बुधवार, 17 मई 2017

दुनिया की 10 सबसे गर्म जगह





 

 

 

दुनिया की 10 सबसे गर्म जगह, यहां 70 डिग्री तक पहुंच जाता है तापमान

प्रस्तुति-  कृति शरण 

यहां हम दुनिया की कुछ ऐसी जगहों के बारे में बता रहे हैं, जहां लोगों को समय-समय पर रिकॉर्डतोड़ गर्मी का मुकाबला करना पड़ा।
1. दश्त-ए-लुत, ईरान (Dasht-e lut, Iran)
अधिकतम तापमान- 70.7 डिग्री सेल्सियस

साल 2004, 2005, 2006, 2007 और 2009 में ईरान का दश्त-ए-लुत धरती पर सबसे ज्यादा गर्म स्थान रहा। हालांकि, 2005 में यहां अधिकतम तापमान 70.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। लुत के एक बड़े हिस्से में इतनी गर्मी पड़ती है कि यहां किसी जीव-जंतु के लिए रहना संभव नहीं है।
                                                                                                                                                                 
                                                                                                                                                                 
2. क्वींसलैंड, ऑस्ट्रेलिया (Queensland, Australia)


अधिकतम तापमान- 69.3 डिग्री सेल्सियस

ऑस्ट्रेलिया धरती पर सबसे शुष्क (सूखे) महाद्वीप है। बैडलैंड्सके नाम से मशहूूर यहां क्वींसलैंड आउटबैक का हिस्सा एक बड़ा रेगिस्तान है। 2003 में यहां भयंकर सूखा पड़ा था, उस वक्त यहां का तापमान 69.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था।
3. फ्लेमिंग माउंटेन, शिनजियांग, चीन (Flaming mountains, Xinjiang, China)


अधिकतम तापमान- 66.8 डिग्री सेल्सियस

चीन के शिनजियांग में तियान शान पहाड़ों की श्रृंखला में आने वाले फ्लेमिंग माउंटेन को भी गर्म इलाकों में जाना जाता है। 2008 में यहां पर जमीन की सतह का तापमान 66.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। उस साल ये धरती पर नापा गया सबसे ज्यादा तापमान था।
4. केव ऑफ द क्रिस्टल, मैक्सिको (Cave of the crystals, Mexico)


अधिकतम तापमान- 58 डिग्री सेल्सियस

मैक्सिको के नैका में क्रिस्टल गुफा मौजूद है। इसे अब तक मिला सबसे बड़ा प्राकृतिक क्रिस्टल माना जाता है। ये गुफा बेहद गर्म है। यहां पर हवा का अधिकतम तापमान 58 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया है। यही वजह है कि इस गुफा को बहुत ज्यादा छानबीन नहीं की जा सकी है।
5 . अल-अजीजियाह, लीबिया (Al aziziyah, Libya)


अधिकतम तापमान- 57.8 डिग्री सेल्सियस

लीबिया की राजधानी त्रिपोली में 40 किलोमीटर दक्षिण में मौजूद अल-अजीजियाह बेहद गर्म शहरों में से एक है। 1922 में यहां का अधिकतम तापमान 57.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। वैसे आमतौर पर हर गर्मी में यहां का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक जाता है।
6. डेथ वैली, अमेरिका (Death valley,  America)


अधिकतम तापमान- 56.7 डिग्री सेल्सियस

कैलिफोर्निया के मोजेव रेगिस्तान में स्थित डेथ वैली उत्तरी अमेरिका के सबसे सूखे और गर्म इलाकों में से है। ये समुद्र के स्तर से काफी नीचे बसा है। यहां पर रिकार्ड अधिकतम तापमान 56.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। ये हिस्सा पहाड़ों से घिरा हुआ है।
7. तिरट जवी, इजरायल (Tirat zvi, Israel)


अधिकतम तापमान- 54 डिग्री सेल्सियस

एशिया में हवा में सबसे ज्यादा नमी इसी शहर में रिकॉर्ड की गई है। यह इजरायल का धार्मिक शहर है, जो बेत शेन वैली के पास स्थित है। यह समुद्र तल से 722 फीट नीचे है। जॉर्डन नदी पास होने से यह की धरती अत्यधिक उपजाऊ है।1942 में 54 डिग्री तापमान रिकॉर्ड किया गया था, जो एशिया में सबसे ज्यादा था।
8. केबिली, ट्यूनीशिया (Kebili, Tunisia)


अधिकतम तापमान- 55 डिग्री सेल्सियस

यह मध्य ट्यूनीशिया का नखलिस्तान है। सिर्फ खजूर के पेड़ ही यहां आपको छाया दे सकते हैं। यह अफ्रीका के सबसे गर्म शहरों में से एक है। हालांकि, चरम जलवायु के बावजूद भी यह कस्बा प्राकृतिक रूप से काफी समृद्ध है। बताया जाता है कि इस कस्बे में दो लाख साल से बसाहट है।
अन्य सम्बंधित लेख-




सोमवार, 8 मई 2017

आज भी खरे हैं तालाब (एक कालजयी पुस्तक)



रचनाकार
अनुपम मिश्र
*
प्रकाशक
गांधी शांति प्रतिष्ठान,
नई दिल्ली
*
पृष्ठ - १२०
*
मूल्य :  ७५ रुपये
*
प्राप्ति-स्थल
गांधी शांति प्रतिष्ठान,
२२१ दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली-११० ००२
ऐसी विरली ही पुस्तकें होती हैं जो न केवल पाठक तलाशती हैं, बल्कि तलाशे पाठकों को कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तराशती भी हैं। अपनी प्रसन्न जल जैसी शैली तथा देश के जल स्रोतों के मर्म को दर्शाती एक पुस्तक ने भी देश को हज़ारों कर्मठ कार्यकर्ता दिए हैं। पुस्तक का नाम है 'आज भी खरे हैं तालाब'। श्री अनुपम मिश्र द्वारा लिखित तथा गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक का पहला संस्करण १९९३ में छपा। पाँचवाँ संस्करण २००४ में छपा और कुल प्रतियाँ २३००० छपीं। लेकिन ९३ से २००४ के बीच पुस्तक ने देश भर में आवारा मसीहा की तरह घूम-घूम कर अपने-अपने क्षेत्र के जल स्रोतों को बचाने की अलख जगा दी और यह सिलसिला आज भी जारी है।
अपने देश में बेजोड़ सुंदर तालाबों की कैसी भव्य परंपरा थी, पुस्तक उसका पूरा दर्शन कराती है। तालाब बनाने की विधियों के साथ-साथ अनुपम जी की लेखनी उन गुमनाम नायकों को भी अंधेरे कोनों से ढूँढ़ लाती है, जो विकास के नए पैमानों के कारण बिसरा दिए गए हैं।
पुस्तक के बारे में मूर्धन्य पत्रकार प्रभाष जोशी ने इसके छपने के तुरंत बाद ही जो लिखा था वही शायद इस पुस्तक को सही स्थान देने की सही कोशिश कर पाता है। प्रभाष जी के लेख के कुछ अंश ज्यों के त्यों दायीं तरफ़ दिए गए बक्से में है।
पुस्तक के पहले संस्करण के बाद देशभर में पहली बार अपने प्राचीन जल स्रोतों को बचाने की बहस चली, लोगों ने जगह-जगह बुजुर्गों की तरह बिखरे तालाबों की सुध लेनी शुरू की। इसकी गाथा बेशक लंबी है, लेकिन फिर भी देखने का प्रयास करते हैं।
मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित जल राणा राजेंद्र सिंह बताते हैं कि राजस्थान की उनकी संस्था तरुण भारत संघ के पानी बचाने के बड़े काम को सफल बनाने में इस पुस्तक का बहुत बड़ा हाथ है। मध्यप्रदेश के सागर जिले के कलेक्टर श्री बी. आर. नायडू, जिन्हें हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी, पुस्तक पढ़ने के बाद इतना प्रभावित हुए कि जगह-जगह लोगों से कहते फिरे, 'अपने तालाब बचाओ, तालाब बचाओ, प्रशासन आज नहीं तो कल अवश्य चेतेगा।' श्री. नायडू की ये मामूली अलख सागर जिले के १००० तालाबों को निरंजन कर गई। ऐसी ही एक और अलख के कारण शिवपुरी जिले के लगभग ३४० तालाबों की सुध ली गई। मध्यप्रदेश के ही सीधी और दमोह के कलेक्टरों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में इस पुस्तक की सौ-सौ प्रतियाँ बाँटी।
पानी के लिए तरसते गुजरात के भुज के हीरा व्यापारियों ने इस पुस्तक से प्रभावित होकर अपने पूरे क्षेत्र में जल-संरक्षण की मुहिम चलाई। पुस्तक से प्रेरणा पाकर पूरे सौराष्ट्र में ऐसी अनेक यात्राएँ निकाली गईं। पानी बचाने के लिए सबसे दक्ष माने गए राजस्थान के समाज को भी इस पुस्तक ने नवजीवन दिया। राजस्थान के प्रत्येक कोने में पुस्तक के प्रभाव के कारण सैकड़ों जल-यात्राओं के साथ-साथ हज़ारों पुरातन जल-स्रोत सँभाले गए। ऐसी अनेक यात्राएँ आज भी जारी हैं।
जयपुर जिले के ही सालों से अकालग्रस्त लापोड़िया गाँव ने इस पुस्तक को आत्मा में बसाया। लापोड़िया गाँव ने पुस्तक से प्रेरणा पाकर न केवल अपनी जलगाहें बचाईं, बल्कि अपने प्रदेश की चारागाहें तथा गोचर भी बचाए। लापोड़िया के सामूहिक प्रयासों का नतीजा यह रहा कि आज ३०० घरों का लापोड़िया, जयपुर डेयरी को चालीस लाख वार्षिक का दूध दे रहा है। जल-जंगल संरक्षण के ऐसे ही आंदोलनों से लापोड़िया को लक्ष्मण सिंह जैसा नेतृत्व क्षमता वाला नायक मिला। उनकी इन्हीं क्षमताओं के कारण आज लापोड़िया के आसपास के ३०० गाँव अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं। शहरों की ओर पलायन में निरंतर गिरावट आई है।
पुस्तक का प्रभाव उत्तरांचल में भी हुआ। यहाँ पौड़ी-गढ़वाल के उफरेखाल क्षेत्र के दूधातोली लोक विकास संस्थान के श्री सच्चिदानंद भारती ने पुस्तक से प्रेरणा पाकर पहाड़ी क्षेत्रों की विस्तृत चालों (पानी बचाने के लिए पहाड़ी तलाई) को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया। इस दौरान पिछले १३ सालों में उन्होंने १३ हज़ार चालों को बचाया-बनाया। उनके इन्हीं प्रयासों से उजड़े हिमालय के शीश पर फिर से हरियाली का मुकुट दिखने लगा है।
गैर हिंदी भाषी राज्य कर्नाटक में इस पुस्तक का सीधा प्रभाव राज्य सरकार पर पड़ा। कर्नाटक सरकार ने तालाब बचाने का काम सीधे अपने ही हाथ में ले लिया और वहाँ एक जल १संवर्धन योजना संघ' बनाया गया तथा विश्व बैंक की मदद से पूरे राज्य के तालाब बचाने की योजना तैयार की गई है। इसी राज्य की ही इंफोसिस कंपनी के मालिक श्री नारायणमूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति ने इस पुस्तक का कन्नड़ में अनुवाद किया है और ५० हज़ार प्रतियाँ छपवाकर कर्नाटक की प्रत्येक पंचायत में भिजवाने की योजना बनाई है।
हरित क्रांति के जेहादी नारे के बाद निरंतर रेगिस्तान की ओर अग्रसर पंजाब में इस पुस्तक का नाद सुनाई दिया। सर्वप्रथम इसका पंजाबी अनुवाद मालेरकोटला से प्रकाशित 'तरकश' नामक पत्रिका में शुरू हुआ। फिर इसका एक संक्षिप्त पंजाबी संस्करण छपा जो मुफ्त में बाँटा गया। कुछ वर्षों बाद इसके अनुवाद के साथ पंजाब के सुख-दुख जोड़कर एक पुस्तक की शक्ल दी गई। इस नए अनुवाद का व्यापक प्रभाव रहा। पंजाब के साहित्यकारों, आलोचकों, लोकगायकों, सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं के साथ-साथ प्रमुख संतों, यहां तक कि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्यों पर भी इसका खासा प्रभाव पड़ा। पंजाबी अनुवाद का श्री गुरुनानक देव जी की नदी का उद्धार करने वाले संत बलवीर सीचेवाल जी ने बेहद रचनात्मक उपयोग किया। वे अब नदी किनारे होने वाले वार्षिक साहित्यिक सम्मेलनों में पुस्तक ख़रीद कर रचनाधर्मियों को भेंट करते हैं। पंजाब के लोकगायकों ने इस पुस्तक को पढ़ने के बाद अपने तरीके से जलस्रोतों को बचाने की मुहिम शुरू की है। देश के अधिकतर लेखक तथा प्रकाशक पुस्तकें न पढ़ने वाले पाठकों का रोना रोते हैं। पर वे शायद ये भूल जाते हैं कि पुस्तकों का सच्चा अर्थ समाज के नाम लिखा प्रेम-पत्र होता है। और कितनी पुस्तकें ऐसी होती हैं, जिनमें समाज के लिए प्रेम भरा होता है? श्री अनुपम मिश्र की इस कृति ने यही काम किया है। 'आज भी खरे हैं तालाब' पुस्तक न केवल धरती का, बल्कि मन-माथे का अकाल भी दूर करती है।
बंगाल का किस्सा भी मज़ेदार है। जहाज़ से हथियार गिराए जाने के बाद सूर्खियों में आए पुरुलिया नामक कस्बे की एक घुमक्कड़ पत्रकार निरुपमा अधिकारी वहाँ के एक अकाल क्षेत्र का दौरा करती-करती अचानक हरियाली देखकर ठिठक गईं। गाँव वालों से पता चला कि उस गाँव में कुछ तालाब ज़िंदा थे, इसलिए वहाँ धरती के भीतर की नमी अभी शेष थी। तालाबों की उपयोगिता के बारे में निरुपमा की दृष्टि साफ़ होती चली गई। इसी बीच निरुपमा के एक मित्र ने उन्हें तालाब पुस्तक भेंट की। निरुपमा का जीवन पुस्तक पढ़ते-पढ़ते बदलता गया। रोजी-रोटी का पक्का प्रबंध न होने के बावजूद निरुपमा ने इसका बांग्ला अनुवाद किया। अब इस अनुवाद का दूसरा संस्करण भी छप चुका है।
कई राज्यों से गुजरते हुए पुस्तक के किस्से महाराष्ट्र भी पहुँचे। कभी जलसंसाधन मंत्रालय के सचिव रह चुके औरंगाबाद के प्रसिद्ध इंजीनियर माधव चितले की आँखों के सामने से जैसे ही यह पुस्तक गुजरी, उन्होंने इसके मराठी अनुवाद की तत्काल ज़रूरत महसूस की। बेशक यह पुस्तक आज की इंजीनियरिंग शिक्षा पद्धति को आईना दिखाता है, फिर भी माधव जी ने इसका मराठी अनुवाद 'औरंगाबाद संस्कृति मंडल' के सौजन्य से छापा।
भूकंप में ध्वस्त हो चुके गुजरात में भी इस पुस्तक का अनुवाद किया गया। श्री दिनेशभाई संघवी ने पुस्तक का अनुवाद किया तथा गुजराती समाचार पत्र 'जन्मभूमि प्रवासी' ने इसे धारावाहिक रूप में छापा।
देशभर में अमृत छिड़कने के बाद यह पुस्तक फ्रांस की एक लिखिका एनीमोंतो के हाथ लगी। एनीमोंतो ने इसे दक्षिण अफ्रीकी रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी के लिए तड़पते लोगों के लिए उपयोगी समझा। फिर उन्होंने इसका फ्रेंच अनुवाद किया। ताज़ा जानकारी के अनुसार पुस्तक के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र में पानी की सँभाल में काफी तेज़ी आई है।
भारत ज्ञान-विज्ञान परिषद ने इसकी २५ हज़ार प्रतियाँ छापकर मुफ्त में बांटी। मध्यप्रदेश जनसंपर्क विभाग ने भी २५ हज़ार प्रतियाँ छापकर प्रदेश की प्रत्येक पंचायत तक पहुँचाया। भोपाल के राज्य संसाधन केंद्र ने इसकी ५०० प्रतियाँ ५०० गाँवों में बाँटी। अहमदाबाद की 'उत्थान माहिती' नामक संस्था ने ५०० प्रतियाँ छापकर सामाजिक संस्थाओं में मुफ्त बाँटी। नागपुर के स्वराज प्रकाशन ने ५ हज़ार प्रतियाँ छापकर मुफ्त में बाँटी। बिहार के जमालपुर की संस्था 'नई किताब' ने भी इसकी ११ सौ प्रतियाँ बाँटी। देशभर के १६ रेडियो स्टेशन पुस्तक को धारावाहिक रूप में ब्रॉडकास्ट कर चुके हैं। कपार्ट की सुहासिनी मुले ने इस पुस्तक पर बीस मिनट की फ़िल्म भी बनाई है। सीमा राणा की बनाई फिल्म दूरदर्शन पर आठ बार प्रसारित हो चुकी है।
भोपाल के शब्बीर कादरी ने पुस्तक का उर्दू अनुवाद किया और मध्यप्रदेश के मदरसों में मुफ्त में बाँटी। उर्दू तथा पंजाबी अनुवाद पाकिस्तान भी पहुँच चुके है।
गुजरात की एक संस्था 'समभाव' के श्री फरहाद कांट्रैक्टर पर इस पुस्तक का गहरा प्रभाव पड़ा। श्री फरहाद राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, अलवर, जोधपुर, महाराष्ट्र तथा गुजरात के कई हिस्सों में पुराने जल स्रोतों को बचाने के एक विराट काम में जुटे हैं। गुजरात की ही श्रीमती डेजी कांट्रेक्टर इस पुस्तक के अंग्रेज़ी अनुवाद कर रही हैं।
सदियों से ऐसी मान्यता है कि मनुष्य जाति का विकास मीठे जल-स्रोतों के मुहानों पर ही हुआ। जीवन के राग-विराग मनुष्य ने वहीं पर सीखे, लेकिन विकास की अंधी होड़ में मनुष्य के चारों ओर अंधेरा बढ़ता जा रहा है। इस अंधेरे की बाती को हम सब तथा हमारी तरह-तरह की नीतियाँ-प्रणालियाँ दिन-ब-दिन बुझाने की कोशिश में लगी हुई हैं।
देश के अधिकतर लेखक तथा प्रकाशक पुस्तकें न पढ़ने वाले पाठकों का रोना रोते हैं। पर वे शायद ये भूल जाते हैं कि पुस्तकों का सच्चा अर्थ समाज के नाम लिखा प्रेम-पत्र होता है। और कितनी पुस्तकें ऐसी होती हैं, जिनमें समाज के लिए प्रेम भरा होता है?
श्री अनुपम मिश्र की इस कृति ने यही काम किया है। 'आज भी खरे हैं तालाब' पुस्तक न केवल धरती का, बल्कि मन-माथे का अकाल भी दूर करती है।
सुरेंद्र बंसल
८ सितंबर २००८

अनुपम मिश्र यानी खरे हैं तालाब की तरह




प्रस्तुति-  स्वामी शरण 
मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Anupam Mishra.png
अनुपम मिश्र (१९४८–१९ दिसम्बर 2016) जाने माने लेखक, संपादक, छायाकार और गांधीवादी पर्यावरणविद् थे। पर्यावरण-संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने और सरकारों का ध्यानाकर्षित करने की दिशा में वह तब से काम कर रहे थे, जब देश में पर्यावरण रक्षा का कोई विभाग नहीं खुला था। आरम्भ में बिना सरकारी मदद के अनुपम मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस तल्लीनता और बारीकी से खोज-खबर ली है, वह कई सरकारों, विभागों और परियोजनाओं के लिए भी संभवतः संभव नहीं हो पाया है। उनकी कोशिश से सूखाग्रस्त अलवर में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ जिसे दुनिया ने देखा और सराहा। सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश काबिले तारीफ रही है। इसी तरह उत्तराखण्ड और राजस्थान के लापोड़िया में परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया है।

अनुक्रम

जन्म

इनका जन्म महाराष्ट्र के वर्धा में श्रीमती सरला मिश्र और प्रसिद्ध हिन्दी कवि भवानी प्रसाद मिश्र के यहाँ सन् १९४८ में हुआ।

शिक्षा

यह दिल्ली विश्वविद्यालय से १९६८ में संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त हैं।

उत्तरदायित्व और सम्मान

गांधी शांति प्रतिष्ठान दिल्ली में उन्होंने पर्यावरण कक्ष की स्थापना की। वह इस प्रतिष्ठान की पत्रिका गाँधी मार्ग के संस्थापक और संपादक भी थे। उन्होंने बाढ़ के पानी के प्रबंधन और तालाबों द्वारा उसके संरक्षण की युक्ति के विकास का महत्त्वपूर्ण काम किया था। वे २००१ में दिल्ली में स्थापित सेंटर फार एनवायरमेंट एंड फूड सिक्योरिटी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। चंडी प्रसाद भट्ट के साथ काम करते हुए उन्होंने उत्तराखंड के चिपको आंदोलन में जंगलों को बचाने के लिये सहयोग किया था। वह जल-संरक्षक राजेन्द्र सिंह की संस्था तरुण भारत संघ के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे। २००९ में उन्होंने टेड (टेक्नोलॉजी एंटरटेनमेंट एंड डिजाइन) द्वारा आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित किया था।
आज भी खरे हैं तालाब[1] के लिए २०११ में उन्हें देश के प्रतिष्ठित जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अनुपम मिश्र ने इस किताब को शुरू से ही कॉपीराइट से मुक्त रखा है।
१९९६ में उन्हें देश के सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
२००७-२००८ में उन्हें मध्य प्रदेश सरकार के चंद्रशेखर आज़ाद राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
इन्हें एक लाख रुपये के कृष्ण बलदेव वैद पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।[2]]

प्रमुख रचनाएँ

  • राजस्थान की रजत बूँदें [2][3]
  • अंग्रेज़ी अनुवाद में : राजस्थान की रजत बूँदें [4]
  • आज भी खरे हैं तालाब [5] उनकी इस पुस्तक आज भी खरे हैं तालाब जो ब्रेल लिपि सहित तेरह भाषाओं में प्रकाशित हुई की एक लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं।
  • ‘साफ माथे का समाज’ [6]

सन्दर्भ


  • [1]

  • बाहरी कड़ियाँ

    • परिचय [7]
    • आत्मकथ्य [8]
    • साक्षात्कार [9]
    • अनुपम मिश्र की श्रवण शुक्ल से खरी-खरी(साक्षात्कार): बहुत कुछ कहता है पर्यावरण दिवस को लेकर मिश्र का गुस्सा...! [10]
    • अनुपम मिश्र का एक आलेख [11]
    • अनुपम मिश्र पर आलेख [12]
    • अनुपम मिश्र के आलेख [13]
    • आलेख [14]
    • संगोष्ठी भाषण [15]