गुरुवार, 25 अगस्त 2016

सेक्स पर लेख









Informative and Interesting Articles on Sex in Hindi
Sex in Hindi, Inforation, Jankari, Articles,
आयुर्वेद – यौन शक्ति बढ़ाने के कुछ सरल घरेलू उपाय
पौराणिक कहानी: सेक्स कौन ज़्यादा एंजाय करता है – स्त्री या पुरुष?
लिंग से सम्बंधित 30 इंटरेस्टिंग फैक्ट्स
सेक्स से सम्बंधित 10 कॉमन सवाल और उनके जवाब
10 अद्भुत और विचित्र सेक्स रिकॉर्ड
महिलाओं द्वारा की जाने वाली 9 सेक्स मिस्टेक्स
हस्तमैथुन (मैस्टरबेशन) के 10 फायदे
सेक्स से जुड़े मर्दों के टॉप सीक्रेट
जानिए सेक्स से जुड़े पुरुषों के 5 डर और उनका निदान
पुरुष द्वारा सेक्स में की जाने वाली 10 कॉमन गलतियां
सेक्स लाइफ के लिए ख़राब हैं ये 7 बातें
हस्तमैथुन भी है स्वास्‍थ्य के लिए लाभदायक, जानें कैसे?
शादी के बाद स्त्री हो या पुरुष नहीं खानी चाहिए ये 10 चीजें
सेक्सुअल हेल्थ- पुरुषों के लिए अच्छी नहीं होतीं ये चीजें, इन्हें नहीं खाना चाहिए
15 घरेलु नुस्खे, ये करने से मिलेगी जबरदस्त ताकत
सेक्स से जुड़ी 20 दिलचस्प जानकारियां
सेक्‍स के बारे में भारतीय पुरुष बोलते है यह 5 झूठ
जानिए राशि अनुसार कैसा होता है पुरुषों का ‘सेक्‍स व्यवहार’
जानिए राशि अनुसार कैसा होता है महिलाओं का ‘सेक्‍स व्यवहार
सेक्स पॉवर बढ़ाने और वशीकरण के लिए करे इन मन्त्रों का जाप
इस जीव के पास है डिसपोजेबल पेनिस- अपने जीवन में कई बार उगाता है नया लिंग
जानवरों की सेक्स लाइफ से जुड़े अमेजिंग फैक्ट्स
दाम्पत्य जीवन में नियमित सेक्स से दूर होते है कई रोग
लिंग संग्रालय (पेनिस म्यूज़ियम) – यहाँ रखे है जानवरो, मछलियों और इन्सानो के लिंग (पेनिस)
हिमालयी वियाग्रा ‘यार्सागुम्बा’ – जो बढ़ाता है बिना किसी साइड इफ़ेक्ट के सेक्स पावर
10 फ़िल्मी एक्ट्रेस जो पकड़ी गई सेक्स रैकेट में
सेक्स से सम्बंधित 20 अनूठे नियम कायदे
कि‍स करने के 10 बेस्ट तरीके 
सेक्स के बाद करें ये 10 रोमांटिक चीजें
बिस्तर पर पुरूषों के सही परफॉर्म न कर पाने के 8 कारण
जानें संभोग के पहले और बाद के जरुरी स्वच्छता नियम
इस तरह होती है सेक्स चेंज सर्जरी, मर्द को बना देते हैं औरत
Tag- Hindi, Story, History, Kahani, Article, News, Facts, Record, Gyan, Knowledge, about Sex, in Hindi, human sexuality, sexual facts, sexual intercourse, orgasm, ejaculation, Penis, Linga, कामसूत्र, सेक्स, सेक्स संबंधी तथ्य, यौन क्रिया, कंडोम, कैलोरी, चुंबन, संभोग, दर्द निवारक, वीर्य , लिंग.
    


बुधवार, 24 अगस्त 2016

दुल्हन की आस में हरियाणा के लोग बेहाल





प्रस्तुति- स्वामी शरण 

(14 Sep) कोख में ही जांच कर मादा भ्रूण को मार डालने के सिलसिले से आज यह नौबत आई है. भारत के कई गांवों में कुंवारे बैठे हैं और शादी के लिए लड़की नहीं मिल रही. दूर दराज के राज्यों और अपहरणकर्ताओं तक से खरीदी जा रही हैं दुल्हनें. हरियाणा के सोरखी गांव के रहने वाले साधूराम बर्नवाल शादी करना चाहते थे. परिवार ने पारंपरिक भारतीय अंदाज में संबंधियों, पड़ोसियों मंदिर के पंडित को भी उनकी इस इच्छा से अवगत करा दिया. लेकिन लंबा समय बीत जाने के बाद भी अपनी जाति-बिरादरी की कोई लड़की नहीं मिली. हरियाणा, जहां लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या देश में सबसे कम है, ये स्थिति तो आनी ही थी. उत्तर भारत के कई राज्यों में गर्भ में ही भ्रूण के लिंग का पता कर, मादा भ्रूण को मार डालने का चलन है. आर्थिक कारणों से कोई लड़की नहीं पैदा करना चाहता. एक दोस्त की मदद से बर्नवाल को घर से कुछ 2,700 किलोमीटर दूर एक लड़की मिली. लड़की दक्षिण भारतीय राज्य केरल की थी और शादी को तैयार भी. लेकिन एक अलग भाषा और संस्कृति से आने वाली दुल्हन हरियाणा की अपनी नई जिंदगी को लेकर घबराई हुई थी. बर्नवाल की यह शादी करीब 10 साल पहले हुई. इससे उनका गांव सोरखी सकते में था. लेकिन तबसे लेकर अब तक केवल इस गांव में ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत में इस तरह की घटनाएं आम हो चुकी हैं. हरियाणा के हालात करीब 7,000 लोगों की आबादी वाला सोरखी गांव राजधानी दिल्ली से केवल 150 किलोमीटर ही दूर है. यहां पिछले कितने ही सालों से कुछ ज्यादा बदला हुआ नहीं दिखता. केवल एक चीज काफी बदली है और वह है, लड़कियों की संख्या में भारी कमी. गांव के रिटायर्ड स्कूल टीचर ओम प्रकाश बताते हैं, "केवल सोरखी में ही इस समय 200 से 250 ऐसे जवान लड़के हैं जो शादी करना चाहते हैं लेकिन शादी के लिए लड़की ही नहीं मिल रही है." भारत में प्रीनेटल सेक्स निर्धारण टेस्ट पर 1994 में ही प्रतिबंध लग गया था. डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ को भी सोनोग्राम करने पर मनाही है. लेकिन आज भी कई जगहों पर छुप कर ऐसा किया जाता है. हरियाणा में हालत सबसे असंतुलित है, जहां हर छह साल से कम उम्र के हर 1,000 लड़कों पर औसतन केवल 834 लड़कियां ही हैं. इसी उम्र के बच्चों में पूरे भारत का अनुपात 1,000 पर केवल 919 लड़कियों तक गिर गया है. शादी के लिए अपहरण शादी के समय भारी दहेज के बोझ के कारण आज भी कई भारतीय परिवार बेटियां नहीं चाहते. इसके अलावा वे शादी के बाद अपने पति के घर चली जाती हैं और माता-पिता की बुढ़ापे में देखभाल नहीं कर पातीं. इस कारण भी लोग लड़की पैदा कर उसके पालन पोषण और शादी तक का खर्च नहीं उठाना चाहते. बर्नवाल की शादी के साथ ही उनके गांव में केरल से दुल्हन लाने का एक चलन बन गया. इसके अलावा वहां बिहार और पश्चिम बंगाल से भी लड़कियों को लाया गया. केरल की लड़कियों ने हरियाणा के लड़कों से शादी का प्रस्ताव इसलिए मान लिया क्योंकि वे दहेज नहीं मांग रहे थे और शादी का खर्च उठाने को भी तैयार थे. आज महिलाओं की कमी के चलते कई मानव तस्कर लड़कियों को अगवा कर रहे हैं और दूसरे राज्यों में ले जाकर उन्हें बेच रहे हैं. केलव 2013 में ही 15 से 30 साल की ऐसी करीब 25,000 लड़कियों को अगवा कर शादी के लिए बेचे जाने के आंकड़े दर्ज हैं. आरआर/आईबी (एपी) Analytics pixel

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

नौकरशाहों के खेल से मुक्ति की जरूरत



यहां पर खिलाड़ियों को भले ही दो पदक मिले पर रियो में खिलाड़ियों की जीत हुई है। हारी है तो भारत हार गयी है। यहां के लालची स्वार्थी अवसरवादी स्वार्थी मौकापरस्त और किखावे के हिटलरी अंदाज वाले बेखरम खिलाड़ियों की हार हुई है। जो इन खिलाड़ियों के बूते ही अुनी बीबी से लेकर माशूकाओं रखैलों तकको विदेश यात्रा करा आते है। मगर इतनी बेशर्मी कि मैराथन दौड़ में भारत के स्टॉल पर कोई एक पानी देने वाला स्टाफ नहीं। कहां चले गए थे ये हरामखोर नमकहराम अधिकारी ? एक तरफ खिलाडियों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो रही है मसलन पानी एनर्जी ड्रिंक के लिए खिलाड़ी तरस रहे हैं इनका दम निकल रहा है तो मौज मस्ती मार्केटिंग करने गए अधिकारियों को स्टेडियम तक में नहीं होना कितनी बड़ी बेशर्मी है। यह युवा खेल मंत्री और दिल्ली के नेता विजय गोयक की बहुत बड़ी हार है। चुम्मा चुम्मा चारदिन पहले ही मोदी किचेन में शामिलहुए गोयल का इतना खराब ढीला ढाला और शर्मनाक रियो का उदाहरण विजय को हमेशा विजय सफलताउम्दा प्रदर्शन तथा नियोजित


Anami Sharan Babal
Anami Sharan Babal कार्य निष्पादन के लिए तरसाती रही है। यही वजह भी है कि वे विजय होकर भी इसके लिए ही तरसते रहे है। इस बार तो कमाल ही हो गया कि फिजियोथेरेपीिस्ट डॉक्टर को भेजने की बजाय किसी रेडियोलेजिस्ट को ओलंपिक टीम का चिकित्सक बनाकर भेजा गया। जिस आलतू फालतू डॉक्टर को सूई देने की तमीज ना हो वो हमारे 150 खिलाड़ियों के दर्द का क्या इलाज करेगा। यह मोदी सरकार के लचीलेपन का सबसे शर्मनाक प्रर्दशन रहा है कि दुनियां के सबस ेबड़े खेल उत्सव में इस तरह की लापरवाही और ओलंपिक टीम के साथ स्पोर्ट
Like · Reply · 1 · 27 mins
Anami Sharan Babal

स्पोर्टिंग स्टाफ को भेजने मे ंइस तरह की उदासीनता भाई भतीजावाद ? एकदम काबिले बर्दाश्त से बाहर है. अब प्रधानमंत्री जी आप ही कुछ करो? खेलो कोसाथ इन नौकरशाहं को विभत्, खेल पर लगाम लगाए और इस बार केवल जुबानी चेतावनी देकर छोड़ने की भाई भतीजावादी कल्चर के हिस्सा बनकर केवल दिखावा ना करे। नहीं तो इन गरीब खिलाडियों की बजाय दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के महान नेताओं को ही भेजा करे। क्योंकि झूठ बोलने गलत को सही साबित करने देश तक को बेच देने लंबी लंबी हांक लगाने वाले बड़ेबड़े गोला फेंकने गरीबों केदमन शोषण करने जूतियाने में इनका भला क्या मुकाबला? जब ये खद्दर नेता ही अपनी कार्यकुशलता से जन्मजात गुण से दर्जनों पदक पा सकते हैं तो फिर इन खिलाडियों पर खर्च करने या कराने का क्या औचित्य ? बार बार हर बार मेरे भाईयों बहनों कहने वाले मेरे परम आदरणीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी जी कुछ इस तरह करे ताकि अगली दफा किसी भी खेल में जाने से पहले ये अधिकारी हमारे खिलाड़ियों की देखरेक करने वाले मानकर चले , तभी खिलाडियों और खेल का हित होगा। नहीं तो ये धपेली नौकरशाह कब हार मानने वाले है। मौका पड़ने पर जूता खाकर भी सीना तान कर चलने वालो ंके सामने हमारे खिलाड़ी अपना सीना तानकर चले तभी देश का खेल का हित होगा। नहीं तो इन बेचारों को चाय ब्रेड रोटी के लिए भी इन अधिकारियों से गिड़गिड़ाना पड़ता है।मोदी जी जमींनदार बन बैठे धपेलों से किलाड़ियों की मुक्ति की जरूरत है। रियो के बाद भी यदि आपकीखामोशी चुप्पी नहीं टूटी तो फिर ज्यादा बोलने और मेक इन इंडिया क नारा बुलंद करने का क्या मतलब? कम बोलकर कमसे कम जनता का दिमाग समय ना खराब करने वाले अपन मौनी बाबा से ऐज भला किसको शिकायत है?

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

दिल्ली को क्यों भूल गए प्रधानमंत्री जी











अनामी शरण बबल


शहीदे आजम चंद्रशेखर आजाद के गांव भाबरा में जाकर आज श्रद्धाजंलि अर्पित करेंगे यह एक शुभ शुभारंभ है। यानी देश के लिए कुर्बान होने वाले शहीदों पर सरकार को अब नाज के साथ लाज भी आने लगी है। और उनकी दुर्दशा को सुधारने की यह पहल वंदनीय है। बशर्ते इसमें करप्शन का घुन नहीं लगा तो 2017 में आप भी प्रधानमंत्री जी नाज करेंगे अपने इस अभियान की कामयाबी पर?

पर प्रधानमंत्री जी चंद्रशेखर आजाद को ही इस मुहिम के लिए क्यों चुना? देश पर मर मिटने वाले ऐसे हजारों शहीद हैं जिनका कोई नाम लेवा तक नहीं है। हालांकि आपका इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि दिल्ली के भूगोल को तो आप जानते ही कहां है? पर 1857 के गदर में यानी जालियांवाल बाग नरसंहार से करीब 62 साल पहले दिल्ली में भी एक नरसंहार हुआ था। दिल्ली के अलीपुर गांव के पार्क , जिसको अब शहीद पार्क भी कहा जाता है में अंग्रेजों नें आस पास के 150 से भी अधिक देशभक्तों को भून दिया था। जमाना फिरंगियों का था और उस समय तक गांधी बाबा भी पैदा नहीं हुए थे लिहाजा सालों तक इसका विरोध और ग्रामीणों में असंतोष होने के बाद भी सैकड़ों लोगों का यह बलिदान इतिहास में जगह भी नहीं पा सकी।

इस घटना के 90 साल के बाद जब देश आजाद हुआ तो 1954 में शहीद पार्क को शहादत स्थल घोषित किया गया और उस समय के तेजतर्रार महानगर पार्षद चौधरी प्रेम सिंह ने इस शहादत शिला काो लगवाया था। इसके बावजूद दिल्ली समेत केंद्र की समस्त सरकारे इस शहादत और नरसंहार की ओर झांकना भी नहीं गया। सरकारी और सामाजिक उपेक्षा के चलते यह शहीद पार्क एक भूतहा पार्क के रूप में कुख्यात है। सालो हो गए इस शहादत को लोग बिसरा दिए। और सबसे हैरत तो देश के तमाम और दिल्ली में ही रहने वाले इतिहासकारो को भी दोषी माना जाना चाहिए कि आजादी के संघर्ष के पहले नरसंहार को भूल गए। और तो और शहादत शिलालेख को अनावृत करने वाले नेता चौधरी प्रेम सिंह जीवन में कभी चुनाव नहीं हारने की वजह से गिनीज बुक में स्थान पाने वाले देश के इकलौते नेता है। मगर उम्र के 80 बसंत आते आते प्रेम सिंह भी अलीपुर शहीद पार्क को भूल चुके थे।

प्रधानमंत्री जी आप तो गुजरात से हैं 1922 में पालचितरिया में हुए भीलों के नरसंहार को आप भी क्यों याद नही किए ? 1500 से ज्यादा भीलों (जिन्हें आज दलित भी कहकर सहानुभूति पा सकते थे) का बलिदान भी आज आपसे सवाल करता होगा। 94 साल के बादभी पालचितरिया भील नरसंहार इतिहास का एक खोया हुआ प्रसंग ही है। अपने इतिहास कारों और सोशल मीडिया के धुरंधरो को कहेंगे तो पल भर में यह अंकड़ा हाजिर हो जाएगा कि स्वतंत्रता संग्राम में जालियावाला बाग जैसे नरसंहार दो दर्जन से अधिक हुए मगर इसको भारतीय इतिहासकारों के निकम्मेपन की वजह से ये तमाम नरसंहार इतिहास में स्थान नहीं पा सकी और सैकड़ों देशभक्तों का बलिदान सम्मान नहीं पा सका।
अरे मैं तो बहकने लगा पर इसके लिए माफ करेंगे मैं केवल दिल्ली पर ही खुद को नियंत्रित रख रहा हूं।

1857 के लोकयुद्ध में दिल्ली के गांव नजफगढ़ के पास बाकरगढ़ गांव के सिरफिरे ग्रामीणों पर आजादी की लड़ाई का ऐसा खुमार चढ़ा कि अंग्रेज अधिकारी की बीबी को ही कोठी से उठाकर अपने गांव में ले आए। उसके साथ कोई बदसलूकी तो नहीं कि मगर दिल्ली के जाट बहुल दो तीन गांवों के दबंगों को मौका मिल गया। और अंग्रेजों के कान भर कर पूरे गांव के प्रति ही दोगली राजनीति कर डाली। जिसके फल में कई ग्रामीणो को तो रॉलर से रौंदवा मार डाला गया। जिससे भयभीत होकर पूरा गांव पलायन कर गया और अपने संबंधियों के छिपते छिपाते करीब 90 साल तक गुमनामी में ही कई पीढियों तक गुमनाम ही रहे।

1947 में आजादी के बाद पूरा गांव एक बार फिर बाकरगढ़ लौटा तो यहां का नजारा ही बदला हुआ था। अपने ही गांव में जमीन खरीद खरीद कर फिर से आबाद हुए और आजादी के करीब 69 साल के बाद भी इन्हें अपनी जमीन वापस नहीं मिल सकी। बाकरगड़ गांव की जमीन तीन गांवों में अंग्रेजों ने बॉट दी थी जिसकी कीमत आज करोड़ों अरबों की है। और बाहरी दिल्ली के ज्यादातर सांसद विधायक जाट होते हैं जो इस पर आंखें बंद रखना ही उचित मानकर खामोश रह जाते है। हरियाणा के कुछ गांवों में भी इसी तरह की घटनाएं हुई थी जिसको हरियाणा के दबंग मुख्यमंत्री वंशीलाल ने कुछ माह में ही सुलझा दिए थे। मगर अफसोस कि दिल्ली के पास वंशीलाल जैसा कोई जीवट वाला नेता नहीं है जो आजादी में सूरमा बनने की सजा 90 साल के बाद भी भोग ही रहे है, जो इनके घावों पर मरहम लगा सके।

और गांव वजीरपुर और चंद्रावल समेत आस पास के 8-10 गांवो के हजारों ग्रामीणों के जुनून ने अंग्रेजों का जीना हराम कर दिया था । अंग्रेज इनकी छापामार युद्ध से पार नहीं पा रही थाी कि इससे निपटने के लिए फिरंगियों ने खतरनाक कुतों की फौज लेकर इन गांवों में टूट पड़ी। और यह कहना बेमानी है कि इसके बाद क्या हुआ होगा? हर उम्र के सैकड़ो बच्चों से लेकर उम्रदराज महिलाए और महिलाओं का क्या हुआ होगा। सैकड़ों लोग कुतो के काटने से मारे गए। यह मौत कितनी दर्दनाक रही होगी इसकी कल्पना भी डराती है। 500 से ज्यादा लोग कुत्तों की भेट चढगए। मगर इस अमानवीयता पर भी कहीं और कभी भी इतिहास में दर्ज नहीं है। इनकी मौत न शहादत है और ना ही इसे स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष में इनको रखा गया।

दिल्ली पर अभी एकदर्जन और ऐसे मामले हैं जिनकी शहादत आज भी इंसाफ मांग रही है। मगर एक और शर्मनाक प्रसंग को रखकर ही मैं अपनी बात खत्म कर रहा हूं। आजाद हिंद फौज यानी (आईएनए) के मुखिया नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे। जिनकी मौत आज भी एक रहस्य है तो इसे भी शर्मनाक मामला यह है कि दिल्ली में आजाद हिंद फौज को एक दफ्तर तक नहीं मिला। 82 दरियागंज में तो आजाद हिंद फौज का दफ्तर सालों तक मुफ्त में बिन किराये का रहा, मगर जब मकान मालिक ने आजाद हिंद फौज वालों को किराए से बेदकल कर दिया। तो यह दफ्तर रोहिणी में आजाद हिंद फौ के सार्जेंट एसएस यादव के मकान मे बंद हो गया। आजाद हिंद फौज का पूरा दस्तावेज एक बंद अंधेरी कोठरी में सीलन ग्रस्त हो रही है।

उल्लेखनीय है कि जब मशहूर फिल्मकार सत्यजीत रॉय नेताजी पर फिल्म बनाने के लिए तैयार हो गए तो अपनी बेटी के साथ रोहिणी मे रहते हुए आजाद हिंद फौज के दस्तावेजों सहित नेताजी के बाबत किस्से कहानियां सुनते रहे। भाजपा नेताओं को नेताजी अपने से लगते हैं और इनके प्रति वे अपना प्यार और भावनात्मक लगाव दर्शाती भी है। बाहरी दिल्ली मे तो नेताजी के लिए एक पर्यटक गांव भी बसा डाला मगर नेताजी के उल्लेखनीय कागजों की रक्षा करना किसी भी सरकारों ने गवारा नहीं किया।


अनामी शरण बबल /
09082016

सोमवार, 8 अगस्त 2016

एक प्यार ऐसा भी / अनामी शरण बबल











 (संशोधित प्रति)
यह घटना या हादसा जो भी कहें या नाम दें।  यह करीब 21 साल पहले 1995 की बात है। एकदम सही सही माह और दिनांक तो याद नहीं हैं।  मैं उन दिनों राष्ट्रीय सहारा में था। किसी सामयिक मुद्दे पर एक  लघु साक्षात्कार या टिप्पणी के लिए मैं शाम के समय कादम्बिनी पत्रिका के जगत विख्यात संपादक राजेन्द्र अवस्थी जी के दफ्तर में जा पहुंचा। उनके कमरे में एक 42-43 साल की  महिला पहले से ही बैठी हुई थी। मैं अवस्थी जी से कोई 20 मिनट में काम निपटा कर जाने के लिए खड़ा हो गया। तब उन्होने चाय का आदेश एक शर्त पर देते हुए मुझसे कहा कि आपको अभी मेरा एक काम करके ही दफ्तर जाना होगा। मैने बड़ी खुशी के साथ जब हां कह दी तो वे मेरे साथ में बैठी हुई महिला से मेरा परिचय कराया। ये बहुत अच्ची लेखिका के साथ साथ बहुत जिंदादिल भी है। ये अपने भाई के साथ दिल्ली आई हैं पर इनके भाई कहीं बाहर गए हैं तो आप इनके साथ मंदिर मार्ग के गेस्टहाउस में जाकर इनको छोड़ दीजिए। ये दिल्ली को ज्यादा नहीं जानती है। श्रीअवस्थी जी के आदेश को टालना अब मेरे लिए मुमकिन नहीं था। तब अवस्थी जी ने महिला से मेरे बारे मे कहा कि ये पत्रकार और साहित्य प्रेमी  लेखक हैं। अपनी किताबें इनको देंगी तो ये बेबाक समीक्ष भी अपने पेपर में छपवा देंगे। उन्होने मुस्कन फेंकते हुए किताबें फिर अगली बार देने का वादा की। अवस्थी जी की शर्तो वाली चाय आ गयी तो हमलोग चाय के बाद नमस्कार की और महिला लेखिका भी मेरे साथ ही कमरे से बाहर हो गयी।

याद तो मुझे लेखिका के नाम समेत शहर और राज्य का भी है मगर नाम में क्या रखा है । हिन्दी क्षेत्र की करीब 42-43 साल की लेखिका को लेकर मैं हिन्दुस्तान टाईम्स की बिल्डिंग से बाहर निकला तो उन्होने कस्तूरबा गांधी मार्ग और जनपथ को जोड़ने वाली लेन तक पैदल चलने के लिए कहा। उन्होने बताया कि यहां की कुल्फी बर्फी बहुत अच्छी होती है, क्या तुमने कभी खाई है ।  इस पर मैं हंस पड़ा दिल्ली में रहता तो मैं हूं और कहां का क्या मशहूर है यह सब जानती आप है। मैं तो कभी सुना भी नहीं थ। चलो यार आज मेरे साथ खाओ जब भी इस गली से गुजरोगे न तो तुमको मेरी याद जरूर आएगी। मैं भी इनके कुछ खुलेपन पर थोड़ा चकित था। फिर भी मैंने मजाक में कहा कि आप तो अवस्थी जी के दिल में रहती है उसके बाद भला हम छोटे मोटे लेखकों के लिए कोई जगह कहां है। इस पर वे मुस्कुराती रही और उनके सौजन्य से कुल्फी का मजा लिया गया। बेशक इस गली से हजार दफा गुजरने के बाद भी प्रेम मोटर्स की तरफ जाने वाली गली के मुहाने पर लगी मिठाई की छोटी सी दुकान की कुल्फी से अब तक मैं अनभिज्ञ ही था।

 कस्तूरबा गांधी मार्ग से ही हमलोग ऑटो से मंदिर मार्ग पहुंचे ऑटो का किराया उन्होने दिया और हमलोग मंदिर कैंपस में बने गेस्टहाउस में आ गए। एक कमरे का ताला खोलकर वे अंदर गयी। मैं बाहर से ही नमस्ते करके जब मैं जाने की अनुमति मांगी तो वे चौंक सी गयी। अरे अभी कहां अभी तो कुछ पीकर जाना होगा। अभी तो न नंबल ली न नाम जानती हूं । चाय लोगे या कुछ और...। मै उनको याद दिलाय कि चाय तो अभी अभी साथ ही पीकर आए हैं। कुल्फी का स्वाद मुहं में है । अभी कुछ नहीं बस जाने की इजाजत दे। लौटने के प्रति मेरे उतावलेपन से वे व्यग्र हो गयी। अरे अभी तो तुम पहले बैठो फिर जाना तो है ही। मेरे बारे में तो कुछ जाना ही नहीं। थोड़ी बात करते हैं तो फिर कभी दिल्ली आई तो तुमको बता कर बुला लूंगी। उन्होने अपने शहर में आने का भी न्यौता भी इस शर्त पर दी कि मेरे घर पर ही रूकना होगा। मैने उनसे कहा कि इतना दूर कौन जाएगा और ज्यादा घूमने में मेरा दिल नहीं लगता।

मैं कमरे में बैठा कुछ किताबें देख रह था। तभी वे न जाने कब बाथरूम में गयी और कपड़ा चेंज कर नाईटी में बाहर आयी। बाथरुम से बाहर आते ही बहुत गर्मी है दिल्ली की गरमी सही नहीं जाती कहती हुई दोनों हाथ उठाकर योग मुद्रा में खुद को रिलैक्स करने लगी। मैं पीछे मुड़कर देखा तो गजब एक तौलिय हाथ में लिए पूरे उतेजक हाव भाव के साथ मौसम को कोस रही थी। मैने जब उनकी तरफ देखने लगा तो वे पीछे मुड़कर पानी लगे बदन पर तौलिया फेरने लगी। अपनापन जताते हुए उन्होने बैक मुद्रा मे ही कहा यदि चाहो तो बबल तुम भी बाथरूम में जाकर हाथ मुंह धोकर फ्रेश हो जाओ। मैं इस लेखिका के हाव भाव को देखते ही मंशा भले ना समझा हो पर इतनी घनिष्ठता पर एकदम हैरान सा महसूस करने लगा था। मैने फौरन कहा अरे नहीं नहीं हमलोग को तो दिल्ली के मौसम की आदत्त है । मैं एकदम ठीक हूं। यह कहकर मैं फिर से बेड पर अस्त व्यस्त रखी पत्र पत्रिकों को झुककर देखने लगा।
बिस्तर पर झुककर बैठा मैं किसी पत्रिकाओं को देख ही रहा था कि एकाएक वे एकाएक मुझ पर जानबूझ कर गिरने का ड्रामा किया या पैर फिसलने का बहाना गढ़ लिया पर एक बारगी पेट के बल बिस्तर पर पूरी तरह मैं क्या गिरा कि उनका पूरा बदन ही मेरे पीठ के उपर आ पड़ा। एकाएक इस हमले के लिए मैं कत्तई तैयार नहीं था। एक दो मिनट तो मेरे पूरे शरीर पर ही अपने पूरे बदन का भार डालकर संभलने का अभिनय करने लगी। उनकी बांहें पीछे से ही मेरे को पूरे बल के साथ दबोचे थी। दो चार पल में ही मैं संभल सा गया। नीचे गिरने और अपने उपर कम से कम 70-72 किलो के भारी वजन को पीछे धकेलते हुए जिससे वे पेट के बल बिस्तर पर उलट सी गयी। दो पल में ही मैं उनको अपने से दूर धकेलते हुए बिस्तर से उठ फर्श कहे या जमीन पर खड़ा हो गया। वे दो चार पल तो बिस्तर पर निढाल पड़ी रही। कुछ समय के बाद भी उठने की बजाय बिस्तर पर ही लेटी  मुद्रा में ही कहा मैं अभी देखती हूं किधर चोट लगी है तुम्हें। बारम्बार गिरने के बारे में असंतुलित होने का तर्क देती रही। उनको उसी हाल में छोड़कर मैं कुर्सी पर पैर फैलाकर बैठ उनके खड़े होने का इंतजार करता रहा।

 मैं सिगरेट पीता तो नहीं हूं पर टेबल पर रखे सिगरेट पैकेट को देखकर मैने एक सिगरेट सुलगा ली और बिना कोई कश लिए अपने हाथों में जलते सिगरेट को घूमाता रहा। जब आधी से ज्यादा सिगरेट जल गयी तो फिर मैं यह कहते हुए बाकी बचे सिगरेट को एस्ट्रे मे फेंक दिया माफ करना सिगरेट भाई कि मैं पीने के लिए नहीं बल्कि अपने हाथ में सुलगते सिगरेटों को केवल देखने के लिए ही तेरा हवन कर रहा था। वे खड़ी हो गयी और मेरे बदन पर हाथ फेरते हुए व्यग्रता से बोली जरा मैं देखूं कहीं चोट तो नहीं लगी है। मैने रूखे स्वर में कहा कि बस बच गया नहीं तो घाव हो ही जाता।  मेरी बात सुनकर वे हंसने लगी। चोट से तो घाव ठीक हो जाते है यह कहते हुए उन्होने फिर एक बार फिर मुझे आलिंगनबद्ध् करने की असफल कोशिश की। मैने जोर से कहा आपका दिमाग खराब है क्या?  क्या कर रही हैं आप। एकदम सीधे बैठे और कोई शरारत नहीं। आपको शर्म आनी चाहिए कि अभी मिले 10 मिनट हुए नहीं कि आप अपनी औकात पर आ गयी।

अरे कुछ नहीं तो अवस्थी जी का ही लिहाज रखती। यदि उन्होने कहा नहीं होता तो क्या मैं किसी भी कीमत पर आपके साथ आ सकता था।  मैं अपनी मर्यादा के चलते किसी का भी रेप नहीं कर सकता पर मैं किसी को अपना रेप भी तो नहीं करने दे  सकता । यह सुनकर वे खिलखिला पड़ी, यह रेप है। मैने सख्त लहजे में कहा कि क्या रेप केवल आप औरतों का ही हो सकता है कि सती सावित्री बनकर जमाने को सिर पर उठा ले । यह शारीरिक हिंसा क्या मेरे लिए उससे कम है। यह सब चाहत मन और लगाव के बाद ही संभव होता है। जहां पर प्यार नेह का संतोष और प्यार की गरिमा बढती है। आप तो इस उम्र में भी एकदम कुतिया की तरह मुंह मारती है। मेरे यह कहते ही वे बौखला सी गयी। तमीज से बात करो मैं कॉलेज में रीडर हूं और तुम बकवास किए जा रहे हो। मैं पुलिस भी बुला सकती हूं। मैने कहा तो रोका कौन है मैं तो खुद दिल्ली का क्राईम रिपोर्टर हूं। कहिए किसको बुलाकर आपको जगत न्यूज बनवा दूं। मैने उनसे कहा कि कल मैं अवस्थी जी को यह बात जरूर बताउंगा। बताइए क्या इरादा है पुलिस थाना मेरे साथ चलेंगी या फिर मैं अभी थोड़ी देर तक और बैटकर आपको नॉर्मल होने का इंतजार करूं। मेरे मन में भी भीतर से डर था कि कहीं यह लेखिका महारानी  सनक गयी और किसी पुलिस वाले को बुला ली या मेरे जाने के बाद भी बुला ली तो हंगामा ही खड़ा हो जाएगा,। मगर पत्रकार होने का एक अतिरिक्त आत्मविश्वास हमेशा और लगभग हर मुश्किल घड़ी में संबल बन जाता है। सिर आई बला को टाल तू की तर्ज पर मैने उनको सांत्वना दी। उन्होने अपना सूर बदलते हुए कहा कि तू मेरा दोस्त है न ?  जब कभी भी मैं दिल्ली आई और तुमसे मिलना चाही तो तुम आओगे न ? मैने भी हां हूं कहकर भरोसे में लिया। फिर मैने कहा कि खाली ही रखेंगी कि अब कुछ चाय आदि मंगवाएंगी। मैने चाय पी और चाय लाने वाले छोटू का नाम पूछा और 10 रूपए टीप दे दी ताकि वो गवाह की तरह कभी काम आ सके।  फिर मैने उनसे कहा बाहर तक चलिए ऑटो तो ले लूं। मैने ऑटो ले ली और मेरे बैठते ही उन्होने ऑटो वाले को 50 रूपये का नोट थमा दी। मेरे तमाम विरोध के बाद भी वे बोली कि आप मुझे छोडने आए थे तो यह मेरा दायित्व है।

बात सहज हो जाने के बाद अगले दिन मैं इस उहापोह में रहा कि कल की घटना की जानकारी श्री अवस्थी जी को दूं या नहीं। मगर दोपहर में हम रिपोर्टरों की डेली मीटिंग खतम् होते ही मैं पास वाले हिन्दुस्तान टाईम्स की ओर चल पड़ा। कादिम्बनी के संपादक राजेन्द्र अवस्थी के केबिन के बाहर था। बाहर से पता चला कि वे खाना खा रहे हैं तो मुझे बाहर रुककर इंतजार करना ज्यादा नेक लगा, नहीं तो इनके भोजन का स्वाद भी खराब हो जाता। खाने की थाली बाहर आते ही मैं उनके कमर में था। मेरे को देखते ही मोहक मुस्कान के साथ हाल चाल पूछा और एक कप चाय और ज्यादा लाने को कहा। चाय पीने तक तो इधर उधर की बातें की, मगर चाय खत्म होते ही कल एचटी से बाहर निकलने से लेकर मंदिर मार्ग गेस्टहाउस में शाम की घटना का आंखो देखा हाल सुना दिया। मेरी बात सुनकर वे शर्मसार से हो गए। उनकी गलती के लिए एकदम माफी मांगने लगे। तो यह मेरे लिए बड़ी उहापोह वाली हालत बन गयी। मैने हाथ जोड़कर कहा कि सर आप हमारे अभिभावक की तरह है। मैं आपके प्यार और स्नेह का पात्र रहा हूं लिहाजा यह बताना जरूरी लगा कि पता नहीं वे कल किस तरह कोई कहानी गढकर मेरे बारे में बात करे। मैने अवस्थी जी को यह भी बताया कि मैंने कल शाम को ही उनको कह दिया था कि इस घटना की सूचना अवस्थी जी को जरूर दूंगा। बैठे बैठे अवस्थी जी मेरे हाथओं को पकड़ लिए और पूछा कि आपने इस घटना को किसी और से भी शेयर किया है क्या ? मेरे ना कहे जाने पर अवस्थी जी ने लगभग निवेदन स्वर में कहा कि अनामी इसको तुम अपने तक ही रखना प्लीज।  मैं कुर्सी से खड़ा होकर पूरे आदर सम्मान दर्शाते हुए कहा कि आप इसके लिए बेफिक्र रहे सर।
इस घटना के कोई दो साल के बाद अवस्थीजी का मेरे पास फोन आया कहां हो अनामी ? उनके फोन पर पहले तो मैं चौंका मगर संभलते हुए कहा दफ्तर में हूं सर कोई सेवा। ठठाकर हंसते हुए बोले बस फटाफट आप मेरे कमरे में आइए मैं चाय पर इंतजार कर रहा हूं। उनके इस प्यार दुलार भरे निमंत्रण को भला कैसे ठुकराया जा सकता था। मैं पांच मिनट के अंदर अंबादीप से निकल कर एचटी हाउस में था। स्री अवस्थी जी के कमरे में घुसते ही देखा कि वही मंदिर मार्ग वाली महिला लेखिका पहले से बैठी थी। मुझे देखते ही वे अपनी कुर्सी से उठकर खड़ी होकर नमस्ते की, तो अवस्थी जी मुस्कुराते हुए मेरा स्वागत किया। उन्होने कहा कि माफ करना अनामी मैने तुम्हें नहीं बुलाया बल्कि ये बहुत शर्मिंदा थी और तुमको एक बार देखना चाहती थी। अवस्थी जी की इस सफाई पर भला मैं क्या कह सकता था। मैने हाथ जोड़कर नमस्ते की और हाल चाल पूछकर बैठ गया। वे बोली क्या तुम नाराज हो अनामी ? मैने कहा कि मैं किसी से भी नाराज नहीं होता। जिसकी गलती है वो खुद समझ ले बूझ ले यही काफी है । मैं तो एक सामान्य सा आदमी हूं नाराज होकर मैं भला अपना काम और समय क्यों खराब करूं। करीब आधे घंटे तक मैं वहां बैठा रहा। बातचीत की और दोनों से अनुमति लेकर बाहर जाने लगा तो अवस्थी जी ने फिर मुझे रोका और महिला लेखिका को बताया कि अनामी को मैने ही कहा था कि इस घटना को तीन तक ही रहने दे। इस पर मैं हंसने लगा सर आपने मना कर दिया नहीं 10-20 लोग तक तो यह बात जरूर चली जाती पर सब मेरे को भी तो दोषी मान सकते थे। मैने किसी को यह बात ना कहकर अपनी ही इज्जत की रक्षा की है । इस पर एक बार फिर खड़ी होकर लेखिका ने मेरे प्रति कृतज्ञता जाहिर की, तो मैं उनके सामने हाथ जोड़कर नमस्ते की और इसे भूल जाने का आग्रह किया।
इस घटना के बाद अवस्थी जी करीब 13 साल तक हमसबों के बीच रहे। उनके निधन के करीब आठ साल हो गए और लेखिका भी अब कहां हैं या नहीं या रिटायर कर गयी सब केवल भगवान जानते है। तब मुझे लगा लगा कि करीब 21 साल पहले की इस घटना को याद कर लेने में भी अब कोई हर्ज नहीं है। तो यह थी एक अप्रत्यासित घटना जहां पर मैं ने सावधान और साहस को सामने रखकर ही खुद को रेप या बदनामी से खुद अपने आपको बचाया ।      

एक प्यार ऐसा भी / अनामी शरण बबल











 (संशोधित प्रति)
यह घटना या हादसा जो भी कहें या नाम दें।  यह करीब 21 साल पहले 1995 की बात है। एकदम सही सही माह और दिनांक तो याद नहीं हैं।  मैं उन दिनों राष्ट्रीय सहारा में था। किसी सामयिक मुद्दे पर एक  लघु साक्षात्कार या टिप्पणी के लिए मैं शाम के समय कादम्बिनी पत्रिका के जगत विख्यात संपादक राजेन्द्र अवस्थी जी के दफ्तर में जा पहुंचा। उनके कमरे में एक 42-43 साल की  महिला पहले से ही बैठी हुई थी। मैं अवस्थी जी से कोई 20 मिनट में काम निपटा कर जाने के लिए खड़ा हो गया। तब उन्होने चाय का आदेश एक शर्त पर देते हुए मुझसे कहा कि आपको अभी मेरा एक काम करके ही दफ्तर जाना होगा। मैने बड़ी खुशी के साथ जब हां कह दी तो वे मेरे साथ में बैठी हुई महिला से मेरा परिचय कराया। ये बहुत अच्ची लेखिका के साथ साथ बहुत जिंदादिल भी है। ये अपने भाई के साथ दिल्ली आई हैं पर इनके भाई कहीं बाहर गए हैं तो आप इनके साथ मंदिर मार्ग के गेस्टहाउस में जाकर इनको छोड़ दीजिए। ये दिल्ली को ज्यादा नहीं जानती है। श्रीअवस्थी जी के आदेश को टालना अब मेरे लिए मुमकिन नहीं था। तब अवस्थी जी ने महिला से मेरे बारे मे कहा कि ये पत्रकार और साहित्य प्रेमी  लेखक हैं। अपनी किताबें इनको देंगी तो ये बेबाक समीक्ष भी अपने पेपर में छपवा देंगे। उन्होने मुस्कन फेंकते हुए किताबें फिर अगली बार देने का वादा की। अवस्थी जी की शर्तो वाली चाय आ गयी तो हमलोग चाय के बाद नमस्कार की और महिला लेखिका भी मेरे साथ ही कमरे से बाहर हो गयी।

याद तो मुझे लेखिका के नाम समेत शहर और राज्य का भी है मगर नाम में क्या रखा है । हिन्दी क्षेत्र की करीब 42-43 साल की लेखिका को लेकर मैं हिन्दुस्तान टाईम्स की बिल्डिंग से बाहर निकला तो उन्होने कस्तूरबा गांधी मार्ग और जनपथ को जोड़ने वाली लेन तक पैदल चलने के लिए कहा। उन्होने बताया कि यहां की कुल्फी बर्फी बहुत अच्छी होती है, क्या तुमने कभी खाई है ।  इस पर मैं हंस पड़ा दिल्ली में रहता तो मैं हूं और कहां का क्या मशहूर है यह सब जानती आप है। मैं तो कभी सुना भी नहीं थ। चलो यार आज मेरे साथ खाओ जब भी इस गली से गुजरोगे न तो तुमको मेरी याद जरूर आएगी। मैं भी इनके कुछ खुलेपन पर थोड़ा चकित था। फिर भी मैंने मजाक में कहा कि आप तो अवस्थी जी के दिल में रहती है उसके बाद भला हम छोटे मोटे लेखकों के लिए कोई जगह कहां है। इस पर वे मुस्कुराती रही और उनके सौजन्य से कुल्फी का मजा लिया गया। बेशक इस गली से हजार दफा गुजरने के बाद भी प्रेम मोटर्स की तरफ जाने वाली गली के मुहाने पर लगी मिठाई की छोटी सी दुकान की कुल्फी से अब तक मैं अनभिज्ञ ही था।

 कस्तूरबा गांधी मार्ग से ही हमलोग ऑटो से मंदिर मार्ग पहुंचे ऑटो का किराया उन्होने दिया और हमलोग मंदिर कैंपस में बने गेस्टहाउस में आ गए। एक कमरे का ताला खोलकर वे अंदर गयी। मैं बाहर से ही नमस्ते करके जब मैं जाने की अनुमति मांगी तो वे चौंक सी गयी। अरे अभी कहां अभी तो कुछ पीकर जाना होगा। अभी तो न नंबल ली न नाम जानती हूं । चाय लोगे या कुछ और...। मै उनको याद दिलाय कि चाय तो अभी अभी साथ ही पीकर आए हैं। कुल्फी का स्वाद मुहं में है । अभी कुछ नहीं बस जाने की इजाजत दे। लौटने के प्रति मेरे उतावलेपन से वे व्यग्र हो गयी। अरे अभी तो तुम पहले बैठो फिर जाना तो है ही। मेरे बारे में तो कुछ जाना ही नहीं। थोड़ी बात करते हैं तो फिर कभी दिल्ली आई तो तुमको बता कर बुला लूंगी। उन्होने अपने शहर में आने का भी न्यौता भी इस शर्त पर दी कि मेरे घर पर ही रूकना होगा। मैने उनसे कहा कि इतना दूर कौन जाएगा और ज्यादा घूमने में मेरा दिल नहीं लगता।

मैं कमरे में बैठा कुछ किताबें देख रह था। तभी वे न जाने कब बाथरूम में गयी और कपड़ा चेंज कर नाईटी में बाहर आयी। बाथरुम से बाहर आते ही बहुत गर्मी है दिल्ली की गरमी सही नहीं जाती कहती हुई दोनों हाथ उठाकर योग मुद्रा में खुद को रिलैक्स करने लगी। मैं पीछे मुड़कर देखा तो गजब एक तौलिय हाथ में लिए पूरे उतेजक हाव भाव के साथ मौसम को कोस रही थी। मैने जब उनकी तरफ देखने लगा तो वे पीछे मुड़कर पानी लगे बदन पर तौलिया फेरने लगी। अपनापन जताते हुए उन्होने बैक मुद्रा मे ही कहा यदि चाहो तो बबल तुम भी बाथरूम में जाकर हाथ मुंह धोकर फ्रेश हो जाओ। मैं इस लेखिका के हाव भाव को देखते ही मंशा भले ना समझा हो पर इतनी घनिष्ठता पर एकदम हैरान सा महसूस करने लगा था। मैने फौरन कहा अरे नहीं नहीं हमलोग को तो दिल्ली के मौसम की आदत्त है । मैं एकदम ठीक हूं। यह कहकर मैं फिर से बेड पर अस्त व्यस्त रखी पत्र पत्रिकों को झुककर देखने लगा।
बिस्तर पर झुककर बैठा मैं किसी पत्रिकाओं को देख ही रहा था कि एकाएक वे एकाएक मुझ पर जानबूझ कर गिरने का ड्रामा किया या पैर फिसलने का बहाना गढ़ लिया पर एक बारगी पेट के बल बिस्तर पर पूरी तरह मैं क्या गिरा कि उनका पूरा बदन ही मेरे पीठ के उपर आ पड़ा। एकाएक इस हमले के लिए मैं कत्तई तैयार नहीं था। एक दो मिनट तो मेरे पूरे शरीर पर ही अपने पूरे बदन का भार डालकर संभलने का अभिनय करने लगी। उनकी बांहें पीछे से ही मेरे को पूरे बल के साथ दबोचे थी। दो चार पल में ही मैं संभल सा गया। नीचे गिरने और अपने उपर कम से कम 70-72 किलो के भारी वजन को पीछे धकेलते हुए जिससे वे पेट के बल बिस्तर पर उलट सी गयी। दो पल में ही मैं उनको अपने से दूर धकेलते हुए बिस्तर से उठ फर्श कहे या जमीन पर खड़ा हो गया। वे दो चार पल तो बिस्तर पर निढाल पड़ी रही। कुछ समय के बाद भी उठने की बजाय बिस्तर पर ही लेटी  मुद्रा में ही कहा मैं अभी देखती हूं किधर चोट लगी है तुम्हें। बारम्बार गिरने के बारे में असंतुलित होने का तर्क देती रही। उनको उसी हाल में छोड़कर मैं कुर्सी पर पैर फैलाकर बैठ उनके खड़े होने का इंतजार करता रहा।

 मैं सिगरेट पीता तो नहीं हूं पर टेबल पर रखे सिगरेट पैकेट को देखकर मैने एक सिगरेट सुलगा ली और बिना कोई कश लिए अपने हाथों में जलते सिगरेट को घूमाता रहा। जब आधी से ज्यादा सिगरेट जल गयी तो फिर मैं यह कहते हुए बाकी बचे सिगरेट को एस्ट्रे मे फेंक दिया माफ करना सिगरेट भाई कि मैं पीने के लिए नहीं बल्कि अपने हाथ में सुलगते सिगरेटों को केवल देखने के लिए ही तेरा हवन कर रहा था। वे खड़ी हो गयी और मेरे बदन पर हाथ फेरते हुए व्यग्रता से बोली जरा मैं देखूं कहीं चोट तो नहीं लगी है। मैने रूखे स्वर में कहा कि बस बच गया नहीं तो घाव हो ही जाता।  मेरी बात सुनकर वे हंसने लगी। चोट से तो घाव ठीक हो जाते है यह कहते हुए उन्होने फिर एक बार फिर मुझे आलिंगनबद्ध् करने की असफल कोशिश की। मैने जोर से कहा आपका दिमाग खराब है क्या?  क्या कर रही हैं आप। एकदम सीधे बैठे और कोई शरारत नहीं। आपको शर्म आनी चाहिए कि अभी मिले 10 मिनट हुए नहीं कि आप अपनी औकात पर आ गयी।

अरे कुछ नहीं तो अवस्थी जी का ही लिहाज रखती। यदि उन्होने कहा नहीं होता तो क्या मैं किसी भी कीमत पर आपके साथ आ सकता था।  मैं अपनी मर्यादा के चलते किसी का भी रेप नहीं कर सकता पर मैं किसी को अपना रेप भी तो नहीं करने दे  सकता । यह सुनकर वे खिलखिला पड़ी, यह रेप है। मैने सख्त लहजे में कहा कि क्या रेप केवल आप औरतों का ही हो सकता है कि सती सावित्री बनकर जमाने को सिर पर उठा ले । यह शारीरिक हिंसा क्या मेरे लिए उससे कम है। यह सब चाहत मन और लगाव के बाद ही संभव होता है। जहां पर प्यार नेह का संतोष और प्यार की गरिमा बढती है। आप तो इस उम्र में भी एकदम कुतिया की तरह मुंह मारती है। मेरे यह कहते ही वे बौखला सी गयी। तमीज से बात करो मैं कॉलेज में रीडर हूं और तुम बकवास किए जा रहे हो। मैं पुलिस भी बुला सकती हूं। मैने कहा तो रोका कौन है मैं तो खुद दिल्ली का क्राईम रिपोर्टर हूं। कहिए किसको बुलाकर आपको जगत न्यूज बनवा दूं। मैने उनसे कहा कि कल मैं अवस्थी जी को यह बात जरूर बताउंगा। बताइए क्या इरादा है पुलिस थाना मेरे साथ चलेंगी या फिर मैं अभी थोड़ी देर तक और बैटकर आपको नॉर्मल होने का इंतजार करूं। मेरे मन में भी भीतर से डर था कि कहीं यह लेखिका महारानी  सनक गयी और किसी पुलिस वाले को बुला ली या मेरे जाने के बाद भी बुला ली तो हंगामा ही खड़ा हो जाएगा,। मगर पत्रकार होने का एक अतिरिक्त आत्मविश्वास हमेशा और लगभग हर मुश्किल घड़ी में संबल बन जाता है। सिर आई बला को टाल तू की तर्ज पर मैने उनको सांत्वना दी। उन्होने अपना सूर बदलते हुए कहा कि तू मेरा दोस्त है न ?  जब कभी भी मैं दिल्ली आई और तुमसे मिलना चाही तो तुम आओगे न ? मैने भी हां हूं कहकर भरोसे में लिया। फिर मैने कहा कि खाली ही रखेंगी कि अब कुछ चाय आदि मंगवाएंगी। मैने चाय पी और चाय लाने वाले छोटू का नाम पूछा और 10 रूपए टीप दे दी ताकि वो गवाह की तरह कभी काम आ सके।  फिर मैने उनसे कहा बाहर तक चलिए ऑटो तो ले लूं। मैने ऑटो ले ली और मेरे बैठते ही उन्होने ऑटो वाले को 50 रूपये का नोट थमा दी। मेरे तमाम विरोध के बाद भी वे बोली कि आप मुझे छोडने आए थे तो यह मेरा दायित्व है।

बात सहज हो जाने के बाद अगले दिन मैं इस उहापोह में रहा कि कल की घटना की जानकारी श्री अवस्थी जी को दूं या नहीं। मगर दोपहर में हम रिपोर्टरों की डेली मीटिंग खतम् होते ही मैं पास वाले हिन्दुस्तान टाईम्स की ओर चल पड़ा। कादिम्बनी के संपादक राजेन्द्र अवस्थी के केबिन के बाहर था। बाहर से पता चला कि वे खाना खा रहे हैं तो मुझे बाहर रुककर इंतजार करना ज्यादा नेक लगा, नहीं तो इनके भोजन का स्वाद भी खराब हो जाता। खाने की थाली बाहर आते ही मैं उनके कमर में था। मेरे को देखते ही मोहक मुस्कान के साथ हाल चाल पूछा और एक कप चाय और ज्यादा लाने को कहा। चाय पीने तक तो इधर उधर की बातें की, मगर चाय खत्म होते ही कल एचटी से बाहर निकलने से लेकर मंदिर मार्ग गेस्टहाउस में शाम की घटना का आंखो देखा हाल सुना दिया। मेरी बात सुनकर वे शर्मसार से हो गए। उनकी गलती के लिए एकदम माफी मांगने लगे। तो यह मेरे लिए बड़ी उहापोह वाली हालत बन गयी। मैने हाथ जोड़कर कहा कि सर आप हमारे अभिभावक की तरह है। मैं आपके प्यार और स्नेह का पात्र रहा हूं लिहाजा यह बताना जरूरी लगा कि पता नहीं वे कल किस तरह कोई कहानी गढकर मेरे बारे में बात करे। मैने अवस्थी जी को यह भी बताया कि मैंने कल शाम को ही उनको कह दिया था कि इस घटना की सूचना अवस्थी जी को जरूर दूंगा। बैठे बैठे अवस्थी जी मेरे हाथओं को पकड़ लिए और पूछा कि आपने इस घटना को किसी और से भी शेयर किया है क्या ? मेरे ना कहे जाने पर अवस्थी जी ने लगभग निवेदन स्वर में कहा कि अनामी इसको तुम अपने तक ही रखना प्लीज।  मैं कुर्सी से खड़ा होकर पूरे आदर सम्मान दर्शाते हुए कहा कि आप इसके लिए बेफिक्र रहे सर।
इस घटना के कोई दो साल के बाद अवस्थीजी का मेरे पास फोन आया कहां हो अनामी ? उनके फोन पर पहले तो मैं चौंका मगर संभलते हुए कहा दफ्तर में हूं सर कोई सेवा। ठठाकर हंसते हुए बोले बस फटाफट आप मेरे कमरे में आइए मैं चाय पर इंतजार कर रहा हूं। उनके इस प्यार दुलार भरे निमंत्रण को भला कैसे ठुकराया जा सकता था। मैं पांच मिनट के अंदर अंबादीप से निकल कर एचटी हाउस में था। स्री अवस्थी जी के कमरे में घुसते ही देखा कि वही मंदिर मार्ग वाली महिला लेखिका पहले से बैठी थी। मुझे देखते ही वे अपनी कुर्सी से उठकर खड़ी होकर नमस्ते की, तो अवस्थी जी मुस्कुराते हुए मेरा स्वागत किया। उन्होने कहा कि माफ करना अनामी मैने तुम्हें नहीं बुलाया बल्कि ये बहुत शर्मिंदा थी और तुमको एक बार देखना चाहती थी। अवस्थी जी की इस सफाई पर भला मैं क्या कह सकता था। मैने हाथ जोड़कर नमस्ते की और हाल चाल पूछकर बैठ गया। वे बोली क्या तुम नाराज हो अनामी ? मैने कहा कि मैं किसी से भी नाराज नहीं होता। जिसकी गलती है वो खुद समझ ले बूझ ले यही काफी है । मैं तो एक सामान्य सा आदमी हूं नाराज होकर मैं भला अपना काम और समय क्यों खराब करूं। करीब आधे घंटे तक मैं वहां बैठा रहा। बातचीत की और दोनों से अनुमति लेकर बाहर जाने लगा तो अवस्थी जी ने फिर मुझे रोका और महिला लेखिका को बताया कि अनामी को मैने ही कहा था कि इस घटना को तीन तक ही रहने दे। इस पर मैं हंसने लगा सर आपने मना कर दिया नहीं 10-20 लोग तक तो यह बात जरूर चली जाती पर सब मेरे को भी तो दोषी मान सकते थे। मैने किसी को यह बात ना कहकर अपनी ही इज्जत की रक्षा की है । इस पर एक बार फिर खड़ी होकर लेखिका ने मेरे प्रति कृतज्ञता जाहिर की, तो मैं उनके सामने हाथ जोड़कर नमस्ते की और इसे भूल जाने का आग्रह किया।
इस घटना के बाद अवस्थी जी करीब 13 साल तक हमसबों के बीच रहे। उनके निधन के करीब आठ साल हो गए और लेखिका भी अब कहां हैं या नहीं या रिटायर कर गयी सब केवल भगवान जानते है। तब मुझे लगा लगा कि करीब 21 साल पहले की इस घटना को याद कर लेने में भी अब कोई हर्ज नहीं है। तो यह थी एक अप्रत्यासित घटना जहां पर मैं ने सावधान और साहस को सामने रखकर ही खुद को रेप या बदनामी से खुद अपने आपको बचाया ।