सोमवार, 24 मार्च 2014

लापता विमान के मिलने की उम्मीद कायम









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दुनिया

मलेशिया के प्रधानमंत्री ने कहा है कि दो हफ्ते पहले गायब हुए विमान का सफर दक्षिणी हिन्द महासागर में कहीं पूरा हो गया. लंबे इंतजार के बाद अब यात्रियों के बचे होने की रही सही उम्मीद भी खत्म हो गई है.
सोमवार स्थानीय समय रात 10 बजे की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में मलेशिया के प्रधानमंत्री नजीब रजाक ने कहा, "यह एक दूर दराज की जगह है जहां लैंड करने की कोई संभावना ही नहीं है, इसलिए गहरी वेदना और अफसोस के साथ मुझे आपको यह बताना होगा कि नए डाटा के अनुसार एमएच 370 विमान की यात्रा दक्षिणी हिन्द महासागर में खत्म हो गई."
शोक जताते हुए काला सूट पहने प्रधानमंत्री कुछ ही देर के लिए मीडिया के सामने आए. बगैर वक्त बर्बाद किए उन्होंने कहा कि यात्रियों के परिवारों को सूचित किया जा चुका है. मलेशियन एयरलाइंस ने यात्रियों के परिवारों को संदेश भेज कर कहा है, "हमें मान लेना होगा कि एमएच370 विमान खो चुका है और उस पर सवार कोई भी नहीं बचा."
प्रधानमंत्री का बयान टीवी पर लाइव चला. यात्रियों के रिश्तेदारों को इसके लिए एयरपोर्ट के पास एक होटल में बुलाया गया था. बयान सुनते ही वहां मौजूद लोग भावुक हो उठे. हॉल में लोगों को चीख चीख कर रोते हुए देखा गया. कई लोग खुद को संभाल ना सके और जमीन पर गिर गए. कुछ लोगों को स्ट्रेचर पर उठा कर अस्पताल ले जाया गया. रिश्तेदारों ने वहां मौजूद पत्रकारों से बात करने से इंकार कर दिया और अधिकतर लोगों ने रोते हुए विनती की कि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए.
एमएच370 ने 8 मार्च को कुआलालम्पुर से चीन की राजधानी के लिए उड़ान भरी. विमान पर कुल 239 यात्री सवार थे जिनमें से 150 से ज्यादा चीन के थे.

जारी रहेगी खोज
विमान को ढूंढने के लिए 26 देशों से मदद ली गई है. जर्मनी के जिओमार इंस्टीट्यूट द्वारा बनायी गयी रोबोटिक पनडुब्बी को भी इस काम पर लगाया जा रहा है. 'एबिस' नाम का यह रोबोट 22 घंटे तक समुद्र में रह सकता है. 900 किलो की इस चार मीटर बड़ी पनडुब्बी में कई कैमरे और सेंसर लगे हैं. वहीं फ्रांस भी मलबा खोजने का काम कर रहा है पर उसका कहना है कि खोज का दायरा बहुत ही बड़ा है.
नजीब रजाक का बयान ऐसे वक्त पर आया है जब ऑस्ट्रेलिया की नौसेना ने दावा किया कि उसे सैटेलाइट चित्रों में मलबे जैसा कुछ मिला है. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी अबोट ने बयान दिया कि "सलेटी और हरे रंग के गोल आकार" के कुछ टुकड़े देखे गए हैं और "एक संतरी रंग का चौकोर टुकड़ा" भी.
विमान के ब्लैक बॉक्स की तलाश अभी भी जारी है. विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने से पहले क्या हुआ, यह जानने के लिए ब्लैक बॉक्स का मिलना बेहद जरूरी है क्योंकि उसी में कॉकपिट की बातें रिकॉर्ड होती हैं और विमान की ठीक लोकेशन भी. लेकिन इसकी बैटरी 30 दिन तक ही चलती है और उसके बाद इसमें जमा सारा डाटा गायब हो जाता है.
जांचकर्ताओं का मानना है कि विमान के साथ जानबूझ कर छेड़ छाड़ की गई जिस कारण उसका हर तरह का संपर्क टूट गया. हालांकि अब भी हाइजैक की बात की जा रही है लेकिन जांचकर्ता तकनीकी खराबी की संभावना को भी खारिज नहीं कर रहे हैं.
आईबी/एमजे (रॉयटर्स, एएफपी)

रविवार, 23 मार्च 2014

औलाद पाने का कारोबार:








औलाद पाने का कारोबार: 'निःसंतान हों, तो मिलें…'

 सोमवार, 10 मार्च, 2014 को 07:21 IST तक के समाचार
अख़बार के किसी कोने में, रेलवे लाइन के पास की किसी दीवार पर या किसी बड़े शहरी अस्पताल के बोर्ड पर आपने अक़सर लिखा देखा होगा – ‘निःसंतान हों, तो मिलें…’
मैंने भी देखा है... और हर बार याद किया है उन महिलाओं को जिन्होंने मुझे समझाया कि बच्चा पैदा करने में सक्षम होने के बावजूद वे क्यों निःसंतान रहना चाहती हैं, अपनी ज़िन्दगी अलग तरीके से जीना चाहती हैं.
साथ ही सोचा है उन लाखों औरतों और आदमियों के बारे में, जो अपना बच्चा पैदा नहीं कर सकते. जिनके लिए ये चार शब्द उम्मीद की एक छोटी मगर तेज़ लौ जलाने के लिए काफ़ी हैं.
वो लौ जिसमें फल-फूल रहा है भारत का एआरटी (असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नीक) उद्योग. छोटे-बड़े शहरों में नए और आधुनिक तरीकों से बच्चा पैदा करने के उपाय कर रहे क्लीनिक तेज़ी से बढ़ रहे हैं.
लाखों का ख़र्च और सफलता की दर केवल 30 प्रतिशत. ये कैसे इलाज हैं? इन्हें कौन कर रहा है? करने वालों पर नज़र कौन रख रहा है? करवाने वालों की इच्छा इतनी प्रबल क्यों है? और इस सब में ख़तरा कितना है?
इन सवालों के जवाबों में छिपी हैं दंपति, डॉक्टर, इलाज और क़ानून की कहानी – इन सभी से मिलवाऊंगी मैं आपको अगले चार दिनों में अपनी विशेष रिपोर्ट्स के ज़रिए.
बारह साल पहले, वर्ष 2002 में जब भारत सरकार ने देश में एआरटी (असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेकनीक) उद्योग पर पहला शोध किया तो इसे 250 क्लीनिक वाला 25,000 करोड़ रुपए का व्यवसाय पाया था.
यह शोध स्वास्थ्य मंत्रालय के शोध संस्थान, इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने किया था. एआरटी उद्योग से जुड़ा सारा काम अब इसी संस्थान के ज़िम्मे है.
आईसीएमआर में इस काम के प्रमुख साइंटिस्ट, आर एस शर्मा से मैंने लंबी बातचीत की. उन्होंने बताया कि जब वह इस मुद्दे से पहली बार जुड़े तो अंदाज़ा नहीं था कि यह अरबों रुपए का उद्योग बन जाएगा, “यह उद्योग बहुत तेज़ी से फैल रहा है, हमारा ख़्याल है कि देश में 2,000 से भी ज़्यादा छोटे-बड़े क्लीनिक इनफर्टिलिटी के इलाज कर रहे हैं, इस अनुपात से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उद्योग का व्यवसाय भी कितना बढ़ गया होगा.”

एआरटी (असिसटिड रिप्रोडक्टिव टेकनीक) से - गर्भ धारण करने के आर्टिफिशल यानि कृत्रिम तरीकों को एआरटी कहा जाता है. इनमें आईवीएफ, एग डोनेशन और सरोगेसी समेत कई तरीके शामिल हैं.

क्लीनिक

इस बढ़ती मांग के चलते दुनियाभर में छोटे-बड़े कई क्लीनिक्स में यह इलाज किया जाने लगा है. इनमें से कुछ पर इलाज के लिए सही तरीके इस्तेमाल ना करने के आरोप भी लगते रहे हैं.
भारत में भी ऐसी शिकायतें सामने आने पर आईसीएमआर ने एआरटी क्लीनिक्स और बैंक्स की एक रजिस्ट्री तैयार करने का फ़ैसला किया.
क्लिक करें रजिस्टर्ड क्लीनिक्स की सूची के लिए क्लिक करें
‘नेशनल रजिस्ट्री ऑफ एआरटी क्लीनिक्स एंड बैंक्स इन इंडिया’ की इस सूची में फ़िलहाल सिर्फ़ 192 क्लीनिक्स और सेंटर्स के नाम हैं. आईसीएमआर की वेबसाइट पर उपलब्ध इस सूची पर साफ़ लिखा है कि इसमें किसी सेंटर का नाम होने का मतलब ये नहीं कि उस सेंटर की सुविधाओं को आईसीएमआर ने जांचा है, बल्कि ये सिर्फ जानकारी का कोष है.
हरियाणा के हिसार में बीबीसी की टीम ने जिस आईवीएफ सेंटर का दौरा किया, उसका नाम इस सूची में नहीं है. सेंटर के मुताबिक़ वहां सालाना 1,000 महिलाओं का इलाज होता है.
वहीं आईसीएमआर की इस सूची में शामिल दो सेंटरों में इलाज करवाने वाली महिलाओं की मौत होने के बाद उनके परिजनों ने उन सेंटरों के ख़िलाफ़ इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए क़ानूनी कार्रवाई शुरू की है. ये सेंटर ख़ुद को निर्दोष बताते हैं.
डॉक्टर आर एस शर्मा के मुताबिक़ वह और उनके दो सहयोगियों के काम करने की भी एक सीमा है. उन्होंने कहा, “एक शोध संस्थान के पास इतने साधन नहीं हैं कि वो देश में काम कर रहे 2,000 से ज़्यादा क्लीनिक्स की जांच कर सके. हम यह ख़ाका बनाकर स्वास्थ्य मंत्रालय को देंगे और वो ही फिर जांच के लिए कोई इंतज़ाम करेगा.”
डॉक्टर शर्मा मानते हैं कि क़ानून के अभाव में ज़्यादातर क्लीनिक इस रजिस्ट्री में अपना नाम लिखवाने तक के लिए भी ख़ुद को बाध्य नहीं मानते. यानी अरबों रुपयों का उद्योग, पर निजी क्लीनिक पर कोई क़ानूनी रोक-टोक नहीं.

दिशा-निर्देश

एआरटी का उद्योग बढ़ा तो साथ ही सामने आने लगीं क्लीनिक्स की लापरवाही की शिकायतें और बहस छिड़ी दानकर्ता मां, पैदा होने वाले सरोगेट बच्चे और संतानहीन मां-बाप के हक़ों पर.
आख़िरकार वर्ष 2005 में आईसीएमआर ने एआरटी के तहत होने वाले इलाज के लिए दिशा-निर्देश बनाए. हालांकि इनका पालन क़ानूनी तौर पर अनिवार्य नहीं है और इनका उल्लंघन करने पर किसी व्यक्ति, संस्था या क्लीनिक को सज़ा भी नहीं हो सकती.
क्लिक करें आईसीएमआर के नियमों के लिए क्लिक करें
ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, कोरिया, मेक्सिको, नॉर्वे, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और तुर्की समेत 29 देशों में एआरटी के इलाज के कायदों पर क़ानून बनाया गया है.
अमरीका, पुर्तगाल, पोलैंड और फिनलैंड में क़ानून तो नहीं पर भारत की ही तरह दिशा-निर्देश बनाए गए हैं.
इन दिशा-निर्देशों में इलाज करने वाले क्लीनिक के साज़ो-सामान और इलाज करने के उपकरण, डॉक्टर और नर्स की योग्यता, इलाज की सही तकनीक, मरीज़ के चयन के लिए ज़रूरी टेस्ट और इलाज के ग़लत इस्तेमाल पर चेतावनी दी गई है.
क़ानून के अभाव में फ़िलहाल इस उद्योग में यही दिशा-निर्देश, नियम की तरह काम करते हैं. स्वास्थ्य क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ताओं के मुताबिक़ ये नाकाफ़ी हैं. पिछले आठ साल से एआरटी पर शोध और चर्चा कर रही संस्था ‘समा’ के दफ़्तर में मैं मिली सरोजिनी से.

सरोजिनी की संस्था 'समा' ने आईसीएमआर के प्रस्तावित विधेयक में कमियों पर विस्तृत रिपोर्ट संस्थान को भेजी है.
सरोजिनी ने कहा, “पहले तो दिशा-निर्देशों की कोई क़ानूनी मान्यता नहीं है, और दूसरा वो कई मुद्दों पर साफ़ जानकारी नहीं देते. मसलन अंडों का दान करने वाली महिला की न्यूनतम उम्र निर्देशों के एक हिस्से में 18 साल है और दूसरे हिस्से में 21 साल.”
सरोजिनी के मुताबिक़ दिशा-निर्देश दान करने वाली महिला या सरोगेट महिला की सेहत को केन्द्र में रखकर नहीं बनाए गए बल्कि इन सेवाओं को ख़रीदने वाले दंपति और इलाज करने वाले क्लीनिक्स के हितों के लिए बनाए गए हैं.

क़ानून

इन्हीं सरोकारों को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2010 में आईसीएमआर ने एआरटी के तहत होने वाले इलाज के लिए विधेयक भी बनाया – द असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नॉलॉजीज़ (रेग्यूलेशन) बिल 2010.
क्लिक करें बिल पड़ने के लिए क्लिक करें
इस विधेयक में एआरटी के इलाज से जुड़े क़ायदों के उल्लंघन पर क्लीनिक के ख़िलाफ़ शिकायत करने के तरीके का उल्लेख और तीन से पांच साल की सज़ा का प्रावधान भी किया गया है.
साथ ही मरीज़, अंडा दान करने वाली महिला या शुक्राणु दान करने वाले पुरुष, सरोगेट मां और सरोगेसी से पैदा हुए बच्चों के अधिकारों की भी जानकारी दी गई है. पर चार साल पहले बनाया गया यह बिल अभी तक संसद में पेश नहीं हुआ है.
आईवीएफ की तकनीक से भारत में पहला बच्चा, हर्ष, अगस्त 1986 में मुंबई में पैदा हुआ था.
1988 में विश्व स्वास्थ्य संस्था (डब्ल्यूएचओ) के एक शोध के मुताबिक़ भारत में करीब सवा करोड़ से दो करोड़ दंपति बच्चे पैदा करने में असमर्थ थे.
ज़्यादातर दंपति इन्फेक्शन, टीबी या अन्य बीमारियों के इलाज के उपचार के बाद बच्चे पैदा करने में समर्थ होते हैं, लेकिन आईसीएमआर के मुताबिक़ क़रीब आठ प्रतिशत (10 लाख से 16 लाख के बीच) को एआरटी जैसे अति-आधुनिक इलाज की ज़रूरत होती है.
साल 1988 में अनुमानित लाखों संतानहीन दंपतियों का यह आंकड़ा अब करोड़ की रेखा लांघ गया हो, तो अचम्भा नहीं होगा.
सरोजिनी के मुताबिक ज़रूरत है इन संतानहीन दंपतियों के इलाज की, पर जब तक उस दिशा में नए रास्ते सामने नहीं आते और अपना बच्चा होने की चाह रखनेवाले ये लोग एआरटी पर निर्भर हैं, तब तक एक स्पष्ट क़ानून के बनने की ज़रूरत ज़ोर पकड़ती रहेगी.
एआरटी उद्योग पर हमारी विशेष रिपोर्ट्स की कड़ी में आगे आप पढ़ेंगे ऐसी महिला के बारे में जो ऐसे ही एक इलाज के बाद अपनी जान गंवा बैठी.
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1962 का चीन युद्ध: विश्वासघात या कायरता : इंदर मल्होत्रा




इंदर मल्होत्रा
इंदर मल्होत्रा
वरिष्ठ पत्रकार
 गुरुवार, 18 अक्तूबर, 2012 को 17

चीन युद्ध में मिली हार के सदमे से नेहरू कभी उबर नहीं पाए
कोई भी व्यक्ति, जो मेरी तरह हिमालय की ऊँचाइयों में चीन के साथ अल्पकालिक लेकिन कटु सीमा युद्ध का साक्षी है, वो आधी सदी के बाद भी सदमा भूला नहीं है. इस युद्ध में भारत की सैन्य पराजय हुई थी और वो राजनीतिक विफलता भी थी.
इस युद्ध के इतिहास को इतनी बारीकी से लिखा गया है कि उस ज़मीन पर दोबारा चलने की आवश्यकता नहीं, जिस पर इतनी अच्छी तरह से काम हुआ है.
ये कहना पर्याप्त होगा जैसा जवाहर लाल नेहरू के आधिकारिक आत्मकथा लिखने वाले एस गोपाल ने लिखा था- चीज़ें इतनी बुरी तरह ग़लत हुईं कि अगर ऐसा वाक़ई में नहीं होता, तो उन पर यक़ीन करना मुश्किल होता.
लेकिन ये ग़लत चीज़ें इतनी हुईं कि भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने अपनी सरकार पर गंभीर आरोप तक लगा दिए. उन्होंने चीन पर आसानी से विश्वास करने और वास्तविकताओं की अनदेखी के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया.

ग़लती

"बीएम कौल पहले दर्जे के सैनिक नौकरशाह थे. साथ ही वे गजब के जोश के कारण भी जाने जाते थे, जो उनकी महत्वाकांक्षा के कारण और बढ़ गया था. लेकिन उन्हें युद्ध का कोई अनुभव नहीं था."
जवाहर लाल नेहरू ने भी ख़ुद संसद में खेदपूर्वक कहा था, "हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए थे और हम एक बनावटी माहौल में रह रहे थे, जिसे हमने ही तैयार किया था."
इस तरह उन्होंने इस बात को लगभग स्वीकार कर लिया था कि उन्होंने ये भरोसा करने में बड़ी ग़लती की कि चीन सीमा पर झड़पों, गश्ती दल के स्तर पर मुठभेड़ और तू-तू मैं-मैं से ज़्यादा कुछ नहीं करेगा.
हालाँकि चीन के साथ लगातार चल रहा संघर्ष नवंबर 1959 के शुरू में हिंसक हो गया था, जब लद्दाख के कोंगकाला में पहली बार चीन ने ख़ून बहाया था.
इसके बाद ग़लतियाँ होती गईं. इसके लिए हमारे प्रतिष्ठित प्रधानमंत्री को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.
लेकिन उनके सलाहकार, अधिकारी और सेना भी बराबर के दोषी हैं, क्योंकि इनमें से किसी ने भी नेहरू से ये कहने की हिम्मत नहीं दिखाई कि वे ग़लत थे.
उनका बहाना वही पुराना था यानी नेहरू सबसे बेहतर जानते थे. चीन के एकतरफ़ा युद्धविराम के बाद सेना प्रमुख बने जनरल जेएन 'मुच्छू' चौधरी का विचार था- हमने ये सोचा थे कि हम चीनी शतरंज खेल रहे हैं, लेकिन वो रूसी रोले निकला.

ज़िम्मेदार लोग

कौल, मेनन और नेहरू
चीन के साथ युद्ध में चौथी कोर के कमांडर बीजी कौल, तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्णमेनन और जवाहरलाल नेहरू की भूमिका पर सवाल उठते हैं
जिन लोगों को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, उनकी सूची काफ़ी लंबी है. लेकिन शीर्ष पर जो दो नाम होने चाहिए, उनमें पहले हैं कृष्ण मेनन, जो 1957 से ही रक्षा मंत्री थे.
दूसरा नाम लेफ़्टिनेंट जनरल बीएम कौल का है, जिन पर कृष्ण मेनन की छत्रछाया थी. लेफ़्टिनेंट जनरल बीएम कौल को पूर्वोत्तर के पूरे युद्धक्षेत्र का कमांडर बनाया गया था. उस समय वो पूर्वोत्तर फ्रंटियर कहलाता था और अब इसे अरुणाचल प्रदेश कहा जाता है.
बीएम कौल पहले दर्जे के सैनिक नौकरशाह थे. साथ ही वे गजब के जोश के कारण भी जाने जाते थे, जो उनकी महत्वाकांक्षा के कारण और बढ़ गया था. लेकिन उन्हें युद्ध का कोई अनुभव नहीं था.
ऐसी ग़लत नियुक्ति कृष्ण मेनन के कारण संभव हो पाई. प्रधानमंत्री की अंध श्रद्धा के कारण वे जो भी चाहते थे, वो करने के लिए स्वतंत्र थे.
एक प्रतिभाशाली और चिड़चिड़े व्यक्ति के रूप में उन्हें सेना प्रमुखों को उनके जूनियरों के सामने अपमान करते मज़ा आता था. वे सैनिक नियुक्तियों और प्रोमोशंस में अपने चहेतों पर काफ़ी मेहरबान रहते थे.
निश्चित रूप से इन्हीं वजहों से एक अड़ियल मंत्री और चर्चित सेना प्रमुख जनरल केएस थिमैया के बीच बड़ी बकझक हुई. मामले ने इतना तूल पकड़ा कि उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन उन्हें अपना इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए मना लिया गया.
लेकिन उसके बाद सेना वास्तविक रूप में मेनन की अर्दली बन गई. उन्होंने कौल को युद्ध कमांडर बनाने की अपनी नादानी को अपनी असाधारण सनक से और जटिल बना दिया.
हिमालय की ऊँचाइयों पर कौल गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और उन्हें दिल्ली लाया गया. मेनन ने आदेश दिया कि वे अपनी कमान बरकरार रखेंगे और दिल्ली के मोतीलाल नेहरू मार्ग के अपने घर से वे युद्ध का संचालन करेंगे.

टकराव से डर

"19 नवंबर को दिल्ली आए अमरीकी सीनेटरों के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से मुलाकात की. इनमें से एक ने ये पूछा कि क्या जनरल कौल को बंदी बना लिया गया है. इस पर राष्ट्रपति राधाकृष्णन का जवाब था- दुर्भाग्य से ये सच नहीं है."
सेना प्रमुख जनरल पीएन थापर इसके पूरी तरह खिलाफ थे, लेकिन वे मेनन से टकराव का रास्ता मोल लेने से डरते थे. ये जानते हुए कि कौल स्पष्ट रूप से कई मामलों में ग़लत थे, जनरल थापर उनके फ़ैसले को बदलने के लिए भी तैयार नहीं रहते थे.
इन परिस्थितियों में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि नेहरू के 19 नवंबर को राष्ट्रपति कैनेडी को लिखे उन भावनात्मक पत्रों से काफी पहले मेनन और कौल पूरे देश में नफरत के पात्र बन चुके थे.
इसका नतीजा स्पष्ट था. कांग्रेस पार्टी के ज़्यादातर लोगों और संसद ने अपना ज़्यादा समय और ऊर्जा आक्रमणकारियों को भगाने की बजाए मेनन को रक्षा मंत्रालय से हटाने में लगाया.
नेहरू पर काफ़ी दबाव पड़ा और उन्होंने मेनन को सात नवंबर को हटा दिया. कौल के मामले में राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने जैसे सब कुछ कह दिया.
19 नवंबर को दिल्ली आए अमरीकी सीनेटरों के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से मुलाकात की. इनमें से एक ने ये पूछा कि क्या जनरल कौल को बंदी बना लिया गया है. इस पर राष्ट्रपति राधाकृष्णन का जवाब था- दुर्भाग्य से ये सच नहीं है.
राष्ट्रीय सुरक्षा पर फ़ैसला लेना इतना अव्यवस्थित था कि मेनन और कौल के अलावा सिर्फ़ तीन लोग विदेश सचिव एमजे देसाई, ख़ुफ़िया ज़ार बीएन मलिक और रक्षा मंत्रालय के शक्तिशाली संयुक्त सचिव एचसी सरीन की नीति बनाने में चलती थी.

ख़ुफिया प्रमुख की नाकामी

"आख़िर में माओ ने भारत में वो हासिल कर लिया, जो वो चाहते थे. वो ख्रुश्चेव को कैरेबियन में कायरता और हिमालय में विश्वासघात के लिए ताना भी मार सकते थे."
इनमें से सभी मेनन के सहायक थे. मलिक की भूमिका बड़ी थी. मलिक नीतियाँ बनाने में अव्यवस्था फैलाते थे, जो एक खुफिया प्रमुख का काम नहीं था.
अगर मलिक अपने काम पर ध्यान देते और ये पता लगाते कि चीन वास्तव में क्या कर रहा है, तो हम उस शर्मनाक और अपमानजनक स्थिति से बच सकते थे.
लेकिन इसके लिए उन्हें चीन की रणनीतियों का पता लगाना होता. लेकिन भारत पूरी तरह संतुष्ट था कि चीन की ओर से कोई बड़ा हमला नहीं होगा.
लेकिन माओ, उनके शीर्ष सैनिक और राजनीतिक सलाहकार सतर्कतापूर्वक ये योजना बनाने में व्यस्त थे कि कैसे भारत के ख़िलाफ़ सावधानीपूर्वक प्रहार किया जाए, जो उन्होंने किया भी.
नेहरू ने ये सोचा था कि भारत-चीन संघर्ष के पीछे चीन-सोवियत फूट महत्वपूर्ण था और इससे चीन थोड़ा भयभीत रहेगा.

कायरता या विश्वासघात

भारतीय सैनिक
भारतीय सैनिकों को चीन के हाथों मुँह की खानी पड़ी
लेकिन हम ये नहीं जानते थे कि क्यूबा के मिसाइल संकट की जानकारी का कुशलतापूर्वक इस्तेमाल करते हुए नेहरू को सबक सिखाने का माओ का संदेश निकिता ख्रुश्चेव के लिए भी था. और इसी कारण सोवियत नेता ने संयम बरता.
भारत को इस मिसाइल संकट के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. 25 अक्तूबर को रूसी समाचार पत्र प्रावदा ने ये कह दिया कि चीन हमारा भाई है और भारतीय हमारे दोस्त हैं. इससे भारतीय कैंप में निराशा की लहर दौड़ गई.
प्रावदा ने ये भी सलाह दी कि भारत को व्यावहारिक रूप से चीन की शर्तों पर चीन से बात करनी चाहिए. ये अलग बात है कि क्यूबा संकट का समाधान क़रीब आते ही रूस अपनी पुरानी नीति पर आ गया.
लेकिन माओ ने आक्रमण का समय इस हिसाब से ही तय किया था. आख़िर में माओ ने भारत में वो हासिल कर लिया, जो वो चाहते थे. वो ख्रुश्चेव को कैरेबियन में कायरता और हिमालय में विश्वासघात के लिए ताना भी मार सकते थे.

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इस हौसले को सलाम




बलात्कार से नहीं हारी 'ब्रेव मिस वर्ल्ड'

1998 में इस्राएल की लीनोर अबार्गील को विश्व सुंदरी का ताज पहनाया गया. तब कम ही लोग जानते थे कि 18 साल की लीनोर के साथ कुछ हफ्ते पहले बलात्कार हुआ था. आज उनकी कहानी 'ब्रेव मिस वर्ल्ड' बलात्कार पीड़ितों को हौसला दे रही है.
अबार्गील ने इस हादसे के बाद अपने सपनों से मुंह चुराने के बजाय हालात को चुनौती दी. इस बात को बिना किसी झिझक वह दुनिया के सामने लाईं और अदालत में आरोपी का डट कर मुकाबला किया. अबार्गील की जीत हुई और अपराधी को 16 साल की सजा मिली. इस घटना से इस्राएल की और महिलाओं को भी हिम्मत मिली और उन्होंने अपने साथ हो रहे यौन अपराधों के खिलाफ आवाज उठाना शुरू किया. बलात्कार जैसे मामलों में मुंह खोलने से पहले जहां पहले औरतें झिझकती थीं, वहीं अब वे इसे अपना अधिकार मान रही हैं.
सबसे बड़ा मरहम
34 साल की अबार्गील का यह अभियान आज अंतरराष्ट्रीय रूप ले चुका है. उनके जीवन पर आधारित डॉक्यूमेंटरी फिल्म 'ब्रेव मिस वर्ल्ड' के जरिए और दुनिया भर में यात्रा कर वह बलात्कार पीड़ित महिलाओं की मदद करने की कोशिश कर रही हैं.
वह कहती हैं, "जब आप किसी बहुत मुश्किल समय से गुजरते हैं तो जो एकमात्र दवा है, वह है कि आप इसके बारे में किसी को बता सकें. क्योंकि अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो यह ट्यूमर की तरह अंदर ही अंदर बड़ा होता जाता है और आपको मार डालता है." वह अपने आपको खुशकिस्मत मानती हैं कि वह लोगों को अपनी बात सुनाने का मौका दे पा रही हैं.
अबार्गील पर आधारित निर्देशक सेसीलिया पेक की डॉक्यूमेंट्री 'ब्रेव मिस वर्ल्ड' में उनके जीवन को उकेरा गया है. पहले अबार्गील की किशोरावस्था, फिर बलात्कार पीड़ित के रूप में उनकी मानसिक स्थिति और फिर बेबाक सामाजिक कार्यकर्ता बनने का सफर फिल्म में दर्शाया गया है. डॉक्यूमेंट्री में उनके निजी जीवन को भी दिखाया गया है जिसमें वह एक पत्नी और मां की भूमिका निभा रही हैं. पेक ने बताया, "लिनोर के बारे में कुछ तो है जो बलात्कार पीड़ितों को उनपर विश्वास दिलाता है. उन्हें लगता है कि उनपर विश्वास किया जा सकता है और उनके सिर से शर्मिंदगी का भार कम होता है."
छह में से एक शिकार
अमेरिका में बलात्कार और घरेलू हिंसा के खिलाफ काम करने वाली संस्था 'रेप अब्यूज एंड इंसेंट नेशनल नेट्वर्क' के अनुसार, अमेरिका में हर छह में से एक महिला के साथ बलात्कार हुआ है या कोशिश की गई है. इनमें से 60 फीसदी मामलों की पुलिस में रिपोर्ट नहीं की जाती. इस्राएल के आंकड़े भी काफी कुछ मिलते जुलते हैं जबकि विकासशील देशों में यह और भी ज्यादा है. पेक ने बताया कि फिल्म की वेबसाइट यौन पीड़ितों के लिए खास अहमियत रखती है. तीन लाख से ज्यादा लोग वेबसाइट पर आ चुके हैं. वह बताती हैं कि हर रोज उन्हें इससे संबंधित सैकड़ों ईमेल मिलते हैं.
अबार्गील का कहना है कि उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि वह इंसाफ सिर्फ अकेले खुद के लिए नहीं चाहती थीं. उन्होंने इसे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी की तरह महसूस किया. वह चाहती हैं कि लोग इस तरह की वर्जनाओं को तोड़ें और पीड़ितों को इस बारे में खुलकर बात करने की हिम्मत मिले, "यह मेरे लिए बेहद मुश्किल काम है. कई बार तो लोगों की इन कहानियां सुनने के बाद मैं निःशब्द हो जाती हूं."

और अब पानी के लिए होगा युद्ध




पानी के लिए लड़ेगी दुनिया

विकासशील देशों की बढ़ती जनसंख्या और अर्थव्यवस्थाएं आने वाले समय में दुनिया के सामने कई संकट खड़े कर सकती है. संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि पानी और ऊर्जा की बढ़ती जरूरतें सीमित संसाधनों पर दोगुनी मार लगाएंगीं.
22 मार्च को पूरी दुनिया में 'विश्व जल दिवस' के रूप में मनाया जाता है. इसके ठीक पहले जारी हुई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि साफ पानी और बिजली का आपस में बहुत गहरा संबंध है जो कि आने वाली सदियों में धरती के सीमित संसाधनों पर बहुत भारी बोझ डाल सकता है. रिपोर्ट में लिखा है, "बदलती जीवनशैलियों और उपभोग के बढ़ते चलन से मौजूदा सीमित प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी पर दबाव बहुत बढ़ जाएगा."
वर्तमान स्थिति अपने आप में चिंतित करने वाली है. करीब 77 करोड़ लोगों के पास एक सुरक्षित, भरोसेमंद पानी का स्रोत नहीं है. ऐसे करीब 250 करोड़ लोग हैं जिनके पास पक्के शौचालयों की सुविधा नहीं है. इसके अलावा 130 करोड़ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें बिजली नहीं मिलती. विश्व मौसम संगठन के महानिदेशक मिषेल यारुद ने टोक्यो के संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय में बात करते हुए बताया, "पानी, सफाई व्यवस्था और वहनीय ऊर्जा का लोगों तक ना पहुंचना, गरीबी को और बढ़ाने वाला कारक बन रहा है." यारुद आगे कहते हैं कि इस स्थिति से निपटने के लिए हमें बेहतर नीतियां और नई रणनीतियां अपनानी होंगी.
पानी की भारी बर्बादी
यूएन की रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्व में करीब बीस फीसदी जलीय चट्टानी पर्तें खत्म हो चुकी है. दुनिया भर के कुल पानी का करीब दो तिहाई सिर्फ कृषि में इस्तेमाल होता है. खेती, खाना पकाने और कपड़े धोने जैसे कामों के अलावा ऊर्जा उत्पादन में ताजे पानी की काफी जरूरत होती है. ऊर्जा उत्पादन की करीब 90 फीसदी तकनीकें पानी की भारी बर्बादी करती है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2050 तक विश्व भर में पानी की मांग करीब 55 प्रतिशत बढ़ जाएगी. इसके अलावा यह भी संभावना है कि दुनिया की 40 फीसदी से ज्यादा आबादी पानी की भारी कमी वाले इलाकों में रह रही होगी. स्थिति के इतना बिगड़ने की संभावना है कि पानी को लेकर लड़ाइयां होंगी, खासकर एशिया में. कजाखस्तान के दक्षिण में स्थित एरल सी और गंगा-ब्रह्मपुत्र नदियों, सिंधु नदी और मिकांग नदी की तलहटी में यह समस्या और बड़ी होगी.
सौर और पवन ऊर्जा की तरह अक्षय ऊर्जा के स्रोत बहुत कम पानी का इस्तेमाल करते हैं. 2011 में इन ऊर्जा स्रोतों से विश्व की कुल बिजली की जरूरतों का करीब पांचवा हिस्सा पूरा किया गया. रिपोर्ट में बताया गया है कि इस ऊर्जा को तब तक बढ़ावा नहीं मिल सकता, जब तक खनिज पदार्थों को भारी सब्सिडियां मिलती रहेगी. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार 2010 से 2011 में, अक्षय ऊर्जा के स्रोतों के मुकाबले तेल, गैस और कोयले जैसे खनिज पदार्थों को करीब 30 फीसदी ज्यादा सब्सिडी मिली. रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया है कि विश्व में अरबों, खरबों की धनराशि को समझदारी के साथ पानी और ऊर्जा के उपयोगी ढ़ांचे खड़े करने के लिए इस्तेमाल करने की सख्त जरूरत है.

करमापा का मिशन 'दलाई इम्पायर'!




भूपेश कुमार


Tuesday , February 01, 2011 at 18 : 26

0IBNKhabar

भौगौलिक नजरिए से देखें तो धर्मशाला और ल्हासा के बीच मीलों का फासला है लेकिन कहने वाले इसे मिनी ल्हासा कहते हैं। दिल्ली और ल्हासा के दिल कुछ 50 साल पहले तब मिले जब एक भिक्षुक ने कहा कि \'भारत संघम शरणम गच्छामि\'! बीजिंग और दिल्ली के बीच न तो दिलों के फासले कम हो पाए हैं और न ही भूगोल के और जब दिल में कहीं कसक हो तो हर घटना में साजिश का दिखना लाजमी है। तो फिर क्या था 11 लाख की बेहद मामूली मुद्रा ने भी बवाल खड़ा कर दिया क्योंकि ये युआन थे। युआन यानी चीन की मुद्रा। चीन का नाम जिस चीज के साथ जुड़ता है वो अपने आप में शक के घेरे में आ जाती है, यहां तो साथ में तिब्बत भी जुड़ गया। युआन और तिब्बत! जिस युआन को तिब्बत में रहने वाले लोग भी मजबूरी समझकर रखते हैं वही युआन अगर उन लोगों के पास से मिले जो तिब्बत से इसलिए भागे थे क्योंकि उन्हें चीन की आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक गुलामी मंजूर न थी तो सवाल के लिए जगह तो बनती है। किसी आम तिब्बती की बात होती तो तस्करी या फिर अवैध तरीके से विदेशी मुद्रा रखने का मामला समझकर कार्रवाई की जा सकती थी लेकिन बरामदगी जब एक ऐसे मठ से हो जिसका नियंत्रण तिब्बति बौद्ध धर्म के नंबर तीन के पास हो तो हलचल नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में होती है और राडार हिमालय के उस पार झांकने की कोशिश करता है।
कुछ साल पहले सिक्किम के रुमटेक मठ में प्रवास के दौरान 16वें करमापा रंगजुंग रिग्पे दोर्जे ने भी हिमालय के पार पश्चिमी तिब्बत में फिर से जन्म लेने की बात कही थी। एक लंबी खोज के बाद 1992 में बोकार गांव में अपो गागा नाम के 8 साल के बच्चे को खोजा गया और कहा गया कि ये वही शख्स है जो 17वें करमापा के रूप में काग्यु संप्रदाय का नेतृत्व करेंगे और उन्हें उग्येन त्रिनले दोर्जे के नाम से जाना जाएगा। उधर चीन ने अपने पारंपारिक रुख को दरकिनार करते हुए इस नाम को स्वीकार किया और इधर दलाई लामा ने भी अपनी सहमति की मुहर लगा ली। चीन का ये बदला हुआ रुख भी संदेह के घेरे में रहा।
दरअसल तिब्बत में लाल कदम पड़ते ही तिब्बती बौद्ध धर्म को हान और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की परंपराओं के मुताबिक ढालने की कोशिशें शुरू हो गई थीं। इसी से तंग आकर तिब्बती धार्मिक नेताओं ने भारत का रुख किया था। सबसे पहले दलाई लामा आए जो उस वक्त तिब्बत के राष्ट्रप्रमुख थे और तिब्बति बौद्ध धर्म के नंबर एक। तीसरे नंबर के धार्मिक नेता 16वें करमापा रंगजुंग रिग्पे दोर्जे ने भी दलाई लामा की तरह भुटान की राह पकड़ी। लेकिन दूसरे नंबर के धार्मिक नेता 10वें पंचेन लामा चोइक्यी ग्याल्त्सेन ने वहीं पर रुकने का फैसला किया। कहा जाता है कि चीनी सरकार ने सत्ता के मोहपाश में उन्हें फांस लिया था। यही वजह थी कि उन्हें चीन की नेशनल पीपल्स कांग्रेस का वाइस चेयरमैन बनाया गया। चीनी नीतियां लंबे समय तक रास आतीं ऐसा मुमकिन नहीं था तो उन्होंने विरोध का झंडा बुलंद करने की कोशिश की लेकिन दमन का डंडा चला और उन्हें बीजिंग में करीब 10 साल तक जेल की हवा खानी पड़ी। दमन के सामने नतमस्तक 1982 में स्वदेश लौटे और 7 साल बाद 1989 में शरीर त्याग दिया। अब तिब्बत में कोई भी बड़ा धर्म गुरु नहीं बचा था। 16 वें करमापा लामा भी 1981 में दुनिया छोड़ चुके थे। इधर दलाई लामा के नेतृत्व में प्रवासी तिब्बतियों ने चीन के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था तो उधर अमेरिका पश्चिमी देशों के साथ मिलकर तिब्बत में मानवाधिकारों के हनन को मुद्दा बनाकर चीन के शासन की वैधता को चुनौती दे रहा था। तिब्बती राष्ट्रवाद धर्म पर टिका था। चीन को भी ये एहसास था कि अगर तिब्बतियों के बीच अपनी मान्यता को पुख्ता करना है तो भौगौलिक तिब्बत की बजाय धार्मिक तिब्बत पर कब्जा करना होगा। अब तिब्बती बौद्ध धर्म के शीर्ष तीन स्थानों में से दो स्थान खाली थे। ऐसे में काग्यु संप्रदाय ने जब त्रिनले उग्येन दोर्जे को 17वें करमापा के रूप में ल्हासा के सुरपु मठ में बिठाया तो चीन ने भी इस आसरे उन पर डोरे डालने शुरू किए कि एक दिन 8 साल का ये धर्मगुरु तिब्बतियों के बीच चीन के एजेंट के रूप में काम करेगा! उधऱ पंचेन लामा के मामले में दलाई लामा के चुने गोधुन चोयिकी न्यिमा को चीन ने अस्वीकार कर लिया और उसे किसी अज्ञात ठिकाने में नजरबंद कर ग्यैनकैन नोरबू को 11 वां पंचेन लामा घोषित कर लिया। चीनी पंचेन लामा की तिब्बती समाज में ज्यादा पहुंच नहीं बन पाई। ऐसे में जनवरी 2000 में करमापा भी लाल सेना को चकमा देकर धर्मशाला पहुंचे। चीन की तमाम धमकियों के बावजूद तात्कालिक वाजपेयी सरकार ने शुरुआती ना नुकुर के बाद उन्हें शरण दे दी। करमापा को कायदे से सिक्किम के रुमटेक मठ में बैठना चाहिए था लेकिन उग्येन त्रिनले को धर्मशाला की ग्युतो तांत्रिक युनिवर्सिटी में बैठाया गया। वजह 17वें करमापा पर उठा विवाद।
तिब्बति बौद्ध धर्म के 4 संप्रदायों में से एक काग्यु संप्रदाय के 4 गुरुओं में से दो ने उग्येन त्रिनले को 17वां करमापा माना था और 1 की मौत हो गई थी जबकि संप्रदाय के नंबर दो शरमापा कुंजिग शमार रिंपोछे ने थिनले थाये दोर्जे को 17वां करमापा घोषित कर दिया। थाये पश्चिम बंगाल के कलिंगपोंग मठ में रह रहे हैं। और तिब्बति समुदाय में उनकी भी अच्छी खासी पैठ है। इतना ही नहीं एक और शख्स दावा सांग्पो दोर्जे भी 17वां करमापा होने का दावा करता है। लेकिन दलाई लामा की स्वीकृति त्रिनले को सर्वमान्य बनाती है और शायद यहीं से नौजवान त्रिनले की महत्वकांक्षा का जन्म होता है।
त्रिनले और उनके सिपहसालारों को अच्छी तरह पता है कि तिब्बती बुद्धिज्म एक ब्रांड बन चुका है जिसके एंबेसेडर दलाई लामा हैं। ये न सिर्फ 29 लाख तिब्बत वासियों और करीब डेढ़ लाख निर्वासित तिब्बतियों का धर्म है बल्कि यूरोप, एशिया और अमेरिका के एक अच्छे खासे तबके के जीवन का हिस्सा बन चुका है। सामाजिक स्तर के पहले पायदान पर आने वाला वर्ग इससे ज्यादा प्रभावित है फिर वो चाहे फिल्मस्टार हों, उद्योगपति हों, ब्यूरोक्रेट्स हों या फिर नेता। दलाई लामा जहां भी जाते हैं उनको सुनने के लिए मजमा लग जाता है। 2003 में तो लंदन के सेंट्रल पार्क में करीब 65 हजार लोग उनको सुनने के लिए इकट्ठा हुए। किसी दूसरे धर्म के गुरु को सुनने के लिए इतनी संख्या में लोगों का आना अपने आप में एक आश्चर्य है। प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन ने कहा कि वो दुनिया के 100 सबसे शक्तिशाली इंसानों में से एक हैं और ईसाई बाहुल्य जर्मनी में करीब 40 फीसदी लोग उन्हें पोप और नेल्सन मंडेला से भी ऊपर मानते हैं। अपने पिछले अमेरिकी दौरे में लोगों ने उनके तीन दिन के प्रवचनों के लिए 400 डॉलर के टिकेट खुशी-खुशी खरीदे। इसके अलावा तिब्बत के रिफ्युजियों के नाम पर अकेले अमेरिका का विदेश विभाग करीब 16 करोड़ रुपए की वार्षिक मदद देता है। दूसरे देशों से भी अलग-अलग मात्रा में आर्थिक मदद आती है। साफ है कि दलाई लामा ने धर्म के नाम पर एक सम्राज्य खड़ा कर दिया है लेकिन सम्राट अब 76 साल का हो चुका है। तमाम दुनिया की तरह दलाई लामा को भी पता है कि अब इस शरीर से विदा लेने का वक्त कभी भी आ सकता है। इसलिए उनके द्वारा खड़े किए गए इस \'दलाई इम्पायर\'- जो भौगौलिक सीमाओं से परे है- को संभालने के लिए एक काबिल उत्तराधिकारी की जरूरत है।
पिछले कुछ वक्त से उत्तराधिकार की ये कशमकश बीजिंग से लेकर धर्मशाला तक जारी है। चीन ल्हासा के पोटाला पैलेस में अपनी पसंद का दलाई लामा बिठाना चाहता है तो यही बात दलाई लामा के लिए चिंता का सबब बनी हुई है। तभी तो कयासों का बाजार गर्म है। कभी किसी औरत के अगला दलाई लामा बनाने का किस्सा उछलता है तो कभी मौजूदा करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे को चुपचाप बैटेन थमाने का कयास जोर पकड़ता है। उतराधिकार की इस जंग का एहसास त्रिनले को अच्छी तरह है और वो ये भी बखूबी जानते हैं कि वो दलाई लामा की तरह सर्वमान्य नहीं हो सकते। इसलिए एक तरफ जहां वो अपने ही कुनबे की चुनौतियों से निबटने की तैयारी कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर चीन पर भी उनकी नजर है। अपने मिशन को अंजाम तक पहुंचाने के लिए उनको विदेशों में फैले अनुयायियों तक पहुंचना होगा। ऐसा करने के लिए आध्यात्म के साथ-साथ मुद्रा की जरूरत भी पड़ेगी और यही वो कर भी रहे हैं। कहने वाले कहते हैं कि वो चीन के जासूस हैं और दलाई लामा के चीन विरोधी अभियान को पटरी से उतारने के लिए चीन ने बड़ी चालाकी से उन्हें खुद भारत भेजा था। इतना ही नहीं धर्मशाला और मैकलोडगंज के 4-5 मठों में से ज्यादातर का निर्माण चीनी मदद से होने का आरोप लगता रहा है। जासूसी का तर्क थोड़ा समझ से परे है क्योंकि करमापा को इतना पता है कि दलाई लामा की पीठ में छुरा घोंपकर वो दलाई इम्पायर का भरोसा नहीं जीत सकते। इस अनूठे सम्राज्य में वो उनके जूते में पैर डालकर ही घुस सकते हैं और फिर करीब 7 करोड़ की विदेशी मुद्रा की बरामदगी के तार सिर्फ जासूसी से ही क्यों जोड़े जाए? ये भी तो हो सकता है कि वो दलाई लामा की बरसों पुरानी अहिंसा की नीति को छोड़कर दम तोड़ रहे तिब्बति राष्ट्रवाद में हिंसा का तड़का लगाकर अपने लिए एक अलग मुकाम बनाने की कोशिश कर रहे हों?

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

ग्लोबल इंडिया के पीछे के चेहरे? / रूपा झा



 गुरुवार, 1 नवंबर, 2012 को 09:13 IST तक के समाचार
टेलिविज़न कार्यक्रम क्लिक करें ‘ग्लोबल इंडिया’ के साथ शुक्रवार से बीबीसी हिन्दी के पत्रकारिता के सफर में एक नई शुरुआत होगी.
भारत के ईटीवी नेटवर्क पर दिखाए जाने वाले इस साप्ताहिक कार्यक्रम की पहली कड़ी दो नवंबर की शाम टेलिविज़न पर प्रसारित होगी.
क्लिक करें ‘ग्लोबल इंडिया’ पर काम कर पत्रकारों की टीम लंदन में स्थित है, और उन सभी की कोशिश है कि इस कार्यक्रम में समसामयिक खबरों से लेकर संस्कृति, तकनीक, स्वास्थ्य, कला जगत और आम लोगों से जुड़े विषयों पर रिपोर्ट्स का समागम हो.
आइए ‘ग्लोबल इंडिया’ की टीम के चेहरों को पहचानें, जिनसे आप कई बार बीबीसी रेडियो या वेबसाइट के माध्यम से रूबरू हुए होंगे.

रूपा झा

रूपा झा
रूपा झा ‘ग्लोबल इंडिया’ की प्रमुख प्रस्तुतकर्ता है. बीबीसी हिंदी से लगभग दस साल से जुड़ीं रूपा ने इस दौरान संपादक, प्रोड्यूसर, प्रस्तुतकर्ता और रिपोर्टर की ज़िम्मेदारी निभाई है.
वे बीबीसी हिंदी रेडियो और वेबसाईट पर काम करने के साथ-साथ बीबीसी की अंग्रेजी सेवाओं में भी अपना योगदान देती रही हैं. उन्होंने भारत, ब्रिटेन, नाईजीरिया, भूटान, नेपाल और पाकिस्तान से रिपोर्टिंग का काम किया है.
रूपा को पत्रकारिता के लिए संयुक्त राष्ट्र का मीडिया अवार्ड और एशिया पसेफिक ब्रॉडकॉस्टिंग यूनियन अवार्ड से भी नवाज़ा गया है.
रूपा झा शास्त्रीय नृत्य कत्थक में रूचि रखती हैं और इन्होंने कई राष्ट्रीय, अतंरराष्ट्रीय नृत्य समारोहों में शिरकत की है.

राजेश प्रियदर्शी

राजेश प्रियदर्षी
पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता कर रहे राजेश वर्ष 1997 में बीबीसी हिंदी से बतौर प्रोड्यूसर जुड़े. अब वो डेस्क एडिटर की भूमिका में कार्यरत हैं.
1992 में उन्होंने ‘इंडिया टुडे’ से हिंदी में पत्रकारिता की शुरुआत की थी. वे इराक़ युद्ध, कश्मीर चुनाव और विश्व कप क्रिकेट जैसी कई बड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग कर चुके हैं.
इंडिया टुडे के संपादकीय विभाग में कई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियाँ संभालने के बाद भारत में वे ‘आकाशवाणी’ से बतौर समाचार वाचक भी जुड़े रहे थे.
1993 से 1997 के बीच राजेश लिंटास, एचटीए और एवरेस्ट जैसी एड एजेंसियों के लिए फ्रीलांस कॉपीराइट भी कर चुके हैं.

जतिंदर ढिल्लों

जतिंदर ढिल्लों
पिछले 10 वर्षों से बीबीसी में काम कर रहीं जतिंदर पिछले कुछ सालों से बीबीसी वर्ल्ड टीवी में कार्यरत हैं.
बीबीसी में उनकी शुरुआत टोरोंटो में कैनेडियन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन में हुई, जहां उन्होंने दो साल काम किया.
उसके बाद जतिंदर ने यूरोप में बीबीसी के मुख्य ब्यूरो, ब्रसल्स और फिर बर्लिन में काम किया. हाल में जतिंदर लंदन ओलंपिक की बीबीसी टीम का हिस्सा थीं.
अंग्रेज़ी के अलावा जतिंदर, फ्रेंच और जर्मन भाषा जानती हैं. बीबीसी से जुड़ने से पहले वो यूरोप में अंग्रेज़ी भाषा पढ़ाती थीं.

अपूर्व कृष्ण

अपूर्व कृष्ण
अपूर्व बीबीसी हिन्दी सेवा के साथ पिछले 11 वर्षों से जुड़े रहे हैं. कुछ माह दिल्ली में रहने के बाद वर्ष 2002 से वो लंदन में कार्यरत हैं.
बीबीसी से पहले वो समाचार चैनलों ‘ज़ी न्यूज़’ और ‘आज तक’ के साथ काम कर चुके हैं.
‘ज़ी न्यूज़’ के दिल्ली मुख्यालय में काम करने के बाद उन्होंने गुवाहाटी और कोलकाता में बतौर संवाददाता काम किया.
कोलकाता में ही वो ‘आज तक’ के टेलिविज़न समाचार चैनल से जुड़े.
इसके अलावा अपूर्व दिल्ली में आकाशवाणी की समाचार सेवा के साथ अस्थायी तौर पर काम भी कर चुके हैं.

दिव्या आर्य

दिव्या आर्य
करीब तीन वर्ष से बीबीसी में कार्यरत दिव्या आर्य, अंग्रेज़ी और हिन्दी भाषा में, बीबीसी वर्ल्ड टीवी, बीबीसीन्यूज़.कॉम और बीबीसी हिन्दी.कॉम के लिए कई वीडियो रिपोर्ट्स बना चुकी हैं.
वो कैमरा संभालने में भी निपुण हैं और अपनी कई रिपोर्ट्स की शूटिंग उन्होंने खुद ही की है. राजनीति, जातिगत भेदभाव, मानवाधिकार उल्लंघन इत्यादि से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने के लिए वो भारत के कई इलाकों में घूम चुकी हैं.
बीबीसी से जुड़ने से पहले दिव्या, भारत के दो राष्ट्रीय समाचार टेलीविज़न चैनलों (आईबीएन-7 और स्टार न्यूज़) में बतौर संवाददाता और प्रोड्यूसर काम कर चुकी हैं.
बीबीसी में एक मल्टीमीडिया प्रोड्यूर होने के नाते वो हिन्दी सेवा के रेडियो प्रसारण और बीबीसीहिन्दी.कॉम के लिए कई भूमिकाओं में काम करती रही हैं.

पवन सिंह अतुल

पवन सिंह अतुल
12 वर्षों से पत्रकारिता जगत में काम कर रहे पवन, वर्ष 2006 में मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर की भूमिका में बीबीसी से जुड़े.
बीबीसी से पहले पवन कई टेलिविज़न चैनलों और प्रोडक्शन हाउस में काम कर चुके हैं. वर्ष 2002 में वो ‘सहारा समय’ के हिन्दी समाचार चैनल के लॉन्च टीम का हिस्सा बने.
इससे पहले वो निम्बस कम्यूनिकेशन्स में बतौर एसोसिट प्रोड्यूसर काम कर रहे थे. वो उस टीम का हिस्सा थे जिसपर रोज़ाना छह घंटे के लाइव कार्यक्रम बनाने की ज़िम्मेदारी थी.
शेयर बाज़ार, अर्थव्यवस्था और वित्तीय मामलों पर केन्द्रित इन कार्यक्रमों का प्रसारण ‘दूरदर्शन’ पर होता था.

पारुल अग्रवाल

पारुल अग्रवाल
साल 2006 में टेलिविज़न पत्रकारिता से अपने करियर की शुरुआत करने वाली पारुल अग्रवाल दो साल पहले बीबीसी से जुड़ीं और बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा बीबीसी रेडियो और वर्ल्ड टीवी के लिए काम कर चुकी हैं.
झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के नक्सल प्रभावित इलाकों से जुड़ी खबरों के अलावा उन्होंने लंबे समय तक आईबीएन7 के लिए सिटीज़न जर्नलिस्ट नामक शो का संचालन भी किया है.
आम लोगों के संघर्ष और उनकी कहानियों से जुड़ी उनकी विशेष श्रृंखला सिटीज़न रिपोर्ट बीबीसी श्रोताओं और पाठकों के बीच भी बेहद लोकप्रिय रही है.
पत्रकारिता के अलावा रंगमंच और साहित्य में उनकी विशेष रुचि है.

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