बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

अंग्रेज vs

 अंग्रेज ही हैं जो प्रेम के क्षेत्र में उपभोक्ता वादी संस्कृति लाये। उन्होंने ही हमें सिखाया कि बाबू है सदा के लिये ,वाली हमारी थ्योरी पुरानी पड़ चुकी।बाबू कोई हीरा जैसी शाश्वत चीज़ नहीं ।आनी जानी चीज़ है वो ,उसे छूट गई रेलगाड़ी से अधिक महत्व दिया जाना अकारण है।एक बाबू के जाने से जीवन ख़त्म नहीं होता।


वक्त बदल गया है अब।पहले के ज़माने में किशोर कुमार जैसे लड़के मन ही मन जोड़ घटाना करते करते अशोक कुमार हो जाते थे।मुँह में दही जमाये रहने की परम्परा थी पहले ।कहना है पर कहा नही जा रहा ! देखा देखी में ही सामने वाली इंतज़ार करते करते दादी नानी हो लेती थी और ये भाई लाठी टेकते टेकते दुनिया छोड़ जाते थे। 


आजकल प्रपोज़ करना पहले से ज़्यादा आसान है।किसी से कहना है तो कह के फ़ुर्सत हो लें।सामने वाली ने हाँ कह दिया तो मौज है आपकी ।ना हो तो इसमें बुरा मानने जैसा कुछ है नहीं ।बुरा मानता भी नहीं कोई।ऐसे अवसरों पर हिम्मत बनाये रखना ही उचित है।उद्यमी लड़कों के लिये अवसरों की कमी होती भी नहीं।असफलता ही सफलता की कुंजी है ।धैर्य ,परिश्रम ,एकाग्रता से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।


और फिर प्रपोज़ करने में धरा क्या है।बंदे को खुद पर भरोसा हो और जलेबी जैसी बातें करना आता हो इतना काफ़ी है।जेब में भरा पर्स रखने वाले और सच लगने जैसा झूठ बोल पाने वालों के प्रपोज़ल जल्दी मंज़ूर होते हैं।बड़े दिल वाले ,तमीजदार या भलेमानस नहीं है आप।कोई बात नहीं।पर ऐसा दिखना ज़रूरी है।फूलों और चॉकलेट्स पर पैसा खर्च करें।तारीफ़ भरे व्हाट्सअप मैसेज यदि खुद लिखने की क़ाबिलियत ना हो तो ऐसे मैसेज तलाश कर फ़ॉरवर्ड करें।


और फिर भी कुछ हासिल ना हो तो निराश ना हों।हौसला बनाये रखें।जूझते रहे।अपने बाप दादा के ज़माने का , गिरते हैं शहसवार ही मैदान ए जंग में वाला शेर याद रखें।छिले हुये घुटनों की परवाह ना करें।उठ खड़े हो।एक बार फिर दौड़ पड़ें।मंज़िल आपके इंतज़ार में है।


हमें फ़िल्म क़समें वादे के लिये गुलशन बावरा का लिखा ये महान गीत आती रहेंगी बहारें जाती रहेगी बहारें ,दिल की नज़र से दुनिया को देखो दुनिया बड़ी ही हंसी है ,याद रखना चाहिये।एक बाबू के जाने के बाद दूसरा बाबू तलाश लेना ही जीवन है।यह प्रेम की प्राकृतिक चिकित्सा है।अव्वल इससे डिप्रेशन होता ही नहीं और होता भी है तो बिना दवाइयों के जल्दी चला जाता है।


और फिर बाबू ही क्यों छोड़े आपको।आपको खुद अवसर देखकर अपने बाबू से पिंड छुड़ा लेना चाहिये।अंग्रेजों पर भरोसा ना हो तो गीता ही पढ़ लें।गीता में लिखा है कि आत्मा अजर अमर है और यह शरीर के वृद्ध ,जीर्ण शीर्ण होते ही उसे पुराने वस्रों की तरफ़ छोड दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाती है।बाबुओं की भी यही नियति है।जब भी आप इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आपका बाबू अब फक्कड़ हो चुका।अनुपयोगी हैं और इन मूल कारणों की वजह से बोर और खड़ूस होने की मनोदशा को प्राप्त कर चुका तो ऐसे में उससे तत्काल ,किसी ना किसी बहाने छुटकारा पाकर किसी नये बाबू को तलाश लेना ही शास्त्रसम्मत है।


प्रायः बाबू मिलते है प्रारब्ध और संयोग से ,पर यथोचित प्रयास भी करना ही होते हैं इसके लिये।आपको हासिल बाबू कितना दर्शनीय और गुणवान होगा ये आपकी अपनी औक़ात पर निर्भर है।ऐसे में खुद को परिष्कृत करने से उच्च गुणवत्ता का बाबू मिलता है।


और ऐसा बाबू जब भी दिख जाये तो उस पर अपना ठप्पा लगाने के लिये उसे प्रपोज़ करना ही पड़ता है।अब तो नहीं ,पर आज से बीस पच्चीस साल पहले तक हमारे संस्कृति प्रधान देश में प्रपोज़ करना बेहद रिस्की गतिविधि रही है।उन दिनों इस बात की पूरी आशंका बनी रहती थी कि होने वाले बाबू के बाप भाई आपको भीषण नुक़सान पहुँचा सकते हैं।सौ पचास साल पहले अंग्रेज भी कुछ ऐसी ही मानसिकता से ग्रस्त थे ऐसे में उनमें से किसी चतुर आदमी ने प्रपोज़ डे जैसे पर्व का अविष्कार किया,और इस हेतु यह विधान निश्चित किये कि बाबू तलाश रहे किसी भी बाबू को किसी भी तरह की शारीरिक हानि नहीं पहुँचायेगी जायेगी।पर यह ख़ुशी की बात है कि हमारा देश भी अब अंग्रेजों की तरह उदार और अहिंसक हो चला है।


कौन सा काम कब करना है।कैसे करना है हर चीज़ पहले से तय करके चलने वाली क़ौम है अंग्रेज। ऐसे ही इन्होंने किसी का बाबू हो जाने ,किसी को बाबू बना लेने का भी टाईम टेबल तय किया हुआ है। वे तारीख़ तय कर प्रेम करते हैं और जब प्रेम करते है तो और कुछ नही करते।अग्रेंजो के आने के पहले इस मामले मे बडी कन्फ्यूज कौम थे। हम काम के वक्त प्रेम करते थे और प्रेम के वक्त काम करते थे। हमने उनसे जो कुछ थोडी बहुत अच्छी बातें सीखी उनमें बाबू से प्रेम करने बाबत एक निश्चित समय और तारीख की प्रतीक्षा करना भी शामिल है। 


दुनिया की सबसे काबिल और दूरंदेशी कौम का तय किया हुआ ,हाँ कहो बाबू दिवस है आज। ज़ाहिर है आप भी इस इस उचित मुहूर्त में गंगा नहा सकते हैं।


मुकेश नेमा

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