रविवार, 29 जून 2014

भारत में पति को भी मिल रहा है गुजारा भत्ता






प्रस्तुति-- अमित कुमार / रतन सेन भारती

भारत ही नहीं दुनिया भर में समझा जाता है कि तलाक की मांग पत्नी करे या पति, दोनों ही स्थितियों में गुजारा भत्ते की हकदार पत्नी ही होती है. लेकिन भारत में बदलती परिस्थितियों में कानून का रुख अब बदलता दिख रहा है.
यह सुन कर भले ही हैरानी हो कि पति से गुजारा भत्ते की मांग कर रही पत्नी को उल्टा पति के वास्ते गुजारा भत्ता देने का अदालत से फरमान मिल जाए. मगर अब यह हकीकत है कि भारतीय अदालतें समय के साथ समाज में आए बदलाव को देखते हुए महिलाओं के हित में बने कानूनों पर अलग तरीके से फैसला कर रही हैं. हाल ही में राजधानी दिल्ली सहित तमाम शहरों में निचली और उच्च अदालतों ने पति को गुजारे भत्ते का हकदार ठहराते हुए बदलते वक्त का अहसास कराया है.
नए नजरिए से फैसला करते हुए अब अदालतें आत्मनिर्भर महिलाओं को गुजारा भत्ता देने से साफ इंकार करने लगी हैं. इतना ही नहीं कुछ मामलों में तो अदालतों ने उन महिलाओं की भत्ते की मांग को खारिज कर दिया जो पति से वसूली की मंशा रखते हुए तलाक से पहले अपनी नौकरी छोड़ देती हैं. अदालतें अब पत्नी की योग्यता और कार्यक्षमता का आकलन करने के बाद ही उन्हें गुजारा भत्ते का हकदार ठहरा रही है.
और तो और कानून को लकीर का फकीर होने जैसा तमगा देने वालों की धारणा तोड़ते हुए अदालतों ने कई मामलों में लीक से हटकर पति को ही पत्नी से गुजारा भत्ता पाने का हकदार ठहरा दिया है. आलम यह है कि महानगरों की तेजतर्रार महिलाएं पति से यथाशीघ्र छुटकारा पाने के लिए अदालती झंझटों से बचते हुए आपसी समझौता कर खुद ब खुद पति को आजीवन गुजारा भत्ता दे कर वक्त को पीछे छोड़ रही हैं.
बदलते वक्त की बानगी
पिछले कुछ सालों में इस बहस की शुरुआत दिल्ली की एक निचली अदालत के फैसले से तेज हो गई. गुजारा भत्ता मांगने अदालत पहुंची पत्नी की अर्जी को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनुराधा शुक्ला भारद्वाज ने खारिज कर दिया. इसका आधार बना पत्नी की पति के बराबर ही कमाई होना. अदालत ने कहा कि लैंगिक समानता के इस दौर में पति को महज मर्द होने के कारण कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता है. पति के बराबर ही कमाने वाली महिला को पति से गुजारा भत्ता पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
दरअसल इस मामले में पत्नी ने पति से आवास सुविधा मुहैया कराने की मांग की थी. अदालत ने कहा कि पत्नी को इसके लिए यह साबित करना होगा कि वह अपनी आर्थिक अक्षमता के कारण अपने लिए आवास का इंतजाम करने में लाचार है. एक अन्य मामले में पति का पत्नी से काफी अधिक वेतन होने के बाद भी अदालत ने गुजारा भत्ता देने से इंकार कर कानून की नई व्याख्या कर दी. एडवोकेट ओसामा सुहेल बताते हैं कि इस मामले में पति ब्रिटिश एनआरआई था जबकि पत्नी दिल्ली में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में 60-70 हजार रुपये मासिक वेतन पर कार्यरत थी. अदालत ने कहा कि गुजारा भत्ते का मतलब पति की कमाई और संपत्ति में हिस्सा बंटाना नहीं है बल्कि पत्नी को अतीत, वर्तमान और भविष्य के मद्देनजर गरिमापूर्ण जीवनयापन के साधन मुहैया कराना है.
इससे एक कदम और आगे जाकर अदालत ने एक डेंटिस्ट की डिग्रीधारक महिला को पति से भरणपोषण दिलाने से इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि वह सामान्य गुजरबसर के लिए पर्याप्त काबिल और सक्षम थी. वह पहले नौकरी कर चुकी थी और उसकी शैक्षिक योग्यता को देखते हुए आगे भी नौकरी मिलने में उसके लिए कोई दिक्कत नजर नहीं आ रही थी.
बना नया सिद्धांत
दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस विक्रमजीत सेन ने तो साल 2004 में गुजारा भत्ते के निर्धारण के लिए एक नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया.पारिवारिक मामलों के वकील प्रभजोत जौहर बताते हैं कि जस्टिस सेन ने ऐसे मामलों से जुड़े कानून को लचकदार साबित करते हुए तलाक के मामलों में पति और पत्नी दोनों की आय को जोड़ते हुए इसका नाम फेमिली रिसोर्स केक दिया. इस केक के दो हिस्से कर पति और पत्नी को बराबर बराबर दे दिए. ऐसे में कम आय वाले पति को पत्नी से उल्टी रकम मिलना लाजिमी हो गया. दिल्ली की निचली अदालतें अब इस सिद्धांत का बखूबी पालन कर रही हैं.
दरअसल पत्नी के गुजारे भत्ते का मामला भले ही सिविल श्रेणी में आता हो लेकिन इसे कानून में इसे अपराध प्रक्रिया संहिता ‘‘सीआरपीसी‘‘ में धारा 125 के रुप में जगह दी गई है. ब्रिटिशकालीन इस उपबंध के पीछे भारत की पारंपरिक सामाजिक संरचना को प्रमुख आधार बनाया गया था. जौहर बताते हैं कि अब वक्त की बदलती बयार को महसूस करते हुए अदालतों ने कानून को अपने तरीके से दुरुस्त करने की यह पहल की है. यद्यपि धारा 125 पूरी तरह से महिला के पक्ष में दिखती है मगर अदालतों ने संविधान में प्रदत्त लैंगिक समानता के मूल अधिकार को वरीयता देते हुए कानून की नई व्याख्या की है.
पति भी गुजारेभत्ते का हकदार
भारत में कानून के व्यापक दायरे में पति को भी गुजारा भत्ता दिलाने वाले कानून मौजूद हैं. हालांकि इसका दायरा बेशक सीमित है मगर अहम भी है. हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 24 ऐसे पति या पत्नी को गुजारा भत्ता मिलने का हकदार बनाती है जिनके पास आय का कोई जरिया नहीं है. ऐसे में अदालत को पति अथवा पत्नी के लिए आंशिक या स्थाई गुजाराभत्ता तय करने का अधिकार है. साथ ही मुकदमे का खर्च भी जरूरतमंद पक्षकार को दिलाने का अधिकार है. हालांकि स्पष्ट है कि यह विकल्प गैरहिंदुओं के पास मौजूद नहीं है.
वकील शिल्पा जैन इसे सामाजिक पहलू के लिहाज से उपयुक्त मानती हैं. उनका कहना है कि इसी समाज में ऐसी महिलाएं भी हैं जो कोर्ट के बाहर आपसी सहमति से पति को 60 लाख रुपये एकमुश्त गुजारा भत्ता देकर जिंदगी की राह में आगे बढ़ रही हैं जबकि दूसरी ओर गांवों और झुग्गियों में बसने वाले भारत की लाचार बेबश महिलाएं भी हैं जो पति के जुल्म से पीड़ित हैं. ऐसे में अदालतों के व्यावहारिक रवैये को देखते हुए अन्य विवाह और गुजारा भत्ता कानूनों के दुरुपयोग का खतरा समय के साथ कम हो रहा है.
ब्लॉग: निर्मल यादव
संपादन: महेश झा

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विज्ञान

भारत केज्यादातर घरों में पलते गुलाम





प्रस्तुति- निम्मी नर्गिस / अम्मी शरण

मानव तस्करी सुन कर लगता है कोई ऐसी बात है जो हमसे बहुत दूर की और सिर्फ पुलिस खुफिया एजेंसियों के मतलब की है. भारत के लोग यह देख ही नहीं पा रहे कि इस अपराध के शिकार उनके पास पड़ोस या खुद उनके घर में रह रहे हैं.
दिल्ली के एक अस्पताल में बिस्तर पर लेटी 18 साल की लड़की के सिर पर बंधी मोटी पट्टी उन जुल्मों की कहानी बता रही है जो उसने चार महीनों में अपनी मालकिन के घर में सहे. होश में आई तो बोली, "वो मेरे बाल उखाड़ देंगी, मेरे सिर पर जोर से मारेंगी...हर वक्त वो मुझसे नाराज ही रहती हैं." इस लड़की का कहना है कि अकसर उसे बेल्ट, झाड़ू और जंजीरों से पीटा जाता है और उस घर में कैद कर रखा गया है जहां वह घर के काम करने आई थी. इस लड़की की बायीं गाल और सीने पर जख्मों के निशान हैं और उसका कहना है, "वो मुझे मेरा पैसा नहीं देंगी, मुझे फोन नहीं करने देतीं, किसी से मिलने नहीं देतीं, मेरे सारे दस्तावेज फाड़ डाले और वो कागज भी जिसमें रिश्तेदारों के नंबर थे."
इसी महीने पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उसे मालकिन की कैद से छु़ड़ा कर अस्पताल में भर्ती कराया. यह कहानी सिर्फ इसी लड़की की नहीं, दुनिया में गुलामों की तरह जी रहे आधे से ज्यादा लोग भारत में रहते हैं. दुनिया के गुलामों पर रिपोर्ट तैयार करने वाले संगठन वाक फ्री फाउंडेशन के प्रमुख निको ग्रोनो का कहना है, "लोगों को हिंसा के जरिए काबू में किया जाता है. वो छलावे से या फिर जबर्दस्ती इस तरह की हालत में डाले जाते हैं जहां उनका आर्थिक शोषण किया जा सके. उन्हें पैसा नहीं मिलता या मिलता भी है तो बहुत मामूली और उनके पास काम छोड़ने की आजादी नहीं होती."
जुल्म का शिकार हुई झारखंड की यह लड़की महज तीन साल स्कूल गई, काम से पैसा कमाकर घर भेजने का लक्ष्य लेकर दिल्ली आई थी. नौकर मुहैया कराने वाली एजेंसी के संपर्क में आने से पहले उसने कई घरों में काम किया. लड़की का नाम कानूनी वजहों से नहीं दिया जा सकता. इसी एजेंसी ने उसे इस घर में काम के लिए रखवाया. घर के मालिक को गिरफ्तार भी किया गया लेकिन वो आरोपों से इनकार करते हैं. मामला अभी अदालत में है. उसकी मां उसे वापस घर ले जा कर स्कूल में डालने की बात कह रही है.
गरीब बच्चों और किशोरों की दशा सबसे दयनीय
हर तरह का शोषण
भारत में प्रमुख रूप से महिलाओं को घरेलू कामों से लेकर वेश्यावृत्ति या जबरन विवाह के लिए मानव तस्करी और धोखे से या फिर डरा धमका कर इस काम में धकेला जाता है. जानकारों का कहना है कि निराश और परेशान मां बाप अपने बच्चों को बेच देते हैं जहां से उन्हें जबर्दस्ती भीख मांगने, यौन शोषण या फिर कोयले की खदानों में मजदूरी जैसे कामों में लगा दिया जाता है. संयुक्त राष्ट्र के नशीली दवाओं और अपराध से जुड़े विभाग यूएनडीओसी के मुताबिक अब भी इस तरह के जुल्मों के शिकार पहले दिल्ली लाए जाते हैं. यूएनडीओसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के साथ नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश से तस्करी के जरिए लाए गए लोगों की "दिल्ली मंजिल है और वहां से आगे जाने का केंद्र भी." इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि खासतौर से राजधानी में मानव तस्करी का यह धंधा बुरी शक्ल ले चुका है. आपराधिक गैंग अपने काम बढ़ाने के लिए प्लेसमेंट एजेंसी और मसाज पार्लर के रूप में कारोबार की तरह इसे चला रहे हैं.
अपनों की तलाश
पश्चिम बंगाल की राबिया बीबी अपनी सबसे छोटी बेटी 17 साल की रानू के साथ खाने का सामान खरीदने बाजार गई थीं. वहां से उनकी बेटी को अगवा कर लिया गया. अब वो उसे ढूंढने दिल्ली आईं. कभी गांव से बाहर नहीं गईं राबिया बीबी दिल्ली के बारे में ना तो कुछ जानती हैं, ना ही उनके पास पैसे हैं. कई हफ्तों से पुलिस ने उनके साथ जगह जगह छापे मारे. वो बताती हैं, "तीन मछुआरों ने मेरी बेटी को एक तेज भागती कार में चीखते देखा था." गरीब मजदूर नवीन हारू भी इसी तरह अपनी 13 साल की बेटी ज्योति मरियम को ढूंढने का फैसला कर दिल्ली आए. दिन के उजाले में उनकी बेटी को छत्तीसगढ़ में स्कूल से लौटते वक्त अगवा कर लिया गया. दोनों घटनाएं एक जैसी लग रही हैं, लेकिन लड़कियां अलग अलग हालत में मिलीं. रानू को एक होटल के कमरे में बंद कर रखा गया था जबकि मरियम प्लास्टिक में लिपटे शव के रूप में बरामद हुई. आधिकारिक रूप से मौत की वजह मलेरिया दर्ज की गई और पुलिस की इसके पीछे के अपराध को जानने समझने में कोई दिलचस्पी नहीं है.
इन्हें भी मिलें बराबरी के मौके
भारत में अपराध की घटनाओं का लेखा जोखा रखने वाली एजेंसी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने बताया कि पिछले साल कुल 38,200 महिलाओं और बच्चों को अगवा किया गया. इससे पहले के साल में यह तादाद 35,500 थी. हालांकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि वास्तव में यह संख्या इससे बहुत ज्यादा है. मानव तस्करी रोकने के लिए नीतियां बनाने पर केंद्र सरकार के साथ मिल कर काम कर रही भामती कहती है, "अपराध का कोई क्षेत्र नहीं है, वह देशों या एक राज्य से दूसरे राज्य की सीमा नहीं जानता."
मानव तस्करी रोकने के लिए काम कर रहे गैर सरकारी संगठन शक्ति वाहिनी से जुड़े ऋषिकांत इन सबके पीछे आर्थिक विषमताओं को भी जिम्मेदार मानते हैं. उनका कहना है, "अमीर लोग अपने घरों में ऐसे नौकरों के लिए कोई भी पैसा देने को तैयार हैं जो उनके घर साफ करें और बचे हुए खाने पर जिंदा रहें. नौकर मुहैया कराने वाली अवैध एजेंसियां बड़ी संख्या में सभी बड़े शहरों में उग आई हैं.
रानू या वो लड़की तो किसी तरह बच कर वापस जा रही है लेकिन मरियम और उसकी जैसी हजारों या तो मारी जा रही हैं या मौत से मुश्किल जिंदगी जी रही हैं.
एनआर/एमजे (एएफपी)

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शनिवार, 28 जून 2014

सैन्य जवानों के बीच ‘सुपरहीरो’ बनने की रणनीति पर प्रधानमंत्री






वीरेन्द्र सेंगर

प्रस्तुति अमित कुमार/ रोहिट बघेल

रक्षा मोर्चे पर कड़क तेवर:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द से जल्द लोकप्रियता बटोरने के तमाम फॉर्मूलों पर एक साथ बढ़ते नजर आने लगे हैं। सैन्य जवानों के बीच ‘सुपरहीरो’ बनने की रणनीति पर उन्होंने अपनी पहल तेज कर दी है। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने दिल्ली से बाहर अपना पहला दौरा गोवा का ही कर डाला। यहां पर समुद्र तट में उन्होंने सबसे बड़े युद्धपोत और विमान वाहक को देश को समर्पित किया। आईएनएस ‘विक्रमादित्य’ अब नौसेना का हिस्सा बन गया है। तमाम खूबियों वाले इस युद्ध पोत से भारतीय नौसेना की ताकत बहुत मजबूत हो गई है। इसे 15 हजार करोड़ रुपए की लागत से रूस में बनवाया गया है। इस जंगी युद्ध पोत के लोकार्पण समारोह में प्रधानमंत्री ने यह जताने की भरसक कोशिश की कि सुरक्षा क्षेत्र उनकी सरकार के लिए पहली प्राथमिकताओं में है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि तीनों सेनाओं को जल्द से जल्द साधन-संपन्न बनाने की कोशिश की जाएगी। यह भी कोशिश रहेगी कि सुरक्षा क्षेत्र में अब देशी उपकरणों को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा दिया जाए। 
एक तरफ प्रधानमंत्री आईएनएस विक्रमादित्य में सवार होकर 1600 नौसैनिकों का हौसला बढ़ाते रहे। वे करीब चार घंटे तक इस युद्ध पोत पर रहे। उन्होंने इस दौरान समुद्र में युद्धाभ्यास का रणकौशल भी देखा। युद्धपोत में सवार तमाम नौसैनिकों का हौसला बढ़ाने के लिए उन्होंने शाबासी में कइयों की पीठ भी थपथपाई। मोदी ने इस दौरान आईएनएस विक्रमादित्य से लड़ाकू विमान ‘मिग-29’ के टेकआॅफ और लैंडिग का करतब भी देखा। 284 मीटर लंबे और 60 मीटर चौड़े इस महायुद्ध पोत की तमाम खूबियां हैं। इसमें इतनी खुली जगह है कि फुटबॉल के तीन मैदान बन जाएं। 20 मंजिला यह युद्धपोत एंटी-मिसाइल सिस्टम से लैस है। दुनिया में बहुत कम देशों के पास ही इतना सक्षम और जंगी युद्धपोत है। इसका कुल वजन करीब 44,500 टन है। 
इसमें 30 लड़ाकू विमान रखने की क्षमता है। ये विमान पलक झपकते ही दुश्मन पर पलटवार करने में सक्षम हैं। शनिवार को आईएनएस विक्रमादित्य का लोकार्पण करते हुए नरेंद्र मोदी काफी भावुक भी हो उठे थे। उन्होंने कहा कि आज का दिन भारतीय नौसेना के लिए स्वर्णिम दिवस बन गया है। क्योंकि, इस जंगी युद्ध पोत से नौसेना की शान दुनियाभर में बढ़ गई है। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर अपनी कड़क रक्षा नीति के संकेत भी दे दिए। उन्होंने कहा कि वे चाहेंगे कि सुरक्षा क्षेत्र में देशी तकनीक को ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहन दिया जाए। ताकि, हमें सैन्य संसाधनों के लिए दूसरे देशों का ज्यादा मुंह न ताकना पड़े। लोकसभा के चुनावी अभियान के दौरान भी मोदी बार-बार कहते आए हैं कि मनमोहन सरकार के दौर में रक्षा नीति बहुत कमजोर किस्म की रही है। इसी के चलते पड़ोसी देशों ने सीमाओं पर बार-बार ‘लक्ष्मण रेखा’ लांघने की जुर्रत की है। यदि उनकी सरकार आई, तो तस्वीर पूरी तौर पर बदल जाएगी। 
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बहुमत की सरकार बन गई है। सत्ता संभालने के बीस दिन के अंदर ही उन्होंने आईएनएस विक्रमादित्य के लोकार्पण समारोह में कह दिया कि भारत की रक्षा नीति का मूलमंत्र यही रहेगा, न किसी को आंख दिखाएंगे और न झुकाएंगे। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया है कि सैन्य क्षेत्र में विदेशी आयात पर निर्भरता कम करेंगे। सरकार की कोशिश रहेगी कि देश में ही ज्यादा से ज्यादा बेहतर सैन्य उपकरण बनाने की तकनीक विकसित कर ली जाए। मोदी की इस तरह की जज्बाती घोषणाओं से कई सैन्य विशेषज्ञ भी नई उम्मीदों से भर उठे हैं। शुक्रवार को जम्मू के पास मेंढर सेक्टर में पाक सैनिकों ने सीजफायर का जमकर उल्लंघन किया था। इन लोगों ने तीन भारतीय सैन्य चौकियों को निशाना बनाने की कोशिश की। यहां तक कि इस इलाके के कई रिहायशी क्षेत्रों में भी मोर्टार से गोले दागे गए। लाइन आॅफ कंट्रोल (एलओसी) के पास आईडी विस्फोट में एक सैन्य जवान शहीद भी हो गया। पाक सैनिकों की इस करतूत को नई सरकार ने काफी गंभीरता से लिया। शुक्रवार को दोपहर में ही प्रधानमंत्री ने साउथ ब्लॉक स्थित ‘वार रूम’ में एक उच्चस्तरीय बैठक कर डाली। 
इस ‘वार रूम’ बैठक में तीनों सेनाओं के प्रमुखों के साथ रक्षा मंत्री अरुण जेटली भी थे। इस बैठक में लेफ्टिनेंट जनरल दलबीर सिंह सुहाग को भी शामिल किया गया। उल्लेखनीय है कि जनरल सुहाग अगले सेना अध्यक्ष पद के लिए नामित हो चुके हैं। अगस्त में वे सेना प्रमुख का पदभार संभालेंगे। इस बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल भी उपस्थित रहे। सेनाध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह ने इस दौरान प्रधानमंत्री को यह जानकारी दी कि पाक अधिकृत कश्मीर के कई इलाकों में दर्जनों आतंकी शिविर बरकार हैं। इन्हीं शिविरों से तमाम प्रशिक्षित आतंकियों को भारत में घुसपैठ कराने की कोशिशें सालों से चलती आई हैं। इसमें कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने इस मौके पर सेना प्रमुखों को निर्देश दिया कि अब सुरक्षा की लक्ष्मण रेखा लांघने वालों को कड़ा जवाब मिलना चाहिए। हमें इसी नीति पर आगे बढ़ना है। प्रधानमंत्री ने यह भी आश्वस्त कर दिया है कि छह महीने के अंदर ही सेना को सभी बेहद जरूरी युद्धक संसाधन उपलब्ध कराने की कोशिश रहेगी। नेवी और एयरफोर्स को भी संसाधनों की कमी नहीं होने दी जाएगी। 
रक्षा मंत्री अरुण जेटली भी शनिवार को अपने पहले दौरे पर श्रीनगर के लिए निकले। वे आज (रविवार) जम्मू के पास एलओसी के इलाकों का भी निरीक्षण कर रहे हैं। ताकि, यह देख-जान सकें कि भारतीय सेना किस तरह से सीमा पर चाक-चौबंद रहती है? श्रीनगर पहुंचकर जेटली ने मीडिया से कहा भी कि उनकी सरकार का रवैया सुरक्षा नीति के मामले में एकदम दृढ़ इरादों वाला रहेगा। यदि सीमापार से बार-बार शरारत की गई, तो भारतीय फौज भी माकूल जवाब देगी। इसके निर्देश पहले ही जारी कर दिए गए हैं। हालांकि, उनकी सरकार चाहती है कि पाकिस्तान से रिश्ते अच्छे हों। पिछले दिनों पाक के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ दिल्ली आए थे। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से यह वायदा भी किया है कि दोनों देश यह कोशिश करेंगे कि एलओसी पर भी शांति रहे, ताकि आपसी विश्वास के रिश्ते मजबूत हों। इसके बावजूद यदि पाकिस्तान की तरफ से हमारा विश्वास तोड़ा जाता है तो सेना अपनी तरह से माकूल जवाब देने के लिए सक्षम है। 
रक्षा विशेषज्ञों का आकलन है कि जिस तरह से सुरक्षा के मामलों में मोदी सरकार ने कड़क तेवर दिखाए हैं, उससे सेना के बीच भी उत्साह का माहौल तैयार होगा। जबकि, यूपीए सरकार के दौरान सरकार के स्तर पर उचित फैसलों के लिए समय पर निर्देश नहीं मिल पाते थे। ऐसे में, कई बार अनिश्चितता की स्थिति भी पैदा होती रही है। अब नए प्रधानमंत्री से लेकर रक्षा मंत्री जेटली ने साफ कर दिया है कि देश की सुरक्षा के मामले में किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया जाएगा। राजनीतिक हल्कों में माना जा रहा है कि पाकिस्तान के मोर्चे पर मोदी ने काफी चतुराई भरे दांव चले हैं। एक तरफ वे अपने शपथ समारोह में नवाज शरीफ को न्यौता देकर बुला लेते हैं, इससे पूरी दुनिया को यह संदेश दे देते हैं कि भारत अपनी तरफ से पाकिस्तान से भी दोस्ती के रिश्ते चाहता है। मोदी ने नवाज शरीफ को भी यही संदेश दिया। शॉल और साड़ी के उपहारों के लेन-देन की कूटनीति का दांव भी चला गया। इसके जरिए मोदी ने यह संदेश भी देने की कोशिश की कि वे इतने ‘कट्टर’ नहीं हैं, जितने की उनकी छवि गढ़ने की कोशिश हुई है। 
प्रधानमंत्री ने शुरुआत से ही जिस तरह से सुरक्षा मामलों में पाक के खिलाफ मजबूत घेरबंदी शुरू की है, इससे कहीं न कहीं उन्होंने लोकप्रियता बटोरने की भी कवायद कर डाली है। क्योंकि, लंबे समय से देशभर में यह धारणा रही है कि सैन्य मामलों में भारत की रक्षा नीति कुछ कमजोर किस्म की रही है। इसी के चलते सीमा पर पाकिस्तान के सैनिक आए दिन भारतीय क्षेत्र में आकर खूनी धमाल मचा जाते हैं। कुछ महीने पहले तो वे भारतीय सैन्य चौकी तक आ धमके थे। उन्होंने सेना के जवानों का सिर भी काट लिया था। इस प्रकरण की चर्चा लंबे समय तक रही है। दूसरी तरफ, चीन भी लद्दाख और अरुणाचल के सीमावर्ती इलाकों में पिछले दो सालों से आक्रामक तेवरों में रहा है। कई बार चीनी सैनिकों ने घुसपैठ की है। एक दो बार तो चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में तंबू लगाकर ही कई दिनों तक बैठे रहे थे। 
तमाम कूटनीतिक कोशिशों के बाद ही चीनी सैनिकों ने लौटने की ‘कृपा’ की थी। लेकिन, इस मोर्चे पर कमजोर सैन्य नीति की आलोचना रक्षा विशेषज्ञों ने जमकर की थी। अब नई सरकार यह तस्वीर तेजी से बदलने की कोशिश कर रही है। ताकि, देश में यह संदेश जाए कि अब तो ‘महायोद्धा’ (मोदी) की सरकार है। सो, चीन और पाकिस्तान कोई भी हमें आंख दिखाने की कोशिश करेगा, तो वह उसका तुरंत माकूल अंजाम भी भुगतेगा। यह अलग बात है कि मोदी सरकार इस मोर्चे पर आगे क्या कर पाती है? फिल्हाल, उसने जिस तरह के दृढ़ संदेश दिए हैं, इससे सेना के तमाम पूर्व जनरल भी खुश हो गए हैं। इनमें से कइयों ने यह अलाप लगाना शुरू कर दिया है कि अब वाकई में सैन्य क्षेत्र के तो ‘अच्छे दिन’ आने को ही हैं। 
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

पहली बार भारत ने बनाया टीका





प्रस्तुति-- निम्मी नर्गिस / रतन सेन भारती

इस प्यारी मुस्कुराहट के लिए..
बच्चों को छोटी मोटी बीमारियां लगी रहती हैं, पेट खराब होना, दस्त लगना आम सी बात है. लेकिन अगर इन्हें संजीदगी से ना लिया जाए तो बच्चे की जान भी जा सकती है. एक सदी में पहली बार भारत ने एक टीका तैयार किया है.
दस्त लगने और फिर शरीर में पानी की कमी के कारण दुनिया भर में हर साल पांच साल की उम्र से कम के करीब पांच लाख बच्चे अपनी जान गंवा बैठते हैं. भारत में ही हर साल एक लाख ऐसी मौतें होती हैं. अधिकतर मामलों में इसकी वजह है रोटा वाइरस. यह एक ऐसा वाइरस है जो बच्चों पर बहुत तेज असर करता है और जानलेवा साबित होता है.
'वन डॉलर वैक्सीन'
हालांकि इस वाइरस से लड़ने के लिए टीके भी मौजूद हैं, लेकिन ये टीके भारत सरकार की टीकाकरण नीति के अंतर्गत नहीं आते. इन्हें निजी स्तर पर खरीदा जरूर जा सकता है, लेकिन ऊंची कीमतों के कारण गरीब इस से वंचित रह जाते हैं. भारतीय बाजार में रोटा वाइरस के खिलाफ दो कंपनियों के टीके मौजूद हैं, जिनकी कीमत हजार रुपये से अधिक है. अब भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐसा टीका तैयार किया है, जो महज 50 रुपये से भी कम में रोटा वाइरस से निजात दिला सकेगा. रोटोवैक नाम के इस टीके को वन डॉलर वैक्सीन के नाम से प्रसिद्धि मिल रही है.
बाजार में रोटा वाइरस के खिलाफ दो कंपनियों के टीके मौजूद हैं, जिनकी कीमत हजार रुपये से अधिक है.
यह टीका पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत तैयार किया गया है. भारत के वैज्ञानिक डॉक्टर एमके भान ने अमेरिका के डॉक्टर रॉजर ग्लास के साथ मिल कर इसे बनाया है. टीका सही तरह काम कर रहा है, यह सुनिश्चित करने के लिए भारत के तीन राज्यों में 7,000 बच्चों पर इसका परीक्षण किया गया. तीन चरणों में हुए टेस्ट के बाद पाया गया कि टीका सुरक्षित भी है और असरदार भी. यहां तक कि यह रोटा वाइरस की कई किस्मों से लड़ने में सक्षम है.
टीकाकरण अभियान का हिस्सा
डॉयचे वेले से बातचीत में डॉक्टर भान ने बताया, "हमारे लिए यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि डाइरिया से सबसे ज्यादा गरीब लोग प्रभावित होते हैं और इसका असर भी सबसे ज्यादा उन्हीं में देखने को मिलता है. और अधिकतर गरीब परिवारों के लिए, खास तौर से जो गांवों में रहते हैं, अस्पताल या डॉक्टर के पास जाना उनके लिए बहुत कठिन होता है".
गरीब परिवारों के लिए अस्पताल या डॉक्टर के पास जाना बहुत कठिन होता है.
अमेरिका के डॉक्टर ग्लास ने बताया कि उनका ध्यान इस तरफ तब गया जब उन्होंने एक नवजात शिशु में रोटा वाइरस पाया, "अधिकतर रोटा वाइरस नवजात शिशुओं पर असर नहीं करता, लेकिन इस किस्म ने किया." विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सलाह है कि इस तरह का टीका हर देश के टीकाकरण अभियान का हिस्सा होना चाहिए. भारत में पोलियो, टीबी, टेटनस और हेपटाइटिस के खिलाफ तो टीके कम दाम पर मिलते हैं, लेकिन रोटा वाइरस के साथ अब तक ऐसा नहीं हो पाया है. रोटोवैक के साथ अब ऐसा बदल सकता है. बच्चों को इसकी तीन खुराकें लेनी होंगीं, पहली जन्म के छह हफ्ते बाद, फिर 10वें और 14वें हफ्ते में.
भारत की दवाओं पर नियंत्रण रखने वाली संस्था फिलहाल इसे स्वीकृति देने पर विचार कर रही है. यदि रोटोवैक को लाइसेंस मिल जाता है तो यह पिछले सौ सालों में बना पहला ऐसा टीका होगा जो पूरी तरह भारत में तैयार किया गया है. माना जा रहा है कि इस साल के अंत तक यह टीका भारत के अस्पतालों में उपलब्ध होगा.
रिपोर्ट: मुरली कृष्णन/ईशा भाटिया
संपादन: आभा मोंढे

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