रविवार, 11 अगस्त 2013

दिल्ली का प्राचीनतम: पार्लियामेंट स्ट्रीट थाना


 
Image Loading अन्य फोटो इस थाने में एक से एक पुरानी एफआईआर रखी हुई हैं, जिनमें कई प्राचीनतम एवं महत्त्वपूर्ण केस दर्ज हैं,

फिरोज बख्त अहमद
:26-11-09
 imageloadingई-मेल Image Loadingप्रिंट  टिप्पणियॉ: (0) अ+ अ-
दिल्ली का इतिहास केवल स्मारकों में ही नहीं, बल्कि यहां की एक प्राचीनतम कोतवाली में भी सुरक्षित है। इस  थाने का नाम था-रायसीना हिल पुलिस स्टेशन, जिसकी नींव 1913 में अंग्रेजों द्वारा डाली गयी थी। आज यह थाना पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन के नाम से जाना जाता है। सन्  1962 में इस पुलिस स्टेशन का नाम बदल दिया गया था। इस थाने में एक से एक पुरानी एफआईआर रखी हुई हैं, जिनमें कई प्राचीनतम एवं  महत्त्वपूर्ण केस दर्ज हैं, जैसे बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह द्वारा दिल्ली की विधान सभा गैलरी में 1929 में बम फेंका जाना।
बकौल वीर किशन पाल सिंह यादव, थानाध्यक्ष सनलाइट कालोनी पुलिस स्टेशन, जिन्हें थानों के इतिहास एकत्र करने का चाव है,‘पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने के रिकॉर्ड रूम में आज भी इन दोनों स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध दर्ज की गई एफआईआर मौजूद है, जो कि उर्दू में लिखी हुई है। पहले अदालतों एवं थानों में उर्दू में ही लिखा जाता था। इस एफआईआर का जो समय थाने में दर्ज है, वह है दोपहर 12:30 बजे, 18 अप्रैल 1929। इसमें यह भी लिखा है कि बटुकेश्वर और भगत सिंह ने दो बम चलती हुई असेंबली पर फेंके, गोलियां दागीं और उसके बाद तुरंत आत्मसर्मपण कर दिया। तत्काल दोनों को सजा-ए-काला पानी दी गई। एफ आईआर में दोनों के पते इस प्रकार से लिखे हैं, बटुकेश्वर दत्त, पुत्र गौतम बिहारी और भगत सिंह, पुत्र किशन सिंह, जात- कायस्थ, जालंधर।
वैसे आजादी के बाद भी इस थाने ने बड़े-बड़े केस और रैलियां देखी हैं, जिनमें सबसे बड़ी रैली 1988 में भारतीय किसान यूनियन के महेंद्र सिंह टिकैत द्वारा की गई थी। उस समय टिकैत बोट क्लब पर अपने साथियों के साथ 20 दिन से भी अधिक दिन तक रहे थे और वे वहां से तभी हटे, जब 30 अक्टूबर 1988 को पुलिस ने उन्हें जोर-जबर्दस्ती के साथ खदेड़ा। थाने के एक पुराने कार्यकर्ता बताते हैं, ‘वह रैली वास्तव में सबसे भीषण रैली थी, क्योंकि रैली में आने वाले न केवल पत्थर फेंक रहे थे, बल्कि फायरिंग भी कर रहे थे, जिसके कारण 20 पुलिस वाले जख्मी हुए, जिनमें डीसीपी एवं एसीपी भी थे। वैसे कुछ दिन पहले जो किसानों की रैली दिल्ली में 19 नवंबर को हुई, उसमें भी थानाध्यक्ष के अनुसार पुलिस के जवानों को बड़ी कठिनाई आई। आज इस थाने का स्वरूप बदल चुका है। खेद की बात यह है ऐतिहासिक महत्त्व की बहुत सी पुरानी चीजों का रंग-रूप भी बदल गया है।

ज़मीन में ही छिपा है दिल्ली के जल संकट का समाधान



मनोज मिश्र
जनसत्ता, 07 मई 2013
दिल्ली को अन्य राज्यों की तरह यमुना के पानी में से हिस्सा दिल्ली विधानसभा बनने के बाद पहले मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना के प्रयास से मिला। दिल्ली को 808 क्यूसेक पानी दिया जाना तय किया गया। लेकिन यह पानी आज तक नहीं मिला। दिल्ली जल बोर्ड ने 2021 का पानी का जो मास्टर प्लान बनाया है, उसके हिसाब से दिल्ली को तब 1840 एमजीडी पानी की जरूरत होगी। उस समय अभी के स्रोतों के अलावा हिमाचल प्रदेश के रेणुका बांध से 275 एमजीडी पानी मिलने की उम्मीद है। यानि उस भरोसे दिल्ली को पानी नहीं मिल पाएगा। पानी की समस्या लगातार भयावह होती जा रही है। इसमें सुधार की उम्मीद नहीं दिखती है।केवल पानी के लीकेज को कम कर और पानी का बँटवारा कर दिल्ली में पानी के संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए हर साल भूमिगत जल में हो रही करीब एक मीटर की गिरावट को रोकना जरूरी है। हालत यह है कि दक्षिणी पश्चिमी दिल्ली के कुछ इलाकों में पानी का स्तर 20-30 मीटर तक नीचे चला गया है। शीला दीक्षित सरकार के पहले कार्यकाल में तब के ग्रामीण विकास मंत्री डॉक्टर योगानंद शास्त्री ने दिल्ली देहात में परंपरागत पानी के स्रोतों को पुनर्जीवित कर और बरसाती पानी के संग्रह का अभियान चलाया था। पेड़ लगाने और शहरी इलाकों में बरसाती पानी के संग्रह को अनिवार्य बनाया गया था। इसका फायदा भी हुआ। बढ़ती आबादी और शहरीकरण ने अन्य जरूरी चीजों से ज्यादा पानी के संकट को बढ़ाया है। आज हालत यह है कि दिल्ली में पानी के वैध कनेक्शन वाले घरों में प्रतिदिन पूरे प्रवाह से दो घंटे तक साफ पानी पहुंचाना संभव नहीं हो पा रहा है। गर्मी में बिजली और पानी की मांग बढ़ जाती है। अगर विधानसभा चुनाव से पहले बरसात का मौसम न आता तो बिजली पानी के मुद्दे आगे सभी मुद्दे बेकार साबित होते। बिजली तो किसी भी दर पर कहीं से भी खरीदी जा सकती है। लेकिन पानी नहीं। इसकी हर इलाके में कमी है। गर्मी बढ़ने के साथ-साथ पानी के लिए मारामारी बढ़ती जा रही है।

दिल्ली में शेरशाह सूरी ने अपने शासनकाल में सिंचाई के लिए पश्चिमी यमुना नहर बनवाई थी। उस नहर से दो उप नहरें निकलती थीं। उनसे उत्तर-पश्चिम दिल्ली में अलीपुर और कंझावला विकास खंड के सवा सौ गाँवों में सिंचाई होती थी। लेकिन राजधानी में शहरीकरण होने से सिंचाई का रकबा घटता चला गया। अब अलीपुर और कंझावला में 10-12 गाँवों में ही खेती होती है। दिल्ली 1911 में देश की राजधानी बनी। उस समय दिल्ली में 365 गांव थे। ढ़ाकाधीरपुर गांव में जार्ज पंचम का दरबार लगा था। वहीं राजधानी बनने की घोषणा हुई थी। पुराना सचिवालय 1912 में बनना शुरू हुआ। सरकारी कर्मचारियों के लिए तिमारपुर गांव की ज़मीन पर तिमारपुर कालोनी बनी। 1947 में बँटवारे के बाद से ही शाहजानांबाद (दिल्ली का पुराना नाम जो चहारदीवारी से घिरा हुआ था) ने देहात को निगलना शुरू किया। अब तो गिनती के गांव ही बचे हैं। साल 1993 में हुए आखिरी पंचायत चुनाव में 199 पंचायतें सरकारी रिकार्ड में दर्ज थीं। वास्तव में देहाती इलाक़ा अब नाम का ही बचा है। पानी के संकट का यही मूल कारण माना जाता है।

आज से बीस साल पहले तक दिल्ली में छह हजार निजी और सरकारी ट्यूबवेल थे। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से मार्च 2012 में 65 री-बोरिंग ट्यूबवेल सहित जल बोर्ड के 2636 ट्यूबवेल और 21 बरसाती कुएं थे। नजफगढ़, महरौली इलाकों में रहट (कुओं से ऊटों और बैल आदि से पानी खींचने की व्यवस्था), चरस (आदमी खींचते थे) और ढेकी से सिंचाई होती थी।

दिल्ली को भौगोलिक हिसाब से तीन हिस्सों में बाँटा जाता है, महरौली यानि दक्षिणी में पहाड़ी इलाकों को पहाड़, नजफगढ़ यानी पश्चिमी दिल्ली के इलाके को डाबर और यमुना की तलहटी के इलाके को बागड़। नजफगढ़ इलाके का आकार झील जैसा था। इसलिए उसके मूल स्वरूप को बचाने के लिए नजफगढ़ नाला बनाया गया। उसके साथ हरियाणा से लगे गाँवों में सिंचाई के लिए भूटानी और छुटानी नाला बनाया गया। बवाना और कंझावाला इलाके के लिए मूंगेशपुर नाला और पालम इलाके के लिए पालम नाला बना। इसमें हिसी बस्ती का गंदा पानी नहीं जाता था, केवल बाढ़ का पानी था। जो बाद में बेकार हो जाता था। तब इन नालों को पुनर्जीवित करने की कोशिश हुई थी। नजफगढ़ नाले में पंप लगाकर तीनों छोटी नहरों में पानी डाला गया। इससे 60-70 गाँवों को पानी मिला था। इसी तरह हर गांव के जोहड़ (तालाब) और झील को पुनर्जीवित करने के प्रयास किए गए। गांव के पुराने तालाबों पर लोगों के कब्ज़े हो गए हैं। कई तो अब इतिहास में समा चुके हैं। जो तालाब बचे हुए हैं उनकी संख्या भी 70 के करीब है। जरूरत उनको ठीक कर पानी से भरने की है। भलस्वा झील, संजय झील, नजफगढ़ नाले आदि को गहरा और चौड़ा कर उसे बड़ा जलाशय बनाना जरूरी है। उससे भी जरूरी है दिल्ली में बहने वाली यमुना नदी के समानांतर नहर बना कर उसमें गंदा पानी इंटरसेप्टर से साफ कर डाला जाए और यमुना नदी को बड़े जलाशय की तरह विकसित किया जाए। क्योंकि पानी बाहर से लाना कठिन होता जा रहा है।

हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी पानी के लिए हाहाकार है। तय समझौते के बाद भी हरियाणा डेढ़ दशक में मुनक नहर का काम पूरा नहीं कर पाया है। दिल्ली को ताजेवाला बांध मुनक नहर से 85 एमजीडी पानी आना है। पक्का नहर न बनने से काफी पानी रास्ते में बर्बाद हो जाता है। हरियाणा को दिल्ली से पैसे लेकर इसे बनाना था। लेकिन अभी तक पूरा नहीं हो पाया है।

दिल्ली के गिरते जलस्तर को रोकने के लिए केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने पुराने नौ जिलों में से सात जिलों में भूजल का दोहन पर रोकने के आदेश जारी कर दिए। प्राधिकरण ने साल 2000 में दिल्ली के दक्षिणी और पश्चिमी जिलों को गंभीर क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया। मार्च 2006 में अधिसूचना के माध्यम से पूर्वी जिला, नई दिल्ली जिला, उत्तर पूर्वी जिला और पश्चिम जिले को अत्यधिक दोहन वाला क्षेत्र घोषित कर जल दोहन पर रोक लगा दी। इस पर कानून बनाने के लिए दिल्ली विधान सभा में दिल्ली जल बोर्ड (संशोधन) विधेयक, 2005 लाया गया। इसे बारी विरोध के चलते प्रवर समिति को भेजा गया। समिति ने दो फरवरी 2006 को उसे रद्द कर दिया।

दिल्ली को अन्य राज्यों की तरह यमुना के पानी में से हिस्सा दिल्ली विधानसभा बनने के बाद पहले मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना के प्रयास से मिला। दिल्ली को 808 क्यूसेक पानी दिया जाना तय किया गया। लेकिन यह पानी आज तक नहीं मिला। दिल्ली जल बोर्ड ने 2021 का पानी का जो मास्टर प्लान बनाया है, उसके हिसाब से दिल्ली को तब 1840 एमजीडी पानी की जरूरत होगी। उस समय अभी के स्रोतों के अलावा हिमाचल प्रदेश के रेणुका बांध से 275 एमजीडी पानी मिलने की उम्मीद है। यानि उस भरोसे दिल्ली को पानी नहीं मिल पाएगा। पानी की समस्या लगातार भयावह होती जा रही है। इसमें सुधार की उम्मीद नहीं दिखती है। इसमें सुधार के लिए जन आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। इसमें सरकार की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

Making of a british capital of delhi




1911 में किंग जॉर्ज पंचम द्वारा ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) से दिल्ली लाने की घोषणा के साथ ही दिल्ली को एक नयी पहचान मिली | उस समय देश की राजधानी से पहले दिल्ली, पंजाब प्रांत की तहसील थी| दिल्ली को राजधानी बनाने के लिए दिल्ली और बल्लभगढ़ जिले के 128 गांवों की जमीन अधिग्रहित की गई थी| इसके अलावा, मेरठ जिले के 65 गांवों को भी शामिल किया गया था| मेरठ जिले के इन गांवों को मिलाकर यमुनापार क्षेत्र बनाया गया|
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‘ऐसा मेरे साथ कभी नहीं हुआ। मेरा मानना है कि यदि आप आप एक सेलिब्रिटी हैं तो यह सब चीजें आपके साथ घटित होंगी। मैं यदि एक सेलिब्रिटी हूं और इस बात का डर है कि मुझे कैमरे में पकड़ा जा सकता है तो मैं थोड़ा सजग रहूंगी।’

-दीपिका पादुकोण, बॉलीवुड अभिनेत्री (स्पेन में रणबीर कपूर के साथ छुट्टियां बीताने के

संत, दार्शनिक तथा स्वपनद्रष्टा स्वामी विवेकानंद ने कोलकाता के बाद अपने जीवन के सबसे अधिक वर्ष रायपुर में ही बिताए थे।

यह बात हैरत में डालने वाली है कि मसौदा निर्माण समिति में सदस्य होने के अलावा डॉ. के.एम.

Out of 3,97,39,441 registered motor vehicles in 35 Million plus Cities in India, the total registered motor vehicles in Delhi and Ghaziabad are 72,27,671 and 4,70,081 respectively (as on 31st March 2011).

Working for your's passion never makes you to feel tired as mental state governs the physical conditioning.

उलटबांसी-1

आधुनिक जीवन का त्रासदी: आदमी भोग भी बंटे हुए भाव में करता है, ऐसे में लगता है कि भोग ही जीवन का दृश्यमान सच है.....

"सिनेमा में किसी तरह के सुधार की उम्मीद करना बेकार है.

लेखन का माध्यम-हिन्दी

देखिए मुझे नहीं लगता कि मैंने समझ-बूझकर हिन्दी में लिखना तय किया । मेरे लिए उस भाषा में लिखना ही सहज था जिसमें मैं अपने परिवार वालों से बात करता था और फिर मेरी परवरिश भी इस तरह से हुई थी कि तमाम महत्वपूर्ण प्रभाव, मेरा धर्म और वे महत्वपूर्ण उत्सव जिनमें मैं भाग लेता था, सभी की

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानी मिल मजदूर पर गरीब मजदूर बनी. इसमें प्रेमचंद ने एक रोल भी किया. फिल्म सेंसर से कई सीन काटे जाने के बाद रिलीज हुई. पूरे पंजाब में इसे देखने मजदूर निकल पड़े. लाहौर के इंपीरियल सिनेमा में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मिलिट्री तक बुलानी पड़ी.

दोस्ती का भी कोई दिन होता है, पता नहीं था। पता नहीं, बाज़ार कैसे कैसे 'दिन' दिखलाएगा। खैर, कुछ पुरानी पंक्तियाँ,

कभी किसी का साथ

ऐसा मत छोड़ना दोस्त

जिंदगी बहुत लंबी है

फिर आमने सामने ला खड़ा करती है

"मैं यह कहना चाहती हूं कि मैं फिल्‍म पत्रिका में छपी तस्‍वीरों को लेकर बहुत दुखी हूं और तनाव में हूं. यह तस्‍वीरें तब खींची गईं जब मैं छुट्टियों पर गई थी. किसी ने कायरता का परिचय देते हुए बिना इजाजत यह तस्‍वीरें खींच लीं और फिर व्‍यावसायिक मुनाफे के लिए इनका इस्‍तेमाल भी किया.

Many Delhi traders began to curry favour with the new masters, requesting a Rail Link to Calcutta for better trading opportunities, after much persuasion the British agreed and the railways arrived in the mid 1860s.

Urdu was rapidly replacing Persian to emerge as the lingua franca of Delhi, The Delhi college set up in the 1690s as Madrasa Ghazi-ud-Din was transformed into the Delhi College and became the first centre in Delhi to offer English as a subject, thus earning the ire of a large population of the city

‘‘गंगोत्री से गंगा की धारा निकलती है। स्रोत से दूर जाने वाली अवस्था का नाम धारा है। और धारा शब्द को उलटा देने से पाधा हुआ, जिसा अर्थ है—स्रोत की तरफ लौट जाना। गंगा वापिस लौटती है गंगोत्री की तरफ। बहिर्मुखता, अंतर्मुखता बनती है।’’

-अमृता प्रीतम

As historian Narayani Gupta writes in Delhi Between Two Empires (OUP 1997): ‘A long processional avenue was planned from the fort through Delhi Gate, past a park and a boulevard with the houses of Indian princes lining both sides.

Capital Gains

Rana Dasgupta

Delhi is a segregated city; an impenetrable, wary city – a city with a fondness for barbed wire, armed guards and guest lists.

"The Islamic conquest of India is probably the bloodiest story in history.

जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख

और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख

चीज ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए

बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाए

-भवानी प्रसाद मिश्र

Consider beauty and look for it both in yourself and in others. Even though beauty is simply an ornament, its contemplation can bring joy, albeit ephemeral. Highlight your own beauty and admire that of others.

Do not forget that in life, nothing remains unchanged and everything evolves through transformation. One must learn how to evaluate every situation with the correct amount of modesty.
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1911-Delhi:Administrative history




1911 में किंग जॉर्ज पंचम द्वारा ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) से दिल्ली लाने की घोषणा के साथ ही दिल्ली को एक नयी पहचान मिली | उस समय देश की राजधानी से पहले दिल्ली, पंजाब प्रांत की तहसील थी| दिल्ली को राजधानी बनाने के लिए दिल्ली और बल्लभगढ़ जिले के 128 गांवों की जमीन अधिग्रहित की गई थी | इसके अलावा, मेरठ जिले के 65 गांवों को भी शामिल किया गया था| मेरठ जिले के इन गांवों को मिलाकर यमुनापार क्षेत्र बनाया गया |
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‘ऐसा मेरे साथ कभी नहीं हुआ। मेरा मानना है कि यदि आप आप एक सेलिब्रिटी हैं तो यह सब चीजें आपके साथ घटित होंगी। मैं यदि एक सेलिब्रिटी हूं और इस बात का डर है कि मुझे कैमरे में पकड़ा जा सकता है तो मैं थोड़ा सजग रहूंगी।’

-दीपिका पादुकोण, बॉलीवुड अभिनेत्री (स्पेन में रणबीर कपूर के साथ छुट्टियां बीताने के

संत, दार्शनिक तथा स्वपनद्रष्टा स्वामी विवेकानंद ने कोलकाता के बाद अपने जीवन के सबसे अधिक वर्ष रायपुर में ही बिताए थे।

यह बात हैरत में डालने वाली है कि मसौदा निर्माण समिति में सदस्य होने के अलावा डॉ. के.एम.

Out of 3,97,39,441 registered motor vehicles in 35 Million plus Cities in India, the total registered motor vehicles in Delhi and Ghaziabad are 72,27,671 and 4,70,081 respectively (as on 31st March 2011).

Working for your's passion never makes you to feel tired as mental state governs the physical conditioning.

उलटबांसी-1

आधुनिक जीवन का त्रासदी: आदमी भोग भी बंटे हुए भाव में करता है, ऐसे में लगता है कि भोग ही जीवन का दृश्यमान सच है.....

"सिनेमा में किसी तरह के सुधार की उम्मीद करना बेकार है.

लेखन का माध्यम-हिन्दी

देखिए मुझे नहीं लगता कि मैंने समझ-बूझकर हिन्दी में लिखना तय किया । मेरे लिए उस भाषा में लिखना ही सहज था जिसमें मैं अपने परिवार वालों से बात करता था और फिर मेरी परवरिश भी इस तरह से हुई थी कि तमाम महत्वपूर्ण प्रभाव, मेरा धर्म और वे महत्वपूर्ण उत्सव जिनमें मैं भाग लेता था, सभी की

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानी मिल मजदूर पर गरीब मजदूर बनी. इसमें प्रेमचंद ने एक रोल भी किया. फिल्म सेंसर से कई सीन काटे जाने के बाद रिलीज हुई. पूरे पंजाब में इसे देखने मजदूर निकल पड़े. लाहौर के इंपीरियल सिनेमा में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मिलिट्री तक बुलानी पड़ी.

दोस्ती का भी कोई दिन होता है, पता नहीं था। पता नहीं, बाज़ार कैसे कैसे 'दिन' दिखलाएगा। खैर, कुछ पुरानी पंक्तियाँ,

कभी किसी का साथ

ऐसा मत छोड़ना दोस्त

जिंदगी बहुत लंबी है

फिर आमने सामने ला खड़ा करती है

"मैं यह कहना चाहती हूं कि मैं फिल्‍म पत्रिका में छपी तस्‍वीरों को लेकर बहुत दुखी हूं और तनाव में हूं. यह तस्‍वीरें तब खींची गईं जब मैं छुट्टियों पर गई थी. किसी ने कायरता का परिचय देते हुए बिना इजाजत यह तस्‍वीरें खींच लीं और फिर व्‍यावसायिक मुनाफे के लिए इनका इस्‍तेमाल भी किया.

Many Delhi traders began to curry favour with the new masters, requesting a Rail Link to Calcutta for better trading opportunities, after much persuasion the British agreed and the railways arrived in the mid 1860s.

Urdu was rapidly replacing Persian to emerge as the lingua franca of Delhi, The Delhi college set up in the 1690s as Madrasa Ghazi-ud-Din was transformed into the Delhi College and became the first centre in Delhi to offer English as a subject, thus earning the ire of a large population of the city

‘‘गंगोत्री से गंगा की धारा निकलती है। स्रोत से दूर जाने वाली अवस्था का नाम धारा है। और धारा शब्द को उलटा देने से पाधा हुआ, जिसा अर्थ है—स्रोत की तरफ लौट जाना। गंगा वापिस लौटती है गंगोत्री की तरफ। बहिर्मुखता, अंतर्मुखता बनती है।’’

-अमृता प्रीतम

As historian Narayani Gupta writes in Delhi Between Two Empires (OUP 1997): ‘A long processional avenue was planned from the fort through Delhi Gate, past a park and a boulevard with the houses of Indian princes lining both sides.

Capital Gains

Rana Dasgupta

Delhi is a segregated city; an impenetrable, wary city – a city with a fondness for barbed wire, armed guards and guest lists.

"The Islamic conquest of India is probably the bloodiest story in history.

जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख

और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख

चीज ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए

बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाए

-भवानी प्रसाद मिश्र

Consider beauty and look for it both in yourself and in others. Even though beauty is simply an ornament, its contemplation can bring joy, albeit ephemeral. Highlight your own beauty and admire that of others.

Do not forget that in life, nothing remains unchanged and everything evolves through transformation. One must learn how to evaluate every situation with the correct amount of modesty.
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दिल्ली के 100 साल


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Published on: Mon, 12 Dec 2011 at 03:24 IST


'राजधानी' का ताज पहनने वाली दिल्ली के 100 साल पूरे
नई दिल्ली| राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली ने सोमवार को 100 साल पूरे कर लिए हैं| 12 दिसंबर, 1911 को जॉर्ज पंचम का कोरोनेशन पार्क में भारत के नए सम्राट के रूप में राज्याभिषेक हुआ था जिसके बाद दिल्ली को 'भारत की राजधानी' बनाने की घोषणा की गई थी| आज ही दिन भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित की गई थी| दिल्ली वालों के दिल का इतिहास सौ साल पुराना है| करीब सौ साल पहले नई दिल्ली के बसने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने इसे वर्ल्ड क्लास सिटी का मुकाम दिलाया| सदियों से राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रही दिल्ली को राजधानी बने सौ साल हो गए हैं| इतिहास गवाह है कि मुग़ल साम्राज्य से लेकर ब्रिटिशों के आने तक दिल्ली कई बार जख्मी हुआ|

दिल्ली का इतिहास

चंदरबरदाई की रचना 'पृथवीराज रासो' में तोमर वंश राजा अनंगपाल को दिल्ली का संस्थापक बताया गया है| ऐसा माना जाता है कि उसने ही 'लाल-कोट' का निर्माण करवाया था और लौह-स्तंभ दिल्ली लाया था| दिल्ली में तोमर वंश का शासनकाल 900-1200 इसवीं तक माना जाता है| 'दिल्ली' या 'दिल्लिका' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम उदयपुर में प्राप्त शिलालेखों पर पाया गया, जिसका समय 1170 इसवीं निर्धारित किया गया है| 1206 इसवीं के बाद दिल्ली, सल्तनत की राजधानी बनी जिसमें खिलज़ी वंश, तुगलक़ वंश, सैयद वंश और लोधी वंश समेत कई वंशों ने शासन किया|

17वीं सदी के मध्य में मुग़ल सम्राट शाहजहाँ (1628-1658) ने सातवीं बार दिल्ली को बसाया, जिसे 'शाहजहानाबाद' के नाम से भी पुकारा जाता है| आज कल इसके कुछ भाग पुरानी दिल्ली के रूप में सुरक्षित हैं| अगर देखा जाये तो इस नगर में इतिहास की धरोहर आज भी सुरक्षित बची हुई है, जिनमें लाल क़िला सबसे प्रसिद्ध है|

1911 से 1931 के मध्य 'राजधानी' ने लिया आकार

वर्ष 1911 में दिल्ली सिर्फ एक ढहता हुआ पुराना शहर था| इसके बाद 'एडवर्ड लुटियन' और 'हरबर्ट बेकर' की देखरेख में 1911 से 1931 के मध्य नई राजधानी ने आकार लेना शुरू किया| लुटियंस और बेकर ने दिल्ली में इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन सहित दिल्ली को आधुनिक रूप प्रदान किया| आपको बता दें कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली आठ शहरों से मिलकर बनी है|

हर शासक ने दिल्ली को राजधानी के तौर पर अलग पहचान दी| इतना ही नहीं न जाने कितनी बार इस शहर पर हमले हुए, लेकिन 3000 साल पुरानी दिल्ली ने हर गम सहकर सभी का दिल से स्वागत किया|

कैसे पहना दिल्ली ने राजधानी का ताज

दिल्ली को बनाने और संवारने की कोशिशें बीते 800 वर्षो से हो रही है| हालांकि दिल्ली के मौजूदा स्वरूप में शाहजहां व जॉर्ज पंचम की झलक दिखाई देती है| सौ साल पहले जॉर्ज पंचम ने अपने राज्याभिषेक के बाद दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा की थी| लेकिन ये जानकार आपको आश्चर्य होगा कि जॉर्ज पंचम की इस घोषणा से पहले भी कम से कम छह शासकों ने दिल्ली को बसाने का प्रयास किया था, लेकिन वह इसे बसाने में कामयाब नहीं हो सके| 1911 में किंग जॉर्ज पंचम द्वारा ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) से दिल्ली लाने की घोषणा के साथ ही दिल्ली को एक नया वजूद मिला था| इस तरह दिल्ली ने राजधानी का ताज पहना|

राजधानी के निर्माण में सौ लाख पौंड खर्च

राजधानी दिल्ली के निर्माण में 29 हजार मजदूरों ने काम किया और इसके निर्माण पर एक सौ लाख पौंड खर्च किए गए| लुटियन ने सुझाव दिया था कि राजधानी में कोई भी इमारत 45 फीट से ऊंची न हो| इसके साथ ही दिल्ली को खूबसूरत बनाने के लिए कई इमारतों और बाग-बगीचों का निर्माण कराया गया| जो इसकी भव्यता का प्रतीक है| बताया जाता है कि राजधानी से पहले दिल्ली पंजाब प्रांत की तहसील थी| दिल्ली को राजधानी बनाने के लिए दिल्ली और बल्लभगढ़ जिले के 128 गांवों की जमीन अधिग्रहित कर ली गई थी| इसके अलावा मेरठ जिले के 65 गांवों को भी शामिल किया गया था| मेरठ जिले के इन गांवों को मिलाकर यमुनापार क्षेत्र बनाया गया|

1948 में निर्मित हुए सरकारी स्कूल

पहले शिक्षा गुरुकुल में दी जाती थी| जहां छात्रों के माता-पिता उनके गुरु हुआ करते थे, लेकिन धीरे-धीरे समय ने करवट बदली और यह शिक्षा पाठशाला में बदल गई| बाद में इसने स्कूलों का रूप लिया और 1948 में सरकारी स्कूल अस्तित्व में आए| वर्ष 1958 में नगर निगम के गठन के साथ ही प्राथमिक शिक्षा की जिम्मेदारी इसे दी गई| स्कूली शिक्षा को विस्तार मिला दिल्ली सरकार की ओर से शुरू किए गए माध्यमिक व उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के जरिये| सरकारी शिक्षा व्यवस्था के विस्तार के साथ-साथ निजी संस्थाओं, ट्रस्टों ने भी इस क्षेत्र में अपने कदम बढ़ाए और प्राइवेट स्कूलों की शुरुआत भी सरकारी स्कूली व्यवस्था के साथ हो चली| आज राजधानी में 2000 से ज्यादा मान्यता प्राप्त निजी स्कूल हैं और गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों की संख्या इससे कहीं ज्यादा पहुंच गई है|

1918 में बना पहला एयरपोर्ट

दिल्ली को पहले एयरपोर्ट की सौगात 1918 में मिली| इस एयरपोर्ट का नाम 'विक्ट्री एण्ड गवर्नर जनरल आफ इंडिया लार्ड विलिंगटन' के नाम पर 'विलिंगटन एयरपोर्ट' रखा गया| यह देश का दूसरा व दिल्ली का पहला एयरपोर्ट था| इस एयरपोर्ट पर 1918 को पहली एयरमेल फ्लाइट लैंड हुई थी| इसके बाद 1930 में विमानों का व्यवसायिक परिचालन शुरू हुआ|

सात बार उजड़ी और बसी दिल्ली

ऐसा माना जाता है कि आज का आधुनिक दिल्ली बनने से पहले दिल्ली सात बार उजड़ी और बसी है, जिनके कुछ अवशेष आज भी शेष हैं|

1. लालकोट, सीरी का किला एवं किला राय पिथौरा: तोमर वंश के सबसे प्राचीन क़िले लाल कोट के समीप क़ुतुबुद्दीन ऐबक़ द्वारा अंतरण किया गया|

2. सिरी का क़िला: 1303 में अलाउद्दीन ख़िलज़ी द्वारा निर्मित किया गया था|

3. तुग़लक़ाबाद: गयासुद्दीन तुग़लक़ (1321-1325) द्वारा निर्मित किया गया|

4. जहाँपनाह क़िला: जिसे मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1325-1351) ने निर्मित कराया|

5. कोटला फ़िरोज़ शाह: इसका निर्माण फ़िरोजशाह तुग़लक़ (1351-1388) ने कराया|

6. पुराना क़िला (शेरशाह सूरी) और दीनपनाह (हुमायूँ; दोनों उसी स्थान पर हैं जहाँ पौराणिक इंद्रप्रस्थ होने की बात की जाती है| (1538-1545)

7. शाहजहानाबाद: शाहजहाँ (1638-1649) द्वारा निर्मित; इसी में लाल क़िला और चाँदनी चौक भी शामिल ह

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

जब शादी के बावजूद संभोग बलात्कार माना जाएगा...






जब शादी के बावजूद संभोग बलात्कार माना जाएगा...

 रविवार, 29 जुलाई, 2012 को 14:13 IST तक के समाचार

पीठ का कहना है कि लड़की की उम्र और संभोग की सहमति मामले में कोई अपवाद नहीं हो सकता है
दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि 15 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ विवाह के बाद जब संभोग होता है तो उसे बलात्कार ही माना जाएगा.
हाईकोर्ट ने कहा है कि संभोग के लिए भले ही लड़की की रजामंदी हो, तब भी इसे बलात्कार ही माना जाएगा और ऐसे मामलों में पुरुष को उसके धार्मिक अधिकारों के तहत संरक्षण हासिल नहीं है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश एके सीकरी की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ का कहना था, ''15 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ संभोग आईपीसी की धारा 375 के तहत एक अपराध है. इस कानून के विषय में कोई अपवाद नहीं हो सकता है और इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए.''

'रजामंदी का औचित्य नहीं'

"ऐसे मामलों में रजामंदी का कोई औचित्य नहीं है. ऐसी उम्र में रजामंदी को मंजूर करना मुश्किल है. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि लड़की का विवाह हुआ है या नहीं. सम्बद्ध पक्षों के निजी कानून भी यहां मायने नहीं रखते हैं"
दिल्ली हाईकोर्ट
न्यायाधीशों ने कहा, ''ऐसे मामलों में रजामंदी का कोई औचित्य नहीं है. ऐसी उम्र में रजामंदी को मंजूर करना मुश्किल है. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि लड़की का विवाह हुआ है या नहीं. सम्बद्ध पक्षों के निजी कानून भी यहां मायने नहीं रखते हैं.''
पीठ ने ये व्यवस्था लड़की के विवाह और संभोग के लिए रजामंदी की सही उम्र संबंधी भारतीय दंड संहिता, हिंदू विवाह अधिनियम और बाल-विवाह रोकथाम अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों पर उठे कई सवालों का जबाव देते हुए दी है.

अपहरण या बलात्कार का मामला

पीठ के समक्ष ये कानूनी सवाल खास तौर पर उठाया गया था कि 'क्या किसी व्यक्ति के खिलाफ आईपीसी की धारा 363 या धारा 376 के तहत दर्ज मामला, नाबालिग लड़की के इस बयान के आधार पर खारिज किया जा सकता है कि उसने विवाह खुद किया था.'
कोर्ट ने ये भी कहा है कि ऐसे मामलों में लड़की की उम्र यदि 16 वर्ष से ज्यादा है और उसने विवाह के बाद संभोग के लिए रजामंदी दी है तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को कानून के मुताबिक खारिज किया सकता है.
कोर्ट ने कहा, ''लड़की की आयु 16 वर्ष से ज्यादा है और वो यदि बयान देती है कि वो रजामंद थी और बयान किसी दबाव में या प्रभाव में नहीं दिया गया है तो इस बयान को स्वीकार किया जा सकता है और अदालत अपने अधिकार-क्षेत्र में रहते हुए आईपीसी की धारा 363 (अपहरण) या धारा 376 (बलात्कार) के मामले को खारिज कर सकती है.''

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