शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम दल के संस्थापक सी॰एन॰ अन्नादुरै









प्रस्तुति-- अशोक सुमन, प्यासा रुपक 



कांजीवरम्‌ नटराजन्‌ अन्नादुरै तमिलनाडु के लोकप्रिय नेता, अपने प्रदेश के प्रथम गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री एवं द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम दल के संस्थापक थे। इनके नाम का संक्षिप्त रूप अन्ना का तमिल में अर्थ है, आदरणीय बड़ा भाई। उनका जन्म एक बेहद साधारण परिवार में हुआ। तंबाकू से रचे दांत, खूंटीदार दाढ़ी और लुभावनी शुष्क आवाज वाले तकरीबन सवा पांच फीट कद के इस शख्स के साथ ही आधुनिक तमिलनाडु की कहानी जुड़ी है। अन्ना स्वतंत्र भारत के पहले ऐसे नेता थे जिनकी स्वतंत्रता संग्राम में कोई भूमिका नहीं थी।

जीवन चरित

अन्नादुरै का जन्म १५ सितंबर १९०९ को कांजीवरम्‌ के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। मद्रास विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात्‌ उन्होंने अपना जीवन एक शिक्षक के रूप में प्रारंभ किया, पर शीघ्र ही ये पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए। तमिल जागरण में इनके निबंधों ने महत्वपूर्ण योगदान किया। श्री अन्नादुरै ने 'जस्टिस' नामक तमिल पत्र के सहायक संपादक एवं बाद में 'विदुघलाई' नामक पत्र के संपादक के पद पर कार्य किया। इन्होंने सन्‌ १९४२ में तमिल साप्ताहिक 'द्रविड़नाड़' सन्‌ १९५७ में अंग्रेजी साप्ताहिक 'होमलैंड' तथा एक वर्ष पश्चात्‌ 'होमरूल' नामक पत्रिका निकाली थी। ये हिंदी के प्रबल विरोधी तथा तमिल भाषा और साहित्य के पुनरुत्थानकर्ता थे।
श्री अन्नादुरै प्रारंभ में द्रविड़ कड़गम के सदस्य थे, पर अपने राजनीतिक गुरु से असंतुष्ट होने के कारण इन्होंने सन्‌ १९४९ में अपने सहयोगियों के साथ द्रविड़ कड़गम से संबंध विच्छेद कर लिया और द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम की स्थापना की। सन्‌ १९५७ में विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होने के पश्चात्‌ अन्नादुरै सक्रिय राजनीति में आए। इन्होंने द्रविड़ों के लिए पृथक्‌ 'द्रविड़स्तान' का नारा दिया और प्रदेश से कांग्रेस शासन को समाप्त करने का व्रत लिया। द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम ने इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अनेक आंदोलन किए। दस वर्ष पश्चात्‌ राज्य की बागडोर अन्नदुरै के हाथ में आ गई। यद्यपि इनकी असामयिक मूत्यु ने इन्हें मुख्य मंत्री के रूप में दो वर्ष से भी कम अवधि तक प्रदेशवसियों की सेवा करने का ही अवसर दिया, तथापि यह अल्पावधि भी अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण रही है।
ये प्रतिभासंपन्न राजनेता, कुशल प्रशासक एवं सिद्धहस्त समाजशिल्पी थे। जनतांत्रिक मूल्यों की प्रतिष्ठापना और पददलितों के उत्थान के लिए ये जीवन पर्यंत संघर्षरत रहे। इनके सबल नेतृत्व में कड़गम ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। ये जीवनपर्यंत दल के महासचिव बने रहे। दल पर अपने असाधारण प्रभाव के कारण ही ये दल की पृथक्तावादी नीतियों को राष्ट्रीय अखंडता के हित में रचनात्मक मोड़ देने में सफल रहे। सन्‌ १९६२ में चीनी आक्रमण के समय श्री अन्नादुरै ने कड़गम से सदस्यों को राष्ट्रीय सुरक्षा में हर संभव योगदान करने के लिए प्रोत्साहित किया। ये दल के अतिवादियों को शनैः शनैः सहिष्णुता के मार्ग पर ला रहे थे। प्रारंभ में कड़गम में उत्तर भारतीय एवं ब्राह्मणों का प्रवेश निषिद्ध था, पर अन्नाकी प्रेरणा से द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम के सिद्धांतों में विश्वास रखनेवालों के लिए दल की सदस्यता का द्वार खुल गया। संविधान की होली खेलने की योजना बनानेवालों के नेता ने तमिलनाडु का मुख्यमंत्रित्व ग्रहण करते समय संविधान में पूर्ण निष्ठा व्यक्त की। कड़गम के सत्तारूढ़ होने पर केंद्र से विरोध के संबंध में अनेक आशंकाएँ व्यक्त की गई थीं, पर श्री अन्नादुरै ने किसी प्रकार का संवैधानिक संकट नहीं उत्पन्न होने दिया। उनका हिंदीविरोध अवश्य चिंत्य था, लेकिन जिस प्रकार उनके दृष्टिकोण क्रमिक परिवर्तन आ रहा था और क्षेत्रीयता के संकुचित मोह का स्थान राष्ट्रीयता की भावना लेती जा रही थी, उससे यह अनुमान हो चला था कि भविष्य में उनका हिंदीद्रोह भी समाप्त हो जाएगा और तमिलनाडु के विद्यालयों में त्रिभाषा सिद्धांत के अनुसार हिंदी की पढ़ाई प्रारंभ हो जाएगी।
श्री अन्नादूरै राजकाज में क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग के पक्षपाती थे। इन्होंने अपने प्रदेश में तमिल के प्रयोग को पर्याप्त प्रोत्साहन दिया। मद्रास राज्य का नामकरण तमिलनाडु करने का श्रेय भी इन्हीं को है। तमिलनाडु का मुख्यमंत्रित्व ग्रहण करने के पूर्व राज्यसभा के सदस्य के रूप में भी इन्होंने ख्याति प्राप्त की थी। सन्‌ १९६७ के महानिर्वाचन में तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम की अभूतपूर्व सफलता ने अन्ना को अपने दल को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठापित करने की प्रेरणा प्रदान की थी। यदि असमय ही ये कालकवलित न हो गए होते तो संभवतः भविष्य में द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम का स्थान भारत मुन्नेत्र कड़गम ने ले लिया होता।
कैंसर के असाध्य रोग से पीड़ित अन्नादुरै की इहलीला ३ फ़रवरी १९६९ को समाप्त हो गई।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

कुतुब मीनार से ऊंचा है जैतखाम मीनार

 

 

 

 

5175-161210

प्रस्तुति- कृति शरण ,सृष्टि शरण

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 145 किलोमीटर की दूरी पर अठारहवीं सदी के महान समाज सुधारक गुरू बाबा घासीदास की जन्म भूमि और तपोभूमि गिरौदपुरी में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के जरिए बन रहा 243 फीट की ऊंचाई का जैतखाम दुनिया में आधुनिक भारतीय इंजीनियरिंग प्रतिभा का एक शानदार उदाहरण होगा। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित लगभग आठ सौ वर्ष पुराना 237.8 फीट (72.5 मीटर) ऊंची कुतुब मीनार भारतीय इतिहास और पुरातत्व की बहुमूल्य धरोहर के रूप में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्मारक सूची में शामिल है, जिसकी ऊंचाई छत्तीसगढ़ के गिरौदपुरी में 51 करोड़ रूपए से भी अधिक लागत से बन रहे विशाल जैतखाम से लगभग पांच मीटर कम है। गिरौदपुरी में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा बनवाए जा रहे इस गगन चुम्बी जैतखाम की ऊंचाई 243 फीट (करीब 77 मीटर) होगी। इस प्रकार कुतुब मीनार से करीब पांच मीटर ऊंचे इस जैतखाम का निर्माण पूर्ण होने पर इसकी गिनती भी इतिहास और आधुनिक स्थापत्य कला की दृष्टि से दुनिया की एक अनमोल धरोहर के रूप में होने लगेगी और यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्मारकों के समकक्ष आ जाएगा।
    सतनाम पंथ के प्रवर्तक बाबा गुरू घासीदास का जन्म गिरौदपुरी में लगभग ढाई सौ साल पहले, 18 दिसम्बर 1756 को हुआ था। उन्होंने इसी गांव के नजदीक छाता पहाड़ में कठिन तपस्या की और अपने आध्यात्मिक ज्ञान के जरिए देश और दुनिया को सत्य, अहिंसा, दया, करूणा, परोपकार जैसे सर्वश्रेष्ठ मानवीय मूल्यों की शिक्षा देकर सत्य के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। इसके फलस्वरूप यह गांव विशेष रूप से छत्तीसगढ़ की जनता की आस्था का प्रमुख केन्द्र बन गया, जहां बाबा घासीदास के महान विचारों के साथ-साथ उनकी यश-कीर्ति को जन-जन तक पहुंचाने और दूर-दूर तक फैलाने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में राज्य सरकार के लोक निर्माण विभाग ने गिरौदपुरी में करीब तीन वर्ष पहले कुतुब मीनार से भी ऊंचे इस विशाल जैतखाम का निर्माण शुरू किया था, जो अब तेजी से पूर्णता की ओर अग्रसर है। प्रति दिन वहां आने वाले श्रध्दालुजन और पर्यटक इस विशाल जैतखाम की निर्माण्ा प्रक्रिया को उत्सुकता से निहारते नजर आते हैं। गिरौदपुरी धाम के सौन्दर्यीकरण और वहां निर्मित विभिन्न बुनियादी सुविधाओं के फलस्वरूप अब स्कूली बच्चे भी बड़ी संख्या में शैक्षणिक भ्रमण के लिए वहां आने लगे हैं। छायादार वृक्षों के नीचे इन हंसते-खेलते बच्चों को तीर्थ यात्रा में एक साथ बैठकर भोजन करते और घूमते-फिरते देखने पर सचमुच काफी सुखद अनुभूति होती है।
    बाबा घासीदास जैसे महान संत के प्रखर व्यक्तित्व और उनके कृतित्व ने छत्तीसगढ़ सहित सम्पूर्ण भारत के सांस्कृतिक इतिहास में गिरौदपुरी का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित कर दिया है। इसे ध्यान में रखकर वहां इस विशाल जैतखाम का निर्माण किया जा रहा है। डॉ. रमन सिंह ने जहां 23 दिसम्बर 2007 को जनप्रतिनिधियों और समाज प्रमुखों की उपस्थिति में इस विशाल जैतखाम के निर्माण कार्य का शुभारंभ किया था। यह विशाल जैतखाम भारत की आधुनिक इंजीनियरिंग प्रतिभाओं का एक शानदार कमाल भी होगा। छत्तीसगढ़ सरकार के लोक निर्माण विभाग द्वारा इसका निर्माण भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.), रूड़की के वरिष्ठ और अनुभवी विशेषज्ञों से बनवाए गए नक्शे और डिजाईन के अनुरूप किया जा जा रहा है। यह सम्पूर्ण रूप से भूकम्परोधी और अग्निरोधी होगा। सतनाम पंथ के गौरवशाली प्रतीक के रूप में दुनिया को मानव कल्याण और विश्व शांति संदेश देने के लिए इस पर परम्परागत श्वेत ध्वज भी फहराया जाएगा।
    वर्ष 2004 में गिरौदपुरी के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इस गांव के समग्र विकास के लिए समाज प्रमुखों और जनप्रतिनिधियों की बैठक में सलाह-मशविरा कर एक समन्वित विशेष कार्य योजना बनाने का निर्णय लिया। वित्तीय वर्ष 2004-05 में इस कार्य योजना पर अमल शुरू किया गया। इसके क्रियान्वयन के लिए आदिम जाति और अनुसूचित जाति विकास विभाग को नोडल विभाग के रूप में जिम्मेदारी दी गयी। विशेष कार्ययोजना के तहत गिरौदपुरी धाम के विकास के लिये वर्ष 2004 से अब तक लगभग 18 करोड़ रूपये की धनराषि मंजूर की जा चुकी है। यह राशि वहां बनाए जा रहे कुतुब मीनार से भी ऊंचे जैतखाम के लिए निर्धारित 51 करोड़ 43 लाख रूपए की धनराशि से अलग है। इस तीर्थ भूमि के विकास के लिए प्रथम वर्ष में विशेष कार्य-योजना के तहत पांच करोड़ रूपए आवंटित किए गए और यह सम्पूर्ण राशि विभिन्न विकास कार्यों पर खर्च की गयी। अगले वर्ष 2005-06 में भी लगभग पांच करोड़ रूपए का आवंटन दिया गया और बुनियादी सुविधाओं के विकास पर शत-प्रतिशत राशि व्यय की गयी। वर्ष 2006-07 में तीन करोड़ रूपए आवंटन किए गए। इसमें से विभिन्न निर्माण कार्यों पर लगभग दो करोड़ 13 लाख रूपए खर्च हुए। पिछले साल करीब दो करोड़ 35 लाख रूपए का आवंटन जारी किया गया।
    समन्वित विकास की कार्य-योजना के तहत हुए विभिन्न निर्माण कार्यों के फलस्वरूप गिरौदपुरी की तस्वीर एकदम से बदल गयी है। पहाड़ी पर स्थित मुख्य मंदिर और मेला परिसर काफी व्यवस्थित हो गया है। गुरू दर्शन मेले में वहां हर साल आने वाले लाखों श्रध्दालुओं के लिए अब पगडंडी नहीं, बल्कि साफ-सुथरी चौड़ी और पक्की सड़कें हैं, जिन पर मार्ग विभाजक बनाकर सूर्य किरणों पर आधारित सौर ऊर्जा प्रणाली सहित परम्परागत विद्युत प्रकाश की भी व्यवस्था है। समन्वित विकास कार्यों से इस तपोभूमि की छटा अब आकर्षक और मनोरम हो गयी है। मेला और मंदिर परिसर में हजारों की संख्या में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे लगाये गये हैं। इन हरे-भरे पौधों से जहां मन को षांति मिलती है, वहीं मंदिर परिसर के आध्यात्मिक वातावरण से बाबा गुरू घासीदास के सद्भावना, भाईचारा, सच्चाई,सादगी, दया, करूणा, अहिंसा और परोपकार का संदेष भी मिलता है।
लगभग चार सौ एकड़ में फैले इस विषाल परिसर में विशेष कार्य-योजना के तहत अनेक विकास कार्य सम्पन्न हुए है। मंदिर परिसर साफ सुथरा है और वहां कांक्रीटीकरण किया गया है। मेला परिसर में सघन वृक्षारोपण, विद्युतीकरण्ा, यात्री षेड, पेयजल की व्यवस्था और पार्किंग स्थल विकसित किया गया है। मुख्य मंदिर, जैतखाम और विषाल प्रवेष द्वार को संगमरमर जड़ कर बेहद आकर्षक और वैभवपूर्ण बनाया गया है। सभी पवित्र स्थलों को जोड़ने सड़क, सीढ़ी और सुरक्षा दीवाल बनाये गये हैं। गिरौदपुरी मेला परिसर वृक्षारोपण से आच्छादित है। मुख्य मंदिर के पास हाई मास्ट लाईट की व्यवस्था है। दूरस्थ अंचलों से आने वाले श्रध्दालुओं के ठहरने के लिये 09 विषाल यात्री षेड बनाये गये हैं। यह स्थल पहले की तुलना में कई गुना आकर्षक, सुविधायुक्त और मनोरम स्थल के रूप में विकसित हो गया है। तीर्थ यात्रियों के ठहरने के लिए अब तक नौ विशाल प्रतीक्षालय भवनों (शेडों) का निर्माण हो चुका है, जहां श्रध्दालुजन आराम से रात्रि में भी रूक सकते हैं।
    कार्य-योजना के प्रथम वर्ष में सम्पूर्ण मंदिर परिसर की साज-सज्जा की गई और आस-पास के क्षेत्र में भूमि समतलीकरण, मुरमीकरण और वृक्षारोपण भी किया गया। मुख्य बस्ती से मंदिर स्थल तक चौड़ी कांक्रीट सड़क और प्रवेष द्वार बनाया गया। सड़क के बीचों-बीच विद्युत के खम्भे लगाये गये। मंदिर परिसर में आकर्षक मुख्य प्रवेष द्वार और निर्गम द्वार बनाया गया। मंदिर परिसर में अहाते का निर्माण और जैतखाम का पुनर्निर्माण किया गया। मेला परिसर को आकर्षक बनाने समतली करण एवं मुख्य प्रवेष द्वार का विस्तार किया गया। गिरौदपुरी बस्ती के भीतर सीमेंट कांक्रीट की सड़कें बनवायी गयी हैं। ग्राम महराजी से पंचकुण्डी तक मार्ग बनाया गया। मंदिर से चरण कुण्ड तक कांक्रीट का सीढ़ीदार मार्ग एवं प्रवेष द्वार बनाया गया। इसी प्रकार चरण कुण्ड से अमृत कुण्ड तक सीढ़ीदार कांक्रीट का मार्ग और सुरक्षा दीवार बनाया गया। मुख्य प्रवेष द्वार से मंदिर तक के मार्ग का कांक्रीटीकरण और मंदिर क्षेत्र का कांक्रीटीकरण किया गया। यहां बड़ी संख्या में आने वाले श्रध्दालुओं के ठहरने के लिये तीन विश्राम गृह का निर्माण किया गया। महराजी से पवित्र छातापहाड़ तक सीमेंट कांक्रीट सड़क बनाया गया। गिरौदपुरी धाम से मात्र छह किलोमीटर पर स्थित छातापहाड़ में ही गुरू घासीदासजी ने कठोर तपस्या कर ज्ञान प्राप्त किया था। वहां पर फाल्गुन शुक्ल षष्ठी के दिन जैतखाम में जगत गुरू द्वारा ध्वजारोहण भी किया जाता है। गिरौदपुरी धाम के मेला स्थल पर पेयजल व्यवस्था के साथ ही पंचकुण्डी में भी पेयजल व्यवस्था के साथ ही पौध रोपण के रखरखाव के लिये ड्रिप कोर्स सिंचाई की व्यवस्था की गयी है। इसके अलावा ग्राम महराजी से छाता पहाड़ तक नल जल योजना भी प्रारंभ की गयी है। गिरौदपुरी बस्ती और मेला सड़क, मेला स्थल, मुख्य मंदिर परिसर, चरणकुण्ड का विद्युतीकरण किया गया। गिरौदपुरी बस्ती से मंदिर प्रवेष द्वार तक के क्षेत्र में पार्किग स्थल विकसित किया गया। पूरे क्षेत्र में आकर्षक ग्लो साइन बोर्ड लगाया गया। मेला बाजार स्थल का भी समतलीकरण किया गया। मेला स्थल और मंदिर परिसर में 10 हजार पौधों का रोपण किया गया।
    विशेष कार्य-योजना के तहत वर्ष 2005-06 में मेला परिसर, चरणकुण्ड और अमृतकुण्ड में विद्युतीकरण और वृक्षारोपण के रखरखाव एवं महराजी से छाता पहाड़ तक डब्ल्यू.बी.एम. सड़क और श्रध्दालुओं की सुविधा के लिये चबूतरा निर्माण किया गया। गिरौदपुरी में लगभग 55 लाख रूपये की लागत से विश्राम गृह, सिविक सेन्टर में अतिरिक्त कमरों का निर्माण, 10-10 लाख रूपये की लागत से हाई स्कूल और माध्यमिक षाला, 55 लाख रूपये की लागत से चार यात्री षेड का निर्माण और 59 लाख रूपये की लागत से गिरौदपुरी धाम में पेयजल और निस्तार की अतिरिक्त व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही हेलीपेड स्थल तक पहुंच मार्ग, 59.28 लाख रूपये की लागत से मुख्य मार्ग से जन्म स्थली और मुख्य मार्ग से मंदिर पहुंच मार्ग तक कांक्रीटीकरण, साढे 26 लाख रूपये की लागत से डब्ल्यू.बी.एम. सड़क और वन्य जीवों के पेयजल के लिये स्टापडेम का निर्माण कराया गया है। 79 लाख 76 हजार रूपये की लागत से गिरौदपुरी बस्ती की आंतरिक मार्गों का कांक्रीटीकरण कराया गया।
इसके बाद वर्ष 2006-07 में इस विशेष कार्य-योजना के तहत मेला क्षेत्र में 10 लाख रूपये की लागत से पार्किंग स्थल विकसित किया गया। करीब 43 लाख 31 हजार रूपये की लागत से तीन यात्री षेड बनवाए गए, 23 लाख रूपये की लागत से महराजी से छातापहाड़ मार्ग में पुलिया सह स्टाप डेम का निर्माण कराया गया और महराजी तालाब का गहरीकरण कार्य भी हुआ। इसी प्रकार छातापहाड़ के पास स्थित तालाब का राहत कार्य में गहरीकरण कराया गया। सात लाख रूपये की लागत से सुलभ षौचालय का निर्माण कराया गया। छोटे षेरपंजा मंदिर से बछिया जीवन दान षोरपा तालाब तक कांक्रीट सड़क 24 लाख 83 हजार रूपये में पूर्ण किया गया है। इसके अलावा 18 लाख 17 हजार रूपये की लागत से मुख्य मार्ग से मटियाटोली तक पहुंच मार्ग और छाता पहाड़ मार्ग में डामरीकरण कराया गया। मेला क्षेत्र में 32 लाख 21 हजार रूपये की लागत से पार्किंग स्थल विकसित किया गया। महराजी के पास तालाब और ब्रिज का निर्माण किया गया। साथ ही गिरौदपुरी में 29 लाख रूपये की लागत से तालाब गहरीकरण एवं पिचिंग का कार्य पूर्ण कराया गया है। छाता पहाड़ के सौंदर्यीकरण पर 6 लाख और अनुसूचित जाति कन्या आश्रम के जीर्णोध्दार पर 10 लाख रूपये की राषि व्यय की गई है। वर्ष 2007-08 में 13 लाख 77 हजार रूपये की लागत से यात्री निवास षेड का निर्माण कराया गया है।
      वर्ष 2007-08 में 27 लाख 54 हजार रूपये की लागत से मेला परिसर में दो यात्री षेड का निर्माण किया गया। इनमें प्रत्येक पर 13 लाख 77 हजार रूपये की राषि व्यय की गई है।  वर्ष 2008-09 में गिरौदपुरी के समन्वित विकास कार्यों के लिये दो करोड़ 34 लाख रूपये की राषि आबंटित की गई है। इनमें मुख्य रूप से गिरौदपुरी में हाई मास्ट लाइट पर 19 लाख और मेला परिसर पर सीमेंन्ट कांक्रीट सड़क निर्माण पर साढे 24 लाख रूपये की राषि व्यय की गई है। मेला परिसर, महराजी से पंचकुण्डी, छाता पहाड़ एवं पंचकुण्डीय महराजी बायपास से गिरौदपुरी से छातापहाड़ तक सीमेंट कांक्रीट रोड का कार्य एक करोड़ 67 लाख रूपये की लागत से पूर्ण कर लिया गया है।
    गिरौदपुरी धाम में हर रोज दूर-दूर से आने वाले श्रध्दालुजन इस विशाल जैतखाम की निर्माण प्रक्रिया को भी काफी उत्साह और उत्सुकता से निहारते नजर आते हैं। पहले यहां पर यात्री प्रतीक्षालयों की काफी कमी थी, लेकिन अब राज्य सरकार ने इस अभाव को दूर करते हुए विशाल यात्री शेडों का निर्माण करवा दिया है। निस्तारी की भी अच्छी सुविधा विकसित की गयी है। यहां आने वाले तीर्थ यात्रियों के अनुसार कुछ वर्ष पहले तक यहां चरण कुण्ड, अमृत-कुण्ड और छाता पहाड़ आने-जाने के लिए पगडंडीनुमा उबड़-खाबड़ रास्ते हुआ करते थे, लेकिन अब चरण कुण्ड से अमृत कुण्ड तक सीढ़ीदार सुन्दर और सुगम रास्ता बन चुका है, वहीं छाता पहाड़ जाने के लिए पक्की सड़क भी बनवा दी गयी है। छाता पहाड़ चढ़ने के लिए सीढ़ीदार मार्ग तथा सौर ऊर्जा आधारित विद्युत खंभों सहित सुरक्षा की दृष्टि से रेलिंग और नाले पर पुलिया निर्माण के फलस्वरूप यहां का सौन्दर्य और भी बढ़ गया है। एक तीर्थ यात्री ने कहा कि गिरौदपुरी तक आने-जाने के लिए राज्य सरकार द्वारा बनवायी गयी सड़कों का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे अब हमारी तीर्थ यात्रा काफी सुगम हो गयी है।

इतिहास के पन्नों में गिरौदपुरी धाम

    ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार मानवता के पुजारी संत गुरू घासीदास जी का जन्म गिरौदपुरी में 18 दिसम्बर सन 1756 को हुआ था। युवा अवस्था में उन्होंने इसी गांव से लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर घने जंगलों से परिपूर्ण छाता-पहाड़ के नाम से प्रसिध्द पर्वत पर कठोर तपस्या की और गिरौदपुरी पहुंचकर लोगों को सत्य, अहिंसा, दया, करूणा और परोपकार के उपदेशों के साथ मानवता का संदेश देने लगे। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार इस ऐतिहासिक घटना को यादगार बनाने के लिए समाज की ओर से जगद्गुरू गद्दीनशीन स्वर्गीय श्री अगम दास जी (पूर्व सांसद) द्वारा वहां लगभग 74 वर्ष पहले (वर्ष 1935 में) माघ-पूर्णिमा के दिन गुरू दर्शन मेले की शुरूआत की गयी। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि मेले की शुरूआत 1935 से भी पहले हो चुकी थी, लेकिन गुरू अगम दास जी ने समाज प्रमुखों से सलाह-मशविरा कर 1935 में जनसहयोग से विधिवत पाम्पलेट छपवा कर प्रचार-प्रसार के साथ इसे और भी अधिक सुव्यवस्थित रूप से आयोजित करना प्रारंभ किया था। लगभग तीन दशक बाद वर्ष 1966 में समाज प्रमुखों द्वारा आम सहमति से लिए गए निर्णय के अनुसार गुरू दर्शन मेला हर साल फाल्गुन शुक्ल पंचमी से सप्तमी तक आयोजित किया जा रहा है। राज्य सरकार की विशेष कार्ययोजना के तहत विकास कार्यो के फलस्वरूप इस गरिमामय मेले की रौनक और भी ज्यादा बढ़ गयी है। अब तो इस तीन दिवसीय वार्षिक मेले में आने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या दस लाख से पन्द्रह लाख तक पहुंच जाती है। मेले में श्रध्दालुओं के लिए बिजली, पानी, सड़क आदि जरूरी सुविधाओं की जरूरत लम्बे समय से महसूस की जा रही थी। रमन सरकार ने इस दिशा में तत्परता से कदम उठाया और लोगों की वर्षो पुरानी मांगे पूरी हुई।

कुतुब मीनार : कुछ ऐतिहासिक तथ्य

    इतिहासकारों के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कुतुब मीनार का निर्माण कुतुबुददीन एबक ने सन 1193 ईस्वी में प्रारंभ करवाया था, लेकिन निर्माण पूर्ण होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गयी। उनके बाद इल्तुतमिश ने दिल्ली के शासक के रूप में इसके निर्माण को आगे बढ़ाया और इसमें तीन मंजिले जुड़वायी। कुतुब मीनार में किसी दुर्घटना के बाद सन 1386 ईस्वीं में उसका पुनर्निर्माण फिरोज शाह तुगलक के समय किया गया। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक कुतुब मीनार का नाम कुतुबुददीन एबक के नाम पर हुआ, जबकि कुछ इतिहासकारों का यह कहना है कि इसका नामकरण बगदाद के संत कुतुबुददीन बख्तियार काकी के नाम पर हुआ, जो इल्तुतमिश के समय भारत आए थे। इल्तुतमिश उनसे काफी प्रभावित थे।

रविवार, 5 अप्रैल 2015

लालू मुलायम महामिलन का इफेक्ट

 

 

  

जनता परिवार' में हुआ आरजेडी का विलय




बिहार की राजधानी पटना में राष्ट्रीय जनता दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के 'जनता परिवार' में विलय करने का फ़ैसला किया गया.
हालाँकि 'जनता परिवार' की इस नई पार्टी के नाम की अभी घोषणा नहीं की गई है. राजद के अध्यक्ष लालूद प्रसाद यादव ने कहा कि इस फ़ैसले की औपचारिक घोषणा मुलायम सिंह यादव करेंगे.
पूर्व जनता परिवार की प्रस्तावित नई पार्टी में जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी एक साथ आ रहे हैं.
लालू प्रसाद यादव ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद कहा कि 'विलय हो चुका है'.
उन्होंने यह भी कहा कि नई पार्टी की औपचारिक घोषणा मुलायम सिंह यादव करेंगे जो कि इन सभी कामों के लिए अधिकृत हैं.
नई पार्टी का नाम, झंडा और चुनाव चिन्ह क्या होगा, ये भी मुलायम सिंह यादव ही तय करेंगे.

बिहार में चेहरा कौन?










पूर्व जनता परिवार से नई राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान कुछ दिन पहले ही हुआ था.
लालू ने नया नारा देते हुए कहा, "एक झंडा एक निशान, भाजपा को हराने के लिए मांग रहा हिंदुस्तान."
लालू प्रसाद यादव ने यह साफ़ नहीं किया कि बिहार में नई पार्टी का नेता कौन होगा.
बिहार में पार्टी का नेता और चेहरा कौन होगा इस सवाल पर लालू ने कहा कि यह पार्टी के बन जाने के बाद तय किया जाएगा.
उधर, बिहार में जदयू के बिहार प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा कि बिहार में पार्टी का नेता कौन होगा यह सब लोग मिलकर तय करेंगे.
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड के बाग़ी नेता जीतन राम मांझी को नई पार्टी में शामिल करने के सवाल पर लालू ने कहा कि मैंने कभी भी उनके ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोला है.
उन्होंने कहा, "वह भी धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक नेता हैं. साथ आएंगे तो मिलकर काम करेंगे."
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मंगलवार, 10 मार्च 2015

लैला मजनूं की मज़ार




 प्रस्तुति-- किशोर प्रियदर्शी, उपेन्द्र कश्यप, धीरज पांडेय


भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
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लैला मजनूं की मज़ार
लैला मजनूं की मज़ार राजस्थान के गंगानगर जिले में अनूपगढ से 11 किमी की दूरी पर स्थित है। यह मज़ार लोगों को प्रेम का अमर किस्सा बयान करती प्रतीत होती है। लैला और मजनूं को भारतीय रोमियो जूलियट कहा जाता है। प्रेमी जोड़ों को भी यहां लैला मजनूं के नाम से पुकारा जाता है। एक दूसरे के प्रेम में आकंठ डूबे लैला मजनूं ने प्रेम में विफल होने के बाद अपनी जान दे दी थी। जमाने की रुसवाईयों के बावजूद सुनने में थोड़ा अजीब लगता है कि दोनों की मज़ारें बिल्कुल पास पास हैं। ख़ास बात यह है कि भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के नजदीक स्थित यह मज़ार हिन्दू मुस्लिम और भारत पाकिस्तान के भेद से बहुत ऊपर उठ चुकी है। यहां हिंदू भी आकर सर झुकाते हैं और मुस्लिम भी। भारतीय भी आते हैं और पाकिस्तानी भी। सार यह है कि प्रेम धर्म और देशों की सीमाओं से सदा सर्वदा मुक्त रहा है। आज़ादी से पूर्व भारत और पाकिस्तान एक ही थे। यह देश मुस्लिम देशों की सीमाओं से लगा हुआ था। विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान दो देश बन गए और इन दोनों देशों को परस्पर दुश्मन के तौर पर देखा गया। राजस्थान पंजाब और कश्मीर की सीमाएं पाकिस्तान से लगती हैं और समय समय पर सीमा पर तनाव की खबरें भी आती हैं। लेकिन दुश्मनी की इसी सीमा पर राजस्थान में एक स्थान ऐसा भी है जहां नफरत के कोई मायने नहीं हैं। जहां सीमाएं कोई अहमियत नहीं रखती है। यह स्थान राजस्थान के गंगानगर ज़िले की अनूपगढ तहसील के क़रीब है, जहां लैला मजनूं की मज़ारें प्रेम का संदेश हवाओं में महकाती हैं। अनूपगढ के बिजनौर में स्थित ये मज़ारें पाकिस्तान की सीमा से महज 2 किमी अंदर भारत में हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि अपने प्रेम को बचाने समाज से भागे इस प्रेमी जोड़े ने राजस्थान के इसी बिजनौर गांव में शरण ली और यहीं अंतिम सांस भी ली। इस स्थल को मुस्लिम लैला मजनूं की मज़ार कहते हैं और हिंदू इसको लैला मजनूं की समाधि कहते हैं।[1]

मृत्यु पर अनेक मत

बिजनौर के स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार लैला मजनूं मूल रूप से सिंध प्रांत के रहने वाले थे। एक दूसरे से उनका प्रेम इस हद तक बढ़ गया कि वे एक साथ जीवन जीने के लिए अपने-अपने घर से भाग निकले और भारत के बहुत सारे इलाकों में छुपते फिरे। आखिर वे दोनों राजस्थान आ गए। जहां उन दोनों की मृत्यु हो गई। लैला मजनूं की मौत के बारे में ग्रामीणों में एक राय नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि लैला के भाई को जब दोनों के इश्क का पता चला तो उसे बर्दाश्त नहीं हुआ और आखिर उसने निर्ममता से मजनूं की हत्या कर दी। लैला को जब इस बात का पता चला तो वह मजनूं के शव के पास पहुंची और वहीं उसने खुदकुशी करके अपनी जान दे दी। कुछ लोगों का मत है कि घर से भाग कर दर दर भटकने के बाद वे यहां तक पहुंचे और प्यास से उन दोनों की मौत हो गई। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि अपने परिवार वालों और समाज से दुखी होकर उन्होंने एक साथ जान दे देने का फैसला कर लिया था और आत्महत्या कर ली। दोनों के प्रेम की पराकाष्ठा की कहानियां यहीं खत्म नहीं होती है। ग्रामीणों में एक अन्य कहानी भी प्रचलित है जिसके अनुसार लैला के धनी माता पिता ने जबरदस्ती उसकी शादी एक समृद्ध व्यक्ति से कर दी थी। लैला के पति को जब मजनूं और लैला के प्रेम का पता चला तो वह आग बबूला हो उठा और उसने लैला के सीने में एक खंजर उतार दिया। मजनूं को जब इस वाकये का पता चला तो वह लैला तक पहुंच गया। जब तक वह लैला के दर पर पहुंचा लैला की मौत हो चुकी थी। लैला को बेजान देखकर मजनूं ने वहीं आत्महत्या कर अपने आप को खत्म कर लिया।[1]

लैला मजनूं मज़ार पर मेला


लैला मजनूं मज़ार
प्रेम की इस उच्च भावना को नमन करते हुए बिजनौर की इस मज़ार पर हर साल मेला भी आयोजित किया जाता है। प्रत्येक वर्ष 15 जून को लैला मजनूं की मज़ार पर भरने वाले इस मेले में बड़ी संख्या में भारतीय और पाकिस्तानी प्रेमी युगल आते हैं, प्यार की कसमें खाते हैं और हमेशा हमेशा साथ रहने की मन्नतें मांगते हैं। स्थानीय लोगों में इन दोनों मज़ारों के लिए बहुत मान्यता है। प्राचीन समय से ही हिंदू इसे पवित्र समाधि स्थल तो मुस्लिम पवित्र मजान मानकर अपनी श्रद्धा जाहिर करते आए हैं। लेकिन दोनों समुदाय ही इन मज़ारों को लैला मजनूं से जोड़कर देखते हैं और उनके प्रेम को नमन करते हैं। पहले इस मज़ारों के ऊपर एक छतरी थी। लोगों का कहना है इन मज़ारों पर उन्होंने कई चमत्कार होते देखे हैं। जो लोग यहां अपना दुख दर्द लेकर आते हैं उनके जीवन में कई अच्छी घटनाएं घटती हैं, उनकी मन्नतें पूरी होती हैं। इसी चमत्कार ने हजारों लाखों लोगों में इन मज़ारों के प्रति असीम श्रद्धा भर दी है और वे हर साल यहां नियमित रूप से आने लगे हैं। वर्तमान में यहां दोनो मज़ारें एक दूसरे से सटी हुई दिखाई देती हैं लेकिन ऊपर छतरी कालांतर में हटा दी गई या ढह गई। कारगिल युद्ध से पूर्व यह स्थान पाकिस्तानी नागरिकों के लिए भी खुला था। लेकिन युद्ध के बाद पाकिस्तानी सीमा के द्वारों को इस स्थान के लिए बंद कर दिया गया है। अतीत के इन महान प्रेमियों को भारतीय सेना ने भी पूरा सम्मान दिया है और बीएसएफ की एक नजदीकी पोस्ट का नाम ’मजनूं पोस्ट’ रखा गया है।[1]

वर्तमान में

हालांकि लंबे समय तक ये मज़ारें स्थानीय ग्रामीणों की देख रेख में ही संभाली गई। लेकिन प्रति वर्ष यहां आने वाले यात्रियों की बढती संख्या देख सरकार ने भी अब इस स्थान को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की योजना बनाई है। राजस्थान के पर्यटन विभाग ने बिजनौर की मज़ारों को सुरक्षित रखने और इनकी देखभाल करने का जिम्मा उठाया है। पर्यटन की दृष्टि से इस स्थान पर सुविधाएं जुटाने और क्षेत्र को उन्नत करने के लिए योजना बनाई जा रही है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अधिकारियों के अनुसार सीमा पर स्थित कई पर्यटन स्थलों का ब्यौरा लिया गया जिसमें लैला मजनूं की मज़ार भी शामिल है। यहां हिन्दू मालकोट की सीमा चौकी पर सुविधएं बढाने के लिए प्रस्ताव लाया गया है, लैला मजनूं की मज़ार का संरक्षण करने के लिए भी 25 लाख रूपए स्वीकृत किए गए हैं। लैला मजनूं की भावात्मक कहानी आज भी राजस्थान के जीवंत इतिहास और संस्कृति का एक गौरवपूर्ण हिस्सा है। आज भी युवा प्रेमी महसूस करते हैं कि यहां आकर कोई रूहानी ताकत उन्हें अपने प्रेम को दृढ करने का हौसला देती है, प्रेम में कुर्बान हो जाने की हिम्मत देती है, प्रेम को सभी भेदभावों और स्वार्थ से ऊंचा उठाकर एक गहरा और पवित्र रिश्ता बनाए रखने की नसीहत देती है। यहां की हवा में कुछ है जो कानों के पास सरसराकर कहती है कि प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है। [1]


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शोध


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ↑ 1.0 1.1 1.2 1.3 लैला मजनूं की मज़ार (हिंदी) pinkcity। अभिगमन तिथि: 23 अगस्त, 2013।

बाहरी कड़ियाँ

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