शनिवार, 28 नवंबर 2015

मां-पुत्र के पावन मिलन का प्रतीक श्री रेणुका जी मेला

प्रस्तुति-  स्वामी शरण



पुत्र के पावन मिलन का श्री रेणुकाजी मेला हिमाचल प्रदेश के प्राचीन मेलो में से एक है, जो हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा तक उत्तरी भारत के प्रसिद्ध तीर्थस्थल श्रीरेणुका में मनाया जाता है। जनश्रुति के अनुसार इस दिन भगवान परशुराम जामूकोटी से वर्ष में एक बार अपनी मां रेणुका से मिलने आते है। यह मेला श्रीरेणुका मां के वात्सल्य एवं पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा संगम है जोकि असंख्य लोगों  की अटूट श्रद्धा एवं आस्था का प्रतीक है। इस वर्ष यह मेला 2 नवंबर से 6 नवंबर तक परंपरागत ढंग से बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है।  यह स्थान नाहन से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर है जहां नारी देह के आकार की प्राकृतिक झील जिसे मां रेणुका जी की प्रतिछाया भी माना जाता है स्थित है। इसी झील के किनारे मां श्री रेणुका जी व भगवान परशुराम जी के भव्य मंदिर स्थित हैं। कथानक अनुसार प्राचीन काल मे आर्यवर्त में हैहयवंषी श्रत्रिय राज करते थे तथा भृगुवंशी ब्राह्मण उनके राज पुरोहित थे, इसी भृगुवंश के महर्षि ऋचिक के घर जमदग्नि का जन्म हुआ। इनका विवाह इक्ष्वाकु कुल के ऋषि रेणु की कन्या रेणुका से हुआ। महर्षि जमदग्नि सपरिवार इसी क्षेत्र मे तपस्या मग्न रहने लगे। जिस स्थान पर उन्होंने तपस्या की वह तपे का टीला कहलाता है। वैसाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को मां रेणुका ने  परशुराम को जन्म दिया। इन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। अश्वत्थामा, ब्यास, बलि, हनुमान, विभीषण, अश्वत्थामा व मारकंडेय के साथ अष्ठ चिरंजीवियों के साथ भगवान परशुराम भी चिरंजीवी हैं। महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु गाय थी जिसे पाने के लिए सभी तत्कालीन राजा ऋषि लालायित थे। राजा अर्जुन ने वरदान मे भगवान दतात्रेय से एक हजार भुजाएं पाई थी जिसके कारण वह सहस्त्रार्जुन कहलाए जाने लगा । एक दिन वह महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु मांगने पहुंच गया। महर्षि जमदग्नि ने सहस्त्रबाहु एवं उसके सैनिकों का खूब सत्कार किया तथा उसे समझाया कि कामधेनु गाय उसके पास कुबेर जी की अमानत थी जिसे किसी को नहीं दिया जा सकता। यह सुनकर गुस्साए सहस्त्रबाहु ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी। यह सुनकर मां रेणुका शोकवश राम सरोवर मे कूद गई। राम सरोवर ने मां रेणुका की देह को ढकने का प्रयास किया जिससे इसका आकार स्त्री देह समान हो गया। उधर, भगवान परशुराम महेंद्र पर्वत पर तपस्या मे लीन थे, लेकिन योगशक्ति से उन्हें अपनी जननी एवं जनक के साथ हुए घटनाक्रम का अहसास हुआ और उनकी तपस्या टूट गई। परशुराम अति क्रोधित होकर सहस्त्रबाहु को ढूंढने निकल पड़े तथा उसे आमने-सामने के युद्ध के लिए ललकारा। परमवीर भगवान परशुराम ने सेना सहित सहस्त्रबाहु का वध कर दिया।  तत्पश्चात भगवान परशुराम ने अपनी योगशक्ति से पिता जमदग्नि तथा मां रेणुका को जीवित कर दिया। माता रेणुका ने वचन दिया कि वह प्रति वर्ष इस दिन कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी को अपने पुत्र भगवान परशुराम को मिलने आया करेगी। एक अन्य कथा के अनुसार महर्षि जमदग्नि तपस्या मे लीन रहते थे। ऋषि पत्नी रेणुका पतिव्रता रहते हुए धर्म कर्म मे लीन रहती थी। वे प्रतिदिन गिरि गंगा का जल पीते थे तथा उससे ही स्नान करते थे। उनकी पतिव्रता पत्नी रेणुका कच्चे घड़े में नदी से पानी लाती थी। सतीत्व के कारण वह कच्चा घड़ा कभी नहीं गलता था। एक दिन जब वह पानी लेकर सरोवर से आ रही थी तो दूर एक गंर्धव जोड़े को देखकर वह भी क्षण भर के लिए रुक गई तथा आश्रम देरी से पहुंची। ऋषि जमदग्नि ने अंतर्ज्ञान से जब विलंब का कारण जाना तो वह रेणुका के सतीत्व के प्रति आशंकित हो गए ओैर उन्होंने एक-एक करके अपने 100 पुत्रों को माता का वध करने का आदेश दिया परंतु उनमें से केवल पुत्र परशुराम ने ही पिता की आज्ञा का पालन करते हुए माता का वध कर दिया। इस कृत्य से प्रसन्न होकर ऋषि जमदग्नि ने पुत्र से वर मांगने को कहा तो भगवान परशुराम ने अपने पिता से माता को पुनर्जीवित करने का वरदान मांगा। माता रेणुका ने वचन दिया कि वह प्रति वर्ष इस दिन डेढ़ घड़ी के लिए अपने पुत्र भगवान परशुराम से मिला करेंगी। तब से हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को भगवान परशुराम अपनी माता रेणुका से मिलने आते हैं मां-बेटे के इस पावन मिलन के अवसर से रेणुका मेला आरंभ होता है। तब की डेढ़ घड़ी आज के डेढ़ दिन के बराबर है तथा पहले यह मेला डेढ़ दिन का हुआ करता था तथा वर्तमान में लोगों की श्रद्धा व जनसेलाब को देखते हुए यह कार्तिक शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक आयोजित किया जाता है। मेला श्री रेणुका मां के वात्सल्य एवं पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा आयोजन है। पांच दिन तक चलने वाले इस मेले में आसपास के सभी ग्राम देवता अपनी-अपनी पालकी में सुसज्जित होकर मां-पुत्र के इस दिव्य मिलन में शामिल होते हैं। कई धार्मिक अनुष्ठान सांस्कृतिक कार्यक्रम हवन, यज्ञ, प्रवचन एवं हर्षोल्लास इस मेले का भाग है। हिमाचल प्रदेश, उतराखंड, पंजाब तथा हरियाणा के लोगों की इसमें अटूट श्रद्धा है। राज्य सरकार द्वारा इस मेले को अंतरराष्ट्रीय मेला घोषित किया गया है।

बाबू राम चौहान  नाहन, सिरमौर

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

रेड लाइट एरिया







प्रस्तुति-  किशोर प्रियदर्शी


दुनिया भर में वेश्यावृत्ति और वेश्यालयों की वैधता: हरे रंग की देशों और क्षेत्रों के स्थानों पर जहां वेश्यावृत्ति कानूनी और विनियमित है, नीले देशों और क्षेत्रों में जहां वेश्यावृत्ति कानूनी है लेकिन अनियमित है। और वेश्यालयों के रूप में संगठित गतिविधियों अवैध रूप से कर रहे हैं, लाल देश जहां पर वेश्यावृत्ति अवैध है।
सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ वेश्यावृत्ति का भी पूरी दुनिया में चरम उभार हो चुका है। पोस्ट मॉडर्न सोसाइटी में वेश्यावृत्ति के अलग-अलग रूप भी सामने आए हैं। रेड लाइट इलाकों से निकल कर वेश्यावृत्ति अब मसाज पार्लरों एवं एस्कार्ट सर्विस के रूप में भी फल-फूल रही है। देह का धंधा कमाई का चोखा जरिया बन चुका है। गरीब और विकासशील देशों जैसे भारत, थाइलैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि में सेक्स पर्यटन का चलन शुरू हो चुका है। जिस्मफरोशी दुनिया के पुराने धंधों में से एक है। बेबीलोन के मंदिरों से लेकर भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा वेश्यावृत्ति का आदिम रूप है। गुलाम व्यवस्था में गुलामों के मालिक वेश्याएं रखते थे। उन्होंने वेश्यालय भी खोले। तब वेश्याएं संपदा और शक्ति की प्रतीक मानी जाती थीं। मुगलों के हरम में सैकड़ों औरतें रहती थीं। जब अंग्रेजों ने भारत पर अधिकार किया तो इस धंधे का स्वरूप बदलने लगा। राजाओं ने अंग्रेजों को खुश करने के लिए तवायफों को तोहफे के रूप में पेश करना शुरू किया। पुराने वक्त के कोठों से निकल कर देह व्यापार का धंधा अब वेबसाइटों तक पहुंच गया है। इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी के मामले में पिछड़ी पुलिस के लिए इस नेटवर्क को भेदना खासा कठिन है। सिर्फ नेट पर अपनी जरूरत लिखकर सर्च करने से ऐसी दर्जनों साइट्स के लिंक मिल जाएंगे जहां हाईप्रोफाइल वेश्याओं के फोटो, फोन नंबर और रेट तक लिखे होते हैं। इन पर कालेज छात्राएं, मॉडल्स और टीवी-फिल्मों की नायिकाएं तक उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं।[1]

अनुक्रम

भारत के शीर्ष पांच लाल बत्ती क्षेत्र

कोलकाता

एशिया का सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया कोलकाता के सोनागाची में है। एक अनुमान के मुताबिक यहां करीब 11 हजार वेश्याएं कई सौ बहु मंजिला इमारतों में देह धंधा करती हैं। यह इलाका उत्तरी कोलकाता के शोभा बाजार के समीप स्थित चित्तरंजन एवेन्यू में है। इस धंधे से जुडी महिलाओं को लाइसेंस दिया गया है। बताते चलें कि भारत में जिस्मफरोशी का धंधा लगातार बढ रहा है। 1956 में पीटा कानून के तहत वेश्यावृत्ति को कानूनी वैद्यता दी गई, पर 1986 में इसमें संशोधन करके कई शर्तें जोड़ी गई। इसके तहत सार्वजनिक सेक्स को अपराध माना गया। इसमें सजा का भी प्रावधान है।[2]

दिल्ली

राजधानी दिल्ली में जी.बी रोड, नई दिल्ली यानी गारस्टिन बास्टिन रोड सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया है। सन् 1965 में इसका नाम बदल कर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग कर दिया गया। मुगलकाल में इस क्षेत्र में कुल पांच रेडलाइट एरिया यानी कोठे हुआ करते थे। अंग्रेजों के समय इन पांचों क्षेत्रों को एक साथ कर दिया गया और उसी समय इसका नाम जीबी रोड पड़ा। यहां देहव्यापार का सबसे बड़ा कारोबार होता है। नेपाल और बांग्लादेश से बड़ी संख्या में लड़कियों की तस्करी करके यहां को कोठों पर लाया जाता है। वर्तमान में एक ही कमरे में कई केबिन बनें हैं, जहां एक साथ कई ग्राहकों को सेवा दी जाती है। यहां समय-समय पर दिल्ली पुलिस छापा मारती रहती है।[3]

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में रेशमपुरा इलाका देहव्यापार के लिए जाना जाता है। सिंधिया परिवार की इस सरजमीं पर इस कारोबार में विदेशी लड़कियों के साथ मॉडल्स, कॉलेज गर्ल्स और बहुत जल्दी ऊंची छलांग लगाने की मध्यमवर्गीय महत्वाकांक्षी लड़कियों की संख्या भी बढ़ रही है। अब दलालों की पहचान मुश्किल हो गई है। बताते चलें कि इस कारोबार को चलाने के लिए बाकयादा ऑफिस खोले जा रहे हैं। इंटरनेट और मोबाइल पर आने वाली सूचनाओं के आधार पर कॉलगर्ल्स की बुकिंग होती है। ईमेल या मोबाइल पर ही ग्राहक को डिलीवरी का स्थान बता दिया जाता है। कॉलगर्ल्स को ठेके पर या फिर वेतन पर रखा जाता हैं।[4]

उत्तर प्रदेश

यूपी के मेरठ में स्थित कबाड़ी बाजार बहुत ही पुराना रेड लाइट एरिया है। यहां अंग्रेजों के जमाने से देहव्यापार किया जाता है। इन दिनों यहां पर देहव्यापार का परंपरागत धंधा अब गलत हथकंडे अपनाकर चलाया जा रहा है। हाल ही में यहां पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर छापा मारा तो दंग रह गई। एक मकान में नेपाली लड़कियों को जानवरों की तरह बंद करके रखा गया था। यहां आलमारी में कपड़ों की तरह ठूस कर लड़कियों को रखा गया था। बताते चलें कि वूमेन एंड चाइल्ड डेवलेपमेंट मिनिस्ट्री ने 2007 में एक रिपोर्ट दिया, इसके मुताबिक, 30 लाख औरतें जिस्मफरोशी का धंधा करती हैं। इममें 36 फीसदी तो नाबालिग हैं।[5]

मुंबई

मायानगरी मुंबई का कामथीपुरा रेडलाइट एरिया पूरी दुनिया में चर्चित है। यह एशिया का सबसे बड़ा और पुराना रेडलाइट एरिया है। सन 1795 में पुराने बांबे के इस इलाके में निर्माण क्षेत्र में काम करने वाली आंध्रा महिलाओं ने देह व्यापार का धंधा शुरू किया था। 1880 में यह क्षेत्र अंग्रेजों के लिए ऐशगाह बन गया। आज भी देहव्यापार के लिए इस क्षेत्र खूब जाना जाता है। यहां 2 लाख सेक्स वर्कर का परिवार रहता है, जो पूरे मध्य एशिया में सबसे बड़ा है। बताते चलें कि भारत में इन इलाकों के अलावा वाराणसी में दालमंडी, सहारपुर (यूपी) में नक्कास बाजार, मुजफ्फरपुर (बिहार) में छतरभुज स्थान, मेरठ (यूपी) में कबाड़ी बाजार और नागपुर में गंगा-यमुना हैं।[6]

यह भी देखें

जी.बी रोड, नई दिल्ली

सन्दर्भ


भारत में देह के दस बड़े बाजार






भारत में देह व्यपार के 10 एरिया जो विश्व भर में प्रसिद्ध
देह व्यापार पूरी दुनिया में आज भी महिलाओं की दैहिक स्वातंत्रता पर कलंक है. भारत जैसे देश में भी लंबे समय से महिलाएं देह व्यापार जैसे घिनौने धंधे में उतरने को मजबूर हैं. हालांकि 1956 में पीटा कानून के तहत वेश्यावृत्ति को कानूनी वैधता दी गई, पर 1986 में इसमें संशोधन करके कई शर्तें जोड़ी गईं, जिसमें सार्वजनिक सेक्स को अपराध माना गया और यहां तक कि इसमें सजा का प्रावधान भी रखा गया, लेकिन इसे विडंबना कहें कि दुर्भाग्य कि आज भी देश में कई ऐसे इलाके हैं, जहां लड़कियां ऐसा करने को मजबूर हैं. देखिए भारत के 10 ऐसे रेड लाइट एरिया, जिनकी एशिया में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में चर्चा होती है.जीबी रोड दिल्‍ली राजधानी दि‍ल्ली स्थित जीबी रोड का पूरा नाम गारस्टिन बास्टिन रोड है. यह राजधानी दिल्ली का सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया है. हालांकि इसका नाम सन् 1965 में बदल कर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग कर दिया गया. इस इलाके का भी अपना इतिहास है. बताया जाता है कि यहां मुगलकाल में कुल पांच रेडलाइट एरिया यानी कोठे हुआ करते थे. अंग्रेजों के समय इन पांचों क्षेत्रों को एक साथ कर दिया गया और उसी समय इसका नाम जीबी रोड पड़ा. जानकारों के मुताबिक देहव्यापार का यहां सबसे बड़ा कारोबार होता है, और यहां नेपाल और बांग्लादेश से बड़ी संख्या में लड़कियों की तस्करी करके यहां को कोठों पर लाया जाता है. वर्तमान में एक ही कमरे में कई केबिन बनें हैं. कमाठीपुरा मुंबई फैशन, फिल्मों और बिजनेस का शहर मायानगरी मुंबई का एक इलाका कमाठीपुरा पूरी दुनिया के सबसे प्रमुख रेडलाइट एरिया में चर्चित है. बताया जाता है कि यह एशिया का सबसे पुराना रेडलाइट एरिया है. इस एरिये का इतिहास सन् 1795 मे पुराने बॉम्बे के निर्माण से शुरू होता है. बताया जाता है कि इस इलाके में निर्माण क्षेत्र में काम करने वाली आंध्रा महिलाओं ने यहां देह व्यापार का धंधा शुरू किया था और कुछ ही सालों, यानी की 1880 में यह क्षेत्र अंग्रेजों के लिए ऐशगाह बन गया. कमाल की बात यह है कि आज भी यह देहव्यापार के लिए इस क्षेत्र को पूरे देश में बखूबी जाना जाता है. एक अनुमान के मुताबिक यहां तकरीबन 2 लाख सेक्स वर्कर्स का परिवार रहता है, जो पूरे मध्य एशिया में सबसे बड़ा है. सोनागाछी कोलकाता: देश के पूर्वी भाग के सबसे बडे महानगर सोनागाछी को एशिया का सबसे बड़ा रेडलाइट एरिया माना जाता है. अनुमान के मुताबिक यहां कई बहुमंजिला इमारते हैं, जहां करीब 11 हजार वेश्याएं देह व्यापार में लिप्त हैं. उत्तरी कोलकाता के शोभा बाजार के पास स्थित चित्तरंजन एवेन्यू में स्थित इलाके में वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं को बाकायदा लाइसेंस दिया गया है. यहां इस व्यापार को कई तरह के समूह चलाते हैं, जिन्हें एक तरह से गैंग कहा जाता है. एक अनुमान के मुताबिक इस स्लम में 18 साल से कम उम्र की करीब 12 हजार लड़कियां सेक्स व्यापार में शामिल हैं ग्वालियर: मध्य प्रदेश में एक तरह से सिंधिया परिवार की सरजमीं पर ग्वालियर में रेशमपुरा एक बड़ा रेडलाइट इलाका है. यहां देह व्यापार के लिए विदेशी लड़कियों के साथ मॉडल्स, कॉलेज गर्ल्स भी हैं. यहां एक तरह से कॉलेज गर्ल्स के लिए बाकायादा ऑफिस खोले जाने लगे हैं. इंटरनेट और मोबाइल पर आने वाली सूचनाओं के आधार पर कॉलगर्ल्स की बुकिंग होती है. ईमेल या मोबाइल पर ही ग्राहक को डिलीवरी का स्थान बता दिया जाता है. कॉलगर्ल्स को ठेके पर या फिर वेतन पर रखा जाता हैं. मीर गंज इलाहबाद: यूं तो इलाहाबाद गंगा, जमुना और सरस्वती के संगम के चलते प्रयागराज तीर्थ के रूप में पूरे भारत में प्रसिद्ध है. लेकिन यहां बाजार चौक में मीरगंज इलाके में स्थित इतिहास एक रेडलाइट ऐरिया है जो तकरीबन डेढ़ सौ साल पुराना है. यहां की पुरानी इमारतों से ढकी हुई बंद गलियों में आपको यहां का वेश्याबाजार दिखाई देगा. हर घर के बाहर सज-धज कर तैयार महिलाएं हर आने जाने वाले को अपने पास बुलाती नजर आ जाएंगी. जानकारी के अनुसार यहां पर पहले कोठे चलते थे और यहां पुराने जमीदार मुजरा देखने आते थे. यहां अवैध तरीके से देह व्‍यापार होता है. कभी पूरे देश में कभी शिक्षा का केंद्र रहा इलाहबाद यहां स्थित मीरगंज इलाके में स्थित कोठे के लिए भी प्रसिद्ध है. शिवदासपुर, वाराणसी: दुनिया के प्राचीन शहरों में से एक वाराणसी एक तरह से हिंदुओं का सबसे पवित्र तीर्थ है, लेकिन यहां देह व्यापार का इतिहास भी कई पुरानी गलियों में दिखाई देता है. यहां की दालमंडी और शिवदासपुर जैसे इलाके सालों पुराने देह व्यापार की मंडिया हैं. शिवदासपुर वाराणसी रेलवे स्टेशन से तकरीबन 3 किलोमीटर दूर स्थित इलाका यहां के रेडलाइट इलाके के रूप में फेमस है. यह एक तरह से यूपी का सबसे बड़ा रेडलाइट इलाका है. इसी तरह यहां स्थित दालमंडी इलाका भी तमाम तरह के कानूनी पाबंदियों के बाद भी आज भी चल रहा है. यहां की तंग गलियों में घर के बाहर खड़ी लड़कियां ग्राहकों को उसी पारंपरिक तरीके से रिझाती नजर आती हैं, जैसे एक समय यहां चलने वाले कोठे में पारं‍परिक रूप से चलन में था. बुधवार पेठ पुणे: पुणे का बुधवार पेठ स्‍थान भी देश के फेमस रेडलाइट ऐरिया में से एक है. यहां बड़ी संख्‍या में नेपाली लड़कियां देह व्‍यापार मे संलिप्‍त हैं गंगा-जमुना नागपुर: महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में इतवारी इलाके में गंगा-जमुना इलाका है, जहां वेश्यावृत्ति चलती है. यह इलाका देह व्यापार के लिए जाना जाता है. चतुरभुज स्‍थान मुजफ्फरपुर: बिहार का मुजफ्फरपुर इलाका राज्य के बड़े रेडलाइट इलाकों में से एक है. बताया जाता है कि उत्तरी बिहार का यह सबसे बड़ा रेडलाइट इलाका है. मेरठ कबाड़ी बाजार: पश्चिमी यूपी के बड़े शहर मेरठ में स्थित कबाड़ी बाजार बहुत ही पुराना रेड लाइट एरिया है. यहां अंग्रेजों के जमाने से देहव्यापार किया जाता है. यहां देह व्‍यापार के धंधे मे अधिकांश नेपाली लड़कियां ही ह

सोमवार, 16 नवंबर 2015

बाल मां






 

 

 

 

अजूबा - लीना मदीना जो की मात्र पांच साल की उम्र में बन गई थी स्वस्थ बच्चे की माँ



Lina Medina
लीना मदीना, बच्चे के जन्म के तुरंत बाद  Image Credit 


हाल ही में ब्रिटेन में हाई स्कूल में पढ़ने वाली एक लड़की 12 साल की उम्र में माँ बनी है। उसे ब्रिटेन की सबसे कम उम्र की माँ का दर्ज़ा मिला है।  लेकिन यदि हम बात विशव स्तर पर करें तो यह खिताब पेरू (Peru)  की लीना मदीना (Lina Medina) के नाम दर्ज़ है जो मात्र पांच वर्ष सात महीने में एक स्वस्थ बच्चे की माँ बन गई थी। यह घटना चिकित्सा विज्ञान के लिए आज तक भी एक पहेली है की आखिर कैसे इतनी कम उम्र की बच्ची गर्भवती हुई और एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।



Lina Medina
लीना मदीना अपने बच्चे के साथ Image Credit 
































कहानी लीना मदीना की :
लीना मदीना का जन्म पेरू के तिक्रापो में 27 सितम्बर 1933 को एक सुनार,टिबुरेलो मदीना और विक्टोरिया लोसिया के यहाँ हुआ था। लीना जब मात्र पांच साल की थी तब उसके पेट का आकार बढ़ने लगा जिससे उसके माता-पिता चिंतित हो गए। चुकी तिक्रापो एक ग्रामीण इलाका था इसलिए वो उसे उस समय पर स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, एक स्थानीय ओझा के पास परामर्श लेने के लिए ले गये। ओझा ने कई झाड़-फूँक और अनुष्ठान किए पर कोई फायदा नहीं हुआ। पेट का आकार निरंतर बढ़ता रहा।


Lina Medina
यह लीना मदीना की गर्भावस्था के दौरान ली गई एक मात्र तस्वीर है।  Image Credit  
लाचार माता पिता उसे किसी चिकित्सक को दिखाने पास के पिस्को शहर के एक अस्पताल ले गए । शुरु ने सभी ने यही सोचा कि उसके पेट में रसौली थी, लेकिन डॉक्टर उसके परीक्षण के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि वो सात माह की गर्भवती थी। डा. जेरार्दो लोज़ादा लीना की गर्भावस्था की पुष्टि के लिए उसे अन्य विशेषज्ञों को दिखाने, लीमा ले गये। वहां पर भी उसके गर्भवती होने की पुष्टि हुई।

आखिरकार 14 मई 1939 को, मदीना ने सीज़ेरियन शल्यक्रिया के द्वारा एक लड़के को जन्म दिया क्योंकि सामान्य प्रसूति उसकी कोख (श्रोणि) के छोटे आकार के कारण संभव नहीं थी। शल्यक्रिया डा. लोज़ादा और डॉ. बुसालिऊ द्वारा की गयी थी।


Lina Medina
लीना मदीना अपने बच्चे के साथ Image Credit 
मात्र ढाई साल में हो गई थी रजस्वला :
लीना की कहानी विस्तार से उस समय के मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई थी जिसके अनुसार लीना को मात्र ढाई साल की उम्र से ही पीरियड आने शुरू हो गए थे,  चार साल की उम्र तक उसके स्तनों का विकास पूर्ण हो चुका था। पांच साल की उम्र तक उसकी कोख का चौड़ी होना और अस्थि परिपक्वण भी काफी हद तक हो चुका था। जब बच्चे के लिए डॉकटरों ने उसका ऑपरेशन किया तो उन्होंने भी पाया की उसके शरीर के अंदर प्रजनन अंगों का विकास पूर्ण हो चूका था।


Lina Medina
तुसाद म्यूज़ियम में लीना मदीना और उसका बच्चा   Image Credit 
लीना के बेटे का नाम, डॉ. जेरार्दो के नाम पर जेरार्दो रखा गया। जन्म के समय जेरार्दो का वजन 2.7 किलो था। बचपन में जेरार्दो की परवरिश लीना के एक भाई के रूप में की गयी थी, लेकिन जब वो 10 साल का हुआ तो उसे इस बात का पता चला कि मदीना उसकी माँ थी। 1979 में जेरार्दो की 40 साल की उम्र में एक अस्थि मज्जा रोग के कारण मृत्यु हो गई। युवावस्था में, लीना ने डॉ. लोज़ादा के लीमा में स्थित क्लिनिक में एक सचिव के रूप में काम किया, जिन्होने उसे और उसके बेटे को शिक्षा प्राप्त करने में मदद की।बाद में लीना ने राउल जुरादो से विवाह किया जो 1972 में जन्मे उसके दूसरे बेटे का पिता बना। 2002 तक यह दंपत्ति लीमा की एक गरीब बस्ती "शिकागो चिको" ("छोटी शिकागो") में रहते थे। लीना ने इस बारे में कभी भी कोई इंटरव्यू नहीं दिया यहाँ तक की 2002 में लीना ने रायटर्स को भी साक्षात्कार देने से इनकार कर दिया।


Lina Medina
लीना मदीना अपने बच्चे और पति के साथ  Image Credit 
बच्चे के पिता का कभी नहीं चला पता :
लीना ने कभी भी अपने बच्चे के पिता का नाम और उन परिस्थितियों जिनमें वो गर्भवती हुई का खुलासा नहीं किया। डॉ. एस्कोमेल के अनुसार खुद लीना को भी यह बातें ठीक से पता नहीं थीं।डॉ. जेरार्दो ने लीना की गर्भावस्था का पता चलने पर पुलिस को सूचित किया और लीना के पिता को बलात्कार और अनाचार के संदेह पर गिरफ्तार किया गया, लेकिन बाद में सबूतों के अभाव में उसे रिहा कर दिया गया। उसके बाद उसके 11 वर्षीय मंदबुद्धि भाई को भी गिरफ्तार किया गया पर उसे भी सबूतों के अभाव में रिहा कर दिया गया। मामले की समीक्षा में छपे एक 1955 लेख के अनुसार, "कुछ एंडियन गांवों में जिनमे से लीना का गांव भी एक था अक्सर उत्सव मनाये जाते थे और इन उत्सवों के अंत में सामूहिक तौर पर यौन संबंध बनाये जाते थे और इस दौरान बहुत सी लड़कियों के साथ बलात्कार भी किया जाता था, हो सकता है ऐसे ही किसी उत्सव में लीना के साथ भी शारीरिक सम्बन्ध बने हो।


Lina Medina
लीना मदीना डॉक्टर और अपने बच्चे के साथ Image Credit 


इस तरह से यह केस चिकित्सा विज्ञान के लिए एक अबूझ पहेली बनकर रह गया जो की अपने तमाम तर्कों के बाबजूद भी यह नहीं बता पाए की आखिर कैसे 5 साल की एक बच्ची माँ बन गई।

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मंगलवार, 10 नवंबर 2015

मेरठ की देह मंडी

 

 

 



सलीम अख्तर सिद्दीकी


सरकार और मीडिया महिला सशक्तिकरण की बहुत बातें करते हैं। नामचीन महिलाओं का उदाहरण देकर कहा जाता है कि महिला अब पुरूषों से कमतर नहीं हैं। लेकिन जब किसी गरीब, लाचार और बेबस लड़की के बिकने की दास्तान सामने आती है तो महिला सशक्तिकरण की धज्जियां उड़ जाती हैं। 24 जून को पष्चिम बंगाल की 25 साल की मौसमी को पष्चिम बंगाल से खरीदकर लाया गया। उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। मौसमी को अपने बेचे जाने की भनक लगी तो वह किसी तरह वहषियों के चंगुल से निकल भागी। कुछ लोगों ने उसे मेरठ के नौचंदी थाना पहुंचाया। लड़की केवल बंगला में ही बाते कर रही थी। 'संकल्प' संस्था की निदेषक श्रीमती अतुल षर्मा तथा उनकी सहयोगी कादम्बरी कौषिक ने थाने पहुंचकर कलकत्ता स्थित अपने एक कार्यकर्ता से मौसमी की बात करायी। कार्यकर्ता ने हिन्दी में मौसमी की व्यथा को बयान किया। इससे पहले भी मेरठ में लड़कियां के बिकने की खबरें आती रही हैं। संकल्प की अतुल षर्मा बताती हैं कि मेरठ लड़कियों की खरीद-फरोख्त की मंडी बन चुका है। श्रीमती अतुल बताती हैं कि वे अब तक 131 लड़कियों को बिकने से बचा चुकी हैं। लड़कियों को दिल्ली के जीबी रोड तथा मेरठ के कबाड़ी बाजार स्थित रेड लाइट एरिया मे ंखपाया जाता है।
दरअसल, मेरठ ही नहीं, पूरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश लड़कियों की खरीद-फरोख्त और देह व्यापार का अड्डा बन गया है। ये लड़कियां नेपाल, असम, बंगाल, बिहार, झारखंड मध्य प्रदेश तथा राजस्थान आदि प्रदेशों से खरीदकर लायी जाती हैं। पिछले साल के शुरू में ÷एंटी ट्रेफिकिंग सेल नेटवर्क' का एक दल झारखंड से तस्करी से लायी गयीं 602 महिलाओं को खोजने मेरठ आया था। सेल नेटवर्क की अध्यथ रेशमा सिंह ने बताया था कि पिछले पांच से छः वर्षों के दौरान पश्चिमी यूपी में लगभग 6 हजार महिलाएं तस्करी से लाकर बेची जा चुकी हैं। इनमें से कुछ 15 से 16 तथा कुछ 20 से 22 साल की आयु की थीं। उन्होंने बताया कि झारखंड के लोगों के लिए मेरठ मंडल ही यूपी है। झारखंड के बोकारो, हजारी बाग, छतरा और पश्चिम सिंह भूम जिलों में महिलाओं की हालत सबसे खराब है। इन्हीं जिलों से महिलाओं की तस्करी सबसे अधिक होती है।
मेरठ की बात करें तो पिछले दिसम्बर 2007 तक सरकारी आंकडों के अनुसार 419 बच्चों के गायब होने की रिपोर्ट है। इनमें से विभिन्न आयु वर्ग की 270 लड़कियां हैं। लड़कियों के बारे मे पुलिस शुरूआती दिनों में प्रेम प्रसंग का मामला बनाकर गम्भीरता से जांच नहीं करती है। निठारी कांड के बाद गायब हुए बच्चों की तलाश के लिए बड़ी-बड़ी बातें की गयी थीं। लेकिन निठारी कांड पर धूल जमने के साथ ही गायब हुऐ बच्चों की तलाश के अभियान पर भी ग्रहण लग गया है।
मेरठ महानगर के रेड लाइट एरिया में ही दिसम्बर 08 तक लगभग 1800 सैक्स वर्कर थीं। इनमें लगभग 1160 केवल 12 से लेकर 16 वर्ष की नाबालिग बच्चियां हैं, जिन्हें अन्य प्रदेशों से लाकर जबरन इस धंधे में लगाया गया है। जब से यह कहा जाने लगा है कि कम उम्र की लड़कियों से सम्बन्ध बनाने से एड्स का खतरा नहीं होता, तब से बाल सैक्स वर्करों की संख्या में इजाफा हुआ है। देह व्यापार में उतरते ही इन लड़कियों के शोषण का अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है। दलालों और कोठा संचालकों का उनकी हर सांस और गतिविधि पर कड़ा शिकंजा रहता है। यदि कोई लड़की भागने की कोशिश करती है तो उस पर भयंकर अत्याचार किए जाते हैं। शारीरिक हिंसा, लगातार गर्भपात, एड्स, टीबी तथा हैपेटाइटिस बी जैसी बीमारियां इनका भाग्य बन जाती हैं।
मेरठ के रेड लाइट एरिया में ऐसी अनेकों लड़कियां हैं, जो इस धन्धे से बाहर आना चाहती हैं। लेकिन माफिया उन्हें धन्धे से बाहर नहीं आने देना चाहते। वे अगर बाहर आ भी जाती हैं तो उनके सामने सबसे सवाल यह रहता है कि क्या समाज उन्हें स्वीकार करेगा। ऐसे भी उदाहरण हैं कि किसी सैक्स वर्कर ने इस दलदल से मुक्ति चाही, लेकिन दलाल उसे फिर देह व्यापार के दलदल में वापस खींच लाये। पिछले दिनों मेरठ के रेड लाइट एरिया की जूही नाम की सैक्स वर्कर ने सुरेश नाम के लड़के से कोर्ट मैरिज कर ली। लेकिन कोठा संचालिका और दलालों को जूही का शादी करना अच्छा नहीं लगा। उसे जबरदस्ती फिर से कोठे पर ले जाने का प्रयास किया गया, जो असफल हो गया। लेकिन जूही एक अपवाद मात्र है। धन्धे से बाहर आने की चाहत रखने वाली हर सैक्सवर्कर की किस्मत जूही जैसी नहीं होती।
हालिया आंकड़ों के अनुसार पश्चिमी यूपी में लड़कियों की जन्म दर में सात से आठ प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी है। इसके अलावा इस क्षेत्र में कुछ जातियों में विशेष कारणों से हमेशा ही अविवाहित पुरुषों की संख्या अधिक रही है। इसलिए यहां पर महिलाओं की खरीद-फरोख्त का धंधा बढ़ता जा रहा है। अपने लिए दुल्हन खरीद कर लाये एक अधेड़ अविवाहित ने बताया कि ÷दिल्ली में एक दर्जन से भी अधिक स्थानों से नेपाल, बिहार, बंगाल, झारखंड तथा अन्य प्रदेशों से लायी गयी लड़कियों को मात्र 15 से 20 हजार में खरीदा जा सकता है।' दिल्ली में यह सब कुछ ÷प्लेसमेंट एजेंसियों' के माध्यम से हो रहा है। इन्हीं प्लेसमेंट एजेंसियों के एजेन्ट आदिवासियों वाले राज्यों में नौकरी-रोजगार देने का लालच देकर लाते हैं और उन्हें ÷जरूरतमंदों' को बेच देते हैं। ये एजेंसियां इन लड़कियों के नाम-पते भी गलत दर्ज करते हैं ताकि इनके परिवार वाले इन्हें ढूंढ न सकें। अधेड़ लोग सन्तान पैदा करने के लिए तो कुूछ मात्र अपनी हवस पूरी करने के लिए इन लड़कियों को खरीदते हैं। कुछ सालों के बाद इन लड़कियों को जिस्म फरोशी के धंधे में धकेलकर दूसरी लड़की खरीद ली जाती है। कुछ पुलिस अधिकारी यह मानते हैं कि लड़कियों को बंधक बनाकर उन्हें पत्नि बनाकर रखा जाता है, लेकिन लड़की के बयान न देने के कारण पुलिस कार्यवाई नहीं कर पाती है। लड़कियों की खरीद-फरोख्त तथा देह व्यापार एक वुनौती बन चुका है। इस व्यापार में माफियाओं के दखल से हालात और भी अधिक विस्फोटक हो गये हैं। सैक्स वर्करों को जागरूक करने का कार्य करने वाले गैर सरकारी संगठनों को इन माफियाओं से अक्सर जान से मारने की धमकी मिलती रहती है। ÷संकल्प÷ की निदेशक अतुल शर्मा को कई दलाल जान से मारने की धमकी दे चुके हैं।
कुछ जातियों में देह व्यापार को मान्यता मिली हुई है। यदि ऐसी जातियों को छोड़ दिया जाये तो देह व्यापार में आने वाली अधिकतर लड़कियां मजबूर और परिस्थितियों की मारी होती हैं। प्यार के नाम ठगी गयीं, बेसहारा और विधवाएं। आजीविका का उचित साधन न होने। बड़े परिवार के गुजर-बसर के लिए अतिरिक्त आय बढ़ाने के लिए। अकाल अथवा सूखे के चलते राहत न मिलना, परिवार के मुखिया का असाध्य रोग से पीड़ित हो जाना। परिवार का कर्जदार होना, जातीय और साम्प्रदायिक दंगों में परिवार के अधिकतर सदस्यों के मारे जाने आदि देह व्यापार में आने की मुख्य वजह होती हैं। किसी देश की अर्थ व्यवस्था चरमरा जाना भी देह व्यापार का मुख्य कारण बनता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद आजाद हुऐ कुछ देशों की लड़कियों की भारत के देह बाजार में आपूर्ति हो रही है। एक दशक पहले के आंकड़ों पर नजर डालें तो दिल्ली, कोलकाता, चैन्नई, बंगलौर और हैदराबाद में सैक्स वर्करों की संख्या लगभग सत्तर हजार थी। एक दशक बाद यह संख्या क्या होगी इसकर केवल अंदाजा लगाया जा सकता है।
देह व्यापार में केवल गरीब, लाचार और बेबस औरतें और लड़कियां ही नहीं हैं। देह व्यापार का एक चेहरा ग्लैमर से भरपूर भी है। सम्पन्न घरों की वे औरतें और लड़कियां भी इस धन्धे में लिप्त हैं, जो अपने अनाप-शनाप खर्चे पूरे करने और सोसाइटी में अपने स्टेट्स को कायम रखने के लिए अपनी देह का सौदा करती हैं। मेरठ के ट्रिपल मर्डर की सूत्रधार शीबा सिरोही ऐसी ही औरतों के वर्ग से ताल्लुक रखती है, जो पॉश कालोनी के शानदार फ्लैट में रहती हैं और लग्जरी कारों का इस्तेमाल करती हैं। भूमंडलीकरण के इस दौर में नवधनाढ़यों का एक ऐसा वर्ग तैयार हुआ है, जो नारी देह को खरीदकर अपनी शारीरिक भूख को शांत करना चाहता है। इन धनाढ़यों की जरूरतों को पूरा करने का साधन ऐसी ही औरतें और लड़कियां बनती हैं।
समाज का एक बर्ग यह भी मानता है कि रेड लाइट एरिया समाज की जरूरत है। इस वर्ग के अनुसार भारत की आबादी का लगभग आधा हिस्सा युवा है और इस युवा वर्ग के एक बड़े हिस्से को अनेक कारणों से अपनी शारीरिक जरूरत पूरी करने के लिए रेड लाइट एरिया की जरूरत है। सर्वे बताते हैं कि जहां रेड लाइट एरिया नहीं हैं, वहां बलात्कार की घटनाओं में इजाफा हुआ है।
सैक्स वर्करों की बीच काम करने वाली गैर सरकारी संस्थाओं के सामने देह व्यापार को छोड़कर समाज की मुख्य धारा में आने वाली लड़कियों का पुनर्वास एक बड़ी चुनौती होता है। हालांकि सरकार सैक्स वर्करों के पुनर्वास के लिए कई योजाएं चलाती है। लेकिन सैक्स वर्करों के अनपढ़ होने, स्थानीय नहीं होने तथा दलालों के भय से वे योजना का लाभ नहीं उठा पाती हैं। कुछ गैर सरकारी संगठन वेश्यावृत्ति के उन्मूलन के लिए सार्थक प्रयास तो कर रहे हैं लेकिन उन्हें समाज, प्रशासन और पुलिस का उचित सहयोग और समर्थन नहीं मिल पाता। गैर सरकारी संगठनों को व्यापक शोध करके सरकार को सुझाव दें कि जो लड़कियां देह व्यापार से बाहर आना चाहती हैं, उनका सफल पुनर्वास कैसे हो।

समाजवाद बबूआ कबहूं ना आई- -3


 

 

 

देसी देह की विदेसी मंडी

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Bargirls Dancing - Photo IndianExpress
बारबालाएं मुंबई की – तस्वीर साभार – इंडियन एक्सप्रेस
बारबालाएं देश की सुरक्षा के लिए बनीं खतराआतंकी उठा सकते हैं बारबालाओं का फायदा
हजारों करोड़ की काली अर्थव्यवस्था
भारत सरकार को लग रहा है खासा चूना
मुंबई और आसपास के इलाकों में भले बारबालाओं के ठुमकों पर प्रतिबंध लग गया हो… भले ही बारबालाओं की मदमस्त अदाओं के बीच उनके हाथों शराब के छलकते प्याले पीने की स्थिति न बने… मुंबई की रातें रंगीन करने वाली बारबालाओं की दुनिया उजाड़ दिखाई दे… सच तो कुछ और ही है…. आज बारबालाएं न केवल लाखों रुपए के वारे-न्यारे कर रही हैं बल्कि खुफिया एजंसियों की चिंता बढ़ा रही हैं। अब उनके माफिया और आतंकवादियों के हाथों का खिलौना होने की बात से भी इंकार नहीं किया जा रहा है। बारबालाएं विदेशों में कितनी कमाई कर रही हैं और कितनी परेशानहाल हैं, पूरे सिलसिले की पड़ताल की है विवेक अग्रवाल ने।
एक जिस्म का लड़की होना… लड़की होना, ऊपर से बार डांसर होना… इस पर भी गर्म गोश्त के सौदागरों के चंगुल में फंस जाना… निशा जैसी लड़कियों की कहानी यही बताती है कि पैसों की चकाचौंध से भरा ये कारोबार, कुछ और नहीं बल्कि मौत का जाल है। मुंबई समेत तमाम खाड़ी देशों में हर साल ढाई लाख से अधिक निशाएं जाती हैं… और वे टीपू सरीखे देह के धंधेबाजों के जाल में फंस कर सिसकती – रोती – बिलखती जिंदगी जीती हैं… कुछ मर भी जाती हैं… तिलतिल कर रोज मरती इन लड़कियों की जिंदगी में बहता है तो बस दर्द का दरिया… जो इनकी मांओं का सीना हर दिन.. हर पल चाक करता है।
अगस्त 2005 में महाराष्ट्र के डांस बारों पर महाराष्ट्र सरकार ने पुलिस (अमेंडमेंट) बिल पास कर लगाई पाबंदी ने एक रात में तकरीबन डेढ़ लाख बारबालाओं को बेरोजगार कर दिया। इसमें से तकरीबन 20 हजार खाड़ी देशों में काम मिला तो वे मोटी कमाई के लालच में चल दीं। कुछ साल पहले तक खाड़ी देशों के डांस बारों में रूस व पूर्वी यूरोप की लड़कियों का सिक्का था, अब उनकी जगह पूरी तरह भारतीय बारबालाओं ने ले ली है। ये लड़कियां अमूमन उत्तरप्रदेश और राजस्थान के बेड़िया, मध्यप्रदेश की बांछड़ा जनजातियों की हैं। मुस्लिम समुदाय की भी लड़कियां बहुतायत में जाती हैं।
खाड़ी देशों के डांस बारों में नाचने के लिए दो से तीन हजार लड़कियां हर दिन जाती हैं। उनमें से 50 फीसदी नाबालिग होती हैं और उनके पासपोर्ट पर गलत उम्र दर्ज होती है। ये लड़कियां 14 से 18 साल उम्र की भी होती हैं लेकिन पासपोर्ट पर 21 साल या अधिक उम्र लिखवाते हैं।
सरकार डांस बार बंद करने में कामयाब रही लेकिन बारबालाओं हेतु रोजगार जुटाने में नाकामयाब रही। अंधेरी के एक बार मालिक कहते हैं कि बारबालाएं ही नहीं हैं तो धंधा क्या खाक होगा। मेरा धंधा 60 फीसदी कम हो गया। हम पैसे कमाने के लिए बारबालाओं को विदेश भेज रहे हैं। इन्हें एजंट हमारे बार से ले जाते हैं तो कुछ आमदनी हो जाती है।
दुबई में बॉलीवुड गीतों पर नाचने वाली बारबालाओं की खासी मांग है जिससे वहां भारतीय लड़कियों का अच्छा धंधा होता है। यह भी होता है कि मलयालीभाषियों को आकर्षित करने के लिए खाड़ी देशों के बार मालिक केरल के पारंपरिक परिधानों में भी उन्हें नाचने के लिए कहते हैं।
बारबालाएं मुंबई की - तस्वीर साभार - राईटर्स
बारबालाएं मुंबई की – तस्वीर साभार – राईटर्स
दुबई, ब्रिटेन के शहर लंदन, सिंगापुर, बहरीन, अबूधाबी, अजमान, रासलखेमा, मस्कट, मलेशिया जैसे देशों में हर दिन का आना-जाना हो गया है हिंदुस्तानी बारबालाओं का। क्योंकि यहां लगते हैं हर रात मौज के मेले। और मुंबई में छमछम करने वाली छमिया इन दिनों हुस्न के जलवे यहां बिखेर रही हैं। कभी-कभार ये अमरीका के चक्कर भी लगाती हैं। कोई दलाल या आर्गनाईजर वहां उनकी छमछम के लिए खासतौर पर कुछ समय हेतु एक बंगला लेकर यह काम करवाता है। सिंगापुर, यूएस, यूके, बैंकॉक, थाईलैंड के लिए लड़कियां पूरे साल भेजी जाती हैं।इन देशों के होटलों में छमछम का मायाजल ही नहीं रचा जाता बल्कि इन देहजीवाओं को अनजान शहर में अकेले रहते दिलों को बहलाने का काम भी सौंपा जाता है। इन देशों के कुल 2,000 होटलों में ये काम धड़ल्ले से जारी है। दुबई में लगभग 300 होटलों में यह काम होता है। हमारी जांच में सामने आया है कि मस्कट में लगभग 200 होटलों में तो रासलखेमा के दो होटलों में ये काम होता है। सूत्रों के मुताबिक बहरीन और मस्कट वे देशों में लड़कियों की पहले चिकित्सा जांच प्रमाण पत्र देने होते हैं।
ब्रिटेन के शहर लंदन का काम बंगलों में होता है जो किराए पर लिए जाते हैं। लंदन में प्राईवेट पार्टियों के नाम पर देह बेचने का कारोबार धड़ल्ले से होता है। पहले लंदन का वीजा आसानी से मिलता था लेकिन जबसे भारत में बमकांडों का सिलसिला शुरू हो गया है… और लंदन भी आतंकियों के निशाने पर आया है, वीजा कम मिलने लगे हैं। ऐसे में मुंबईया फिल्मों के शोज के नाम पर बारबालाओं के दस्तों को देह की मंडी में लंदन के बंगलों में सजाया जाता है, जहां वे तीन से छह माह तक लोगों की रातें हसीन बना कर लौटती हैं। लंदन में अधिकांशत शोज साऊथ हॉल इलाके में होते हैं क्योंकि वहां भारतीय, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी नागरिकों की बहुलता है। भारतीय नागरिकों में भी पंजाब व हरियाणा के लोगों की अधिकता होने से दलाल पंजाबी लड़कियां अधिक संख्या में भेजते हैं।
वीजा की भी अपनी कहानी है। तीन महीने के टूरीस्ट वीजा पर इन देहजीवाओं को भेजा जाता है। अब दुबई में थोड़ी कठिनाई आने लगी है इसलिए वर्क वीजा पर भी बारबालाओं कियों को भेजा जा रहा है। दुबई की बल्दिया (महानगरपालिका) कोटे के वीजा देती है जिसे अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता। कई आर्गनाईजर इसका भी उल्लंघन करने से बाज नहीं आते हैं क्योंकि लंगोट के कच्चे शेखों के लिए भारतीय हुस्न की सप्लाई अबाधित हो, इसके कारण वे भी यह गंदा धंधा चलने देते हैं। कुछ हद तक पैसा भी काम करता ही है। वीजा लगवाने के अलग दलाल होते हैं। वे एक वीजा लगवाने के लिए 5,000 रुपए लेते हैं।
बारबालाएं मुंबई की - तस्वीर साभार - डीएनए
बारबालाएं मुंबई की – तस्वीर साभार – डीएनए
ये लड़कियां दो तरह के वीजा पर विदेश जाती हैं। पहला टूरिस्ट वीजा है जो 3 माह के लिए होता है। उन्हें सांस्कृतिक कार्यक्रम करने वाले कलाकारों के विशेष वीजा पर दलाल ले जाते हैं। कई बार महज घूमने के बहाने जाती हैं तो कई बार रिश्तेदारों से मिलने के नाम जाती हैं।हर लड़की के लिए तय नियम है कि जितना पैसा भारत में बतौर बयाना या एडवांस लेगी, उसका 6.5 गुना विदेश में काम करके चुकाना होगा। लड़कियों को पूरा पैसा नकद में मिलता है। दलालों को दलाली नकद में मिलती है। जो रकम नाचते समय या देह बेच कर कमाते हैं, वह भी नकद होती है। लब्बोलुबाब ये कि सारा कारोबार नकद पर टिका है। यह रकम दूसरे देश पहुंचाने में हवाला और वेस्टर्न यूनियन का इस्तेमाल होता है। इस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था को कोई लाभ नहीं होता क्योंकि यह पूरी काली कमाई है। हजारों करोड़ रुपए के इस काले कारोबार से देश को भारी नुकसान झेलना पड़ता है।
पहले इऩ लड़कियों के चयन हेतु ऑडीशन होते थे लेकिन अब ये चलन बंद हो गया है। ऑडीशन में आने के लिए लड़कियों को बाकायदा 500 से 1,000 रुपए तक यात्रा भत्ता मिलता था। आजकल लड़कियां वीसीडी या डीवीडी देती हैं। उन्हें देख दलाल तय करते हैं कि लड़की कितना अच्छा नाचती है। जो बारबाला जितना मादक नाचती है, उसे उतनी अधिक कीमत मिलती है। करार की रकम का 10 से 50 फीसदी मुंबई में अग्रिम भुगतान होता है। विदेश पहुंचने पर 50 हजार से 1 लाख रुपए तक और दिए जाते हैं जो उनके परिवारों को भेजे जाते हैं।
दुबई में लड़कियां शराब से मदहोश ग्राहकों की गोद में भी बैठती हैं। इसके कारण उन पर और अधिक नशा तारी हो जाता है और वे अधिक पैसे उड़ाते हैं। दुबई में लड़कियों को इनाम के तौर पर अब कार्ड दिए जाते हैं। एक कार्ड की कीमत 50 दिरहम है। पहले दुबई में लड़कियों को गुलाब के फूल या चूड़ियां देते थे। जब दुबई सरकार ने यह देने पर रोक लगा दी तो कार्ड सिस्टम शुरू हो गया। किसी लड़की अगर किसी ग्राहक का दिल आ जाए तो वह उसके सिर पर एक ताज या क्राऊन सजाता है। जिस लड़की को सबसे अधिक क्राउन मिलते हैं, उसे रात की रानी का दर्जा देते हैं। ये क्राऊन होटलों में 200 से 500 दिरहम पर मिलते हैं। अजमान में लड़कियों को रुपयों के बदले फूलमालाएं देते हैं। मालाएं दो तरह की होती हैं। एक 25 दिरहम की तो दूसरी 50 दिरहम की होती है।
इस काले कारोबार में बारबाला यदि तीन लाख रुपए लेती है तो उसे तीन महीने में यह रकम आर्गनाईजर के लिए निकालनी ही है। उसके अलावा उस पर लगभग 1 लाख और खर्च होता हैं, उसकी भी भरपाई करनी होती है। उसके बाद फायदा करवाना होता है। यदि बारबाला इस रकम तक नहीं पहुंचती है तो जबरन देहव्यापार करवाया जाता है। ग्राहकों से मिले तमाम उपहार बारबाला के ही होते हैं लेकिन पैसे पूरे नहीं निकाले तो आर्गनाईज तमाम उपहार भी छीन कर पैसों की भरपाई करते हैं। करार की रकम पूरी निकले या न निकले, बारबालाओं पर होटल में होने वाली निछावर की रकम होटल मालिक ही रखता है। पैसे पूरे न होने पर 3 माह और भी रिहाईश बढ़ा देते हैं।
इस धंधे में बारबालाओं से बुरी हरकतें भी होती हैं। कुटिल चाल चलने वाली बारबालाएं भी कारोबार में हैं। लड़की अगर पैसे लेकर भाग जाए तो उससे स्थानीय पुलिस वसूली करके एजंटों को देती है। इसके लिए मीरा रोड और ओशिवारा थाने कुख्यात हैं। सूत्रों के मुताबिक रघु नामक आर्गनाईजर पहले लड़कियों से बहुत मारपीट करता था लेकिन जबसे दुबई में हालात बदले हैं और 999 नंबर पर पुलिस को फोन कर दें पुलिस खाल खींच लेती है। इसके कारण वह बदल चुका है। यह बात और है कि आज भी आर्गनाईजर या होटल मालिक बारबालाओं को मानसिक और शारीरिक यातनाएं देने से बाज नहीं आते हैं।
इस खेल का बेताज बादशाह टीपू है। शकील भी उसके समकक्ष है। पहले कभी मुंबई के होटलों में बेयरे की नौकरी करने वाला राज शेट्टी आज 2 दर्जन होटलों का मालिक है, जिनमें से हर होटल में गर्म गोश्त का कारोबार धड़ल्ले से चलता है। करुणाकर शेट्टी, रघु शेट्‌टी, सुनील बंबानी, उस्मान, शकील, पप्पू नागपुर, विश्वनाथ शेट्‌टी, जीतू चिकना ऐसे नाम हैं जो दुबई में गर्म गोश्त के सबसे बड़े कारोबारी माने जाते हैं। ये सभी मुंबई से काम करते हैं। ये दलाल हर शाम किसी रेस्तोंरा, बार या शराबखाने में लड़कियों के दलालों से मिलते हैं। उनसे लड़कियों की जानकारियां हासिल करते हैं। सोनिया दुबई में ताल बार चलाती है। इकबाल मिर्ची के दुबई में होटल हैं, जिनमें भारतीय लड़कियां नाचने जाती हैं।
मस्कट में प्रिया, विम्मी, सईद भवन के गिरोह सक्रिय हैं तो सिंगापुर में राकेश बेलानी का गिरोह है। राजेश बेलानी सिंगापुर में संगठित अपराधी गिरोह भी चलाता है। उनके अलावा लगभग 2 दर्जन लोग सिंगापुर में बड़े पैमाने पर देह की मंडी सजाते हैं। अबूधाबी में रंगीला, शौकत भाई हैदराबाद वाले के नाम हैं तो अजमान में योगेश शेट्टी का नाम प्रमुख है।
दलाल लड़कियों की तलाश में एस्कॉर्ट सर्विस और चकलों में काम करने वाली अच्छी लड़कियों से संपर्क में रहते हैं। इन्हें वे एक बार विदेश भेजते हैं। वहां उन्हें अच्छी कमाई होती है तो खुद अगली बार जाती हैं, दलालों के कहने पर अतिरिक्त के लालच में और लड़कियों को विदेश जाने के लिए तैयार करती हैं। ऐसे ये उपदलाल बन जाती हैं और एक लड़की पर 10 से 15 हजार रुपए की अतिरिक्त कमाई हो जाती है। दलालों के एक लड़की तैयार करने के लिए 25 से 35 हजार रुपए तक आमदनी विदेशी डांस बारों से होती है।
बारबालाएं मुंबई की - तस्वीर साभार - इंडियन एक्सप्रेस
बारबालाएं मुंबई की – तस्वीर साभार – इंडियन एक्सप्रेस
ये लड़कियां खाड़ी देशों तक पहुंचती हैं एजेंटों के जरिए। बनारस, मुंबई के उपनगर मीरा रोड, ठाणे और ओशिवरा की बारबालाएं सबसे अधिक जाती हैं। एजेंट ही सारी व्यवस्थाएं करते हैं। उसी कारण लड़कियों को पता तक नहीं चलता कि उनके तमाम दस्तावेज आखिर बने कैसे हैं। खाड़ी देशों के आव्रजन अधिकरियों से भी एजंटों की सांठगांठ होती है जो बारबालाओं के वीजा जांच किए बिना उन्हें आसानी से जाने देते हैं। फर्जी दस्तावेज बनाने वाले एजंट 3 से 5 हजार रुपए लेते हैं। ये दलाल बड़े मजे से पासपोर्ट, राशन कार्ड, बिजली के बिल, वोटर आईडी कार्ड इत्यादि बनवाते हैं। जिस तरह फर्जी दस्तावेज बनाते हैं, वह असल में देश की  आंतरिक सुरक्षा का बड़ा मसला है। इन दलालों के कारनामों से सरकारी भ्रष्टाचार की पोल खुल कर सामने आती है। सुरक्षा पर देश का सैंकड़ों करोड़ रुपया खर्च होता है लेकिन देह के दलाल बड़ी आसानी से इस  सुराः कवच को छेदते हैं। देश के संवेदनशील जगहों में हवाई अड्‌डों का समावेश है लेकिन दलालों की मिलीभगत से ये लड़कियां आसानी से विदेशों तक भेज दी जाती हैं।इस खेल का सबसे बड़ा भारतीय मोहरा और दलाल है अफगान। उसने कस्टम्स से आव्रजन को साधने, लड़कियों के नकली पासपोर्ट बनने के लिए पैकेज तय कर रखा है। वह प्रति लड़की 40 हजार रुपए लेता है। इसमें उड़ान और पुशिंग का खर्च भी शामिल है।
एक बार जो लड़की दुबई या परदेस में नाचने के नाम पहुंचती है, वहां होटल मालिक की बंधक बन जाती है। उसे मन मसोस कर, जिस्म के धंधे में उतरना ही पड़ता है। ऐसी कितनी बारबालाओं हैं, जो देश वापस जाने के लिए तड़प जाती हैं लेकिन उनकी सुनवाई नहीं होती। कोई बारबाला अधिक हाय-तौबा मचाए तो उनकी खाल खिंचवा ली जाती है। उन्हें कमरों में अकेले बंद रखा जाता है। कई बार उनसे होटल मालिकों के गुर्गे बलात्कार भी करते हैं।
पहले मुंबई बारबालाओं के विदेश जाने का गढ़ था लेकिन आव्रजन नियमों में कड़ाई बरतने और आतंकी घटनाओं के चलते यह आसान नहीं रह गया। अब वे दिल्ली एयरपोर्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं। अब हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता एयरपोर्ट भी इस्तेमाल हो रहे हैं। देश में मामला अधिक गरम हो तो बारबालाओं को सड़क मार्ग से नेपाल पहुंचा कर दुबई समेत किसी भी देश आराम से एजंट पहुंचा देते हैं।
बारों की लड़कियों को विदेशों में किराए के फ्लैट में रखा जाता है, जहां वे पहरे में होती हैं। लड़कियां हर रात बस में भर कर बारों तक निगरानी में लाई जाती हैं। अधिकांश मामलों में विदेश पहुंचते ही बारबालाओं को पहले ही दिन से देहव्यापार में झोंक देते हैं। उनके पासपोर्ट रख लेते हैं, धमकी देते हैं कि वे तब तक वापस करेंगे, जब तक ग्राहकों के बिस्तर गर्म नहीं करेंगी।
मुंबई से दुबई तक बारबालाओं की मांग दिनों-दिन बढ़ रही है। और मुंबई के दलाल दिन-ब-दिन बढ़ती मांग पूरी करने के लगे हैं। विदेशी मंडी में सजी भारतीय देह का यह खेल तोड़ने में सुरक्षा व खुफिया एजंसियां नाकाम ही हैं।
देह का अर्थशास्त्र
दुबई में नियमानुसार तो एक होटल (जिसे इस काले कारोबार में आऊटलेट कहते हैं) में एक बार में 8 लड़कियों के ही ले जाने के लिए कहा जाता है लेकिन मुबंई के देह के दलाल बड़े मजे से एक-एक होटल में 15 से 30 तक लड़कियां रखते हैं। काली कमाई के इस अर्थशास्त्र को समझने के लिए हम मान लेते हैं कि 20 लड़कियां हर होटल में एक बार में रहती हैं। 3 महीने के लिए लड़की को ये दलाल वहां नाच-गाने के नाम पर ले जाते हैं लेकिन वहां जाने के बाद उन्हें गर्म गोश्त के कारोबार में धकेला जाता है।
कई सौ करोड़ की काली कमाई से सरकार को भी किसी किस्म का फायदा नहीं मिल रहा है। पूरे भारत में 200 से अधिक आर्गनाईजर और एजंट हैं। उनके पास कोई लाईसेंस इन लड़कियों को विदेशों भेजने का नहीं है। एक बार में याने एक बैच में लगभग 30 लड़कियों को एक एजंट विदेश भेजता है। इससे अधिक लड़कियों को इसलिए नहीं भेजा जाता है ताकि वे सुरक्षा और जांच एजंसियों की निगाहों में न आ जाएं। इस तरीके से एक एजंट साल में 120 से 150 लड़कियों को विदेश भेजता है। इन आंकड़ों को देखें तो तकरीबन 2.5 लाख लड़कियां देह की मंडी में हर साल पहुंचती हैं।
प्रत्येक लड़की को उसकी गोरेपन, सुंदरता, लंबाई, अंग्रेजी भाषा की जानकारी जैसी कसौटियों पर कसा जाता है और उनकी 3 महीने की फीस तय होती है। यह रकम डेढ़ से पांच लाख रुपए तक 3 महीने के लिए होती है। अमूमन यह रकम 3 लाख रुपए प्रति लड़की होती है। उनके इस कारोबार का लिखित करारनामा होता है, (जिसकी एक प्रति लेख के साथ है) परंतु यह रकम पूरी तरह नकद में दी जाती है और उसकी एक चवन्नी भी भारत सरकार की तिजोरी मे नहीं जाती है। इस काम के लिए साल भर में कितनी लड़कियां विदेश जाती हैं, उसका पुख्ता आंकड़ा तो किसी के पास नहीं, लेकिन माना जाता है कि तकरीबन ढाई लाख लड़कियां हर साल जाती हैं।
लड़कियों के विमान टिकटों पर सालाना खर्च 960 करोड़ रुपए
भारतीय होटलों में लड़कियों के रुकने का सालाना खर्च 200 करोड़ रुपए
लड़कियों का कपड़ों, मेकअप इत्यादि पर शॉपिंग का सालाना खर्च 960 करोड़ रुपए
दलालों की सालाना कमाई 1,440 करोड़ रुपए
हवाई अड्‌डों पर आव्रजन अधिकारियों को रिश्वत 120 करोड़ रुपए
जाली पासपोर्ट व दस्तावेज बनाने पर सालाना खर्च 40 लाख रुपए
बारबालाओं की सालाना कमाई 18,800 करोड़ रुपए है।
भारत में आने-जाने का खर्च सालाना 300 करोड़ रुपए
पुलिस थाने की रिश्वत 40 करोड़ रुपए
एसबी-2 की रिश्वत 40 करोड़ रुपए
विदेशों में बारबालाओं की शापिंग 400 करोड़ रुपए
ये सब जोड़ें तो सालाना कुल रकम होती है 32,700 करोड़ रुपए
बारबालाएं मुंबई की – तस्वीर साभार – राईटर्स
बॉक्सआंतरिक सुरक्षा का सवाल
फर्जी दस्तावेजों पर जितनी आसानी से बनते हैं पासपोर्ट व यात्रा संबंधी अन्य तमाम दस्तावेज, उन्हें देख मुंबई पुलिस ही नहीं बल्कि आईबी भी परेशान है। दलाल राशन कार्ड, पैन कार्ड, बिजली व टेलीफोन के बिल और पासपोर्ट बनवाते हैं। जिन हवाई अड्डों से बारबालाएं जाती हैं, वे सुरभा के लिहाज से संवेदनशील हैं। सुरक्षा अधिकारी कहते हैं कि बारबालाओं की मजबूरियों का फायदा उठा कर इन हवाई अड्डों की रेकी करवाने का काम आतंकी या अपराधी संगठन कर सकते हैं।
भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे के उपाध्यक्ष जावेद अहमद खान ने पुलिस और महाराष्ट्र गृह मंत्रालय को शहर में आतंक के बढ़ते खतरे से सतर्क करने के लिए पत्र भेज कर चेतावनी दी। मुंबई पुलिस आयुक्त, मुंबई एटीएस और और महाराष्ट्र को भेजे पत्र में खान लिखते हैं कि खाड़ी देशों में बारबालाओं को नाच कर कमाई करने के लालच में वेश्यावृत्ति में धकेला जा रहा है। उनका इस्तेमाल माफिया और आतंकियों हेतु सूचनाएं भेजने में हो सकता है। ये कोई आतंकी घटना अंजाम दे सकती हैं। खान के मुताबिक दिल्ली की एक महिला ने उन्हें बताया कि उनकी बेटी को एजंट दुबई ले गया लेकिन वहां जबरन देहव्यापार में ढकेल दिया। भारत वापसी में उसने बताया कि मुंबई माफिया के कुछ लोग उससे दुबई में मिले थे और कहा कि वापस लौट कर उन्हें जानकारियां उपलब्ध करवाए।
उन्होंने गृहमंत्रालय और पुलिस को सतर्क किया है कि खाड़ी देशों में धंधे के लिए जा रही बारबालाओं से न केवल देह व्यापार करवाया जाता बल्कि वे मुंबई माफिया तक सूचनाएं भेजने हेतु भी इस्तेमाल हो रही हैं।
मुंबई पुलिस के प्रवक्ता निसार तंबोली स्वीकार करते हैं कि पुलिस बारबालाओं को विदेश भेजने वाले एजेंटों पर निगरानी कर रही है। उनके मुताबिक सभी विभागों को शहर में संभावित आतंकी खतरों पर जानकारी जुटाने के लिए कहा है। आतंकियों को सूचनाएं पहुंचने का यह भी एक तरीका हो सकता है, इसके चलते इस पर भी ध्यान दे रहे हैं।

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गर्म गोश्त की सबसे बड़ी मंडी – दुबई
रमजान महीना खत्म होते ही कमसीन उम्र लड़कियों की मांग खाड़ी देशों में बढ़ जाती है। बस यह एक महीना ही है जब लड़कियां नहीं जातीं। रमजान के आखिरी सप्ताह के आखिरी तीन दिनों में लगभग 15 हजार बारबालाएं खाड़ी देशों के लिए भारतीय एयरपोर्टों से उड़ान भरती हैं। खाड़ी देशों में नाच-गाने और भोग से दूर रहे लोगों के पास इन लड़कियों की खासी मांग पैदा होती है। सूत्रों के मुताबिक नाबालिग बारबालाओं को जाली दस्तावेजों पर विदेश भेजते है, जिनमें उन्हें वयस्क दिखाते हैं। मुंबई पुलिस की विशेष शाखा के अधिकारियों के मुताबिक ये लड़कियां पर्यटक वीजा पर खाड़ी देश जाती हैं, जदो वहां जाने की वजह रिश्तेदारों से मिलना लिखती हैं।
एक एजंट के मुताबिक बारबालाओं की विदेश जाने हेतु चयन की प्रक्रिया रमजान के दो माह पहले से शुरू होती है। रमजान खत्म होने के तीन दिन पहले से उनका जाना शुरू हो जाता है। खाड़ी देशों में रमजान के दौरान बार बंद रहते हैं इसलिए बारबालाओं को उसके पहले ही वापस भारत भेजा जाता है। एजेंट लड़कियों की तलाश ब्यूटी पार्लरों और मॉल्स में भी करते हैं। कालबेलिया नृत्य के लिए पहचान रखने वाली राजस्थान के बेड़िया समुदाय की लड़कियों की बहुतायत बारबालाओं में है।
कुछ अर्सा पहले पुलिस को एक बारबाला का इतिहास जानने के दौरान पता चला कि वो 30 लाख रुपए में फ्लैट खऱीद रही है तो होश उड़ गए। वह बारबाला एक साल में ही 30 से अधिक चक्कर खाड़ी देशों के लगा चुकि थी। पूछताछ में उसने बताया था कि धंधे के अलावा सूचनाएं लाने – ले जाने का भी अच्छा पैसा मिलता है।
बारबालाएं मुंबई की – तस्वीर साभार – राईटर्स
बॉक्सक्रिकेट सट्‌टा, बारबालाएं और माफिया
बारबालाओं पर क्रिकेट बुकियों और माफिया संबंधों के आरोप लगते ही रहे हैं। पुलिस सदा इनके बीच मुखबिर भी तलाशते हैं। उनकी सहायता से माफिया निशाने और शिकार भी चुनता है। उनकी मदद से दुश्मनों को ठिकाने लगाने की जुगत भी भिड़ाता है। बारबाला तरन्नुम का मामला आज भी ताजा है। ऑस्ट्रेलिया-इंग्लैंड ऐशेज सिरीज के दौरान लंदन में बसे उसके भाई ने सट्‌टा लगाने और बुकियों की व्यवस्था करने में तरन्नुम की सहायता की थी। इसके 70 लाख रुपए में खरीदे बंगलेनुमा घर ‘तनिष्क’ पर आयकर विभाग ने छापा मारा था, तो उसके नाम करोड़ों की संपत्ति के दस्तावेज बैंक लॉकर से मिले थे। मुंबई में पैदा तरन्नुम एसएससी के बाद आगरा गई लेकिन कुछ समय बाद डांस बार में काम कर रही बहन के कहने पर लौट आई। वह पहली बार 1997 में दुबई में नाची थी। सूत्रों के मुताबिक इस शो में दाऊद इब्राहिम,  अबू सालेम के साथ मुंबई माफिया के कई दिग्गज थे। उनका तरन्नुम पर दिल आ गया… और वह रातों-रात हुस्न की मलिका से धन कुबेर बन गई। पुलिस उसके माफिया से संबंधों की जांच करके थक गई लेकिन कुछ साबित नहीं कर पाई।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक क्रिकेट सट्‌टे में तरन्नुम बड़ा नाम रही है क्योंकि पूछताछ में उसने मुंबई के सबसे बड़े बुकियों के नाम बताए थे। 2003 में तरन्नुम ने एक मैच पर सट्‌टे में 17 लाख रुपए जीते थे। अपराध शाखा अधिकिरियों ने तरन्नुम के सेलफोन की काल लिस्ट में जिनके नाम पाए, उनमें बड़े-बड़े राजनेता, उद्योगपति, बुकि, समाजसेवक भी थे। ये नाम आज भी पुलिस ने उजागर नहीं किए हैं।
उसके मामले में बुकी मिलिंद धीरज नंदू उर्फ डीजे और नौकर प्रदीप कुंवरजी परमार को पुलिस ने गिरफ्तार किया था, कुल 156 बुकियों को फरार दिखाया था, जिनमें शोभन मेहता व जयंती मालाड के नाम भी थे। तरन्नुम से श्रीलंका के क्रिकेटर मुथय्या मुरलीधरन का नाम जुड़ा था। उन्होंने कहा कि वे फिक्सिंग प्रकरण की बारबाला तरन्नुम खान या उसके किसी बुकी मित्र को न जानते हैं, न वे कभी उनसे मिले हैं। आरोप था कि फिल्म अभिनेता आदित्य पांचोली के साथ वे दीपा बार में तरन्नुम से मिले थे।
माफिया से संबंध रखने वाली बारबालाओं में स्वाति पाल भी है जिसने कोलकाता में खादिम शूज के मालिक पार्थप्रतिम राय बर्मन का अपहरण करवाने और करोड़ों की फिरौती वसूल करवाने में भूमिका अदा की थी। थोड़े समय के लिए ही सही बारबाला रह चुकि चुकि अर्चना शर्मा उर्फ मनीषा अग्रवाल उर्फ मीनाक्षी अग्रवाल कभी बबलू श्रीवास्तव, कभी विक्की गोस्वामी, कभी दाऊद के साथ संबंधों को लेकर चर्चा में रही है।
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सिंगापुर में बारबालाएं
धुंए में बेपनाह लापरवाही से नाचते जिस्म… नशे में मदहोश थिरकती लड़कियां… चकाचौंध नजारे… बॉलीवुड गीतों पर बेढंगे रूप से कुल्हे मटकातीं… अश्लील तरीके से हिलती ये लड़कियां कहीं और से नहीं…. मुंबई या दिल्ली से पहुंची हैं, जहां दौलतमंद उन पर पैसे बरसा रहे हैं… यह दृष्य सिंगापुर के अमीर इलाके बोट क्वाय का है। मुंबई के बारों में बारबालाओं का कारोबार ठंडा हुआ तो दो दर्जन बार सिंगापुर में, आधा दर्जन मलेशिया में और चार जकार्ता में चल रहे हैं।
एक बार मालिक कहते हैं कि मुंबईया बारबालाओं की आमदरफ्त सिंगापुर में 1994 से है। ऐसे बार वहां कानूनी हैं इसलिए कोई परेशानी नहीं है। वहां बार खोलने के लिए सरकार से इंटरटेनमेंट और डांसर्स लाइसेंस लेना होता है। एक डांसर के लाइसेंस पर सिंगापुर में 75 हजार रुपए का खर्च है। यहां बारबालाओं के लिए प्रोफेशनल विजिट पास लेते हैं, जिसकी वैधता तीन महीने होती है।
सिंगापुर में अमूमन 12 से 20 का समूह भेजते हैं, जिसमें गायक और संगीतकार भी हैं। बारबालाएं तीन महीने में बदली जाती हैं। मुंबई, दिल्ली और चंडीगढ़ की बारबालाएं यहां भेजी जाती हैं। यहां भी बारबालाओं के पासपोर्ट बार मालिक कब्जे में रखते हैं ताकि पैसे पूरे न निकलें तो वीजा 3 माह के लिए और बढ़वा सकें और लड़कियां दबाव में काम करती रहें। उन्हें बाहर नहीं जाने देते हैं, जाने भी देते हैं तो मालिक के गुर्गे के साथ ही।
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देश-शहर जहां सजती हैं देह की मंडियां
दुबई
अबूधाबी
शारजाह
बहरीन
अजमान
रासलखेमा
मस्कट
मलेशिया
ब्रिटेन (लंदन)
अमरीका
सिंगापुर
जकार्ता
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देश-शहर जहां से आती हैं देहजीवाएं  
भारत
– उत्तरप्रदेश – कानपुर, आगरा, मथुरा
– राजस्थान – धौलपुर, जयपुर
– मध्यप्रदेश – भिंड, मुरैना
– बिहार – मुजफ्फरपुर
– आंध्रप्रदेश
– बंगलूर
– असम
नेपाल
बांग्लादेश
तिब्बत
भूटान

समाजवाद बबूआ कबहूं वा आई -2





मंदसौर में देह की मंडी

 

कमबख्त मर्द अपनी जोरू को संभल कर रखन चाहत हैं, और बेटी/ बहन को पैदा होत ही ग्राहक का बिस्तर गरम करन को बिठा देते हैं। - भंवरी बाई बाछड़ा समाज, मंदसौर


जिस तरह देश में मंदसौर अफीम उत्पादन तस्करी के लिए मशहूर है उसी तरह नीमच मंदसौर रतलाम के कुछ खास इलाके भी बाछड़ा समाज की देह मंडी के रुप में कुख्यात है। जो वेत्ति के दूश्यावृसरे ठिकानों की तुलना में इस मायनें में अनूठे हैं कि यहां सदियों से लोग अपनी ही बेटियों को इस काम में लगाए हुए हैं। इनके लिए ज्यादा बेटियों का मतलब है ज्यादा ग्राहक! ऐसे में जब आप किसी टैक्सी वाले से नीमच चलने के लिए कहते हैं तो उसके चेहरे में एक प्रश्नवाचक मुस्कुराहट स्वत: तैर आती है। इस यात्रा में अनायास ही ऐसे दृश्य सामने आने लगते हैं, जो आमतौर पर सरेराह दिनदहाड़े कम से कम मप्र में तो कहीं नहीं देखने को मिलते। हां, सिनेमा के रुपहले पर्दे पर जरूर कभी- कभार दिख रहते हैं। पलक झपकते ही मौसम की शर्मिला टैगोर , चांदनी बार की तब्बू , चमेली की करीना आंखों के सामने तैरने लगती हैं।
महू- नीमच राजमार्ग से गुजरते हुए जैसे ही मंदसौर शहर पीछे छूटता है। सड़क किनारे ही बने कच्चे-पक्के घरों के बाहर अजीब सी चेष्टाएं दिखने लगती हैं। वाहनों विशेषकर ट्रक, कारों को रुकने के इशारे करती अवयस्क, कस्बाई इत्र से महकती लड़कियों की कमनीय भाव-भंगिमाएं इतनी प्रवीण हैं कि । इस देह की खुडी से गुपहली बार यहां से गुजरने वाले यात्री हक्का-बक्का रह जाते हैंली मंजरना आसान है। रुककर देह की अतृप्त ग्रंथियों की वासना मिटाना सहज है। लेकिन किसी सेक्स वर्कर, महिला दलाल से बात हो जाए यह बेहद मुश्किल है। उनको पुलिस का डर नहीं है, क्योंकि वह इनकी पक्की हिस्सेकि सारा काम सड़ले में होदार है। किसी के देख लेने का डर नहीं, क्योंक के किनारे खुता है। डर है, तो इस बात का कहीं टीवी चैनलों के स्टिंग ऑपरेशन में उनकी तस्वीर न दिखाई जाए। ग्राहकों को यह न लगे कि उनकी ऐशगाह असुरक्षित है। समुदाय में धंधे में लगी लड़कियों की संख्या पहले ही कम नहीं थी, उस पर से गरीबी, भुखमरी के चलते अब पड़ोसी जिलों, राज्यों से भी यहां पर जमकर लड़कियां लाई जा रही हैं। इनके मां-बाप इन्हें एक मुश्त रकम देकर बेच जाते हैं। या फिर तय अवधि में आते हैं और दलाल से उसके कमीशन, बेटी के रहने,खाने का खर्च काटकर उसकी कमाई ले जाते हैं। अर्थात बेटी अपनी जिंदगी महज दाल रोटी के लिए नरक कर रही है। लेकिन ऐसी लड़कियों को स्थानीय बाछड़ा लड़कियों की भीड़ में पहचानना बेहद मुश्किल है, क्योंकि उनके इर्द-गिर्द सुरक्षा घेरा भी है। सड़क के किनारे बसे मल्लारगढ़ में बड़ी मुश्किल से अधेड़ उम्र की भंवरीबाई बातचीत को तैयार । वैसे उन्होंने भी पहले उनके मकान की ओर मुझे आते देख एक तेरह बरस की लड़की को मेरी ओर लपकाया था। भंवरीबाई ने अपने समाज की व्यवस्थाओं, देह व्यापार से जुड़े सवालों पर लाजवाब साफगोई से बात की। साठ से अधिक की हो चलीं भंवरी को उनके परिवार ने तेरह की उमर में ही इस धंधे में उतार दिया था। वह कहती हैं कि हमारे समाज में सिसकियों, मिन्नतों का कोई मोल नहीं है। क्योंकि परिवार के मर्द चाहते हैं कि बेटियां धंधा करें ताकि वह रोज़ी की फ्रिक से दूर शराब पीने में मशगूल रह सकें।
बाछड़ा समुदाय में बेटियों से वेश्यावृत्ति करवाना बेहद आम रिवाज है। रतलाम, मंदसौर और नीमच जिलो के सैकड़ों गांवों में यह कुप्रथा आज भी जारी है। इनमें कचनारा, रुंडी, परोलिया, सिमलिया, हिंगोरिया, मोया, चिकलाना आदि प्रमुख हैं। किसी को नहीं मालूम यह कब से चला आ रहा है, लेकिन जब बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि उनकी मां-दादी/ नानी भी धंधा करती थी, तो जाहिर है कि मामला दशकों का नहीं सदियों का है। दूसरी ओर ज्यादातर पुरुष निठल्ले, शराबखोर ही मिलेंगे। उनके लिए इस बात के कोई मायने नहीं हैं कि उनकी अपनी बेटी/बेटियों को स्लेट, कापियों की उम्र में ग्राहको को रिझाने के गुर सिखाए जाते हैं। मंदसौर से नीमच के बीच सड़कों के किनारे जिस्मफरोशी की जितनी दुकाने हैं, उससे अधिक दुकाने, अड्डे गांवों के भीतर हैं। रास्ते से गुजरते वाहनों के सामने लिपस्टिक पोते, अपने उभारों को भरसक दिखाने की अधिक चेष्टा करती लड़कियां आपकी झिझक दूर करने की पूरी कोशिश करती हैं। ऐसी ही एक बाला ने कहा, साहब पहली बार आए हो! कोई बात नहीं, यहां पहली बार आने पर लोग ऐसे ही शर्माते हैं। झिझक मिटने में अधिक देर नहीं लगती।
भंवरी की बातों में खांटी सच्चाई अनुभव की ताप है। उस अनुभव से उपजी पीड़ा की जिसे न चाहते हुए भी वासना की भट्टी में झोंक दिया गया था। कमसिन उम्र में उसके नाजुक बदन को दिन-रात यहां से गुजरने वाले ट्रक चालकों और इलाके के सवर्णों के सामने परोस दिया गया। यह सिलसिला तब जाकर थमा जब भंवरी के साथ उसके ग्राहक रामसिंह ने ही दिल मिलने के बाद यहां प्यार होने के लिए यही जुमला चलता है शादी कर ली थी। एक औसत बाछड़ा लड़की की नियति यही है। जब तक वे ग्राहकों को रिझाने के काबिल होती हैं उनके परिवार के मर्दों को यह कतई मंजूर नहीं होता कि लड़कियां घर इसे कोठा पढें दहलीज पार करें। क्योंकि ऐसा करने से उनको हर महीने मिलने वाली मोटी रकम से हाथ धोना पड़ सकता है। अनेक प्रगतिशील विचारों के धनी ऐसे भी हैं जिन्होंने इस मोटे अर्थशास्त्र को समझा। यहीं बस गए। वेश्यावृत्ति करने वाली किसी लड़की से शादी कर ली फिर उसको तो इस धंधे से दूर रखा लेकिन उसके नेटवर्क का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं और उसकी दूसरी बहनों से धंधा भी करवा रहे है। चलिए इनको तो फिर भी बख्शा जा सकता है लेकिन उन भाइयों पिताओं को कैसे क्षमा किया जा सकता है जो बहन बेटी की रक्षा का दम भरते है। उससें रिश्तों की दुहाई देते है। फिर उसे विवश करते हैं कि वह अपने जिस्म से उनके लिए रोटियां सेंके। उसे मजबूर करते हैं कि वह तितलियों को पकड़ने, सपने बुनने की उम्र में ग्राहकों की बाहों में मसली जाएं। एक ग्राहक के जाने के बाद दूसरे के लिए फिर सजकर रोड़ किनारे बैठ जाए। बाछड़ा समाज अपनी बेटियों से ही धंधा करवाता है। इस काम में बहुओं को आमतौर पर नहीं उतारा जाता हैवरी जोकर कहती हैं कि बहुएं पराए मर्द की ओख लें तो हमारे बेटे उनके हाथ-पां। भंर देर देव काटकर फेंकने से भी नहीं हिचकते हैं। वह आगे कहती हैं कमबख्त मर्द अपनी जोरू को संभल कर रखन चाहत हैं और बेटी/ बहन को पैदा होत ही ग्राहक का बिस्तर गरम करन को बिठा देत हैं।
कुल मिलाकर बाछड़ा समाज के लिए बेटी मोटी कमाई का सहज सुलभ साधन है। परिवार के उदर पोषण के लिए रुपया लाने वाला विद्रोह की संभावना रहित ईमानदार माध्यम। ग्राहकों को बुलाने और सौदा तय करने के काम में कहीं भी आपको कोई पुरूष नजर नहीं आएगा। इसे समाज के मर्दों की शान के खिलाफ समझा जाता है। यानि मां और उसकी बेटी/बेटियां ही धंधे के समय घर के दरवाजे और ढाबों होटलों के इर्द-गिर्द नजर आती हैं। इनकी जाति पंचायतों की बात और भी निराली है। जहां एक ओर दुनिया के सामने मंच से शरीर के सौदे की मुखालफत की जाती है वहीं दूसरी ओर पंचायत सरकारी अफसर इसे बढ़ावा देते रहते हैं ताकि उनकी दुकाने बंद न हों। वैसे भी यह सारा धंधा मर्दो के आलस और उनके निकम्मेपन की ही देन है। मर्दों के पास चूंकि एक तय रकम होती है इसलिए वह मेहनत-मजदूरी से परहेज करते हैं। एक ओर तो वह इस पेशे के लिए औरतों को ही जिम्मेदार मानते हैं का पैसा वह बिना शर्म पीढ़ि लेकिन दूसरी ओर इसी औरत उनकी बहनों के नोच खसोयों से डकार रहे हैं। आमतौश्यावृल में गरीबी, अशिक्षा है, लेकिन यहां आकर तो यह पर कहा जाता है कि वेत्ति के मूतर्क भी गले से नहीं उतरता है, क्योंकि अनेक पढे लिखे लोग इस काम को अपने घरों में अ्रंजाम दे रहे हैं। उनके पास ऐसी संभावना, योग्यता है कि वह दूसरे पेशे को अपनाकर जीवनयापन कर सकें, लेकिन वह ऐसा करते नहीं हैं। क्योंकि उनके पास रोजगार का सबसे बढ़िया साधन है, उनकी बेटियां। इसी कारण वह ऐसी लड़कियों को भी इस धंधे में उतार देते हैं, जो पढ़ाई में जुटी हुई हैं। नीमच मार्ग पर ही बसे मुरली गांव में एक ऐसे दंपति ऐसे भी मुलाकात हुई, जिनके तीनों बच्चे सरकारी सेवा में हैं, लेकिन उसके बाद भी वह दलाली के काम में लगे हुए हैं। इसी तरह सड़क किनारे चारपाई पर बैठकर ग्राहकों को बुलाने एक प्रौढ़ महिला की कहानी भी खासी रोचक है। उसने अपनी दो बेटियों, बेटे की शादी कर दी है और अब बाहर यानि उड़ीसा, राजस्थान से आने वाली लड़कियों की दलाली खाती हैं। वह इस बात को टियों को इस धधें में नहीं उतारा, लेबेहद अभिमान के साथ कहती है कि उसने अपनी बेकिन उसके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि फिर इस दलाली में क्यों हाथ काले कर रही हो। दरअसल इस काम टने के पीछे बिना मे। एक बार हराम का पैसा के न छूहनत आने वाली रकम भी हैसा जीमने की आदत पड़ जाए तो जिंदगी भर नहीं छूटती। इस काम में यहां के पुरुर्षों की भूमिका बेहद अहम है, क्योंकि वही ता हैं, और पूरे परिवार के नियंरी तरह से पर्दे के पीछे स्त्रियों को ही स्त्रियों की दलाली करने के लिए उकसाते, मजबूर करते हैं। बाछड़ा समुदाय पर काम कर रहे अनेक इस संगठनों और सरकार को यह बात चौंकाने वाली लगीसा की लड़ सकती है कि देह की इस मंडी में अब राजस्थान और उड़कियां उतारी जा रही हैं। तेरह साल की अनीता हालात की मारी एक ऐसी ही बेबस है, जिसे राजस्थान से उसका परिवार यहां छोड़ गया है।
यह वही लड़वरी बाई ने लपकाया था। वह दिनभर में कम से कम पांच ग्राहकों की वासना को संतुष्ट करती है। यह सारा इलाका ऐसी हजारों लड़कियों से भरता जा रहा है। इसके साथ ही महाराष्ट्र से बेकार होने के बाद बार बालाओं के ठुमके और जिस्म के सौदों के लिए भी यह राजमार्ग नया ठिकाना है। देह के कारोबार में तीस साल से अधिक बिताने के बाद उम्र के अंतिम पड़ाव पर जा पहुंची सेमरी बाई बताती हैं, हम लोग अपनी बच्चियों को सात की उम्र से ही ग्राहकों को पटाने के तरीके सिखाने लगते हैं। यह समय लड़कियों के प्रशिक्षण का होता है। कम उम्र में उनके विरोध का खतरा नहीं होता और इनकी कीमत भी मोटी मिलती होती है।
देह की इस मंडी में उतारी गई लड़कियों की साक्षरता के बारे में कोई स्पष्ट आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन इन दिनों अनेक एसी लड़कियां खुद को ग्राहकों के सामने परोसने में लगीं हैं जो दसवीं और बारहवीं की छात्राएं हैं। अब वे इसके लिए तकनीक का भी भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं। मोबाइल नंबरों की पहुंच इंदौर के अनेक मालदारों तक है। जो कभी यहां आते हैं, तो कभी लड़कियों की आपूर्ति बिजनेस मीटिंग के लिए इंदौर आने वाले सफेदपोश लोगों के लिए होती है। वासना के प्यासे धनकुबेरों और वैश्वीकरण की कथित कमाई से फूल कर कुप्पा हुए लोगों के सामने देह की ऐसी मंडी है, जिसका सारा कारोबार मासूम उम्र की लड़कियों के इर्द-गिर्द ही सिमटा है। जिनकी औसत उम्र नौ से पैंतीस साल है। जिस तरह दिनदहाड़े सड़क पर बने कच्चे-पक्के मकानों में जिस्मफरोशी होती है, उससे जाहिर है कि पुलिस इस कारोबार में बराबर की हिस्सेदार है। बार-बार ग्राहकों, धंधा करने वालों को होने वाली दिक्कतों से अच्छा है एक मु। टेंशन फ्री होकर काम करो। पहरे में चलने वाले रकम एक बार दोकारोबार का शाम गहराते ही नज़ारा ही बदल जाता है। दोपहर में सौ से दो सौ रुपए की मांग करने वाली लड़कियां बीस से पचास रुपए में ही राजी हो जाती हैं। वजह, रात को यहां कोई भी वाहन नहीं कियों की रुकता, साथ ही अब यहां लड़ख्या अधिक हो गई है, जिनके अनुपात में ग्राहक कम आते हैं। इस तरह रतलाम, मंदसौर, नीमच जिलों में बाछड़ा समुदाय की लड़कियां, महिलाएं एक ऐसा जीवन जीने को अभिशप्त हैं, जो उनके अपनों ने ही उनके लिए चुना है। इसलिए उनके नारकीय जीवन से मुक्ति के लिए भी महिला नेतृत्व को ही आगे आना होगा। क्योंकि पुलिस, सरकार से महिलाओं को अपने ही समाज की पुरुष सत्ता के खिलाफ न्याय की कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं है।
मंदसौर से दयाशंकर मिश्र।