रविवार, 28 जुलाई 2013

प्रेस क्लब / अनामी शरण बबल- 16








........ .....मनमोहन और मोंटेक जैसा हो  
वाकई मानना पड़ेगा कि पिछले 60- 65 सालों में जो अचरच अचंभा चमत्कार और देश को आगे ले जाने की दुहाई देने वाले हमारे सर्वमान्य नेता नेहरू, लालबहादुर, इंदिरा गांधी राजीव गांधी या अटल बिहारी बाजपेयी ने जो कारनामा नहीं दिखाया , वहीं काम अपने मौनी बाबा ने खामोशी से केवल आठ नौ साल में ही कर दिया। इनके पास गुरू घंटाल मोंटेक सिंह अहलूवालिया नामक एक इंटरनेशनल योजना जादूगर है, फिर ये दोनों सतश्री अकाल की जोड़ी भी राजन इकबाल वाली है। गरीबी दूर करने का नारा बुलंद करते करते हमारे कई नेता दिवंगत हो गए, मगर गरीबी है कि कम होने का नाम नहीं ले रही। हमारे प्रात :स्मरणीय वंदनीय मनमोहन सिंह और योजना आयोग के सबसे बड़े जादूगर मोंटेक के साथ मिलकर गरीबी की इतनी अच्छी और शानदार मुहाबरा सामने रखा है कि एकाएक देश में 21 फीसदी गरीब सरकारी गरीबी रेखा से उपर आ गए। बीपीएल को भी शर्मसार करने में उस्ताद मोंटेक ने 33 रूपये और 27 रूपयो में गरीबी का इतना शानदार ककहरा सामने रखा है कि शायद यूपीए सरकार भी इस मुहाबरे को अपने चुनावी प्रचार में शामिल करना पसंद ना करे। मान गए उस्ताद की यदि मनमोहन मोंटेक एंड संस को खुली छूट दे दी जाए तो गरीबी दूर हो या ना हो यह तो पंजा जाने मगर गरीबों को बेइज्जत करने में द ग्रेट एमएमएस कोई कोर कसर छोड़ने वाले नहीं है।   
द ग्रेट एमएमएस का माजरा  .......
इंटरनेशनल ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह का कैरियर शानदार रहा है। तमाम देशी विदेशी संस्थानों में अपनी सेवाएं देने वाले अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मोंटेक का नाता जन्म जन्म का है। मनमोहन सिंह रिजर्व बैंक में रहे हो  या वित मंत्रालय में हर जगह हर समय मोंटेक इनके साथ इनके बतौर मैनेजर की तरह शैड़ो बने रहते है। पूरी दुनियां में एमएमएस की जोड़ी मशहूर है। आमतौर पर माना जाता है कि मोंटेक की योजनाओं को मनमोहन दा अपनी जुबांन देते है। चंद दिनों के लिए यूजीसी में भी रहने वाले मनमोहन बिना मोंटेक अधूरे से लगे, क्योंकि वहां पर मोटेंक को खपाना आसान नहीं था। अब देखना है कि गरीबी रेखा की नयी परिभाषा के बाद एमएमएस की इस जोड़ी को लेकर यूपीए में अब कौन सा नया पावर गेम चालू होता है। वैसे मानना पड़ेगा कि इस एमएमएस ने देश के गरीबों को गरीबी की पीड़ा से मुक्त कराने की जितनी कोशिश की है, वह अकेले कांग्रेस से ब्लू स्टार ऑपरेशन का के इंतकाम को शांत करने के लिए काफी है।
और उल्टा पड़ रहा है मोदी विरोध  

जनता के बीच जाकर रैली करने निकालने या जनसभा करने में लाखों रूपये खर्च करने पड़ते है, इसके बावजूद उसका इम्पैक्ट क्या होता या रहता है, इसको लेकर तमाम नेतागण अंधेरे में ही रहते है। मगर जबसे खबरिया चैनलों की देश में धूम मची है तबसे सभी दलो के नेताओं के मजे हो गए है। सजसंवर के स्टुडियों में जाकर बैठ गए और दे दन दना दन दन एक दूसरे पर बोफोर्स से निशाना साधने लगते है। रोजाना रात को प्राइम टाईम पर नेताओं का वाक युद्ध होता है। खासकर जबसे गुजरात वाले नरेन्द्र मोदी का नेशनल अवतार हुआ है तबसे सभी चैनलों मे होने वाले इस महाभारत में मोदी ही छाए हुए है। विरोध करना है और गुजराती को वापस गांधीनगर भेजने या किसी लायक नहीं साबित करने की इस मुहिम में नेताओं ने तो चैनलों को इस तरह मोदीमय बना दिया कि आह मोदी वाह मोदी गाय मोदी चाय मोदी से लेकर किलर मोदी तो सुपर मोदी की छवि से मोदी को नवाजा गया. तमाम नेतागण समझ तो यह रहे थे कि मोदी को इस तरह ड्रैकूला साबित किया जाए कि जनता को मोदी से हेट होने लगे, मगर जनता के बीच आजमाए गए तमाम नेताओं का मोदी विलाप से जनता के बीच मोदी एक हीरो की तरह पेश हुए। ज्यादातर लोगों को लग रहा है कि आखिर क्या बात है इस मोदी में कि लोग इकठ्टे हो गए है। विकास की बात करने वाले मोदी के सामने तमाम युवराजों की इमेज मलीन होती दिख रही है। देश के अपने महान नेताओं की दूरदर्शिता पर क्या आपको कोई शक है ?

चुनावी सर्वेक्षणों से नेता हैरान

एनडीए को मैदान से बाहर मानकर चल रहे ज्यादातर नेता मोदी की मुखियागिरी को चार दिन की चांदनी मान रहे थे। पीएम पोस्ट को हमेशा नकारने वाले युवराज बाबा भी भारी दबाव से इसबार पीएम के लिए राजी होकर कांग्रेसियों पर अहसान जता रहे थे। यानी यूपीए में चुनाव से पहले ही मामला खुशगवार बनता दिख रहा था। कि अचानक कई सर्वेक्षणों ने यूपीए के टेस्ट को खराब कर दिया है।  एक तरफ मोदी के अगुवाई में एनडीए को सबसे ज्यादा सीटे मिलने की उम्मीद से कईयों को यह बात पच नहीं रही है। वहीं दूसरी तरफ एनडीए एंड मोदी ग्रूप में उर्जा का संचार हुआ है।. वहीं एक और सर्वेक्षण में मोदी को मनमोहन और राहुल गांधी से ज्यादा लोकप्रिय बताया गया। बात मोदी तक भी रहती तो युवराज के लिए खास चिंता की बात नहीं थी, मगर हद तो तब हो गयी जब अपने मनमौनी मनमोहन सिंह को भी युवराज से ज्यादा लोकप्रिय बताया गया। यानी खिचड़ी दाढ़ी से इमेज बनने की बजाय और बिगड़ने लगे तो यह समझ लेना ही पड़ेगा कि बाबा की ट्रेन स्टेशन से खुलती जा रही है और....

.........और रायबरेली की प्रियंका
और ना ना ना ना ना करते करते अंतत :  सोनिया राजीव गांधी पुत्री प्रियंका गांधी अपने परिवार की परंपरा का आदर करते हुई देशहित में जनसेवा करने 2014 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली से चुनाव लड़ेगी। वे कांग्रेस सुप्रीमों और अपनी प्यारी मम्मी सोनिया गांधी की जगह पर मैदान में उतरेंगी। क्योंकि अपनी सेहत को लेकर सोगा अब जनसेवा नहीं कर पा रही है, लिहाजा जनसेवा का परम धर्म पुत्री प्रियंका बेबी को निभाना पड़ेगा। सोगा की खराब सेहत को देखते हुए यह सब पहले ही फिक्स हो गया था. जिसको पूरे इमोशनल नौटंकी के साथ जल्द ही रायबरेलियों से आंसू के साथ बेटी को साथ देने की सिपारिश सोगा करेंगी और प्रिगा वाड्रा मैडम देश हित के लिए परिवारवाद की नयी फसल की तरह लोगों पर अपना चुनावी ड्रामा करने के लिए अवतरित होंगी।

किराये की पहचान वाले मैंगों (मैन)  पीपल

प्रियंका गांधी के चुनावी मैदान में बतौर प्रत्याशी के नवीन स्वरूप में जाहिर है कि वे गरीबी विकास और लोगों को बेहतर जिंदगी दिलाने के लिए दिल खोलकर जुबानी प्रयास करंगी। एकदम खासमखास परिवार से होने के बाद भी सामान्य नागरिकों और आम जनता के बीच अपनी इमेज बनाने के लिए प्रिगा दम लगा देंगी, मगर बहुत लोंगों को शायद यह पत्ता नहीं है कि प्रिगा के मुरादाबादी पतिदेव को मैंगों मैन से हेट है। वे अपने साथ रहने वाले वाले लोगों से अक्सर सामान्य जनता को मैंगों मैन या मैंगो पीपल कहकर उपहास उड़ाते है। अब इस मैंगोमैन पीपल की बात करने वाले दामाद जी को कौन समझाए कि मैंगोमैन की भी तो एक अपनी पहचान है पर किराये के मकान की तरह किराये की पहचान ओढ़ने वाले इस मुरादाबादी मैंगो को कौन बताए कि अपनी बीबी से पहचाने जाने वाले मैगों के मुंह से मैंगों पीपल की यह बात तो मुरादाबादी ब्रास को भी रास नहीं आएगी। .

लालू का तंत्र मंत्र जंतर मंतर
रंगरूप और आकार प्रकार से लेकर रीति कुरीति अनीति की बात करने वाले अपने चरम काल में बिहार के भूत सीएम लालू प्रसाद यादव  अपने सुहावने काल में भगवानों से भी टक्कर लेने लगे थे। पूजा पाठ का मजाक या खिल्ली उड़ाने वाले लालू पर चारा की इतनी कृपा हुई कि वो बेचारा बनकर बेकार हो गए। हालांकि अपनी पत्नी को सीएम बनाकर सत्ता की राबड़ी खाने में मशगूल रहे लालू  अपने प्राणप्रिय परम मित्र मुलायम के स्टार से सुलगते रहे है। खासकर जब नेताजी का बेटा सीएम बन गया तब तो लालू भी खुद को परास्त महसूसने लगे। अपने बिगड़े हुए सितारों को लाईन पर लाने के लिए लालू ने अब धार्मिक चादर ओढ़ लिया है, और विध्यांचल के एक बाबा से जमकर डॉट खाने के बाद पीएम बनने का आर्शीवाद पाया..। यह प्रति फलित होगा या नहीं यह तो 2014 या इसके बाद ही पता चलेगा, मगर चारा से बेचारा बने लालू फिलहाल खुश है।
कंस मामा के श्रेणी में  बंसल मामा

आमतौर पर मामा को अपने भांजे बहुत प्रिय होते है, मगर मामाओं के भी दो प्रकार होते है। एक तो कंस मामा होते है, जो अपने भांजे को मारने के लिए पूरा दम लगा देते है, और दूसरे मामा शकुनी मामा की श्रेणी में आते है, जो अपने भांजे को राज काज दिलाने के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देते है। 21वी सदी में बंसल मामा मे दोनो मामा के गुण है। एक तरफ तो वे शकुनी की तरह अपने भांजे को बचाना भी चाहते है, मगर अपनी जान और साख इमेजे के लिए भांजे की कुर्बानी देने के लिए भी राजी हो गए लग रहे है। मामा की हरी झंड़ी मिलने के बाद ही 90 लाख लेने वाले सिंगला को अपने बंसल मामा से क्या उम्मीद है इसका राज केवल बंसल मामा ही जानते है।
एनसीआर यानी नो कनेक्शन रीजन
एनसीआर का दायरा पिछले 28 साल में बढते बढ़ते भरतपुर से लेकर हरियाणा के ज्यादातर शहरों को भी अपने जद में ले लिया है। एनसीआर का मतलब होता है नेशनल कैपिटल रीजन ( राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ) जिसे दिल्ली इतना ही बेहतर और विकसित करने का टारगेट है। सरकारी आकंड़ो में तो एनसीआर  का फैलता दायरा सुकून देता है  एनसीआर का एक नया अर्थ यह भी माने तो नो कनेक्शन रीजन भी कहा जाता है। दिल्ली से 50 किलोमीटर दूर तक तो लोग बसने के लिए तो सोचते नहीं है,। वहां पर 150 किलोमीटर दूर जाकर रहते हुए दिल्ली में रहने का भ्रम पालना तो कोई नेता ही देख और कर सकता है। गुड़गांव के पड़ोस में मेवात इलाके को नॉर्थ इंडिया को कालाहांड़ी कहा जाता है। यानी एनसीआर बनने के बाद भी इलाके में सबकुछ पहले जैसा ही हाल है, तो लोगों को एनसीआर का दायरा फैलाना क्या कोई दॉव सा नहीं लगता ?

आप के साथ हम आपके है कौन

आप बनाकर और रामदेव अन्ना से पंगा लेकर दिल्ली की सीएम को बेदखल करने का सपना देख रहे एके 47 नुमा अरविंद केजरीवाल को चुनाव से पहले ही पसीने छूटने लगे है। दिल्ली के ज्यादातर ऑटो रिक्शा के पीछे शीला के खिलाफ पोस्टर लगाकर सत्ता से बेदखल करने और सती में आने का सपना देख रहे है। अपने मुंगेरीलाल के सपने में पहला कील अन्ना चुभो रहे है। एके को आप भंग करने की सलाह दे रहे है। वहीं आप के कई भावी उम्मीदवार सत्याग्रह पर उतारू होकर बगावती लहजा दिखा रहे है।आप में बाप बनने वाले कार्यकर्तीओं से निपटना क्या इतना आसान है ?

रविवार, 14 जुलाई 2013

देश हित के लिए काम करने का समय है : ड़ा. त्रिवेदी







 






द ग्लोबल ओपन युनिवर्सिटी (नागालैण्ड)  तथा इंदिरा गांधी टेक्नोलॉजिकल एंड मेडिकल साइंसेज यूनिवर्सिटी अरुणाचल प्रदेश के संस्थापक कुलाधिपति डॉ प्रियरंजन त्रिवेदी एक अनूठे चिंतक हैं। एक शैक्षणिक चिंतक होने के साथ साथ पर्यावरण और कृषि विशेषज्ञ डा. त्रिवेदी ज्यादातर देशी समस्याओं पर गहरी पकड़ और बेबाक नजरिया से तल्ख टिप्पणी करते है। इनकी टिप्पणियों में तलख्यित के साथ साथ सरकार और नौकरशाही की बेऱूखी और उदासीनता को लेकर काफी रोष है.। जल जंगल जमीन जानवर जनजीवन पर्यावरण प्रदूषण बाढ़ सूखा अकाल  और प्राकृतिक – मानवीय आपदा पर भी काफी चिंतित हैं। बढ़ती आबादी से लेकर बेकारी आंतकवाद हिंसा तस्करी से लेकर  जीवजंतुओ और पक्षियों की लगातार कम होती तादाद से भी आहत है। शिक्षा और सेहत के अंधाधुंध व्यावसायिक करण से स्वास्थ्य और शैक्षणिक वातावरण में पैसे की चमक दमक से वे विचलित है। तमाम ज्वलंत मुद्दों पर डा. त्रिवेदी से लास्ट संड़े के लिए अनामी शरण बबल ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है बातचात के मुख्य अंश: ---
सवाल--- अपना देश भारत महान, एक सौ मे 99 बेईमान, फिर भी जय जयकार है और आदमी लाचार है। इस तरह की छवि टिप्पणी और आम धारणा के बीच आप देश और देश के संचालकों नीति नियंताओं पर क्या राय रखते है ?
जवाब – देश एक गंभीर संकट के दौर में है। स्वार्थी शासकों लालची नौकरशाहों और अदूरदर्शी संचालकों की समाज निर्माण के प्रति उदासीन नीतियों से देश संचालित हो रहा है। देश को विकासशील देशों की कतार में लाने की ठोस पहल की बजाय नेताओं की जुबानी पहलकदमी से देश आगे बढ़ रहा है। देश की सुरक्षा को लेकर भी यहीं जुबानी जंग हो रही है.।. पूरी दुनियां हमारे देश के नेताओं और नौकरशाहों की कागजी बहादुरी को जान गयी है। सरकार  किसी समस्या को सुलझाने की बजाय उसे यथावत बनाए रखना चाहती है। देश को बेहतर बनाने की बजाय कोई भी आफत ना हो बस इसी सावधानी से सरकार चलाते है। डर डर कर सरकार चलाने वाली पार्टियां करप्शन घोटालो और देश को बेचने वाली नीतियों को लागू करते समय तो नहीं डरती है पर देश हित के लिए कोई भी कड़ा फैसला लेते समय वोट बैंक का ख्याल करके लाचार हो जाती है। इस तरह के शासकों के रहते हुए देश को आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी होने की हम कल्पना नहीं कर  सकती है।
सवाल—इसका देश पर क्या असर पड़ता है ?
जवाब – इसका असर तो आप हर तरफ हर स्तर पर देख ही रहे है।. नेताओं के चरित्र को देखकर सत्ता की पूरी कमान ही आज नौकरशाहों और बाबूओं के हाथों में चली गयी है। इनके भीतर शासकों का डर खत्म हो जाता है। यहां पर शासकों में ही नौकरशाहों और बाबूओं को लेकर डर बना है। सत्ता में रहने वाली हर पार्टी के नेता अपनी पसंद के ब्यूरोक्रेट को अपना सारथी बनाते है। मंत्री अपने सारथी नौकरशाह पर निर्भर रहते है और वो ब्यूरोक्रेट अपनी अंगूलियों पर नेता को नचाता है. उसको लाभ पहुंचाता है और मंत्री के नाम पर अपने खजाने और ताकत को बढ़ाता रहता है। उसके लिए देश और जनसेवा से ज्यादा जरूरी अपने मंत्री को खुश रखना और चापलूसी करके उस पर कायम अपने विश्वास को अटल बनाये ऱखना होता है। हमारे नेता का नौकरशाहो पर निर्भर होने का नतीजा है, कि वे लोग एक दूसरे के रक्षक बनकर खूब लूटमार में लग जाते है। विपक्षी दल भी चाहे सरकार किसी की रहे मलाई खाने में किसी को कोई कोर कसर नहीं रहती।, लिहाजा एक तरह से एक दूसरे के रक्षक की भूमिका भी निभाते है। सत्ता और नौकरशाहों बाबूओं की तिकड़ी के एक साथ हो जाने का असर सरकारी सेवाओं साधनों और संस्थानों पर दिखने लगता है। खुलेआम करप्शन और सुविधा शुल्क के बगैर कामकाज नहीं हो पाता। चाहे अस्पताल हो या स्कूल कॉलेज जनसुविदा विभागों में भी अराजक हालात होता है । लोग लाचार से बेबस रहते है और ज्यादातर कर्मचारियो में डर संकोच नहीं रह जाता। लोगों की लाचारी पर भी सरकार और नौकरशाहों का ध्यान नहीं जाता।    
    सवाल –  लोकतंत्र की धारणा है कि यह जनता द्वारा जनता की जनता के लिए बनाई गई सरकार होती है , और इसमें सबसे बड़ी भूमिका एक जनता की ही होती है ?
जवाब – आपका कहना एकदम सही है। देखने में तो यह सत्ता की एक अनोखी परम्परा सी दिखती है, मगर लोकतंत्र वास्तव में एक समय के बाद भीड़तंत्र या अराजक आपराधिक चेहरों की समूह बनकर रह जाती है।  तमाम दलों को अपने वोटरों के रूख और समर्थन का पत्ता होता है। ज्यादातर पार्टियां पूरे देश को अपना मानने की बजाय एक खास वर्ग और समूह को ही सत्ता की पूंजी मान लेती है। यहां पर सोच का दायरा सिकुड़ जाता है। और आज आप अपने देश को ही देख ले कि महज 65 – 66 साल में ही किस तरह पूरी धारणा बदल गयी है। छोटे छोटे दलों का एक महाजनी चेहरा प्रकट होता है जो भले ही देश की बात करता हो, मगर उसका ध्यान केवल अपने इलाके और अपने वोट बैंक और अपने लिए ज्यादा से ज्याद ब्लैकमेल करके मांगे मनवाने की होती है।
सवाल – लगता है कि हमारी बातचीत का पूरा लाईन ही चेंज होता दिख रहा है । कहां तो बातचीत शुरू कर रहे थे शिक्षा को लेकर और हमलोग कहां आकर ठिठक गए ? 
जवाब – नहीं हमें तो लग रहा है कि बातचीत पटरी पर है, क्योंकि जब जीवन बचेगा समाज है और समाज की मुख्यधारा में आशाओं और विश्वास की संजीवनी बची रहेगी, तब तक लोगों में और समाज में संघर्ष का माद्दा भी बना रहेगा। शिक्षा तो समाज और लोगों के उत्थान की केंद्र बिंदू है। मगर आज तो समाज और इसके मुख्य स्त्रोतो को बचाने की जरूरत है। हमारे यहां की नदियां सूख चली है. देश के 90 फीसदी तालाब झील और गांवो के पोखर सूख गए है। जलस्तर पाताल में चले जाने से हैंड़पंप और कुंए बेकार हो गए। शहरी कचरा नदी के किनारे के शहरों और बस्तियों को लील रही है। जीवन दायिनी होने की बजाय नदियां मानव विनाशकारी हो गयी है। पानी की कमी को पूरा करने के लिए गंदे पानी को रीट्रीट करके गंदे पानी को ही शोधित कर फिर पेयजल के तौर पर दिया जा रहा है। खाने के नाम पर हमलोग जहर खाने को लाचार है. खेतो में खाद और कीटनैशक दवाईयों के नाम पर पेस्टीसाईज का जम कर छिड़काव हो रहे है, जिससे खेतों की उर्वरा क्षमता पर ही असर पड़ रहा है। दवाईयों के नाम पर जिस तरह मानव सेहत और जेब के साथ खिलवाड़ हो रहा है वह भी सरकारी तंत्र की लापरवाही का उदाहरण है। बिजली की कमी को पूरा करने के लिए बड़ी बड़ी नदियों के प्रवाह को रोका जा रहा है, तो पहाड़ों को काटा जा रहा है । बिजली के नाम पर भूकंप जलप्रलय और विभीषिका को हमारे प्लानर और इंजीनियर न्यौता दे रहे हैं। उत्तराखंड विनाश के भयानक तांड़व से भी कुछ  सीखने के लिए हम तैयार नहीं है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और लगातार कम हो रहे जल जंगल के भयावह परिणाम को जानते हुए भी लापरवाह बने हुए है। विनाश और खतरे के कगार पर खड़े होने के बाद भी सरकार जनता से सच छिपाने की पहल करती है।  
सवाल – सरकार की लापरवाही या उदासीनता को आप किस तरह देखते है ?
जवाब --   आज देश का हाल बेहाल ही उदासीनता और काम को फौरन करने  की बजाय टालने की नीति से है। देश की सीमाओं पर कड़ाके  की ठंड़ में भी देश की रक्षा के हौसले को बनाए रखना भी कमाल की बात है, मगर देश के नौकरशाह और सरकार का रवैया इन बहादुरों के प्रति भी नकारात्मक रहता है। पड़ोसी देशों से रिश्ते जगजाहिर है।. बांग्लादेश जैसा देश जिसको अलग देश बनवाने में भारत की भूमिका रही है वो भी हमारे सैनिकों को मारकर जानवरों की तरह फेंक देता है और हमारे नेता केवल एयरकंडीशन कमरे में बैठकर रेड़ियों और न्यूज चैनलों पर धमकी देकर चुप हो जाते है। पाकिस्तान के सामने हम पिछले सात दशक से दब्बू बने हुए है।  मामला बाहरी सुरक्षा की हो या देश की आंतरिक सुरक्षा की हो, हर मामले को निपटारे से पहले लाभ हानि को परखा जाता है। देश के भीतर ही देखिये लगभग हर राज्य में कोई ना कोई बड़ी समस्या उबल रही है। उदासीनता या वोट बैंक के समीकरण की वजह से मामले को दशकों तक लटकाया जाता रहा जिससे बाद में वही समस्या भयानक आकार ले लिया। देश के भीतर एक दर्जन से ज्यादा संभावित राज्यों का मामला हो या आतंकवाद हो अशिक्षा हो या कोई भी मामला हो इन सबके लिए सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती।
सवाल –  इसे जरा और स्पष्ट करे ?
जवाब – देश को आजाद हुए करीब करीब 70 साल होने वाले है।  इस दौरान 14 दफा लोकसभा चुनाव हुए. देश में करीब 50 साल से भी अधिक समय तक एक ही पार्टी सत्ता में रही है, इसके बावजूद एक सभ्य  मानव समाज और देश के विकास के लिए सबसे जरूरी पानी बिजली परिवहन सड़क शिक्षा सफाई और  स्वास्थ्य की सुविधाओं का पूरा इंतजाम नहीं किया जा सका है। गांव शहर से लेकर राजधानी दिल्ली हो या कोई भी महानगर हर जगह मानव जीवन की इन मूलभूत जरूरतों की कमी बनी हुई है। इंतजाम पर करोड़ों खर्च होने के बाद भी लापरवाही से जनता में सरकार अपना विश्वास खो चुकी है।. सरकारी स्कूल हो या कॉलेज । सरकारी अस्पताल की बजाय लोग प्राईवेट अस्पताल में जाना ज्यादा पसंद करते है। बदहाल सरकारी विभागों के निजीकरण होते ही सूरते हाल बदल जाते हैं और लस्त पस्त विभाग लाभ के साथ साथ सही रास्ते पर आ जाता है। काम के प्रति लापरवाही का मुख्य कारण एक कर्मचारी के मन से नौकरी के खतरे का भय का नहीं होना है. जिससे एक कर्मचारी बेखौफ होकर उदंड़ हो जाता है। 
सवाल – भारत की शिक्षा नीति पर आपकी क्या धारणा है ?
जवाब --  यह पूरी तरह दोषपूर्ण अवैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला है ।. शिक्षा को बाजार और समय के साथ जोड़ा नहीं गया है। शिक्षा को केवल कागजी ज्ञान का माध्यम बना दिया गया है.। शिक्षा में सुधार के नाम पर इसको और बदतर किया जा रहा है। तकनीकी शिक्षा के नाम पर तकनीक का प्रवचन पिलाया जाता है, बगैर यह जानने की मनोवैज्ञानिक पहल की कि तकनीकी शिक्षा को एक छात्र द्वारा कितना और किस स्तर तक ग्रहण किया गया। नौकरी का ढंग इस तरह का है कि एक इंजीनियर मौके पर रहते हुए काम को अपने सामने निरीक्षण करे, मगर. होता यह है कि एक हेड मिस्त्री या कारीगर की दक्षता से ही किसी बड़े प्रोजेक्ट की मजबूती का पैमाना तय होता है. एक तकनीकी शिक्षा प्राप्त अधिकारी केवल कागजों पर पूरी योजना को साकार करता है मगर उसको वास्तविक आकार नीचे के कारीगर देते है, जो रोजाना के अनुभव से दक्ष या माहिर होते है। मौजूदा शिक्षा नीति की यह पीड़ाजनक हालत है कि शिक्षा समाप्त होने के बाद एक छात्र अपना बायोडॉटा बनवाने के लिए भी वह कोई साईबक कैफे के उपर निर्भर होता है.। शिक्षा में प्रैक्टीकल शिक्षा या अभ्यास की भारी कमी है। इस वजह से एक छात्र सही मायने में चार पांच साल की पढ़ाई को अपने जीवन और कैरियर में उतार नहीं पाता. कागजी शिक्षा से नौकरी तो मिल जाती है, मगर वहां पर भी किसी क्लर्क या सहायक द्वारा काम के मूड को समझ पाता है।
सवाल – इसमें क्या खराबी है ? कोई भी आदमी किसी काम को समझने पर ही तो बेहतर तरीके से काम को अंजाम दे सकता है ?
जवाब – क्या आपको इसमें कोई खराबी नजर नहीं आती। एक डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक को गहन विषयों के बारे में सामान्य सी जानकारी कोई टेक्निशियन या कोई हेल्पर बताएगा ?  यह हमारी शिक्षा प्रणाली का क्या दोष नहीं है कि वह पांच छह साल में भी एक छात्र को पारंगत नहीं कर पाता ?
सवाल – देश की शिक्षा में एकरूपता की भारी कमी है। हर राज्य का अपना अलग शिक्षा बोर्ड या परिषद है। राष्ट्रीय स्तर पर भी सीबीएसई के अलावा और भी कई बोर्ड या परिषद है। अलग अलग जातियों खास समुदायों के अपने पाट्यक्रम और शिक्षा संविधान तक है। इस विभिन्नता या अनेकता को क्या एक दायरे  में करने की जरूरत नहीं लगती ? 
जवाब--  देखिए , अगर किसी देश में शिक्षा के कई बोर्ड या परिषद है तो इसमें को खराबी नहीं है, और ना किसी को इस पर आपति ही होनी चाहिए। हमारा देश अधिक आबादी वाला एक विशाल और विभिन्नताओं वाला देश है। हर प्रांत और उसमें रहने वाले लोगों में अपनी संस्कृति, मान्यता  .लोकाचार और भाषा का अलग संस्कार होता है, जिसे जीवित रखना और संरक्षित करना भी आवश्यक है। इस तरह स्थानीय बोर्ड अकादमी या शैक्षणिक माध्यमों के जरिये ही इन पर पूरा ध्यान दिया जा सकता है। मगर मेरी मान्यता है कि देशज संस्कारों को सहेजने के साथ साथ प्रांतीय लोगों के दृष्टिकोण को राष्ट्रीय और  वक्त के साथ उनको भी अवगत करा. जाने की जरूरत है. एक आधुनिक राष्ट्रीय नजरिये के बिना देश की शिक्षा के स्तर को एकरूप नहीं किया जा सकता। छात्रों पर ज्यादा निगरानी रखने के लिए अलग अलग बोर्ड या राज्य शैक्षणिक बोर्डो का होना आवश्यक होने के साथ साथ वे एक दूसरे के लिए सहायक भी है। मगर पाठ्यक्रमों में एकरूपता और परीक्षा प्रणाली को लेकर भी एक समान दृष्टि का होना जरूरी है, तभी तो कोई छात्र चाहे मुबंई से हो या किसी दूरदराज इलाके से हो , इसके बाबजूद अध्ययन का पैमाना एक समान ही होगा। मगर अफसोस की इसको लेकर देश में अभी तक कोई एक समान नजरिया साफ नहीं हो सका है। सरकारी और निजी स्कूलों के पाठ्यक्रमों और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी एक रूपता का घोर अभाव है। देश के सभी संस्थानों को इसमें पहल करनी चाहिए।।
सवाल – पहले तो केवल प्राईवेट स्कूल होते थे मगर आज तो देश में एक दो नहीं सैकड़ों प्राईवेट यूनीवर्सिटी भी खुल चुके है. जहां पर लाखों छात्र पढ़ाई कर रहे है ?
जवाब --  प्राईवेट यूनीवर्सिटी से कोई आपति नहीं है , मगर सरकार को यूनीवर्सिटी या डीम्ड यूनीवर्सिटी या इसके समतुल्य मान्यता देते समय पाठ्यक्रमों में एक समान संयोजन की नीति को पालन करने की शर्तो को अनिवार्यता होनी चाहिए थी। मगर जितने यूनीवर्सिटी हैं उतने ही प्रकार के प्रयोग और एक दूसरे से बेहतर पाठ्यक्रम को लागू करने की अंधी प्रतियोगिता हो रही है। यह जाने बगैर कि इसका एक छात्र पर क्या असर पड़ रहा है. छात्रों की परवाह किए बगैर केवल अपनी इमेज और साख को औरों से बेस्ट करने की नीयत के पीछे एक छात्र को एक क्लासरूम की बजाय एक शैक्षणिक अनुसंधान के प्रयोगशाला में बैठा दिया जाता है, जहां पर होने वाले रोजाना के प्रयोगों से एक छात्र किस तरह किस रूप में बाहर निकल रहा है यह किसा से छिपा नहीं है। एक छात्र को उसकी मौलिकता उसके विचारों और उसके नजरिये का सम्मान होना चाहिए। उसके आधार पर उसको विकसित करने का मौका नहीं दिया जा रहा है।
सवाल –  इसका कारण आप क्या मान रहे हैं ?
जवाब – दरअसल लगभग सभी अभिभावकों को अपने बच्चों पर भरोसा नहीं है. उनको निजी स्कूल ट्यूशन या ट्यूटर पर ज्यादा यकीन होता है। पढाई के अलावा किसी बच्चें की मौलिक प्रतिभा का परिवार द्वारा अनादर किया जाता है। केवल कागजी ज्ञान या कट पेस्ट की पढ़ाई को ही परिवार टैलेंट की तरह देखता है। बच्चे की मौलिकता के प्रति सामाजिक और पारिवारिक दृष्टिकोण में बदलाव की जरूरत है। खेलों को ज्यादातर परिवारों में सबसे बेकार और बुरा माना जाता है, मगर केवल खेल की वजह से ही दर्जनों खिलाड़ी घर घर के हीरो माने जा रहे है। पारिवारिक समर्थन के बगैर क्या कोई सचिन या धोनी सामने उभर पाते। मेरी धारणा है कि केवल खेल ही नहीं हर तरह की विभिन्नता और लीक से अलग चलन को सम्मान और प्रोत्साहन देना होगा।
सवाल – इसी साल से दिल्ली यूनीवर्सिटी ने बैचलर कोर्सेज विद ऑनर्स के तीन साल के पाठ्यक्रम को चार साल का कर दिया है। इसे आप किस तरह देखते है ?
जवाब – यह एक गलत और बेकार सा फैसला है, जिसे दो चार साल में वापस लेना होगा। इस तरह के बड़े यूनीवर्सिटी के इस तरह के अवैज्ञानिक और अतार्किक फैसलों से ही शिक्षा में अंतरविरोध बढ़ता और पनपता है। चार साल के पाठ्यक्रम  से छात्रों को केवल एक साल की बर्बादी के अलावा कुछ और नहीं हासिल होने वाला है. एक तरफ सरकार के पास नौकरियों की कमी है लिहाजा मुझे तो लग रहा है कि ज्यादा से ज्यादा समय तक पढ़ाई में व्यस्त रखने की यह केवल एक सरकारी चाल है ,जिसे दिल्ली यूनीवर्सिटी के जरिये लागू किया जा रहा है। एक तरफ सरकार नौकरियों की उम्र सीमा तो बढ़ा नहीं रही है ?  लिहाजा सरकार का यह फैसला लाखों छात्रों के कैरियर को प्रभावित करने वाला है।
सवाल – डीयू के इस फैसले के खिलाफ क्या होना चाहिए  ?
जवाब – आप देखते रहे हमलोगों को कुछ करने से ज्यादा काम दो एक साल के अंदर छात्र संगठन और पोलिटिकल पार्टियां ही कर देंगी। यह समय का तकाजा और मांग है कि इस तरह के बेकार पाठ्यक्रमों को समाप्त कराने  में लोग खड़ा हो।
सवाल – सरकार से क्या अपेक्षा रखते है ?


जवाब – सरकार से क्या उम्मीद करेंगे ?   सारा फितूर ही सरकार का करा कराया है। डीयू चूंकि राजधानी में है लिहाजा सारा हंगामा सरकार अपने सामने ही देखना चाहती थी।  एक तरफ चुनावी फायदे के लिए सरकार नौकरी की उम्र बढ़ाकर 65 करने पर आमादा है तो दूसरी तरफ देश में करोड़ो बेकार और बेरोजगार युवक उबल रहे है। सरकार का ध्यान इनकी तरफ नहीं है। सत्ता के मोह से बाहर  निकल कर देश हित के लिए काम  करने का समय आ गया है।   
सवाल -- चलिए मान लेते है कि हर जगह गलत और गलत ही हो रहा है, कोई समाधान आपके पास है ?
जवाब – क्यों नहीं। दोषपूर्ण शिक्षा नीति या प्रणाली से बेकारी अशांति हिंसा आतंकवाद और प्रदूषण की समस्या सिर उठा चुकी है. इनके सामने सरकार और सरकारी आलाकमानों ने समर्पण सा कर दिया है। इसको नियोजित तरीके से ही समाधान किया जा सकता है। बेकारी से समाज में अशांति का माहौल बढ़ता है। . अशंति में हिंसा आंतकवाद और तस्करी बढ़ जाती है। युवावर्ग को छोटे छोटे साधनों और स्वार्थो के लिए खरीदा जा रहा है। समाज में हर तरफ प्रदूषण का साम्राज्य है. हर तरह का प्रदूषण का बोलबाला है। यहां पर सबसे अच्छा समाधान है कि इन तमाम समस्याओं को आपस में मैत्री करा दी जाए। इससे तमाम समस्याओं में एक समन्वय संतुलन पैदा होगा। समाज में फ्रेणडली इकोलॉजी पनपेगा। देश भर में नर्सरी बनाए जाए। पौधों की नर्सरी ले समाज में पर्यावरणीय प्रबंधन को लेकर नयी दृष्टि का विकास होगा। कचरा प्रबंधन को लेकर समाज में नये उधोग का विकास होगा। इस तरह बेकारी अशांति हिंसा अपराध और लूटमार की बजाय कूड़ा सबके लिए रोजगार और कमाई का साधन बन जाएगा।इससे जैविक खाद्य बनाया जाएगा और देश भर में एक नए समाज की रूपरेखा प्रकट होगी। विदेशों में भी कटरा प्रबंधन को लेकर शोध होंगे। ( हंसते हुए ) पाकिस्तान को यदि इस कचरा प्रबंधन और जैविक खाद्य के बारे में पत्ता चल जाए तो आतंकवाद और सोने की तस्करी को छोड़कर इसके माध्यम से अपने देश की तकदीर बदलने में लग जाएगी.
सवाल – क्या यह इतना सरल और आसान लग या दिख रहा है  ?
जवाब – यह इतना कठिन भी नही है। मगर इसके लिए पक्का इरादा दृढ़ निश्चय कड़ी मेहनत और हर स्तर पर इसको सफल बनाने का जुनून होना चाहिए।
सवाल – क्या आप अपने विचारों और साधनों को लेकर सरकार से कभी वार्ता की है  ?
 जवाब – एक बार नहीं कई बार, मगर सरकारी प्लानरों और विशेषज्ञों को इन चीजों में ना कोई दिलचस्पी है और ना ही वे इस तरह के समाधान को लेकर कोई उत्सहित है। देश की बेकारी से लेकर तमाम ज्वलंत मुद्दों पर भी नौकरशाहों की उदासीनता सबसे बड़ी कठिनाई बन जाती है।
सवाल – विदेशों में आपके विचारों और उपायों को लेकर क्या धारणा है  ?
जवाब -  मैं एक भारतीय हूं, लिहाजा मेरी पहली जिम्मेदारी और सपना अपने देश के लिए है। विदेशों में तो नवीन विचारों मौलिक उपायों को गंभीरता से सुना और लिया जाता है। वहां की ब्यूरोक्रेसी और पोलटिशियन को लगता है कि इससे देश का भला हो सकता है तो त्तत्काल एक कमेटी द्वारा उसका विशेलेषण किया जाता है और खर्चे से ल्कर अंतिम निराकरण और लाभ घाटे का हिसाब लगाकर मान्यता दी जाती है , या ज्यादा लाभप्रद ना मानकर उसको रद्द कर दिया जाता दै। इसके बावजूद दोनों ही हालात में छोटे स्तर पर एक पायलेट प्रोजेक्ट शुरू होता है। पूरी टीम की मेहनत और सलाह मशविरा के उपरांत चर्चा होती है। उसको ज्यादा लाभप्रद और बजट पर लेकर माथा पच्ची की जाती है। तब कहीं जाकर उसको देश में लागू किया जाए या लंबित रखा जाए इसका फैसला किया जाता है। यह सब हमारे देश में संभव नहीं है। हम नयेपन को तरजीह देने की अपेक्षा पीछे पीछे चलने के रास्ते को ज्यादा आरामदेह मानते है। यही वजह है कि देश की प्रतिभाएं देश से बाहर जाकर ही अपना सिक्का मनवा पाती है। देश में नाना प्रकार की दिक्कतों और उदासीनता से जूझने के बाद जब देश का टैलेंट बाहर जाकर नया काम करते हुए नाम कमाता है तब कहीं जाकर हमारा देश उसकी आरती उतारने और सम्मान देकर बारतीय होने पर गौरव मान लेती है।देश की प्रतिभाओं ने विदेशों में दाकर हर जगह अपना ड़ंका बजाया है, और बजा रहे है, मगर देश में उनको तमाम साधनों के ज्यादा समस्याओं से लड़ना पड़ता है। हमें नकलची बनने की बजाय टैंलेंट को मान सम्मान देना होगा । केवल जुबानी बयानबाजी या महज औपचारिकता के लिए बयान देने की बजाय सार्थक तरीके से काम करना होगा।
सवाल – क्या आपको यह मुमकिन लग रहा है ?
जवाब— नामुमकिन तो इस संसार में कुछ भी नहीं है, मगर उसके लिए स्वार्थ और दलगत भावना से उपर उठकर देश समाज और आम नागरिकों के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत का होना जरूरी है। हमारे यहां युवा आ तो रहे हैस मगर नया कुछ करने की बजाय करप्शन में नया नया रिकार्ड बना रहे है। इस तरह के नैतिक मंद युवाओं से देश का तो कभी भला  हो ही नहीं सकता। इसके लिए शिक्षा कार्यप्रणाली में आमूल परिवर्तन की नए सोच की और देश को एक समय के भीतर टारगेट मानकर काम करने की जरूरत है। फिर देश में इस समय युवाओं की तादाद काफी है, लिहाजा उनको साथ लेकर कुछ करना होगा। पर्यावरण, खेती किसान और पैदावार को बचाना होगा। देश की नदियों को लेकर सरकार को गंभीर होना पड़ेगा, तभी पर्यावरण और देश की कृषि को नया जीवन मिलेगा। हर राज्य में किसानों की असेम्बली बनानी होगी तथा किसाल और उनकी समस्.ओं को मुख्यधारा में रखना पड़ेगा। विकास तो मानवीय बनाना होगा, मगर देश में विकास की नीति ही मानव विरोधी है. पेड़ों पहाड़ों नदियों प्राकृतिक संसाधनों को खत्म करके हमारे देश में जो विकास का मॉडल है वो पूरी तरह सामाजिक नरसंहार जैसै है. पेयजल सहित जल जंगल और पर्यावरण की चिंता किए बगैर यह कैसा विकास है जहां पर मानव ही सुरक्षित ना हो।  पर्यावरण शिक्षा से ही धरती माता को बचाया जा सकता है, जिसके लिए युवाओं को आगे आना होगा। विश्व पर्यावरण महासम्मेलन के आयोजनों को पूरी दुनियां में लगातार करते रहना होगा, तबी इसके प्रति लोगों में जागरूकत्ता आएगी.
सवाल – आपने दो दो यूनीवर्सिटी की स्थापना की है । इसकी क्या जरूरत पड़ी और आपके ये यूनीवर्सिटी औरों से अलग बेहतर और कास किस तरह है ?
जवाब – हमने देखा कि शिक्षा के नाम पर जो होना चाहिए वो नहीं हो पा रहा है, तभी मैंने  द ग्लोबल ओपन युनिवर्सिटी (नागालैण्ड)  तथा इंदिरा गांधी टेक्नोलॉजिकल एंड मेडिकल साइंसेज यूनिवर्सिटी अरुणाचल प्रदेश की स्थापना की  मैं इसका संस्थापक कुलाधिपति हूं। इसमें सैकड़ों वो पाठ्यक्रमों को लागू किया गया है जो कहीं नहीं शिक्षा का आधार बना है। मैनें शिक्षा को रोजगार और बाजार से जोड़ा है.। 2100 से ज्यादा पाठ्यक्रमों की मान्यता के लिए मेरी फाईले सरकारी टेबलों पर रूकी पड़ी है। जिससे सरकार को अपनी शिक्षा में दोशी मान्यताओं से जोड़ने का मौका मिलेगा।देश की प्राचीनतम 355 दवा रहित चिकित्सा प्रणालियों की मान्यता के लिए मैं सालों से सरकार से लड़ रहा हूं। मगर मैंने पहले ही कहा था कि हम नवीनती पर विचार करने की बजाय पीछलग्गू की तरह पुरानी लीक पर ही चलना चाहते है. 355 पैरामेड़िकल चिकित्सा प्रणाली की मान्यता से सरकार को घाटा तो नहीं है पर करोड़ों लोगों को इसका फायदा तो मिल सकता है। इसकी पढाई होगी और तमाम साधनों को एक पहचान मिलेगी। इससे लाखो लोग रोजगार पाएंगे। ये चिकित्सा पद्धति हमारे देश में प्रचलित भी है पर सरकार को इसको अपना मानकर दावा करना चाहिए। इस पर दुनियां भर में काम हो रहे है और लाखो लोग इसके इलाजा से ठीक भी हो रहे है। मगर सरकार की उपेक्षा कब टूटेगी ? यही इच्छाशक्ति सरकार और नौकरशाहों में नहीं है। हमारे देश में हजारों कॉलेजों की कमी है। तमाम तकनीकी संस्तानों को देश के उधोगों से जोडा जाना चाहिए ताकि वे एक छात्र को तराश कर अपने यहां रोजगार दे और उनको प्रशिक्षित करने का खर्चा वहन करे। शिक्षा के व्यय को कम किया जा सकता है, मगर इसके लिए रास्तो निकालने और बनाने होंगे।
सवाल -- शिक्षा में क्या होना चाहिए ?
जवाब – शिक्षा पर लॉर्ड मैकाले द्वारा की सांसंस्कृतिक हमले को खत्म करना होगा. देश को बर्बाद और  विनाश करने की मैकाले पद्धति को हटाना होगा। मैकाले ने शिक्षा को औजार देश की संस्कृति पर हमला किया था। हमें बाबूओं वाली शिक्षा से हटकर एक आधुनिक शिक्षा को पढाई में शामिल करना होगा। .शिक्षा को सर्वसुलभ करना और बनाना होगा। आज की शिक्षा गरीबों को केवल अंगूठाटेक साक्षर करने की है। पढ़ाई काफी महंगी हो गयी है, जिसे  सबके लिए बनाना होगा। नबीं तो जिसके पास पैसा है वहीं आज पढ़ और अफसर बन रहाहै। इससे समाज में असंतुलन की खाई और चौड़ी होगी। सरकार को पहल करनी होगी। हमारे ग्लोबल यूनीवर्सिटी में 3000 पाठ्यक्रम है.45 पाठ्यक्रम स्पेशल है। ग्रामीणों किसानों को कृषि पर पढाई का पूरा संचार है। ओपन यूनीवर्सिटी में करीब 50 हजार छात्र है जिनको पाठ्यक्रम और गाईड के माध्यम से जोडा जाता है।यह एक अनोखा और अनूठा प्रयास है, जहां पर पैसे से ज्यादा गुण और कौशल को तराशने की चेष्टा की जाती है। पढाई बाजार की जरूरत है।  विदेशों में उसका उपयोग किया जाता है, जबकि हमारे .हां शिक्षा बाजार और रोजगार से ना जुड़कर व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का आधार माना जाता है। यही वजह है कि पढ़ा लिखा आदमी सामाजिक ना होकर समाज केलिए सबसे बेकार हो जाता है, क्योंकि उसकी कोई उपयोगिता ही नहीं रह जाती। मूल्यपरक शिक्षा होने पर ही एक आदमी को अपनी सामाजिक उपयोगिता और दायित्व का भान होगा।

सवाल – अपने विदेशी अनुभव पर कोई टिप्पणी  ?

जवाब – अब तक मैं एक सौ से बी ज्यादा देशों में जा चुका हूं , पर वहां पर नवीन विचारों को लेकर समाज और सरकार में उत्सुकता का भाव है। किसी चीज को त्तत्काल लागू करना और समाज में उसको लेकर जिज्ञासा का भाव होता है. सरकार की रुचि के चलते लोगों में नवीनता को लेकर उत्साह होता है, जिसका हमारे यहां कोई मतलब ही नहीं है।

शनिवार, 6 जुलाई 2013

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली



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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली
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विवरण दिल्ली देश के उत्तरी मध्य भाग में गंगा की एक प्रमुख सहायक यमुना नदी के दोनों तरफ बसी है। दिल्ली भारत का तीसरा बड़ा शहर है। यह एक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली है।
भौगोलिक स्थिति उत्तर- 28°36′36, पूर्व- 77°13′48
मार्ग स्थिति दिल्ली, राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर और आगरा के रास्ते कोलकता से जुड़ी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से सूरत, अहमदाबाद, उदयपुर, अजमेर और जयपुर के रास्ते मुंबई से जुड़ी है। राष्ट्रीय राजमार्ग 1 से जालंधर, लुधियाना और अंबाला होते हुए अमृतसर और राष्ट्रीय राजमार्ग 24 से रामपुर और मुरादाबाद के रास्ते लखनऊ से जुड़ी है।
हवाई अड्डा इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा
रेलवे स्टेशन पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, हज़रत निज़ामुद्दीन
बस अड्डा आई.एस.बी.टी, सराय काले ख़ाँ, आनंद विहार
यातायात साईकिल रिक्शा, ऑटो रिक्शा, टैक्सी, लोकल रेल, मेट्रो रेल, बस
क्या देखें दिल्ली पर्यटन
कहाँ ठहरें होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह
क्या खायें पंजाबी खाना, चाट, पराठें वाली गली के 'पराठें'
एस.टी.डी. कोड 011
सावधानी आतंकवादी गतिविधियों से सावधान, लावारिस वस्तुओं को ना छुएं, शीत ऋतु में कोहरे से और ग्रीष्म ऋतु में लू से बचाव करें।
Map-icon.gif गूगल मानचित्र, इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा
संबंधित लेख लाल क़िला, इण्डिया गेट, जामा मस्जिद, राष्ट्रपति भवन
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भारत के इतिहास में दिल्ली का उल्लेख महाभारत काल से ही मिलता है। महाभारत काल में दिल्ली का नाम इन्द्रप्रस्थ था। दूसरी शताब्दी के 'टालेमी' के विवरण में ट्राकरूट पर मौर्य शासकों द्वारा बसाई गई नगरी 'दिल्ली' नाम से उल्लिखित है। बाद में मौर्य, गुप्त, पाल आदि अनेक राजवंशों का दिल्ली पर शासन रहा। दिल्ली शहर की स्थापना के सन्दर्भ में कई कथाएँ प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि तोमर वंश के अनंगपाल ने 11 वीं शताब्दी में इसकी स्थापना की थी, जबकि कुछ पुस्तकों में वर्णित है कि तोमर राजपूतों के सरदार अनंगपाल ने 737 ई. में 'दिल्ली का गाँव' में लालकोट नामक नगर बसाकर राजधानी स्थापित की। 12वीं शताब्दी में यह राज्य तोमर राजपूतों से चौहान राजपूतों के क़ब्ज़े में आ गया। तत्पश्चात् दिल्ली बीसलदेव चौहान तथा अनके वंशज पृथ्वीराज चौहान के हाथों में पहुँचा। कुछ पुस्तकों में यह भी उल्लिखित है कि प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व एक राजा 'ढिलू' के नाम पर इसका नाम दिल्ली पड़ा, जो बाद में देलही, देहली, दिल्ली आदि नामों से जाना गया।
टिप्पणी दिल्ली का इतिहास व संस्कृति के लिए देखें:- दिल्ली
तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद दिल्ली पर मुसलमानों का आधिपत्य क़ायम हो गया। इसके बाद 16वीं सदी में दिल्ली पर मुग़लों का अधिकार हो गया। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ के वर्षों में दिल्ली पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो गया। सन् 1911 में यह कलकत्ता की जगह भारत की राजधानी बनायी गई। सन् 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस भारत की राजधानी के रूप में स्वीकार किया गया। संविधान के 69वें संशोधन (1991) द्वारा दिल्ली में विधान सभा का गठन किया गया। इस विधेयक में दिल्ली को देश की राजधानी होने के नाते केन्द्रशासित प्रदेशों में विशेष दर्जा दिया गया है। इस केन्द्रशासित प्रदेश को 1 फ़रवरी, 1992 से नया नाम 'राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली' दिया गया।

इतिहास

  • दिल्ली का आरम्भिक नाम इन्द्रप्रस्थ था। महाभारत में पाण्डवों की राजधानी के रूप में इसकी चर्चा है।
  • यमुना तट पर अवस्थित यह नगर वर्तमान फ़िरोज़शाह कोटला स्टेडियम एवं हुमायूँ के मक़बरे के बीच अवस्थित था।
  • पाँच प्रस्थों में एक इन्द्रप्रस्थ के अस्तित्व का प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। अन्य चार प्रस्थ-पानीपत, सोनीपत, बागपत और तिलपत थे। इन्हीं पाँचों स्थानों पर प्रसिद्ध महाभारत का युद्ध लड़ा गया था।
  • इस प्रदेश को खण्डप्रस्थ और योगिनीपुर के नाम से भी जाना जाता था।
  • बाद के काल में यह क्षेत्र मौर्य, गुप्त, पाल आदि शासकों के अधीन रहा।
  • इन्द्रप्रस्थ के गौतवंशीय राजाओं के परवर्ती मयूर वंश के अन्तिम कन्नौज शासक राजा दिलू द्वारा इस प्रदेश को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया गया।
  • 736 ई. में तोमर राजपूतों द्वारा दिल्ली या ढिल्लिका के नाम से एक नए नगर को बसाया गया।
  • 1052 में अनंगपाल द्वितीय द्वारा उस नगर का पुनद्धार एवं पुनर्निर्माण कर इस नगर की सुरक्षा के लिए लाल कोट नामक क़िले का निर्माण करवाया गया।
  • अनंगपाल तृतीय के शासनकाल में चौहान शासक विग्रहराज द्वारा 1151 ई. में इस प्रदेश पर क़ब्ज़ा कर लिया गया। लेकिन दोनों घरानों में वैवाहिक सम्बन्धों की स्थापना के बाद तोमरवंशी वहाँ चौहान शासकों के अधीन शासन करते रहे।
  • विग्रहराज के पौत्र पृथ्वीराज चौहान (रायपिथौरा) लालकोट क़िले का विस्तार कर एवं 'क़िला रायपिथौरा' के नाम से एक बड़े क़िले का निर्माण करवाया गया। इसे दिल्ली का पहला ऐतिहासिक शहर माना जाता है।
  • तराइन के द्वितीय युद्ध 1192 में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद 1193 में मुहम्मद ग़ोरी के एक ग़ुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा दिल्ली पर अधिकार कर लिया गया।
  • 1206 में मुहम्मद ग़ोरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने खुद को दिल्ली का सुल्तान घोषित कर दिया।
  • 1210 में पोलो खेलते समय घोड़े से गिर जाने के कारण ऐबक की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसका दामाद इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान बना।
  • कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद सात मुस्लिम वंशों—ग़ुलाम वंश, ख़िलजी वंश, तुग़लक़ वंश, सैयद वंश, लोदी वंश, सूरी वंश तथा मुग़ल वंश ने एक के बाद एक दिल्ली पर राज किया और अपनी-अपनी रुचि तथा रुझान की छाप दिल्ली पर छोड़ी।
  • दिल्ली के प्रसिद्ध क़ुतुबमीनार की नींव 1199 में कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा डाली गई थी।
  • क़ुतुबुमीनार के समीप ही अलाउद्दीन ख़िलजी के द्वारा दूसरा नगर सीरी बसाया गया। उसने 1305 में हौज ख़ास का भी निर्माण करवाया।
  • ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने 1321 में सीरी के पूर्व में तुग़लकाबाद नगर की नींव डाली। यह नगर केवल 6 वर्षों तक तुग़लक़ साम्राज्य की राजधानी रह पाया।
  • तुग़लक़ वंश के दूसरे बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ द्वारा सीरी और कुतुब के बीच 'जहाँपनाह' के नाम से एक नये नगर की स्थापना की गई। जिसे आज चिराग दिल्ली के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर बादशाह द्वारा 8 किमी के घेरे में 13 दरवाज़ों वाला एक परकोटा बनवाया गया।
  • तुग़लक़ वंश के तृतीय बादशाह फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ द्वारा 1354 में फ़िरोज़ाबाद नाम से एक नया राजधानी नगर बसाया गया। इस नगर को आज फ़िरोजशाह कोटला के नाम से जाना जाता है।
  • क़रीब दो शताब्दी के बाद हुमायूँ ने अपनी एक अलग नगरी दिल्ली, फ़िरोजाबाद नगर के चार किलोमीटर दक्षिण में स्थापित की। यह स्थल आज पुराने क़िले के नाम से मशहूर है। इस नगर की बसावट का काम शेरशाह सूरी के द्वारा पूरा किया गया। इसी के द्वारा 1540-44 के दौरान पुराने क़िले का निर्माण करवाया गया।
  • 1638 में शाहजहाँ के द्वारा आज के पुरानी दिल्ली को शाहजहाँनाबाद के नाम से बसाया गया। उसके द्वारा वहाँ पर 1648 में लाल क़िला तथा 1650-1656 के बीच ज़ामा मस्जिद का निर्माण करवाया गया।
  • शाहजहाँनाबाद के चारों तरफ़ क्वार्टजाइट पत्थर की एक चहार दिवारी बनवाई गई, जिसके चारों तरफ़ मुख्य द्वार-दिल्ली गेट, कश्मीरी गेट, अजमेरी गेट और लाहौरी गेट के नाम से लगे हुए थे।
  • 1724 ई. में राजा जयसिंह द्वारा जंतर-मंतर बनवाया गया तथा शुजाउद्दौला द्वारा 1753-54 में सफ़दरगंज का मक़बरा बनवाया गया।
  • अंग्रेज़ों द्वारा पहले भारत की राजधानी कलकत्ता (कोलकाता) बनाई गई, परन्तु 1911 में सम्राट जार्ज पंचम द्वारा दिल्ली को राजधानी बनाने का निश्चय किया गया।
  • वर्तमान पुरानी दिल्ली के दक्षिण में नई दिल्ली के नाम से एक नया नगर बसाया गया।
  • नई दिल्ली की नगर योजना एडविन ल्यूटेन्स तथा बेकर द्वारा तैयार की गई थी। नई दिल्ली नगर योजना वांशिगटन तथा लन्दन नगरों के योजना से काफ़ी मिलता-जुलता है।
  • सन् 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् इस भारत संघ की राजधानी के रूप में स्वीकार किया गया।
  • 1956 में इसे केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा प्रदान किया गया।
  • 69वें संविधान संशोधन के द्वारा राष्ट्रीय क्षेत्र अधिनियम 1991 प्रभाव में आया। इसके फलस्वरूप दिल्ली में विधानसभा का गठन किया गया।

प्रशासन


अक्षरधाम मंदिर, दिल्ली
Akshardham Temple, Delhi
दिल्ली पर विधिवत् शासन की शुरुआत अंग्रेज़ों द्वारा 1805 में शुरू की गई। प्रारम्भ में प्रशासनिक नियंत्रण ब्रिटिश शासन के प्रतिनिधि एवं मुख्य आयुक्त के अधीन था। 1857 तक सामान्य अधिनियमों के द्वारा ही कुछ फेर-बदल के साथ प्रशासन चलता रहा। 1858 में अंग्रेज़ों द्वारा दिल्ली को सीमान्त प्रान्त के प्रान्तीय शहर का दर्जा दिया गया। बाद में इस उपराज्यपाल के अधीन नवगठित पंजाब प्रान्त में स्थानान्तरित कर दिया गया। राजधानी का कलकत्ता से दिल्ली स्थानान्तरित होने के बाद यहाँ के प्रशासनिक कार्यों की देखरेख के लिए इम्पोरियल दिल्ली समिति का गठन किया गया। 1916 में इस समिति को पंजाब म्यूनिसिपल एक्ट 1911 के तहत रायसीना म्यूनिसिपल समिति के रूप में अधिसूचित किया गया। 16 मार्च 1927 को इसे दिल्ली म्यूनिसिपल समिति के रूप में पुनर्गठित किया गया। 1932 में प्रथम श्रेणी का म्यूनिसिपैलिटी का दर्जा प्रदान किया गया। नई दिल्ली नगर परिषद् अधिनियम, 1994 के अंतर्गत नई दिल्ली नगर समिति का पुनर्गठन किया गया। दिल्ली को 1951 में भाग 'ग' राज्यों में शामिल किया गया, जिसमें मंत्रिपरिषद् और विधायिका का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया। 1957 में संसद द्वारा पारित दिल्ली नगर अधिनियम के तहत निगम के गठन के उद्देश्य से 1958 में चुनाव करवाये गये। 1957 में ही दिल्ली विकास अधिनियम पारित हुआ जिसके तहत दिल्ली विकास प्राधिकरण की स्थापना हुई। प्राधिकरण द्वारा पहला मास्टर प्लान (1961-81) 1962 में प्रकाशित किया गया। दिल्ली प्रशासन अधिनयम, 1966 द्वारा महानगर परिषद् (56 निर्वाचित + 5 मनोनीत सदस्य) के गठन का प्रावधान कर दिल्ली में सीमित प्रतिनिधित्व वाली सरकार की स्थापना की गई। संविधान में 69वें संविधान संशोधन द्वारा दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम, 1991 प्रभाव में आया। 1992 से लागू इस अधिनियम के तहत एक विधानसभा तथा दिल्ली के प्रशासन-संचालन के लिए एक उपराज्यपाल तथा उनको इस विषय में सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री के अधीन मंत्रीपरिषद् का प्रावधान किया गया। इस अधिनियम द्वारा विधानसभा को राज्य सम्बन्धी मामलों एवं केन्द्र शासित क्षेत्रों के मुतल्लिक मामलों पर क़ानून बनाने का अधिकार दिया गया। लेकिन क़ानून व्यवस्था, पुलिस एवं भूमि सम्बन्धी विषय विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखे गए। 1993 के चुनाव के पश्चात् इस अधिनयम के तहत पहली विधानसभा का गठन किया गया। नवम्बर 1998 में दूसरी विधानसभा का गठित की गई। जनवरी 1997 से पूर्व दिल्ली केवल एक ज़िला था, लेकिन वर्तमान में यहाँ 9 ज़िले तथा 27 सबडिवीजन/तहसील हैं।
  • विधानमण्डल - एक संदनात्मक (विधानसभा)
  • विधानसभा सदस्यों की संख्या - 70
  • लोकसभा सदस्यों की संख्या - 7
  • राज्य सभा के सदस्यों की संख्या - 3

भूगोल


इंडिया गेट, दिल्ली
India Gate, Delhi
  • स्थिति – उत्तर, पश्चिम तथा दक्षिण में हरियाणा एवं पूर्व में उत्तर प्रदेश
  • कृषि क्षेत्र – लगभग 70,000 हेक्टेयर।
  • वन क्षेत्र – 1,443 हेक्टेयर।
  • राजकीय पशु – हनुमान।
  • राजकीय पक्षी – धूसर तीतर।
  • उच्च न्यायालय क्षेत्र – दिल्ली
  • पर्वत – अरावली पर्वतमाला के कटक (रिज)।
  • शहरी क्षेत्रों का क्षेत्रफल – 924.68 वर्ग किमी.।
  • ग्रामीण क्षेत्रों का क्षेत्रफल – 558.32 वर्ग किमी.।
  • नगर निकाय – 3
  • गाँव – 165
  • ज़िले – 9
  • तहसीलें – 27
  • औसत वार्षिक वर्षा – 114 मिमी.
  • नदी – यमुना नदी
  • भू-आकृतिक दृष्टि से दिल्ली को तीन भागों में विभाजित किया जाता है–
  1. यमुना बाढ़ एवं गरिपादीय मैदान।
  2. पहाड़ी प्रदेश तथा
  3. मैदानी प्रदेश।
दिल्ली का सबसे ऊँचा स्थान भाटी गाँव है, जिसकी ऊँचाई समुद्रतल से 322 मीटर है। दिल्ली की भू-आकृति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व पहाड़ी है जो राजस्थान की अरावली पहाड़ियों के पर्वत स्कन्ध की भाँति बना है। दक्षिण में महरौली और तुग़लकाबाद के पास का क्षेत्र कोही या पहाड़ी कहलाता है। यमुना के किनारे का मैदान बांगर के नाम से जाना जाता है। भूगर्भिक दृष्टि से दिल्ली की शैलें मध्य प्रोटेरोजोइक और अभिनवकाल की हैं। यह दिल्ली प्रक्रम और अलवर शृंखला का भाग है।

अर्थव्यवस्था


जामा मस्जिद, दिल्ली
Jama Masjid, Delhi
  • कुल बोया गया क्षेत्र – 60,885 हेक्टेयर।
  • बोया हुआ शुद्ध क्षेत्र – 41,385 हेक्टेयर।
  • शुद्ध सिंचित क्षेत्र – 40,000
  • वर्तमान क़ीमतों पर निबल राज्य घरेलू उत्पाद (वर्ष 2002-03)-68743 करोड़ रुपये।
  • वर्तमान क़ीमतों पर प्रति व्यक्ति निबल राज्य घरेलू उत्पाद – 47477 रुपये।
  • कुल उपलब्ध भूमि (1999) – 147 हज़ार हेक्टेयर।
  • वनाच्छादित क्षेत्र (1999) – 1000 हेक्टेयर।
  • वन क्षेत्र – 1443 हेक्टेयर।
  • सड़क मार्ग – 28,508 किमी. (5 राष्ट्रीय मार्ग)
  • रेल मार्ग – 200 किमी. मुनरिका (रिंग) रेलवे।
  • अन्तराज्यीय बस अड्डे – कश्मीर गेट, सराय काले ख़ाँ, आनन्द बिहार।
  • हवाई अड्डे – इंदिरा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (अन्तर्राष्ट्रीय उड़ानों के लिए), पालम हवाई अड्डा (घरेलु उड़ानों के लिए), सफदरजंग हवाई अड्डा (प्रशिक्षण हेतु)।
  • ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों का प्रतिशत – 8.23%
  • सार्वजनिक क्षेत्र की बैकिंग संस्थाओं की संख्या – 1251
  • प्रति व्यक्ति बिजली की खपत – 69 किलो वाट प्रति घंटा (1999)
  • प्राथमिक विद्यालयों की संख्या – 2415
  • मध्य विद्यालयों की संख्या – 680
  • उच्च/उच्चतर विद्यालयों की कुल संख्या – 1578
  • महाविद्यालयों की संख्या – 59
  • व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं की संख्या - 45
  • औद्योगिक इकाईयाँ – 1.29 लाख (31 मार्च, 02)
  • विश्वविद्यालय - (कुल 6); दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय, गुरु गोविन्द सिंह इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ।
  • विशिष्ट संस्थान - अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, (आई आई टी) भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, एन. आई. एफ. टी., इंडियन इस्टीट्यूट आफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन आदि।
  • प्रमुख उद्योग - रेजर ब्लेड्स, खेल का सामान, रेडियो, टेलीविजन सेट एवं कल-पुर्जे, साइकिल एवं उसके कल-पुर्जे, प्लास्टिक उद्योग, जूते-चप्पल, वस्त्र, रसायन, उर्वरक, दवाएँ, हौजियरी का सामान, शीतल पेय, हाथ के औज़ार, स्टेशन बैगन, पी0 वी0 सी0 की वस्तुएँ आदि।

क़ुतुब मीनार, दिल्ली
Qutub Minar, Delhi
  • सड़क मार्ग - 15,800 किमी0 (5 राष्ट्रीय राजमार्गां का सम्मिलन स्थल)।
  • रेलमार्ग - 168 किमी0 लम्बी मुद्रिका (रिंग) रेलवे।
  • रेलवे स्टेशन - दिल्ली, नई दिल्ली, हजरत निज़ामुद्दीन तथा सराय रोहिल्ला।
  • पंजीकृत मोटर वाहनों की संख्या - 2.75 मिलियन।

समाज एवं संस्कृति

राष्ट्रीय राजधानी होने के नाते यहाँ का समाज विभिन्न प्रान्तों तथा वर्गों से आने वाले भिन्न भाषा-भाषी लोगों के मिलने से बना है। जिनके परम्परा, पहनाबा, ओढ़ाबा विश्वास-मत आदि अलग-अलग हैं। यह विविधता प्रदेश के समाज को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। प्रदेश की संस्कृति राष्ट्रीय संस्कृति की प्रतिनिधि प्रतीत होती है। प्रदेश में लगभग सभी धर्म और सम्प्रदाय से जुड़े सांस्कृतिक धरोहर मौजूद हैं।

पर्यटन

हुमायूँ का मक़बरा, कुतुब मीनार, हौज ख़ास, इंडिया गेट तथा बहाई मन्दिर, लोटस टैंपल, राष्ट्रपति भवन, मुग़ल गार्डन, संसद भवन, चाँदनी चौक, लाल क़िला, जामा मस्जिद, राजघाट, शान्तिवन, विजयघाट, शक्ति स्थल, पुराना क़िला (इन्द्रप्रस्थ), सफ़दरगंज का मक़बरा, जन्तर-मन्तर, बिड़ला मन्दिर, विज्ञान भवन, चिड़ियाघर, राष्ट्रीय संग्रहालय, कनॉट प्लेस, बुद्ध जयन्ती पार्क, रवीन्द्र रंगशाला, नेहरू मेमोरियल, कश्मीरी गेट आदि।

इन्हें भी देखें

Seealso.jpg इन्हें भी देखें: दिल्ली, दिल्ली का इतिहास, दिल्ली पर्यटन एवं दिल्ली विश्वविद्यालय


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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