शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

प्रेस क्लब / अनामी शरण बबल- 17








क्यों कम बोलते है पीएमजी


हम भारतवासी बड़े सौभाग्यशाली है कि हमारे प्रधानमंत्री इतने विद्वान होनहार और ईमानदार है। ईमानदारी से भी बड़ी इनकी खूबी है कि ये नाम की तरह ही मनमोहन मनभावन होकर भी बहुत ही कम बोलते है। ये इतना कम बोलते है कि इनके मुखारबिंद से निकली हर बोली से  लोग चकित रह जाते है। ये इतने शालीन और सौम्य है कि चाहे हालात जो हो पाकिस्तान भले ही हमारी सीमा में घुस जाए, गोलियां बरसाकर हमारे जवानों को ढेर कर दे या कई हजार गोलियों की ईदी आतिशबाजी ही क्यों ना कर दे, मगर मनमोहन जी के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आती। ये जग में रहकर भी इतने र्निलिप्त हैं कि कभी कभी तो हमारे देश के संत, ऋषि मुनि भी मनमोहन को देखकर शर्मिंदा हो जाते होंगे। पूरा देश भले ही उबल रहा है हो, पर हमारे मनमोहन मीठे स्वर में नवाज शरीफ को ईदी बधाईयां और भारत आने का न्यौता भी दे रहे है। कमाल है मन साहब, आप गुरूशरण कौर जी से किस तरह संवाद करते होंगे यह भी एक रोचक शोध का विषय हो सकता है ?, मगर हर बात पर उबलने वाले और अनाप शनाप बकने वाले हमारे कुख्यात जाति सूचक नेताओं को भी युवराज बाबा और सोगा मैड़म की तरह ही  मुन्ना साहब से प्रेरणा लेनी चाहिए कि खामोश रहकर कैसे मामले को ठंडा किया जाता है। और तो और लाल किला तक से मन साहब ने कोई तीखी बात नहीं की, शायद यही वजह है कि विशाल देश होने के बाद भी हमारे नन्हे मुन्हे पड़ोसी अक्सर हमारे सब्र की परीक्षा लेने से नहीं चूकते।

संगत का गुण


 संगत में बहुत दम होता है। जैसे फिरंगियो से लोहा लेने के लिए हमारे बापूजी ने अहिंसा को हथियार बनाया था, ठीक उसी तरह हमारे पीएमजी ने खामोशी को अपना हथियार बनाया है। पीएमजी साहब के हथियार को इनके दो चार वाचालों को छोड़ दे तो ज्यादातर साथियों ने भी इनका पालन करना चालू कर दिया है।. है। हमारे रक्षा मंत्री ने कमाल ही कर दिया। पाकिस्तानी गोलीबारी से ढेर हुए अपने सैनिको को देखकर भी एक पाकिस्तानी रक्षा मंत्री की तरह पाक हमले को नकारा और एनओसी देते हुए इस शहादत के पीछे आंतकी साजिश को माना एक दिन तक तो रक्षामंत्री इतने शालीन हो गए कि वे भूल ही गए कि वे किस देश के मंत्री है और क्या बोलना है। पूरे देश में जब पंजे की भद्द पीटने लगी, तब जाकर अगले दिन हमारे रक्षामंत्री ने अपनी रक्षा करते हुए अपनी बातों को किंतु परंतु लेकिन वेकिन अगर मगर के जुगलबंदी के साथ माना कि इस शहादत के पीछे सीमा के पीछे पाक की कारस्तानी हुई है।
सलमान के अरमान 
  
पाक सेना ने जब कई दिनों तक ईदी आतिशबाजी करके ईद मना ली तब कहीं जाकर हमारे फॉरेन मंत्री ने अपने दिल के अरमान को जुबान दिया। बकौल सलमान ने पाक को नसीहत दी कि सीमा नियमों का पालन हो.। हमारे नेताओं ने रस्मी तौर पर अपने फर्ज की अदायगी कर ली। मगर सलमान साहब ने. पाक को क्या एक ओबिडिएंट स्टूडेंट मान कर नेक सलाह दी है? खुदा खैर करे समझ में नहीं  आता कि शांतिप्रिय देश के पंजा छाप शासक क्या वाकई इतने ठंडा हो गय है ?  बस्स दो एक दिग्गियों और तिवारियों को यदि शालीनता के पाठशाला में भेज दिया जाए तब तो पूरी यूपीए ही राहुल बाबा की तरह कहीं बाबा छाप बमभोला नजर आने लगे।

दामादजी के साथ यह सलूक  
लगता है कि हमारे देश के विपक्षी नेतागण सामान्य शिष्टाचार और रिश्तों का मान भी  भूल गए है। दामाद को हमारे समाज में बडा मान आदर दिया जाता है। बेटी के पतिदेव होने के चलते लोग उसको भी देव की तरह ही स्वागत सत्कार करते है। इस आदर की परंपरा को तोड़ना कोई अच्छी बात नहीं। अरे दामाद है तो क्या हुआ, अपने ही बच्चे के समान ही तो है उसकी गलतियों पर तो परदा डालना ही होगा।, मगर विपक्ष तो दामाद के साथ उसके ससुराल को ही शर्मसार करने में जुट गया। देश को कई पीएमजी देने वाले इस खानदान में अभी एक पीएम इन वेटिंग बैठा हुआ है। विदेशी होकर भी पीएम की कुर्सी को लतियाने वाली दिव्य मां की सुयोग्य बेटी के दामाद को जालसाज ठहराने में विपक्ष लगा है। अरे जमीन खरीदा और मंहगे दर पर बेच दिया तो क्या बुरा किया।  सबलोग मुनाफा कमाने के लिए यही तो करते है। कमाल है हमलोग करे तो बिजनेस और दामाद जी करे तो गलत। बुरा हो खेमका का कि हुड्डा साहब द्वारा इतना हुड्डियाने के बाद भी ईमानदी मैनिया से बाज नहीं आ रहे है। अरे सौ फीसदी मुरादाबादी पीतल की तरह खरा है अपना राजकुमार सा दामाद जी। एक एक आदमी से वोट पाने के लिए आम आदमी के सामने रिरियाने और मनुहार करने वाली पत्नी सास और साला की रिरियाहट को देखकर भी दामाद जी मैंगो मैन कहकर उपहास करते है। एक मैंगों से किराये की पहचान ओढकत मुरादाबादी ब्रांड मोगांबो बन गए आमलोग ही दामाद जी यानी पंजे दामाद को शिंकजे से शर्मसार करने में लगे है।.


ममो vs   नमो 
पीएम इन वेटिंग में सदाबहार युवराज बाबा के मुकाबले अपन नमो साहब ताल ठोककर मैदान में घूम घूम कर पीएम की दावेदारी  को मजबूत करने में लगे है। साईलेंट के सामने नमो साहब इतना बोल रहे है कि इनके चिंघाड़ने से लोग हो ना हो मगर कई पार्टियां तबाह परेशान जरूर है। जनता के मूड को भांपने में माहिर नमो साहब के निशाने पर मि.साइलेंट है। एक तरफ पब्लिक साईलेंट रहने से उब रही है तो दूसरी तरफ नमो को वाक प्रहार से पंजा आशंकित है। पीएम इन टैलेंट और पीएम इन देश के प्रोब्लम हो नमो साहब की तल्ख आवाज से यूपीए भी शरमा रही है। देखना हा कि दूसरों की बोलती बंद करने में माहिर  नमो साहब अपनी पार्टी के भीतर ही उबल रहे लोगों को शांत करने में क्या कामयाब होंगे। इनको सायद पता भी हो कि इनको बाहर से ज्यादा खतरा अपनों से ही दिख रहा है। त में एक साथ फिर आ गए।

हम सब एक साथ है

संसद में सांसदों की केवल एक जात होती है। यह तो कहने और दिखाने के लिए दल और अलग अलग नेता होते है। दलों के दलदल में सबने एक दूसरे की हाथ पकड़ रखी है, ताकि आंचआने परे एक दूसरो को सेफ कर सके। अपनी ओर खतरो को आते देखते ही सब सांसद दलगत भावना से उपर उठ कर एक ही दलदल में आ जाते है। सुप्रीम कोर्ट ने दागी सांसदों को संसद से बाहर करने का फरमान क्या सुनाया कि सारे सांसद बेचारे एक बार फिर देश और अपने हित के लिए एक साथ एक ही जहाज पर सवार हो गए, और न्यायालय को सीमा में रहने की नसीहत दी। कोर्ट को आगाह करके हमारे परम पूज्य सांसदों ने देश हित के लिए एक मिशाल कायम की। हम सब मैंगो मैन भी अपने प्रिय सांसदों की कर्तव्य परायणता को देखकर अभिभूत से रह गए।

सरकारी धन हमारा

सत्ता का सुख वाकई सामान्य नेताओं को भी खास बना देता है। अपनी जेब से तो एक भीखारी को भी एक ठेल्ला तक नहीं देने वाले ज्यादातर यही नेता सत्ता पाते ही परम उदार हो जाते है, और दानवीर कर्ण को भी शर्मसार तर देते है। कतोई लैप्टॉप बांट रहा है तो कोई वोटरों को गैस चुल्हा और सिलेण्डर घर घर तक पहुंचवा दे रहा है। कोई एक दो रूपए आटा चावल देने की बात कर रहा है तो दक्षिण में अम्मा एक रूपयो से लेकर आठ रूपये में सांभर डोसा बड़ा और ना जाने क्या खिला पीला रही है। कोई सत्ता में आकर साइकिल बॉट रहा है तो कोई राशन का पूरा सामान भिजवा रहा है। हमारे गरीब देश के नेता जनता के पैसे पर होली दीवाली करके अपनी इमेज ना रहे है। औरतो और कुछ सीएम तो करोड़ों रूपए अपनी पब्लिटी पर ही खर्च कर रहे है। कुछ तो विज्ञापनों के बूते ही चुनावी भौसागप पार उतरने में लगे है। हे राम । महात्मा जी आप कहां हो । अपने बच्चों को सरकारी धन की आतिशबाजी पर लगाम लगाने के लिए दो मिनट की प्रार्थना कर ले ताकि उनको सन्मति सुबुद्धि ।


सैफई के सिपाही जिंदाबाद

यूपी के इटावा जिले में तीर्थस्थल सा एक गांव का नाम है सैफई। जहां से हमारे परम पूज्य प्रात स्मरणीय टीचरी और पहलवानी के लिए मशहूर होकर राजनीति में स्काईलैब तक जाने वाले महाधिराज नेताजी बाबू मुलायम सिंह यादव विराजते है। पैतृक गांव सैफई में मिनिस्टर साहब के नाम से पुकारे जाने वाले नेताजी की राजनीतिक लीला और दांवपेंच को देखकर तो सहोदर सखा नटवरलाल के नाम से मशहूर कृष्णजी महाराज भी चकित रह जाते  होंगे। इनकी सबसे बड़ी खासियत है कि अपनों पर हमला होते ही ये सारे भाई बंधु सहोदर एक साथ एक ही मंच पर आ धमकते है, और बचाव के लिए सबकुछ जायज है को मानते हुए सामने वाले पर टूट पड़ते है। यही वजह है कि नेताजी अपनों पर आंच नहीं आने देते और अपनी मार्केट वैल्यू को गिरने भी नहीं देते। सीएम पुत्र पर दुर्गा शक्ति परीक्षण की आंच आते ही सहोदर चाचा  ने पीएम को यूपी से सारे नौकरशाहों को वापस बुलाने की धमकी तक दे डाली । लोकतंत्र में एक खंभा कार्यपालिका है जिसके साथ भद्दा मजाक तो केवल सैफई पुत्रों से ही मुमकिन है। अब एक ही नाम में राम और गोपाल को भी रखने वाले सपाई को कौन समझाए कि यूपी कोई सैफई तो है नहीं कि गांव के लंफगों को चौकीदारी में तैनात कर देंगे। अपनी टीआरपी के लिए नेताजी को अपने सहोदरों को सेंटरफ्रेश च्यूगंम खिलाने पर जोर देना चाहिए, ताकि खुदा की दया से नेताजी का पीएम बनने का सपना मुंगेरी लाल के सदाबहार हसीन सपना ना बन सके।
 
किसकी नजर लग गयी जेएनयू को


प्यार मुहब्बत जिंदाबाद के साथ पढाई में हमेशा अव्वल रहने वाला जेएनयू देश का एक अनोखा यूनीवर्यिटी है। जहां पर सबकुछ दिखता है की तरह एक खुलापन आजादी है। वर्जनाओं ले इस कदर फ्रीडम है कि वेस्ट वाले भी यहां आकर फ्रीडम की प्रेरणा ले सकते है। सबकुछ जायज है अगर मन मिल गया जिसे दिल भी कह सकते है.। यहां के छात्रों में एक नशा है।मगर तमाम वर्जनाओं से मुक्त यह जेएनयू अपने परिणाम के चलते ही थिंक टैंक सा माना जाता है । वामपंथ से आगे की बात का दम भरने वालों की कोई कमी नहीं है, पर पिछले दिनों थर्ड ग्रेड सिनेमा की तरह.प्यार सेक्स सहमति हिंसा प्रतिशोध तेजाब गोली हत्या को मिलाकर एक के बाद एक ही तरह की कई घटनाएं हुई। जिससे आजादी के पीछे के रोमांस का काला पीला नीला चेहरा प्रकट होता है। लगता है कि समय से आगे भाग रहे यहां के प्रगतिशील छात्रों के रेस को अपनी ही नजर लग गयी.। खुदा बचाये देश के पहले प्रधानमंत्री के नाम पर इस शिक्षा के मंदिर को खुदा बचाये।

गॉडफादर की तलाश


झारखंड़ी कांग्रेसी मंत्री के एक रिश्तेदार पर कोयले की आंच आने के बाद मंत्रीपद गंवाने वाले कायस्थ नेताजी के साथ ही पतजलि वाले अपने योगगुरू भी बगैर गॉडफादर के हो गए है। देश की भावी तस्वीर को देखते हुए योगगुरू फिलहाल नए गॉडफादर की खोज में जुट गए है। गुजरात से देश की बागडोर थामने का ड्रीम देख रहे सीएम साहब को पतजंलि में बुलाया। राजस्थान की कमल छाप पूर्व सीएम से भी नजदीकी बढ़ा रहे है। कभी सत्ता के शिखर तक जाने का सपना देख रहे योगस्वामी का इस तरह बेपतवार होना हैरतनाक है। लगता है कि सत्ता और काला धन की खुमारी में देव बाबा की टीआरपी रामभरोसे हो गयी है। इनके लिए मेरी भी यह मंगल कामना है कि उनको कोई लंबे समय तक साथ देने वाला कोई गॉडफादर नसीब हो जाए। 

ईमानदारी का रोग

ईमानदारी बड़ी बुरी चीज होती है , जिसको लग जाता है वो खुद तो परेशान रहता ही है, और ना जाने कितनों को परेशान करता रहता है। यही वजह है कि हमारे देश के निर्माता नेताजी लोग सबसे पहले इस लाईलाज रोग के वायरस से बचने के लिए विदेशी बैंको की शरण लेते है। मगर यूपी की एक नवनियुक्त आईएएस ने अपनी ईमानदारी से रेत माफियाओं को जीना हराम कर रखा था। सरकारी खजाने को मालामाल कर दिया था, मगर मस्जिद की दीवार गिराने के आरोप में मुल्ला नेताजी के नाम से गौरवान्वित होने वाले के सीएम पुत्र ने एक ही झटके में निलंबन कर दिया। आरोप गलत होने पर भी सीएम की जिद के आगे कौन सिर दे मारे। निशाना खाली देखकर सीएम साहब ने अब आईएएस पति का तबादला कर डाला.। यानी आगे क्या होगा इस पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी ही मानी जाएगी। यही हाल हरियाणा के सीनियर आईएएस अशोक खेमका जी का है,जिनका अबतक करीब 40 बार तबादला किया गया है। तमाम सीएम की आंख की किरकिरी रहने के बाद भी गांधी परिवार के दामाद के खिलाप रिपोर्ट को जगजाहिर करने में नहीं चूके। इनलोगों की ईमानदारी को सलाम.


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रविवार, 11 अगस्त 2013

समय की धारा पर बदलती दिल्ली / नलिन चौहान

देश की आजादी के बाद दिल्ली में बाहर से आने वाले व्यक्तियों को प्रमुख पर्यटक स्थलों पर बिकने वाले पोस्टकार्ड में लालकिला, कुतुब मीनार और राजपथ पर इंडिया गेट राजधानी के जीवंत प्रतीक थे । मानो इनके बिना किसी का दिल्ली दर्शन पूरा नहीं होता था । पर यह दिल्ली की एक अधूरी तस्वीर थी क्योंकि दुनिया में बहुत कम शहर ऐसे हैं जो दिल्ली की तरह अपने दीर्घकालीन अविच्छिन्न अस्तित्व एवं प्रतिष्ठा को बनाए रखने का दावा कर सकें । दिल्ली का इतिहास, शहर की तरह की रोचक है । ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली, दमिशक और वाराणसी के साथ आज की दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है । इस शहर के इतिहास का सिरा भारतीय महाकाव्य महाभारत के समय तक जाता है, जिसके अनुसार, पांडवों ने इंद्रप्रस्थ के निर्माण किया था। समय का चक्र घुमा और अनेक राजाओं और सम्राटों ने दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया । दिल्ली का सफर लालकोट, किला राय पिथौरा, सिरी, जहांपनाह, तुगलकाबाद, फिरोजाबाद, दीनपनाह, शाहजहांनाबाद से होकर नई दिल्ली तक जारी है। समय के इस सफर में दिल्ली बदली, बढ़ी और बढ़ती जा रही है और उसका शाही रूतबा आज भी शहर के मिजाज में बरकरार है ।
आज नई दिल्ली की रायसीना की पहाड़ी पर बने राष्ट्रपति भवन के सामने खड़े होकर बारस्ता इंडिया गेट नजर आने वाला पुराना किला, वर्तमान से स्मृति को जोड़ता है । यहां से शहर देखने से दिमाग में कुछ बिम्ब उभरते हैं जैसे महाकाव्य का शहर, दूसरा सुल्तानों का शहर, तीसरा शाहजहांनाबाद और चौथा नई दिल्ली से आज की दिल्ली । इंद्रप्रस्थ की पहचान टीले पर खड़े 16वीं शताब्दी के किले और दीनपनाह से होती है, जिसे अब पुराना किला के नाम से जाना जाता है । दिल्ली में भूरे रंग से चित्रित मिट्टी के विशिष्ट बर्तनों के प्राचीन अवशेष इस बात का संकेत करती है कि यह करीब एक हजार ईसापूर्व समय का प्राचीन स्थल है । दिल्ली में सन् 1966 में कालका जी मन्दिर के पास स्थित बहाईपुर गाँव में मौर्य सम्राट अशोक महान के चट्टानों पर खुदे लघु शिलालेखों के बारे में आज कम लोग ही जानते हैं ।
दूसरे अदृश्य शहर के अवशेष आज की आधुनिक नई दिल्ली के फास्ट ट्रैक और बीआरटी कारिडोर पर चहुंओर बिखरे हुए मिलते हैं । महरौली, चिराग, हौजखास, अधचिनी, कोटला मुबारकपुर और खिरकी शहर के बीते हुए दौर की निशानी है जो कि 1982 में हुए एशियाई खेलों के दौरान खिलाडि़यों के लिए बनाए एशियाड विलेज, जहां अब दूरदर्शन का कार्यालय और सरकारी बाबूओं के घर हैं, फैशन हाउस, कलादीर्घाओं से लेकर साकेत में एक साथ बने अनेक शापिंग माल की चकाचौध में सिमट से गए हैं । दिल्ली में सन् 1982 में आयोजित किए गए एशियाई खेलों से दिल्ली में बसावट की प्रक्रिया में और तेजी आई । इस दौरान दिल्ली में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हुआ जिसके चलते इस इलाके में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से मजदूरों, राजमिस्त्रियों, दस्तकारों और दूसरी तरह के कामगारों का व्यापक स्तर पर प्रवेश हुआ । आठवें दशक के उस शुरूआती दौर में दिल्ली जैसे लोगो के लिए अवसरों की नगरी थी ।
हर साल लगने वाले प्रसिद्व हस्तशिल्प सूरजकुंड मेले में जाने वाले अधिकतर पर्यटक इस बात से अनजान है कि 10वीं शताब्दी में एक तोमर वंश के राजा ने अनंगपुर गांव में एक बांध का निर्माण किया था और सूरजकुंड उसी जल प्रणाली का एक भाग है । जबकि तोमर राजपूतों के दौर में ही पहली दिल्ली यानी 12 वीं शताब्दी का लालकोट बना जबकि पृथ्वीराज चौहान ने शहर को किले से आगे बढ़ाया । कुतुब मीनार और महरौली के आसपास आज भी इस किले के अवशेष देखे जा सकते हैं । जबकि कुतबुद्दीन ऐबक ने 12वीं सदी के अंतिम वर्ष में कुतुबमीनार की आधारशिला रखी जो भारत का सबसे ऊंचा बुर्ज (72.5 मीटर) है । अलाउद्दीन खिलजी के सीरी शहर के भग्न अवशेष हौजखास के इलाके में आज भी देखे जा सकते हैं जबकि गयासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली के तीसरे किले बंद नगर तुगलकाबाद का निर्माण किया जो कि एक महानगर के बजाय एक गढ़ के रूप में बनाया गया था । फिरोजशाह टोपरा और मेरठ से अशोक के दो उत्कीर्ण किए गए स्तम्भ दिल्ली ले आया और उसमें से एक को अपनी राजधानी और दूसरे को रिज में लगवाया । आज तुगलकाबाद किले की जद में ही शहर का सबसे बड़ा शूटिंग रेंज है, जहां एशियाई खेलों से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों की तीरदांजी और निशानेबाजी प्रतियोगिताओं का सफल आयोजन हुआ । आज यहां इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से लेकर सार्क विश्वविद्यालय तक है ।
सैययदों और लोदी राजवंशों ने करीब सन् 1433 से करीब एक शताब्दी तक दिल्ली पर राज किया। उन्होंने कोई नया शहर तो नहीं बसाया पर फिर भी उनके समय में बने अनेक मकबरों और मस्जिदों से मौजूदा शहरी परिदृश्य को बदल दिया । आज की दिल्ली के उत्तरी छोर से दक्षिणी छोर, जहां कि आज कुकुरमुत्ते की तरह असंख्य फार्म हाउस उग आए हैं, तक लोदी वंश की इमारते इस बात की गवाह है । आज के प्रसिद्व लोदी गार्डन में सैययद लोदी कालीन इमारतें को बाग के रखवाली के साथ सहेजा गया है । आज दिल्ली में बौद्विक बहसों के बड़े केंद्र जैसे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, इंडिया हैबिटैट सेंटर और इंडिया इस्लामिक सेंटर लोदी गार्डन की परिधि में ही है । सन् 1540 में शेरशाह सूरी ने हुमायूं को हराकर भारत से बेदखल कर दिया । शेरशाह ने एक और दिल्ली की स्थापना की । यह शहर शेरगढ़ के नाम से जाना गया, जिसे दीनपनाह के खंडहरों पर बनाया गया था । आज दिल्ली के चिडि़याघर के नजदीक स्थित पुराना किला में शेरगढ़ के अवशेष देखें जा सकते हैं ।
हुमायूं के दोबारा सत्ता पर काबिज होने के बाद उसने निर्माण कार्य पूरा करवाया और शेरगढ़ से शासन किया । हुमायूं के दीनापनाह, दिल्ली का छठा शहर, से लेकर शाहजहां तक तीन शताब्दी के कालखंड में मुगलों ने पूरी दिल्ली की इमारतों को भू परिदृश्य को परिवर्तित कर दिया । बाबर, हुमायूं और अकबर के मुगलिया दौर में निजामुद्दीन क्षेत्र में सर्वाधिक निर्माण कार्य हुआ जहां अनेक सराय, मकबरे वाले बाग और मस्जिदें बनाई गईं । हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह और दीनापनाह के किले पुराना किले के करीब मुगल सम्राट हुमायूं  के मकबरे, फारसी वास्तुकला से प्रेरित मुगल शैली का पहला उदाहरण, के अलावा नीला गुम्बद के मकबरे, सब बुर्ज, चौसठ खम्बा, सुन्दरवाला परिसर, बताशेवाला परिसर, अफसारवाला परिसर, खान ए खाना और कई इमारतें बुलंद की गईं । एक तरह से यह इलाका शाहजहांनाबाद से पूर्व मुगल दौर की दिल्ली था ।
शाहजहां सन् 1638 में आगरा से राजधानी को हटाकर दिल्ली ले आया और दिल्ली के सातवें नगर शाहजहांनाबाद की आधारशिला रखी । इसका प्रसिद्व दुर्ग लालकिला यमुना नदी के दाहिने किनारे पर शहर के पूर्वी छोर पर स्थित है सन् 1639 में बनना शुरू हुआ और नौ साल बाद पूरा हुआ । इसी लालकिले की प्राचीर से आजादी मिलने के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपना भाषण दिया था । सन् 1650 में शाहजहां ने अपनी विशाल जामे मस्जिद का निर्माण पूरा करवाया जो कि भारत की सबसे बड़ी मस्जिद है ।
जब अंग्रेजों ने 1857 के बाद दिल्ली पर दोबारा कब्जा किया तो इमारतों को नेस्तानाबूद कर दिया और उनकी जगह सैनिक बैरकें बना दी । इसी तरह, जामा मस्जिद और शाहजहांनाबाद के दूसरे हिस्सों को भी समतल कर दिया गया । इस तरह न केवल सैकड़ों रिहाइशी हवेलियों बल्कि शाहजहां की दौर की अकबराबादी मस्जिद भी को जमींदोज कर दिया गया । शहर में रेलवे लाइन के आगमन के साथ जहांआरा बेगम द्वारा चांदनी चैक के निर्मित बागों में भी इमारतें खड़ी कर दी गई और इस तरह शाहजहांनाबाद का स्थापत्य और शहरी स्वरूप हमेशा के लिए बदल गया ।
मीर की प्रसिद्व आत्मकथा दिल्ली जिक्र ए मीर, उनके अपने उजड़ने और बसने से ज्यादा दिल्ली के बार बार उजड़ने और बसने की कथा है। बीसवीं शताब्दी के अंत में भारत की अंग्रेजी हुकूमत ने दिल्ली के वजूद को राजधानी के तौर पर दोबारा कायम करने का फैसला लिया और इसलिए शाहजहांनाबाद और रिज के साथ उत्तरी छोर तक के कश्मीरी गेट इलाके में अस्थायी राजधानी बनाई गई । वाइसराय लाज, जहां अब दिल्ली विश्वविद्यालय है, के साथ अस्पताल, शैक्षिक संस्थान, स्मारक, अदालत और पुलिस मुख्यालय बनाए गए । एक तरह से, अंग्रेजों की सिविल लाइंस को मौजूदा दिल्ली के भीतर आठवां शहर कहा जा सकता है।
सन् 1911 में, सबसे पहले अंग्रेजों ने राजधानी के लिए दिल्ली के उत्तरी छोर का चयन किया था, जहां पर दूसरे दिल्ली दरबार का आयोजन किया गया, जिसे बाद में शाहजहांनाबाद के दक्षिण में रायसीना पहाड़ी पर नई दिल्ली बनाने के निर्णय के कारण छोड़ दिया गया । एडवर्ड लुटियंस के दिशानिर्देश में बीस के दशक में नियोजित और निर्मित दिल्ली की शाही सरकारी इमारतों, चौड़े-चौड़े रास्तों और आलीशान बंगलों को एक स्मारक की महत्वाकांक्षा के साथ बनाया गया था।
अंग्रेज पहले दिन से ही इस शहर को एक आधुनिक शाही शहर वायसराय के तबोताब और ताकत की निशानी की हैसियत में ढ़ालने को बेताब थे । सन् 1947 में मिली आजादी के साथ हुए देश विभाजन के समय राजधानी होने के कारण दिल्ली में बेहतर ढांचागत सुविधाएं और अवसर थे । इस वजह से अपने ही देश में शरणार्थी बने नागरिकों ने भारी तादाद में दिल्ली में ही डेरा जमाया । सन् 1955 तक आते आते पुराना किले के इर्दगिर्द की जगह भरने लगी थी ।
पुराना किले के ठीक उत्तर में भारतीय उद्योग मेले के लिए मैदान खाली कर दिया गया । यह मेला 29 अक्तूबर 1955 से शुरू हुआ और नौ सप्ताह तक चलता रहा । 1 जनवरी 1956 को नेहरू ने लिखा, उद्योग मेले की कामयाबी इतनी जबदस्त रही कि मेरे ख्याल में अगर आप नुमाइशों के लिए स्थायी इंतजाम कर लें तो बेहतर रहेगा कहने का मतलब कि जहां यह नुमाइश लगाई गई है उस स्थान को स्थायी रूप से इसी काम के लिए आरक्षित कर दिया जाए । और इस तरह उस कहानी की शुरूआत हुई जिसे 1972 के बाद प्रगति मैदान के नाम से जाना गया । पहले दिल्ली में एक मुख्य आयुक्त होता था जो कि पूरे प्रांत का कामकाज देखता था आजादी के बाद दिल्ली को भाग सी के तहत दर्जा देते हुए एक पृथक विधानसभा दी गई । सन् 1956 में राज्य पुर्नगठन आयोग की सिफारिशों के परिणमस्वरूप दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश बन गई ।
आज प्रमुख पर्यटक स्थलों पर बिकने वाले पोस्टकार्ड में तस्वीरें बदल चुकी है । अब लालकिला, कुतुब मीनार और इंडिया गेट की जगह मेट्रो रेल, अक्षरधाम मंदिर और बहाई मंदिर ने ले ली है । सन् 2002 में दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन की शाहदरा और तीस हजारी के बीच पहली बार चली मेट्रो रेल ने राजधानी के सार्वजनिक परिवहन की सूरत और सीरत दोनों बदल दी है। दिल्ली परिवहन निगम की बसों से पहले राजधानी में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के नाम पर ग्वालियर के सिंधियाओं की कंपनी जीएनआईटी ग्वालियर ऐंड नार्थ इंडिया टांसपोर्ट कंपनी की प्राइवेट बसें थी ।
आज मेट्रो का यह नेटवर्क बढ़कर 139 स्टेशनों के 190 किलोमीटर तक फैल चुका है, जहां 200 से अधिक ट्रेनें प्रतिदिन करीब 18 लाख यात्रियों को सुबह छह बजे से रात के ग्यारह बजे तक अपनी मंजिलों पर पहुंचाती है । आज दिल्ली मेट्रो राजधानी की सीमा से बाहर निकलकर नोएडा, गुड़गांव और गाजियाबाद तक पहुंच चुकी । एक तरह से मेट्रो ने करीब एक शताब्दी से उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और पुराने शहर में बंटी दिल्ली को एक सूत्र में पिरो दिया है । 
प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका रीडर्स डाइजेस्ट के ब्रिटिश संस्करण में (जुलाई 2011) नई दिल्ली स्थित स्वामीनारायण अक्षरधाम को 21 वीं सदी के सात आश्चर्यों में से एक के रूप में चयनित किया । केवल पांच साल में बनकर तैयार हुए और 100 एकड़ में फैले स्वामीनारायण अक्षरधाम परिसर का शुभारंभ नवंबर 2005 को हुआ। इसका मुख्य मंदिर मुख्य रूप से राजस्थान के गुलाबी बलुआ पत्थर से बनाया गया है और इसकी संरचना में लोहे का प्रयोग नहीं किया गया है । 141 फीट ऊंचे, 316 फुट चैड़े और 356 फुट लंबे इस मंदिर में प्रस्तर की अद्भुत हस्तकला दर्शनीय है । अब तक 25 लाख से अधिक आगंतुक इस लुभावनी कला और स्थापत्य कला के प्रतीक से अभिभूत होने के साथ समाज में शांति और सद्भाव को बढ़ावा देने वाले एक मूल्य आधारित जीवन के वैश्विक संदेश का प्रचार से प्रेरित है ।
रीडर्स डाइजेस्ट के शब्दों में, ताजमहल निर्विवाद रूप से भारत की वास्तुकला का प्रतीक था पर अब इस मुकाबले में अक्षरधाम मंदिर एक नया प्रतिद्वंदी है । जबकि बहाई मंदिर भारतीय धार्मिक सहिष्णुता का एक और प्रतीक है । मजेदार बात यह है कि सन् १८४४ में अपने उद्भव के साथ ही बहाई धर्म भारत से जुड़ा हुआ है । अनेकता में एकता का प्रचार करने वाले बहाउल्लाह इस धर्म में दीक्षित होने वाले सबसे पहले 18 व्यक्तियों में से एक व्यक्ति भारतीय था। सन् 1986 में दिल्ली में बने बहाई मंदिर (लोटस टेम्पल) में प्रतिदिन औसतन दस हजार पर्यटक आते हैं । आज बहाउल्लाह के नैतिक संदेश को देश में एक हजार से अधिक स्थानों पर बच्चों की कक्षाओं के माध्यम से फैलाया जा रहा है।
गालिब की जुबान में कहे तो दिल्ली की हस्ती मुनहसर कई हंगामों पर थी ।
किला, चांदनी चौक, हर रोजा बाजार मस्जिद ए जामा का, हर हफते सैर जमना के पुल की, हर साल मेला फूल वालों का।
ये पांचों बातें अब नहीं फिर कहो,दिल्ली कहां।
Source: Purana Qila (Old Fort), Delhi Flickr Prato9x's photostream
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