सोमवार, 26 मई 2014

दम तोड़ रही है यूपी की दर्जनों नदियां





प्रस्तुति-- दक्षम द्विवेदी, अमित कुमार

भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में दिन पर दिन बढ़ रहे प्रदूषण से करीब एक दर्जन नदियां खतरे में है. प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी लेने जा रहे नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में काशी और गंगा की सफाई के मुद्दे को भाषण में अहम जगह दी.
जल संपत्ति के अंधाधुंध दोहन और प्रदूषण की शिकार इन नदियों की दशा देखने के बाद, 'जल ही जीवन है', 'पानी की बर्बादी रोकें' या 'पानी बचाएं' जैसे नारे बेमानी लगते हैं. शहरों के विस्तार और औद्योगिकीकरण के अलावा बढ़ती आबादी नदियों के प्रदूषण में कोढ़ में खाज का काम कर रही है. सांस्कृतिक नगरी वाराणसी में गंगा का पानी प्रदूषण के चलते काला पड़ गया है. गर्मी के मौसम में नदी का बहाव नाम मात्र ही रह गया है.
प्रदूषण के चलते लोग गंगा स्नान करने से कतराने लगे हैं. गंगाजल की दो बूंदों से मोक्ष की प्राप्ति की चाहत में दूरदराज राज्यों से यहां आए श्रद्धालुों में से कई को गंगा को दूर से ही प्रणाम करते देखा जा सकता है. अपने नामों के योग से वाराणसी का नामकरण करने वाली वरुणा और असि नदियां नाले में बदल चुकी हैं. इन दोनों नदियों में पानी कम कचरा अधिक नजर आता है. नदियों के करीब से गुजरने वाले लोग बदबू के चलते नाक पर कपड़ा रखने को मजबूर हो जाते हैं. सीवर और कारखानों का कचरा इन नदियों में बिना किसी रोकटोक गिर रहा है.
सैकडों गांवों की प्यास बुझाने वाली गाजीपुर की मताई नदी में गर्मी आते ही पानी सूख जाता है. मई जून में तो इसकी तलहटी में धूल उड़ती है जहां बच्चे क्रिकेट और फुटबाल खेलते हैं. पर्यावरणविदों का कहना है कि समय रहते हम नहीं चेते तो गंगा यमुना का यह क्षेत्र न केवल भयंकर जल संकट से जूझेगा बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान ये नदियां इतिहास के पन्नों में ही बचेंगी. इसके हरे भरे मैदान रेगिस्तान में बदल जाएंगे.
हिन्दू धर्म ग्रंथो में दुर्वासा, देवलब और दत्तात्रेय आदि ऋषियों की तपोस्थली आजमगढ़ से गुजरने वाली तमसा व घाघरा अपने जीवन्त रुप में हैं. मगर सरयू, मगई, गांगी, लोनी, बेनो, शालिनी, कुंवर एवं मंजूषा समेत कई छोटी नदियों का अस्तित्व लगभग मिट चुका है. इनमें से कुछ नालों में परिवर्तित हो चुकी हैं.
वाराणसी के पड़ोसी जिले जौनपुर में गोमती, सई, पील, बसुही और वरुणा नदी बहती है. बाढ़ में ये नदियां विकराल रुप धारण कर लेती हैं, वहीं मई व जून में इनमें धूल उड़ती है. इन नदियों को पाटकर कई जगह आलीशान मकान बन गए हैं वही कुछ में अतिक्रमण कर खेती हो रही है.
मऊ जिले में बहने वाली टोस नदी भी नाले में तब्दील हो चुकी है जबकि छोटी सरयू और भैंसही नदी के सूखने और दायरे के सिमटने से किसानों की चिंता साल दर साल बढ़ती जा रही है.
नदियों की ही तरह पौराणिक व धार्मिक महत्व के तालाबों व पोखरों का अस्तित्व भी खतरे में है. कुछ को पाटकर मकान बन गए हैं और कुछ पर खेती हो रही है. इसके बावजूद नदियों की भूमि पर भूमाफिया की ललचाई नजरें हैं. प्रशासन की कमजोर इच्छाशक्ति एवं अदूरदर्शिता के चलते जहां सरोवरों, कुंडों एवं तालाबों पर अवैध कब्जे जारी हैं वहीं आम नागरिक भी अपनी जुबान बंद किए हैं. आवाज उठाने वालों को धमकी के सिवा कुछ नही मिलता.
उच्च न्यायालय कुंड एवं तालाबों के पाटे जाने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त कर चुका है. कुछ साल पूर्व न्यायालय ने आदेश दिया था कि वर्ष 1952 के बाद पाटे गए तालाबों एवं पोखरों को खुदवा कर पुरानी स्थिति में लाया जाए. वाराणसी नगर निगम के रिकॉर्ड में 63 तालाबों का जिक्र है. इनमें से अधिकतर तालाबों का अपना ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का उल्लेख सरकारी दस्तावेजों में है. प्रशासन की तरफ से समय समय पर तालाबों को उनकी पुरानी स्थिति में लाने की कागजी कार्यवाही होती है लेकिन कुछ भी व्यावहारिकता में नहीं आता.
एसएफ/एमजे (वार्ता)

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विज्ञान

बहुत सारी उम्मीदों से जूझना होगा मोदी को







प्रस्तुति- राजेश कुमार सिन्हा,

नई संसद के लिए मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को भारी बहुमत से जिताकर उससे अपनी उम्मीदें जोड़ दी हैं और सोनिया और राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी को उसकी गलतियों और भ्रष्टाचार के लिए बेरहमी से सजा दी है.
बीजेपी की अभूतपूर्व जीत से भारत में गठबंधन सरकारों का एक काल समाप्त हो रहा है. देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार और बहुत सारी अन्य समस्याओं के लिए गठबंधन धर्म को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है. अब बीजेपी को अकेले बहुमत देकर मतदाताओं ने छोटी क्षेत्रीय पार्टियों के पर कतरे हैं और उसे समस्याओं का हल करने के लिए खुला हाथ दिया है. लेकिन इसके साथ नरेंद्र मोदी की नई सरकार के साथ बहुत सारी उम्मीदें भी जुड़ गई हैं.
इस साल का चुनाव और मायनों में भी निर्णायक है. इस बार भारत के 81 करोड़ मतदाताओं में से 55 करोड़ लोगों ने मतदान में भाग लेकर रिकॉर्ड बनाया है. लोगों को इतनी बड़ी तादाद में पोलिंग बूथ पर लाने का श्रेय भी नरेंद्र मोदी को जाता है, जिन्होंने देहाती इलाकों में गांधी परिवार की परंपरागत लोकप्रियता का सामना करने के लिए अमेरिका जैसा चुनाव प्रचार किया, जिसमें राष्ट्रीय अभियानों के जरिए अनजाना उम्मीदवार भी अपने को गंभीर राजनेता के रूप में स्थापित करता है. हालांकि इसके लिए औद्योगिक घरानों के चंदों का बड़ा महत्व है, इस रणनीति की सफलता ने भारत को नए राजनीतिक विकल्प दिए हैं.
हालांकि मोदी और बीजेपी ने परंपरागत रूप से प्रभावी और सोशल मीडिया समर्थित हाईटेक चुनाव अभियान चलाया, उन्होंने अपने हिंदू राष्ट्रवादी विचारों के कारण मतदाताओं का ध्रुवीकरण भी किया. उन पर मुख्यमंत्री रहते हुए 2002 में गुजरात के दंगों में कुछ न करने के आरोप लगते रहे हैं, जिनमें 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. मोदी के चुनाव प्रचार का मकसद अपने समर्थकों को बांधकर रखना और विकास और भ्रष्टाचार विरोध के नारे के साथ नए समर्थक खींचना था. इसमें वे अत्यंत सफल रहे. बीजेपी को इस बात से भी मदद मिली कि कांग्रेस और करीब करीब सभी क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी को किनारा करने के लिए मुसलमानों को लुभाने में लगी रहीं.
मोदी को सबसे ज्यादा लाभ कांग्रेस पार्टी की कमजोरी से मिला, जिसकी सरकार पिछले महीनों में लगातार अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रही थी. सरकार और पार्टी विभाजित दिखाई दे रहे थे. मनमोहन सिंह ने चुनाव प्रचारों में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई, क्योंकि पार्टी सरकार की उपलब्धियों के बदले मोदी के डर को भुनाने में लगी थी. कांग्रेस की एक और बड़ी गलती नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किए जाने के बावजूद अपनी उम्मीदवार घोषित नहीं करना था. राहुल गांधी हिचकते नेता के रूप में सामने आए जो नेतृत्व की क्षमता नहीं दिखा रहा था. कांग्रेस दौड़ शुरू होने से पहले ही हार गई थी.
नरेंद्र मोदी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी सरकार बनाने की है जो आक्रामक चुनाव प्रचार के बाद बंटे देश को एक करे, अल्पसंख्यकों का डर समाप्त करे और लोगों को आश्वस्त करे कि मकसद देश का सर्वांगीण विकास है. उनकी फौरी चुनौती पिछले सालों की ढुलमुल नीति और विकास दर में आए ढीलेपन के बाद भारत को फिर से विकास और प्रगति के तेज रास्ते पर वापस लाने की होगी. इसके लिए कारोबारी माहौल को बेहतर बनाकर कारोबारियों में फिर से भरोसा जगाना होगा. तभी बड़े पैमाने पर नए रोजगार पैदा किए सकेंगे और युवा मतदाताओं की उम्मीदों को पूरा किया जा सकेगा जो बेहतर और सुरक्षित जीवन चाहते हैं.
इसके लिए पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्ते भी जरूरी हैं. पाकिस्तान और चीन के साथ रिश्तों को सुधारना मोदी की सबसे बड़ी चुनौती होगी. मोदी में पाकिस्तान भी ऐसा साथी देखेगा जिसके विचार भले ही सख्त हों, लेकिन ढुलमुल नहीं हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अपने पिछले कार्यकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बीहारी वाजपेयी के साथ शांति की कोशिश की थी, बीजेपी की नई सरकार के दौरान उस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है. आर्थिक विकास के लिए नई सरकार को पड़ोसियों के साथ झगड़े के बदले उनसे आर्थिक सहयोग बढ़ाने का रास्ता अपनाना होगा.
तेज आर्थिक विकास के लिए भारत को पश्चिम के विकसित देशों के निवेश और टेक्नोलॉजी की भी जरूरत है. अमेरिका के साथ रिश्ते नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी चुनौती होंगे. अमेरिका गुजरात दंगों में उनकी भूमिका के चलते सालों से उन्हें वीजा देने से मना करता रहा है. हालांकि पिछले कुछ महीनों में अमेरिका ने माहौल में सुधार लाने की कोशिश की है, लेकिन मोदी और देवयानी खोबरागड़े जैसे मामलों के कारण तल्ख हुए रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए दोनों ही पक्षों को काफी मेहनत करनी होगी.
इसका फायदा जर्मनी और यूरोप के साथ भारत के रिश्तों को हो सकता है. लेकिन आर्थिक सहयोग को और तेज करने के लिए उन्हें कई सालों से धीमी चल रही मुक्त व्यापार संधि की बातचीत को उसके मुकाम तक पहुंचाना होगा. भारत को बेहतर कारोबारी माहौल, बौद्धिक संपदा की रक्षा और विवाद की स्थिति में मामले के जल्द निबटारे जैसी यूरोपीय चिंताओं को दूर करने के कदम उठाने होंगे.
नरेंद्र मोदी की नई सरकार को घरेलू और विदेशी मोर्चे पर बहुत सारी चुनौतियों और उम्मीदों से जूझना है. मोदी को दृढ़ता दिखानी होगी और कड़े फैसले लेने होंगे. चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने दिखाया है कि ऐसा करने में वे सक्षम हैं.
ब्लॉग: महेश झा
संपादन: ईशा भाटिया

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मोदी सरकीर की चुनौतियां






प्रस्तुति- मनीषा यादव, प्रतिमा यादव
वर्धा

अगली सरकार की चुनौतियां

भारत की अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है. रुपया जब तब मूर्छित हो जाता है. आधारभूत ढांचे का विकास भी ठहर गया है. सांप्रदायिक हिंसा बड़ा मुद्दा है. कुल मिलाकर अगली सरकार के सामने चुनौतियों का पहाड़ है.
16 मई को नतीजे के बाद सरकार बनाने वाले गठबंधन को जून जुलाई तक बजट पेश करना होगा. बजट के जरिए नई सरकार को बताना होगा कि वो बीती सरकार से कैसे अलग है. सर्वेक्षणों के मुताबिक बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी सरकार बनाने की स्थिति में आ सकते हैं.
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के मामले में जनमानस की चिंताएं और उम्मीदें आपस में टकराते हुए आगे बढ़ती हैं. मोदी पर आरोप है कि उन्होंने 2002 में गुजरात दंगों को काबू करने की कोशिश नहीं की. मोदी एक दशक बाद दंगों पर अफसोस जताते हैं और कहते हैं कि पीएम बने तो वो सबको साथ लेकर चलेंगे. लेकिन उन्हें सांप्रदायिक सद्भाव की कसौटी पर खुद को साबित करना होगा.
लाल होती बैलेंस शीट
आगामी सरकार ऐसे वक्त में सत्ता संभालेगी, जब अर्थव्यवस्था बेहद खराब स्थिति में हैं. महंगाई हावी है, रुपये को बार बार डॉलर से लड़ना पड़ता है. नई नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं, विदेशी निवेशक भी घबराने लगे हैं. कारोबार जगत में निराशा का भाव है. युवा उद्यमियों के लिए हालात कठोर हैं. बजट पेश करने वाली अगली सरकार को बताना होगा कि वो वित्तीय घाटे को काबू में रखते हुए इन समस्याओं से कैसे निपटेगी.
मोदी ने किए हैं बड़े वायदे
बीजेपी ने घोषणापत्र में वित्तीय अनुशासन और बैंकिंग सुधारों का वादा किया है, हालांकि पार्टी ने विस्तार से इसकी जानकारी नहीं दी है. मार्च 2014 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 4.6 फीसदी थी. कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने सरकारी खर्च में 13 अरब डॉलर की कटौती की और 16 अरब डॉलर की रियायत दी. ऐसी कटौती को जारी रखना मुश्किल होगा. भारत में सरकारी कंपनियां तेल, गैस, खाद और अनाज बाजार दर से कम दाम में अपने उत्पाद बेचती हैं. इस नुकसान की भरपाई सरकारी खजाने से होती है.
लेकिन दूसरी तरफ टैक्स से होने वाली आय बढ़ने की उम्मीद कम है. 2007-08 में जीडीपी में 12.5 फीसदी हिस्सा टैक्स से आया. बीते साल यह गिर कर 10.2 फीसदी रह गया. नई सरकार के सामने चुनौती होगी कि वह इस हिस्सेदारी को बढ़ाए.
नई सरकार के लिए चालू खाते में हो रहे घाटे को भी काबू में रखने की चुनौती होगी. बीते साल चालू खाते में रिकॉर्ड 4.8 फीसदी घाटा दर्ज किया गया. इसकी वजह से सोने के आयात पर पाबंदी लगानी पड़ी. बीजेपी का वादा है कि वो सोने पर लगने वाले आयात शुल्क की समीक्षा करेगी. आम लोगों के लिए यह भले ही अच्छी बात हो लेकिन निवेशकों के लिहाज से यह चिंताजनक हो सकता है. ऐसा करने से चालू खाते का घाटा और बढ़ सकता है.
रॉकेट युग में कछुआ चाल
सुपर पावर जैसी बातें करने वाले भारत में अब भी खेती मौसम और बारिश पर निर्भर है. बीते कुछ सालों को देखें तो नहरें या खेती के लिए नई परियोजनाएं बहुत ही कम बनीं. डीजल और बिजली महंगी होने से किसानों से लेकर आम लोगों तक की मुश्किलें जरूर बढ़ीं.
दंगों के दाग के साथ मोदी की छवि काम करने वाले एक तेज तर्रार प्रशासक की भी है. वे निवेशकों को आकर्षित करते हैं. उन्होंने गुजरात को भारत के सामने विकास के मॉडल की तरह पेश किया है. वहीं दूसरी तरफ यूपीए सरकार की अलमारी में एक चौथाई परियोजनाएं लंबित हैं. बीजेपी का घोषणापत्र कहता है कि पार्टी लाल फीताशाही काट फटाफट काम करेगी. हालांकि एफडीआई में सीधे विदेशी निवेश का विरोध बीजेपी भी करती है.
एक बड़ी चुनौती सरकारी बैंकों के फंसे हुए कर्ज को निकालने की भी है. भारत के सरकारी बैंकों की 100 अरब डॉलर की रकम डूबा कर्ज है. डूबा कर्ज उस रकम को कहते हैं, जिसकी उगाही की संभावना नहीं के बराबर होती है. डूबे कर्ज के पीछे बड़ी देनदारी उन कंपनियों की है, जो आधारभूत संरचना के लिए काम कर रही हैं. कुछ प्रोजेक्ट बीच में अटके हैं. लिहाजा कर्ज देना बैंकों की मजबूरी बन गई है.
यह वो वित्तीय समस्याएं हैं, जिसे हल कर ही कोई सरकार कर्ज के दलदल में फंसे बिना पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास जैसे क्षेत्रों में पैसा लगा सकती है. जाहिर है जेब में पैसा होगा तो काम भी होगा, खाली जेब तो सिर्फ गपबाजी ही हो सकती है.
ओएसजे/एजेए (रॉयटर्स)

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नेहरू गांधी के बाद मोदी युग शुरू





प्रस्तुति- अखौरी प्रमोद, अमित कुमार

भारत के पहले प्रधानमंत्री की 50वीं पुण्यतिथि देश के 14वें प्रधानमंत्री के पद संभालने के जश्न के साए में हो रही है. आजादी के बाद नेहरू ने देश को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की लेकिन इस बीच उनके विचारों की क्षति होती गई है.
जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि के मौके पर दो संयोग हुए हैं. एक दिन पहले देश के प्रधानमंत्री के रूप में बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी का शपथ ग्रहण समारोह और तीन दिन पहले कांग्रेस की कमान फिर से गांधी परिवार के हवाले करने का 44 सांसदों वाली पार्टी का संकल्प. कांग्रेस परिवार के मोह और वंश की राजनीति में घिरी रहकर ही लगता है सुख में है और उधर पहली बार ऐसी सरकार सत्ता में आई है जो नेहरू के मूल्यों को चिढ़ाती हुई सी लगती है.
इसे प्रतीकात्मक तौर पर यूं भी देख सकते हैं कि नेहरू खानदान के वारिसों ने 50वीं पुण्यतिथि के मौके पर क्या नजराना पेश किया है. जीवनपर्यंत संघ की विचारधारा का तीखा विरोध करते रहे नेहरू की पुण्यतिथि से पहले ही संघ के ही एक स्वयंसेवक के पास देश की कमान आ गई है. प्रतीक के तौर पर ही गौर करें कि नेहरू की आत्मा आखिर अपने नाती की बहू और उनके बेटे से क्या पूछती होगी कि ये क्या कर डाला. ऐसी भयानक फजीहत. 1947 में देश की कमान संभालते हुए नेहरू ने अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा था, "अन्तत: समय ने निर्णायक करवट ले ली है और हमारे लिए इतिहास का नया अध्याय शुरू हो रहा है." कैसा संयोग है कि नेहरू के उस कथन से उतरकर वक्त ने फिर करवट ले ली है और यही बात अब अलग मुंह से सुनी जा रही है.
नेहरू के वारिसों के पास एक सीधा सा जवाब है कि कांग्रेस कोई पहली बार थोड़े ही हारी है. लेकिन कांग्रेस की दुर्गति का इतिहास देखें तो असल में ये शुरुआत नेहरू की बेटी और देश की तीसरी प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी से होती है, आपातकाल जिनके करियर पर एक अमिट दाग है. कांग्रेस के भीतर सत्ता लोलुपता और वर्चस्व की लड़ाइयों के बीच से अपना रास्ता इंदिरा ने बेशक बनाया लेकिन ये रास्ता नेहरू के विचार और सपने से अलग निकलता था. नेहरू नए रास्तों में गुम हो गए. कांग्रेस में इंदिरा की जय जयकार का युग आ गया. और फिर ये जय-जय राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक जारी रही. जब जब ये जय जयकार धीमी हुई, गांधी परिवार के भक्तों ने उसका वॉल्यूम बढ़ा दिया और कैसी हैरानी है कि 2014 की ऐतिहासिक पराजय में भी गांधी परिवार महानता के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाया है.
परिवार की पार्टी बनीं कांग्रेस
नेहरू ने कभी भी वंशवाद के प्रति अपना मोह नहीं दिखाया. इंदिरा गांधी का सत्ता में आना भी उस दौर की राजनैतिक हलचलों के बीच एक संयोग ही था. लेकिन इंदिरा बनाम अन्य की लड़ाई कांग्रेस के भीतर इतनी तीखी और कड़वी होती गई कि इंदिरा ने एक आक्रामक रणनीति बनाकर विरोधियों को किनारे किया, अपना प्रताप बढ़ाया अपने गलियारे बनाये और नेहरू की कांग्रेस इन गलियारों में विलीन होकर कांग्रेस आई हो गई. जो नहीं गए वे इधर उधर छिटक कर अन्य पार्टियां बन गये. आजाद भारत के निर्माण और परिष्कार के नेहरू के सपनों की जगह सत्ता की राजनीति में राजनैतिक और आर्थिक भ्रष्टाचार, नौकरशाही का बोलबाला होता चला गया. दक्षिणपंथी ताकतों को बल मिला. संघ ने दायरा फैलाया. विपक्ष इंदिरा विरोध तक सीमित रह गया. जन-आकांक्षा की स्पेस खाली होती गईं. वाम दल भी उन्हें भर नहीं पाए. इंदिरा गांधी ने बहस और संवाद की अपने पिता की लीगेसी से पीछा छुड़ाया तो उनके बेटे राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपनी बारी आने पर नेहरू के धर्मनिरपेक्ष विचार को ही ठेंगा दिखा दिया. शाहबानो केस और अयोध्या में ताला खुलवाने का आदेश ऐसी दो ऐतिहासिक घटनाएं हैं जिन्होंने इस देश के सामाजिक तानेबाने में निर्णायक लकीर खींच दी.
आज अगर संघ एक विराट कामयाबी के साथ देश की सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेने पर सफल हुआ है तो इसका एक बड़ा क्रेडिट इंदिरा और राजीव को भी जाता है. बाकी काम उनके बाद सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने किया. कांग्रेस की सत्ता का मनमोहन सिंह काल तो शिथिलता और धीरे धीरे ढेर हो जाने की "कला" के नाम रहा. 2014 ने पार्टी सरकार और देश के नेहरूवियन मॉडल की रही सही उम्मीद भी ध्वस्त कर दी. इसका असर सिर्फ कांग्रेस तक ही सीमित नहीं था. समूची हिंदी पट्टी की राजनैतिक ताकतें अपना सा मुंह लेकर रह गईं. नेहरू की 50वीं पुण्यतिथि उस वाम भटकाव की गहरी चिंता करने का भी समय है जिस वाम के इतने तहे दिल से मुरीद नेहरू थे. उन्होंने बेशक एक मिलीजुली अर्थव्यवस्था देश के लिए चुनी लेकिन उनका वाम झुकाव स्पष्ट था. कैसी विडंबना है कि इस पुण्यतिथि पर हमें लेफ्ट के परिदृश्य से गायब हो जाने की दुर्घटना भी देखनी थी.
ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी
संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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