्त भुगतान मिलता है।
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on नवम्बर 18, 2007 at 1:07 अपराह्न  टिप्पणियाँ (3s)  

विपक्ष ने राष्‍ट्रमंडल खेल घोटालों में उछाला सोनिया गांधी का नाम



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दिल्‍ली। सभी मुद्दों को पछाड़ते हुए राष्‍ट्रमंडल खेल घोटाला संसद के मानसून सत्र का सबसे विवादास्‍पद मुद्दा बन गया है। विपक्ष इस घोटाले पर यूपीए सरकार को घेरने में लगी हुई है। सीएजी की रिपोर्ट के बाद दिल्‍ली की मुख्‍यमंत्री शीली दीक्षित पहले ही इस घोटाले की चपेट में आ चुकी हैं। अब कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी का नाम भी राष्‍ट्रमंडल खेल घोटालों में उछला है।

राज्‍यसभा की कार्रवाई के दौरान विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने सुरेश कलमाड़ी की नियुक्ति को लेकर सोनिया गांधी पर निशाना साधा। अरुण जेटली ने कहा कि राष्‍ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अध्‍यक्ष सुरेश कलमाड़ी की नियुक्ति कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी की मंजूरी के बाद ही हुई है। उनके इस बयान के बाद राज्‍यसभा में हंगामा शुरू हो गया। जिस वजह से राज्‍यसभा की कार्रवाई स्‍थगित करनी पड़ी।

राष्‍ट्रमंडल खेलों में इससे पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम भी आ चुका है। सीएजी रिपोर्ट में उन्‍हें सुरेश कलमाड़ी को आयोजन समिति का अध्‍यक्ष्‍ा बनाए जाने और खेलों के दौरान खुला खर्च करने की इजाजत देने के लिए दोषी पाया गया था। इसके अलावा तत्‍कालीन खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर घोटालों के बारे में अवगत कराया था। इसके बावजूद भी पीएमओ कार्यालय में इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई।

संसद के मानसून सत्र में कैग की रिपोर्ट पेश होने के बाद से विपक्ष की हंगामे की वजह से इसके दोनों सदनों की कार्रवाई सुचारू रूप से नहीं चल पाई है। विपक्ष इस घोटाले में शीला दीक्षित का नाम आने के बाद से कांग्रेस से उनके इस्‍तीफे की मांग कर रहा है। कांग्रेस पहले ही कार्रवाई करने से मना कर चुका है। इस वजह से पिछले 3 दिनों से संसद की कार्रवाई नहीं पूरी हो पाई है।