सोमवार, 12 अप्रैल 2021

लोग भूल गये महताब को

 *आज 10 अप्रैल पुराने ज़माने की मशहूर अभिनेत्री मरहूम मेहताब की पुण्यतिथि पर विनम्र अभिवादन करते हुए उनके विषय मे संक्षिप्त विवरण नीचे दिया है*

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*


1)- *नाम-मेहताब (नजमा खान जन्म नाम*

2)- *जन्म-28 अप्रैल 1913 सचिन गुजरात मे*

3)- *निधन-10 अप्रैल 1997 मुंबई महाराष्ट्र में*

4)- *पहले पति- अशरफ़ खान*

5)- *दूसरे पति-सोहराब मोदी*

6)- *पहली फ़िल्म-सेकंड वाईफ 1929*

7)- *आख़री फ़िल्म-समय बड़ा बलवान 1969*

8)- *देश की पहली रँगीन सिनेमा स्कोप फ़िल्म-झाँसी की रानी 1953*

9)- *प्रमुख फिल्में*  .....

१)- *2nd wife 1929*

२)- *जयंत-1929*

३)- *इंदिरा BA-1929*

४)- *कमाल ए शमशीर-1930*

५)- *हमारा हिंदुस्तान-1930*

६)- *हुस्न परी- 1931*

७)- *पृथ्वीराज-1931*

८)- *वीर कुणाल-1932 विरुद्ध अशरफ़ खान हीरो*

९)- *भूला शिकवा-1933 रंजीत मूवीटोन की फ़िल्म ×E बिलिमेरिया हीरो*

१०)- *मोती का हार-1932 by जद्दन बाई*

११)- *जीवन स्वप्न-1932 by जद्दन बाई*

१२)- *कैदी-1940*

१३)- *चित्रलेखा-1941 ×भारत भूषण हीरो पहली*

१४)- *शारदा-1942 ×वास्ति*

१५)- *क़ानून-1943 ×शाहू मोड़क हीरो*

१६)- *सँजोग-1943 ×नूर मोहम्मद चार्ली हीरो*

१७)- *विश्वास-1943 by होमी वाडिया ×सुरेंद्र हीरो*

१८)- *परख-1944 ×सोहराब मोदी हीरो*

१९)- *एक दिन का सुल्तान- 1945*

२०)- *साथी-1946*

२१)- *शमा-1946*

२२)- *झाँसी की रानी-1953 by सोहराब मोदी*

२३)- *समय बड़ा बलवान-1969 by सोहराब मोदी*

10)- *अवार्ड- 8th BFJA award फ़िल्म परख के लिए*

11)- *प्रमुख सदाबहार नग़मे-रफ़ी के गाये हुए*


*फ़िल्म-झाँसी की रानी*

१)-

अमर है झाँसी की रानी,अमर है झाँसी की रानी,जिनका राज और राजधानी, जिसका जीवन और जवानी,आज़ादी की क़सम,भेट थी पहली कुर्बानी- *एकल*

२)-

हमारा प्यारा हिंदुस्तान,हमारा प्यारा हिंदुस्तान,इसी पे देंगे हम जान ये कुर्बान हिंदुस्तान- *एकल*

३)- 

राजगुरु ने झाँसी छोड़ी ले ईश्वर का नाम,जन्म भूमि जब संकट में है,फिर कैसा विश्राम- *एकल*

४)-

आज़ादी की ये आग है लाज़वाब- *एकल*

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*फ़िल्म-समय बड़ा बलवान*

५)-

तेरी तस्वीर से आँखे मेरी क्यों हटती नहीं,सोचता हूँ इसे कहीं ना हो प्यार की हाये,मिटी सी बेशरमियाँ और चैन नहीं- *साथ आशा*

६)-

भूले अफ़साने फिर से याद आये- *एकल*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* -----

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पतंगा की मोहना

 Mohana...!/ मोहना...



पुरानी हिंदी फिल्मों मे दिखाइ  दी कई फिल्म तारिकाओं मे  कम सुना नाम  अभिनेत्री मोहना का भी हे.सन 1949 से 1964   तक मोहना  हिंदी फिल्म  परदे पर दिखाइ दी. लेकिन उनके बारे मे ज्यादा जानकारी नहिं मिल रही..


उस समय की फिल्मों मे मोहना अभिनेत्री बिंदु   जैसे पात्र  अदा करती थी..कइ  फिल्मों मे विलेन या गेंग लीडर की चहिती जैसे की अजीत की मोना डालिऀग बिंदु  जैसे  रोल करते वकत बोस के पास बैठ कर या खडे हो कर सिगारेट      फुंकना.. .! लेकिन  अफसोस..!  उसे ठीक तरह से सिगरेट पकडना भी नहिं  आता था..! याद  किजीये..फिल्म  मरिन ड़ाईव 1955  मे विलेन के.एन. सिंग की side kick..!


फिल्म नगिना 1951 मे नासिर खान की  हिरोईन नुतन थी..लेकिन साईड हिरोईन मोहना भी थी..लेकिन फिल्म मे किसीका ध्यान नहिं  गया उस पर..


उस वकत का सुप्रसिध्ध मेगेजीन Life में  मोहना के बिकीनी  पहन कर बिच पर फोटो सेसन देने के फोटो भी  छपे थे...


मोहना फिल्म    सावन  आया रे..पतंगा. 1949..  नगिना..  अदा... सगाइ.  1951.     आशियाना..  शाकि..1952..शर्त..1954.. इन्सानियत..मरिन ड़ाईव..1955..  सुवण सुंदरी 1957...और फिल्म  जागृति..चार दिन..सलोनी मे भी  सहायक रोल में दिखाई दी थी.


मोहना   आखरी बार शायद  फिल्म खुफिया महल  1964 मे दिखाई दी थी...


फिल्म पतंगा 1949 का वह मधुर गाना  पहले हो गयी नमस्ते नमस्ते फिर प्यार हो गया हसते हसते. ..के लिये मोहना को  याद किया जायेगा...परदे पर यह गाना  याकुब..गोप. निगार और मोहना पर  फिल्माया गया था..!!

स्टार मेकर शानदार केदार शर्मा

 आज 12 अप्रैल को पुराने ज़माने के मशहूर निर्माता,निर्देशक,कहानीकार, पटकथा लेखक,संवाद लेखक, गीत कार स्व.केदार शर्मा जी के जन्मदिन पर सादर नमन करते हुए उनके फिल्मी जीवन पर एक संक्षिप्त विवरण नीचे दिया है...


*स्व.केदार शर्मा-जीवनी*

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*


1)- *जन्म-12अप्रैल 1910, नारोवाल,पँजाब में*

2)- *मृत्यु-29अप्रैल 1999,बम्बई महाराष्ट्र*

3)- *विधा-निर्माता,निर्देशक, कहानीकार,पटकथा लेखक, गीतकार*

4)- *प्रथम १)-फ़िल्म-गौरी 1943*

5)- *अन्य फिल्में* ....

     २)- *मुमताजमहल-1944*

     ३)- *धन्ना भगत-1945*

     ४)- *चाँद चहोरी-1945*

     ५)- *दुनिया एक सराय-1946*

     ६)- *नीलकमल-1947*

     ७)- *सुहागरात-1948*

     ८)- *नेकी और बदी-1948*

     ९)- *बावरे नैन-1950*

    १०)- *जोगन-1950*

    ११)- *गुनाह-1953*

    १२)- *छोरा छोरी-1954*

    १३)- *रँगीन रातें-1956*

   १४)- *हमारी याद आएगी1961*

6)- *कहानीकार के रूप में*

        १)- *चित्रलेखा-1964*

        २)- *काज़ल-1965*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* -----

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*स्व.केदार शर्मा जी की फिल्मों से रफ़ी साहब के गाये चुनिंदा नग़मे*

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*


*फ़िल्म-चित्रलेखा*

१)-

मन रे तू काहे न धीर धरें,ओ निर्मोही, मोह न जाने,काहे का मोह करें- *एकल*

२)-

छा गए बादल नीलगगन में,धूल गया कजरा,साँझ ढले- *साथ आशा*

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*फ़िल्म-काज़ल*

३)-

छू लेने दो नाज़ुक होठो को,कुछ और नहीं बस जाम है ये,क़ुदरत ने जो हमको बक्शा है वो एक हसीं इनाम है ये- *एकल*

४)-

ये ज़ुल्फ़ अगर खुलके,बिखर जाए तो अच्छा- *एकल*

५)-

ज़रा सी और पीला दो भांग ओ जय बम भोला- *साथ आशा*

६)-

क़बीरा निर्भय राम जपे,महफ़िल में तेरी यूँ ही रहे- *साथ आशा*

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*फ़िल्म-बावरे नैन*

७)-

मेरे रूठे हुए बालमा,अजी रूठे हुए चँदा,चलो अब मान भी जाओ,हमारे पास तो आओ- *साथ आशा*

८)-

मोहब्बत के मारों का हाल दुनिया मे ये होता है,ज़माना उनपे हँसता है,नसीबा उनपे रोता है- *साथ आशा*

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*फ़िल्म-छोरा छोरी*

९)-

खाली जेबें हो,कड़की हो,मेरा दिल माँगे वो लड़की हो,हाये रे हाये,जिसके लिए मेरे दिल मे प्रेम की ज्वाला भड़की हो- *एकल*

१०)-

आ बेदर्दी बाला आ,प्रीत का कर हिसाब,कभी तू आँख बचाकर,कभी तू आँख मिलाकर- *साथ लता*

११)-

ये बता दें मुझे जिंदगी की फ़ातिमा, सामने तूने लूटा क्यूँ - *साथ सीता अग्रवाल*

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१२)-

बहुत आसान है चिलमन से लगाकर मुस्कुराना,बहुत मुश्किल है हाये सामने आकर नज़रें मिलाना- *रँगीन रातें* *साथ लता*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* -----

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वर्मा मालिक के गीतों का कमाल / जलवा

 आज 13 अप्रैल को लोकप्रिय गीतकार स्व.वर्मा मलिक जी के जन्मदिन पर सादर नमन करते हुए उनके लिखे गीतों पर रफ़ी साहब के सदाबहार नग़मों से युक्त सूची पेश है...

*रफ़ी-वर्मा मलिक के सदाबहार नग़मे*

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*

१)-

राज की बात कह दूँ तो जाने महफ़िल में फिर क्या हो,इशारो को अगर समझो,राज को राज रहने दो- *धर्मा* *साथ आशा*

२)-

तीन बत्ती वाला,गोविंदा आला,गोविंदा, गोविंदा,गोविंदा,हो गोविंदा आला,तीन बत्ती वाला- *मुक़ाबला* *साथ किशोर*

३)-

अमीर से होती है,नसीब से होती है,आज मेरे यार की शादी है,लगता है जैसे सारे सँसार की शादी है- *आदमी सड़क का* *साथ देवेन वर्मा व रवि*

४)-

कुछ भी कहेगा,चँदा मामा से प्याला मेरा मामा- *कर्तव्य* *साथ उषा मंगेशकर*

५)-

कोई फूल ना खिलता, कहीं कली भी ना होती,जिंदगी भी ना होती,अगर तू नहीं होती- *पैसे की गुड़िया* *एकल*

६)-

इक सपना मैंने देखा है,इक सपना मैंने देखा है- *शराफ़त छोड़ दी मैंने* *साथ आशा*

७)-

ना सतरा से ऊपर ना सोला से कम- *धर्मा* *एकल*

८)-

मेरे प्यार की आवाज़ में चली आना- *राजमहल* *साथ लता*

९)-

अल्लाह का नाम पाक है,मौला का नाम पाक है- *मान गए उस्ताद* *एकल*

१०)-

अरे मान गए उस्ताद तुमको मान गए उस्ताद- *मान गए उस्ताद* *साथ दिलराज कौर व चन्द्राणी मुख़र्जी*

११)-

गजरे की कसम,कजरे की कसम- *राम क़सम* *साथ लता*

१२)-

मुझसे मिलने की जुर्रत न करना कभी- *मान गए उस्ताद* *साथ मन्नाडे*

१३)-

हम दो शरीफ़,लाये तशरीफ़- *खून की टक्कर* *साथ अमित कुमार*

१४)-

अरे आज लूटा दो जान- *क़सम खून की* *साथ सुलक्षणा पँडित*

१५)-

कुछ ऐसे लोग भी होते है- *वरदान* *एकल*

१६)-

दुनिया ने मुझको है समझा नाकारा, आवारा नालायक़ कहके पुकारा- *नालायक़* *एकल*

१७)-

सुनो सुनो मैं इक़ बात कहूँ- *मेमसाब* *साथ लता*

१८)-

तक़दीर की कलम से,कोई भी न बच पायेगा,पेशानी पर जो लिखा है,वही सामने आएगा- *बेरहम* *एकल*

१९)-

मैं तो चूड़ियों की धार पे करती हूँ  प्यार,मेरी नज़रें है तीर- *एक से बढ़कर एक* *साथ आशा*

२०)-

बस्ती बस्ती,नगरी नगरी कह दो,गाँव गाँव में- *आदमी सड़क का* *साथ आशा*

२१)-

जिंदगी,जिंदादिली का नाम है- *जिंदादिल* *एकल*

२२)-

पकड़ो पकड़ो रे जवानी मेरे हाथ से निकली जाए- *रूप तेरा मस्ताना* *एकल*

२३)-

मेरा रूप,मेरा रँग,मेरा चलने का ढँग- *वो मैं नहीं* *साथ आशा*

२४)-

हाकिम ताराचंद,जो रुपये माँगे पाँच- *अपना खून* *साथ आशा*

२५)-

कुछ ऐसे आशिक़ मैं सामने लाने वाली हूँ- *हीरों का चोर* *साथ आशा*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* -----

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भाग-2

*रफ़ी-वर्मा मलिक के सदाबहार नग़मे*

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*

२६)-

कान में झुमका,चाल में ठुमका,लगे पचासी झटके- *सावन भादो* *एकल*

२७)-

सुन सुन सुन ओ गुलाबी कली,तेरी मेरी बात अब आगे चली,दिल लेके मेरा दूर यूँ ना जाइये- *सावन भादो* *साथ आशा*

२८)-

बूरा न मानो यार दोस्ती में- *आदमी सड़क का* *साथ अनुराधा पौड़वाल व देवेन वर्मा*

२९)-

के मैं हूँ,आदमी सड़क का- *आदमी सड़क का* *एकल*

३०)-

मैं तेरी गुनहगार हूँ,मैं तुझसे शर्मसार हूँ- *धर्मा* *साथ आशा*

३१)-

नाम मेरा बन्नो जट्टी- *सज़ा* *साथ मन्नाडे,आशा व मीनू पुरुषोत्तम*

३२)-

ओ रूप की रानी,देख फूल ये कली- *सज़ा* *साथ आशा*

३३)-

ओ मैं हूँ शाही लकड़हारा- *जलवा* *साथ आशा*

३४)-

ये सुर्खिया,ये लालियाँ,ये जुल्फे भी हसीं,अरे हम ना चाहेंगे तो किसी काम की नहीं- *गुरु और चेला* *साथ आशा व ग़ुलाम मोहर*

३५)-

बीच वाले सैय्यां से लड़ गयी नज़रिया- *सज़ा* *साथ आशा*

३६)-

हम दिल के सच्चे,बात के पक्के- *चक्कर पे चक्कर* *साथ किशोर*

३७)-

दिल वालो से प्यार कर लो- *जोरो* *साथ आशा*

३८)-

बीमा,लाईफ बीमा पॉलिसी बाबू,इन्शुरन्स करा लो- *काला आदमी* *एकल*

३९)-

हमी तो तेरे दीवाने है- *काला आदमी* *एकल*

४०)-

मेरा तो दिल दिल दिल दिल,घबराए रे- *काला आदमी* *साथ लता*

४१)-

पहली पहली बार मुझको ये क्या हो गया- *यारों का यार* *साथ आशा*

४२)-

कुछ और भी तुझसे कहना है- *अपना खून* *साथ आशा*

४३)-

मेरे बुढापे को तू कैश कर लो- *अपना खून* *साथ आशा*

४४)-

खींच काँटा,खींच काँटा,उई,साथी बन के- *दो आँखे* *साथ मीनू पुरुषोत्तम*

४५)-

लड़की उन्नीस सौ सत्तर की- *दो आँखे* *एकल*

४६)-

हम बचपन के दोनों यार,ये है जिंदगी, मैं हूँ प्यार,ये दिलबर और मैं दिलदार- *अपना खून* *साथ मन्नाडे*

४७)-

सुन सजना,कुछ और भी तुमसे कहना है- *अपना खून* *साथ आशा*

४८)-

कमल के फूल जैसा,बदन तेरा चिकना चिकना चिकना- *दो आँखे* *एकल*

४९)-

ग़रीबों को तुम साथ अपने मिलाओ- *शंकर दादा* *एकल*

५०)-

एक मैं एक तू- *शंकर दादा* *साथ आशा*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* -----

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भाग-3

*रफ़ी-वर्मा मलिक के सदाबहार नग़मे*

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*

५१)-

अग बाई मैके तू जाऊँ नको- *शाका* *एकल*

५२)-

बोलो बोलो भोलेनाथ की- *भूख* *साथ आशा व सोनिक*

५३)-

ये होके रहेगा,ये होना लिखा है- *चंगेज खान* *एकल*

५४)-

ये जवानी है मेरी जान,धूम मचाने के लिए- *हीरों का चोर* *साथ आशा*

५५)-

रुक रुक मेरी रानी- *चालू मेरा नाम* *साथ आशा*

५६)-

मोहब्बत हुई मेरी,दैय्या नैनो में निंदियाँ- *शाका* *साथ उषा मंगेशकर*

५७)-

तेरा वो रस्ता,मेरा ये रस्ता- *शाका* *साथ आशा*

५८)-

शाम सुहानी हो,नहीं वो पानी हो- *काला चोर* *एकल*

५९)-

तेरी मेरी मोहब्बत भी एक अमर कहानी- *खून की टक्कर* *साथ आशा*

६०)-

तू बिन बजा सजना,मैं नाचूँ नागीन बनके- *खून की टक्कर* *साथ आशा*

६१)-

चुप चुप अपनी जान पे सह जा,सीता के लिए,यही लिखा है- *जियो और जीने दो* *एकल*

६२)-

एक छत्री और हम दो- *मान गए उस्ताद* *साथ आशा*

६३)-

शराबी कहता है मुझको ज़माना,बड़ा पगला दीवाना- *दो झूठ* *साथ लता व नितिन मुकेश*

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*फ़िल्म-प्रेमी गंगाराम*

६४)-

मेरा तुझे भी सलाम- *एकल*

६५)-

बनवारी,सुन ले,अरज हमारी- *एकल*

६६)-

बुड्ढा पीछे पड़ गया- *साथ सुमित्रा लहरी*

६७)-

गंगाराम से न अँखिया मिलाना- *साथ रानी गिरोला*

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६८)-

तुमसे नहीं पहचान मेरी लेकिन ऐसा लगता है,पहले भी किसी युग मे,साथ रहा हो जैसे- *एक ही रास्ता* *एकल*

६९)-

बलमा अनाड़ी,रँग डारे होली का- *भूख* *साथ आशा*

७०)-

काम करो हाँ काम करो- *भूख* *साथ आशा,उषा खन्ना व सोनिक*

७१)-

भगतो की लाज बचाई- *लाखन* *एकल*

७२)-

हुस्न तेरा इक छलकता जाम है- *दीदार* *साथ मनहर*

७३)-

तो लूट लाये,ओये दीये- *दो यार* *साथ मन्नाडे व आशा*

७४)-

वो एक तरफ़ तन्हा,उधर सारा ज़माना,नाज़ुक सी निग़ाहों में है,नाज़ुक सा फ़साना- *लहुँ पुकारेगा* *एकल*

७५)-

उस मालिक की प्यासे,अब बरसात हुई- *भूख* *साथ आशा*

७६)-

ऐ सुन जानिया,ओये दिल जानिया- *रफ़्तार* *साथ आशा*

७७)-

तेरे खेतों की रखवाली,अब मैं नईयो जाना- *दीदार* *साथ सुमन कल्याणपुर*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* -----

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शेट्टी जिनकी आँखे बोलती हैं

 फ़िल्मी दुनिया का ऐसा चेहरा जिसकी सिर्फ ख़ामोशी पर्दे पर दहशत पैदा कर देती थी।


वो थे 'मुद्दु बाबू शेट्टी' उर्फ 'मुधू बलवंत शेट्टी' उर्फ 'एम बी शेट्टी'। जिन्हें हम सब 'शेट्टी' के नाम से जानते हैं। इनका जन्म १९३८ में मैंगलोर में हुआ था। इनकी पहली पत्नी का नाम विनोदिनी और दूसरी का नाम रत्ना था।


इनकी पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं थी। जिस कारण इनके पिता ने इनको मुंबई भेज दिया, कि वहाँ कोई काम सीख कर रोजी रोटी कमा लेंगे। यहाँ आ कर कुछ समय इन्होंने वेटर का काम किया। इसके बाद इनकी दिलचस्पी बॉक्सिंग में हुई। जिसमें क़रीब ८ सालों तक जुड़े रहे और कई टूर्नामेंट जीते।


फिल्मों में इनकी शुरुआत फ़िल्म 'हीर' से हुई , जिसमे ये फाइट इंस्ट्रक्टर थे। वो वक्त जब फिल्मों में स्टंट पर काफी जोर दिया जाता था, लेकिन जितने जरूरी स्टंट होते थे उतने जरूरी ही विलेन भी..यानि अगर बिना विलेन के फिल्म और हीरो की कहानी अधूरी ही मानी जाती थी। उसी दौर में एक ऐसा एक्टर हुआ जिसने विलेन के किरदार निभाकर ऐसा कॉम्टीशन पैदा किया कि विलेन का रोल प्ले करने वाले बाकी एक्टर भी डर गए।


एम बी शेट्टी ७० के दशक में पॉपुलर विलेन रहे और आगे चलकर बॉलीवुड के मशहूर स्टंटमैन बने। एम बी शेट्टी ने अपने करियर की शुरुआत फाइट इंस्ट्रक्टर के तौर पर की। इसके बाद वो एक्शन डायरेक्टर बने और फिर एक्टर। एम बी शेट्टी ने १९५७ में एक्टिंग में अपने कदम रखे। उन्होंने 'द ग्रेट गैंबलर', 'त्रिशूल' 'डॉन', 'कसमें वादे' जैसी दर्जनों फिल्मों में अपनी एक्टिंग का जौहर दिखाया।


एक्टिंग के अलावा एम बी शेट्टी ने कई फिल्मों में स्टंट कॉर्डिनेटर, फाइट कंपोजर, स्टंट कपोजर और स्टंट मास्टर के तौर पर काम किया। इन फिल्मों में 'जब प्यार किसी से होता है , 'कश्मीर की कली', 'सीता और गीता', 'डॉन' और 'द ग्रेट गैंबलर' जैसी फिल्में शामिल हैं।


एम बी शेट्टी जैसा एक्टर और स्टंट मास्टर ना तो कभी हुआ और ना ही कभी होगा, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने जी-तोड़ मेहनत की। एम बी शेट्टी को एक्शन और स्टंट से इस कदर लगाव था कि वो अपने घर में चारों तरफ दुनिया के मशहूर विलेन की फोटो लगाए रहते, लेकिन एक हादसा ऐसा हुआ जिसने एम बी शेट्टी को सभी से दूर कर दिया। कहा जाता है कि अपने ही घर में फिसलकर गिर गए जिससे उन्हें काफी चोट लगी। एक तो पहले से ही स्टंट करने के दौरान उन्हें टांगों में काफी चोट लग चुकी थी। साथ ही वो शराब भी खूब पीते थे और इस सबका उन पर बुरा असर हुआ कि जब वो घर में फिसलकर गिरे तो उबर नहीं पाए और (२३ जनवरी १९८२) को इस दुनिया से विदा हो गए।


उनके बाद उनके घर के हालात काफी ख़राब हो गए। ऐसे में उनकी वाइफ रत्ना शेट्टी को आगे आना पड़ा और उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय किया। 'अंत', 'यार-गद्दार' (१९९४) 'दरार'(१९९६), 'अफ़साना दिलवालों का'(२००१)


यहाँ आपको बताते चलें घर के हालात को देखते हुए एम बी शेट्टी और रत्ना शेट्टी के बेटे 'रोहित शेट्टी' ने १५ वर्ष की उम्र से फिल्मों में संघर्ष शुरू कर दिया। आज उनकी गिनती फ़िल्म जगत के सफलतम व मंहगे निर्देशकों में होती है।


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70 का दशक...वो वक्त जब फिल्मों में स्टंट पर काफी जोर दिया जाता था, लेकिन जितने जरूरी स्टंट होते थे उतने जरूरी ही विलेन भी..यानि अगर बिना विलेन के फिल्म और हीरो की कहानी अधूरी ही मानी जाती थी। उसी दौर में एक ऐसा एक्टर हुआ जिसने विलेन के किरदार निभाकर ऐसा कॉम्टीशन पैदा किया कि विलेन का रोल प्ले करने वाले बाकी एक्टर भी डर गए।

ये एक्टर थे एम बी शेट्टी जो 70 के दशक में पॉपुलर विलेन रहे और आगे चलकर बॉलीवुड के मशहूर स्टंटमैन बने। बता दें कि एम बी शेट्टी मशहूर डायरेक्टर रोहित शेट्टी के पिता हैं। एम बी शेट्टी ने अपने करियर की शुरुआत फाइट इंस्ट्रक्टर के तौर पर की। इसके बाद वो एक्शन डायरेक्टर बने और फिर एक्टर।

रविवार, 11 अप्रैल 2021

सावधान रहे जनाब

 *छींकना तो दूर, खाँसते समय भी सावधानी बरते.*


सरकारी हॉस्पिटल में...

 एक व्यक्ति खांसता हुआ अंदर आया. 


सारा का सारा स्टाफ एकदम से ...

सतर्क हो गया. 


सभी ने दौड़ कर ...

उस व्यक्ति को पकड़ा 

और 

एक व्यक्ति ने उसके मुंह पर कसकर मास्क बांध दिया. 


डॉक्टर फटाफट उसका टेस्ट करने में लग गए. 


उस व्यक्ति ने छटपटा कर लाख उनकी पकड़ से निकलने की कोशिश की. परन्तु 

उसकी कोशिश नाकाम रही. 


उसने कुछ बताना चाहा पर किसी ने बोलने भी नही दिया. 


जैसे तैसे उसका सैम्पल कलेक्ट हुआ 

और ...

जांच के लिए भेज दिया गया. 


उसकी...

 टेस्ट रिपोर्ट आई 

तो ...

स्टॉफ ने राहत की सांस ली और ...

उसे बताया गया ...

कि ...

चिंता करने की कोई बात नहीं है. 

उसे *कोरोना* नहीं है.


डॉक्टर ने उससे बिगड़ते हुए पूछा कि ... 

तुम *खांसते* हुए अंदर क्यों आये थे.                            


पहले से ही बौखलाया आदमी गुस्से में 

डॉक्टर और स्टाफ से कड़क होकर बोला..... 


"हरामखोरों,...


 मेरे छोटे भाई की बीवी यहाँ नर्स है.

 हड़बड़ी में ...

वो आज घर से टिफिन नही लाई .

 मैं उसे देने आया था. 

और...

 मैं जब भी ...

छोटे भाई के घर जाता हूं 

तो ...

*खांस* देता हूं. 

ताकि ...

बहू समझ जाये ...

कि ...

जेठ जी आये हैं 

और ...

वह *सिर पर पल्लू* रख ले." 


😂😂😂😂😂😂😂


इसलिए ...

सभी जेठजी से निवेदन है कि कृपया इस कोरोना काल में... 

*खांसने की परंपरा* को स्थगित कर दें. 


😂😂😂😂😂😁😁😉

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

कोरोना का खतरनाक खेल चालू

 *अगले 20 घ॔टे भारत के लिए भारी


*WHO ICMR  की भारत को चेतावनी




WHO ICMR ने कहा है कि यदि 20 घ॔टे में भारतीय नहीं सुधरे तो भारत कल रात 11 बजे के बात 'THIRD STEP"  यानी " कम्युनिटी ट्रान्शमिशन"में प्रवेश कर जायेगा। 

और अगर भारत कल रात तक थर्ड स्टेज यानी कम्यूनिटी ट्रांशमिशन में जाता है तो भारत मे 15 APRIL  तक लगभग 50000(पचास हजार) तक मौतें हो सकती हैं,क्यूँकि अन्य देशों की अपेक्षा भारत का जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है परन्तु भारतीय अभी तक इसकी गम्भीरता को नहीं समझ रहे हैं।

ईश्वर से दुआ करो की कल तक भारत सेकेंड स्टेज में ही रहे।

 सभी नागरिकों से निवेदन प्लीज मस्ती मजाक  सलाह कोरेना से सम्बंधित खबर छोड़ आज रात तक जितना हो ये फैलाओ की कुछ भी हो जाये *72 से 108 घण्टा बिल्कुल भी न निकले* क्योकि कल भारत 3 स्टेज में शायद जा सकता है प्लीज सभी को अंदर रहने के लिये प्रेरीत करो 🙏🙏



*अगर उचित समझें तो इसे इतना शेयर करो कि पूरे भारत में फैला दो*

☝️सभी से निवेदन है की पहले से ज्यादा सतर्कता रखें*

*🍁शहरों मे हॉस्पिटल में जगह नहीं है, सारी पहचान पैसा कुछ भी काम नहीं आ रहा है! सिर्फ और सिर्फ अपने आप को बचाना ही एक मात्र उपाय है।*

*❣️सभी परिवार के सदस्य कृपया ध्यान दें:*

*01  कोई भी खाली पेट न रहे*

*02  उपवास न करें*

*03  रोज एक घंटा धूप लें*

*04  AC का प्रयोग न करें*

*05  गरम पानी पिएं, गले को गीला रखें*

*06  सरसों का तेल नाक में लगाएं*

*07  घर में कपूर वह गूगल जलाएं*

*08  आधा चम्मच सोंठ हर सब्जी में डालें*

*09  दालचीनी का प्रयोग करें*

*10  रात को एक कप दुध में हल्दी डालकर पिये*

*11  हो सके तो एक चम्मच चवनप्राश खाएं*

*12  घर में कपूर और लौंग डाल कर धूनी दें*

*13  सुबह की चाय में एक लौंग डाल कर पिएं*

*14  फल में सिर्फ संतरा ज्यादा से ज्यादा खाएं*

*15. आंवला किसी भी रुप में चाहे अचार, मुरब्बा,चूर्ण इत्यादि खाएं।*

*यदि आप Corona  को हराना चाहते हो तो कृपा करके ये सब अपनाइए।*

*दूध में हल्दी आपके शरीर में इम्यूनिटी को बढ़ाएगा।*

*🙏🏼 सभी से मेरी अपील है इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें*🙏🌷🙏

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

शक्ति सामंत का jlwa

 शक्ति सामंत का जन्म बंगाल के बर्धमान जिले में १३ जनवरी १९२६ को हुआ था। जब शक्ति दो साल के थे, उनके पिता एक दुर्घटना में नहीं रहे जिस कारण उन्हें अपने चाचा के पास यूपी के बदायूं आना पड़ा। अपने चाचा के कहने पर वो उनके काम में हाथ बंटाने लगे थे। इस बीच शक्ति को ऐक्टिंग का चस्का लग चुका था, जिसके चलते वो काम के साथ साथ थिएटर और ड्रामा भी करने लगे।


ये उनके चाचा को पसंद नहीं था। इसलिए चाचा का घर छोड़कर अपना शौक पूरा करने मुंबई आ गए। मुंबई में बिना किसी सहारे के जगह न मिल पाने की वजह से मुंबई से २०० किलोमीटर पहले दापोली में एक अंग्रेजी हाई स्कूल में नौकरी ली। यहां से मुंबई स्टीमर से बस दो-तीन घंटे की दूरी पर थी। तो वो आसानी से मुंबई आ-जा सकते थे।


फिल्मों में काम करने की चाह में शक्ति हर शुक्रवार को मुंबई चले जाते थे और अगले दो दिन वहीं काम की तलाश करते थे। पर मुंबई में काम मिलना इतना आसान नहीं था। उस टाइम बॉम्बे टॉकीज एक बड़ा स्टूडियो था, शक्ति भी वहीं जाकर अपनी उम्मीद तलाशते थे।


उस समय के जाने-माने एक्टर अशोक कुमार उर्फ दादामुनि बॉम्बे टॉकीज के साथ जुड़े हुए थे। शक्ति ने दादामुनि के पास जाकर काम मांगा, दादामुनि ने एक असिस्टेंट डायरेक्टर बनाकर शक्ति को काम पर तो रख लिया लेकिन बिना पैसे के, उन्हें सिर्फ खाना-पीना मिलता था, पैसे नहीं मिलते थे। एक ब्रेक पाने की कोशिश में लगे शक्ति के लिए यह बड़ा मौका था, वो बिना पैसे के भी काम करने लगे। बंगाली और हिंदी दोनों भाषा जानने के कारण वो डायरेक्टर फणी मजूमदार के लिए बांग्ला से हिंदी में ट्रांसलेशन का काम भी करते थे, इस काम के उन्हें पैसे भी मिलने लगे।


एक दिन शक्ति ने दादामुनि को अपने ऐक्टर बनने के सपने के बारे में बताया लेकिन दादामुनि ने उनके टैलेंट को देखते हुए डायरेक्शन की फील्ड में ही काम करते रहने की सलाह दी। अपनी ऐक्टिंग की हसरत को पूरी करने के लिए वो मूवीज में छोटे-मोटे रोल कर लेते थे. अमूमन सारी पिक्चरों में उन्हें एक पुलिसवाले का किरदार मिलता था जिसका काम बस ‘फॉलो हिम’ बोलना होता था। लेकिन इस बीच काम करते-करते उनकी बहुत-सी बड़ी हस्तियों से जान-पहचान हो गई थी। इनमें गुरुदत्त और ब्रजेन्द्र गौड़ भी थे, गौड़ को उन दिनों एक फिल्म डायरेक्ट करने का ऑफर हुआ जिसका नाम था ‘कस्तूरी’. पर गौड़ साहब उस टाइम एक दूसरी पिक्चर पर काम कर रहे थे. जिसके चलते उन्हें काम करने में दिक्कत महसूस हुई. उन्होंने इस काम में शक्ति की मदद मांगी, शक्ति तो इस मौके के लिए तैयार थे। उन्होंने २५० रुपये की तनख्वाह में काम करना तय किया। ये शक्ति की फिल्मों से पहली बड़ी कमाई थी।


इस शुरुआत के बाद म्यूजीशियन और प्रॉड्यूसर एस एच बिहारी और लेखक दरोगाजी एक फिल्म बनाने जा रहे थे जिसका नाम था ‘इंस्पेक्टर’ (१९५६)। वो इस कहानी पर नाडियाड़वाला के साथ मिलकर काम कर रहे थे, उन्हें लगा कि इस स्टोरी को हिट बनाने के लिए किसी बड़े डायरेक्टर को लेना पड़ेगा पर इससे बजट बिगड़ जाएगा, ऐसे में उन्होंने पैसे बचाने के लिए किसी बड़े डायरेक्टर की जगह एक नये डायरेक्टर को काम दिया जिसका नाम था शक्ति सामंत मूवी में दादामुनि और गीता बाली ने काम किया और ‘इंस्पेक्टर’ सुपरहिट हुई , लेकिन मजे की बात तो यह थी कि ‘इंस्पेक्टर’ का काम पहले शुरू करने के बावजूद उनकी एक दूसरी मूवी ‘बहू’ (१९५४) पहले रिलीज हो गई थी।


इसके बाद उन्होंने एक फ़िल्म बनाने की सोची नाम रखा "हावड़ा ब्रिज" (१९५७) तय किया कि इस पिक्टर में अशोक कुमार और मधुबाला को लेंगे। पर उस वक्त इतने पैसे नहीं थे कि दोनों सुपरस्टार्स को ले सकें। उन्होंने अशोक कुमार से इस बारे में बात की। स्टोरी को देखकर अशोक कुमार खुद तो तैयार हो ही गये साथ ही मधुबाला से बात करने के लिये राजी हो गए और उन्हें सिर्फ एक रुपये टोकन मनी पर काम करने के लिए राजी कर लिया। साथ ही संगीतकार ओपी नैयर को १००० रुपये देकर साइन किया। ये फिल्म पर्दे पर सुपरहिट साबित हुई। और शक्ति सामंत की पहचान एक प्रॉड्यूसर के रूप में भी बन गई।


शक्ति दा की प्रमुख फ़िल्में रहीं हिल स्टेशन , डिटेक्टिव , जाली नोट , सिंगापुर , नॉटी बॉय, चाइना टाउन, कश्मीर की काली, सावन की घटा, ऐन इवनिंग इन पेरिस, आराधना, कटी पतंग, पागल कहीं का, जाने-अनजाने,अमर प्रेम, अनुराग, चरित्रहीन, अजनबी, अमानुष, महबूबा, अनुरोध, आनंद आश्रम, इत्यादि


शक्ति दा ने कुछ फिल्में प्रॉड्यूस भी की, और अपना शक्ति प्रॉडक्शन बनाया। शक्ति दा की एक बड़ी बात हिट फिल्मों के साथ हिट गानों की भी थी। उनकी फिल्मों के कई गाने एवरग्रीन गाने बन गए. इन गानों की लिस्ट बहुत लंबी है पर इनमें से कुछ खास नगमे ‘रूप तेरा मस्ताना’, ‘तारीफ करूं क्या उसकी’, ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू’, ‘कोरा कागज था ये मन मेरा’, ‘बार-बार देखो’, ‘चंदा है तू’, ‘एक अजनबी हसीना से’ और ‘ये शाम मस्तानी’ और ' कश्मीर की काली के गाने प्रमुख हैं।


आराधना के अलावा उन्हें अनुराग और अमानुष फिल्मों के लिए बेस्ट डायरेक्टर का फिल्मफेयर मिला। डायरेक्टर के रूप में उनकी आखिरी फिल्म गीतांजलि १९९३ में आई थी और प्रॉड्यूसर के रूप में डॉन मुथुस्वामी २००८ में आई थी।


शक्ति दा लाइमलाइट से दूर रहने वाले लोगों में से थे। उनकी पत्नी और दो बेटे हमेशा चकाचौंध से दूर रहे। उनके एक पोते आदित्य सामंत ने ‘ये जो मोहब्बत है’ नाम की पिक्चर में काम किया। मजे की बात ये है कि इस पिक्चर का टाइटल भी शक्ति दा की फिल्म ‘कटी पतंग’ के एक गाने से लिया था।


फिल्मफेयर उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड देने वाला था लेकिन उससे कुछ दिन पहले उन्हें लकवा पड़ गया। इसके बाद वो ठीक नहीं हो पाए. और दिल की धड़कन रुकने से ८३ साल की उम्र में २००९ को शक्ति दा का निधन हो गया। अपने आखिरी समय में शक्ति दा गुमनामी में जिए। कोई भी बड़ी हस्ती उनके अंतिम संस्कार में नहीं आई और शक्ति दा बड़ी बेरुखी से हमसे रुखसत हो गए।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

सिम्मी गरेवाल

 सिम्मी गरेवाल

Simi Garewal, a sophisticated artist of the past film industry, she had her education in England, but returned to India, some historic appearances in various films of the 50s & 60s were seen done by her, last know appearance was in all probability film "Karz" in 1980 as a character artist, slowly she faded from the industry only to reappear in TV industry with the talk shows

गायिका, अभिनेत्री,निर्देशिका,नृतिका मरहूम जद्दनबाई

 आज 8 अप्रैल पुराने ज़माने की मशहूर महिला संगीतकार, गायिका, अभिनेत्री,निर्देशिका,नृतिका मरहूम जद्दनबाई की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए उनके विषय मे संक्षिप्त जानकारी नीचे दी है,...

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*


1)- *नाम-जद्दन बाई --1892*

2)- *पिता-मियाँ जान*

3)- *माँ-दलिपा बाई (ब्राह्मण जो मुस्लिम बनी)*

4)- *अलाहाबाद के पास गाँव चीलबुला,तहसील मेजा के रहनेवाले,माँ दलिपा बाई अलाहाबाद की मशहूर तवायफ़ थी,बनारसी खानदान की*

5)- *पहले पति-नरोत्तमदास खत्री,गुजराती व्यापारी (बच्चु भाई नाम से जाने जाते),ये हिंदू से मुस्लिम धर्म अपनाकर जद्दन बाई से विवाह किए* 

6)- *पहले पति से पुत्र-अख़्तर हुसैन*

7)- *दूसरे पति-इरशाद मीर (प्रसिद्ध हार्मोनियम वादक से*

8)- *दूसरे पति से पुत्र-अनवर हुसैन*

9)- *तीसरे पति-मोहनचंद उत्तम चंद त्यागी,पंजाबी मोहयाल ब्राह्मण ने हिंदू से मुस्लिम बनकर अब्दुल रशीद नाम से विवाह किया*

10)- *तीसरे पति से पुत्री- *नरगिस*

11)- *नरगिस से पंजाबी खत्री सुनील दत्त से हिंदू बनकर शादी की*

12)- *जद्दनबाई बाई के परिवार से ही नरगिस के बाद,संजय दत्त,प्रिया दत्त,नम्रता दत्त,इस प्रकार वंश आगे बढ़ा*

13)- *जद्दन बाई को पुराने ज़माने की प्रसिद्ध महिला संगीतकार (सरस्वती देवी के बाद) के रूप में साथ साथ श्रेष्ठ मुजरा गायिका, प्रसिद्द अभिनेत्री व निर्देशिका के रूप में ख्याति मिली*

14)- *प्रमुख फिल्मो की सूची नीचे दी है*


१)- *तलाश-ए-हक़ 1935*

२)- *मैडम फ़ैशन 1936*

३)- *मोती का हार 1937*

४)- *हृदय मंथन 1936*

५)- *सेवा सदन  1934*

६)- *इंसान या शैतान 1933*

७)- *जीवन स्वप्न 1937*

८)- *नाचवाली 1937*

९)- *राजा गोपीचंद 1937*

१०)- *प्रेम परीक्षा 1934*


*जद्दन बाई के चुनिंदा भूले बिसरे नग़मे*

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*

*फ़िल्म-तलाश ए हक़ 1935*

१)-

चारागर आये न मेरे दिल-ए-बीमार के पास

२)-

दिल मे जा के किसका ठिकाना हुआ

३)-

घोर घोर घोर घोर बरसात मिहरवा

४)-

इलाज़ की नहीं आदत दिल को ज़िगर के लिए

५)-

जब तू मैं जानू

६)-

झूलों झूलों मोरी प्यारी दुलारी

७)-

जुस्तुजू-ए-यार है रहबर कोई

८)-

काया का पिंजरा डोले रे

९)-

क्या बताए दिल-ए-बेताब में क्या रखा है

१०)-

प्यारे अब्बा,अब तुम्हे पाउँ कहाँ

११)-

रसूल-ए-ख़ुदा,ओ कमलीवाले

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*फ़िल्म-मोती का हार*

१२)-

ऐसा बाग़ लगाया फूलों में

१३)-

छूट्टी मिल गयी यार,सैर सपाटा खूब करेंगे

१४)-

सुंदर साड़ी मोरी,माईके मेल भाई का

१५)-

चोट मारे ले घुँघरवा को ओट जानिया

१६)-

एक रोज़ सुबह गोरे,गरीबी जो आया

१७)-

मन के बंसी मन मे आओ,मेरे हृदय की बीना पर

१८)-

नजऱ में मेरी कोई ना समाए,आईना शरमाये

-----//-----

१९)-

आईना रख दो- *सेवासदन 1934*

२०)-

यही आरजू तेरे दिल की रही- *मेडम फैशन 1936*

२१)-

रँगे-महफ़िल न रहा- *प्रेम परीक्षा 1934*

२२)-

खून-ए-दिल का कहीं निशां नहीं- *हृदय मंथन 1936*

२३)-

प्रेम की डोर में बंध गयी- *हृदय मंथन*

२४)- 

लग गयी करेजवा में चोट- *गैर फिल्मी ग़ज़ल*

२५)-

बहार आयी वाह सखी,गुलशन में फिर देखी रुत प्यारी- *प्रेम परीक्षा 1934*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* ------

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*संकलकर्ता-संतोष कुमार मस्के*

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

मेहबूब का जलवा

 महबूब निर्माता-निर्देशक होने के साथ ही बेहतरीन लेखक भी थे उनकी फिल्मे बड़े कलाकारों से पहले खुद के उनके नाम से जानी जाती थी वह ऐसे फिल्मकार रहे जो भारत-पाक विभाजन पर भी पाकिस्तान नही गये भारत में रहकर ही उन्होंने दर्जनों फिल्मो का निर्माण किया ....

.फिल्मो में तो नायक-नायिका का प्यार हमेशा दिखाया जाता है लेकिन कुछ ऐसे फ़िल्मकार भी रहे है जो पर्दे पर नायिका का प्यार दिखाते दिखाते अंत में पर्दे के पीछे ही नायिका के प्यार में पागल हो बैठे महबूब खान उन्ही में से एक थे  ......महबूब खान का जन्म गुजरात के सुरत शहर के निकट के छोटे से गाँव में 9 सितम्बर 1906 को एक गरीब परिवार में हुआ था जब वह 1925 के आसपास बम्बई नगरी में आये तो इम्पीरियल कम्पनी वाल ने उन्हें अपने यहा हेल्पर के रूप में रखा लिया  कई वर्ष बाद उन्हें फिल्म “बुलबुले बगदाद” में खलनायक का किरदार निभाना पड़ा महबूब खान के नाम के साथ कई प्रेम कहानिया भी जुडी वह जिस अभिनेत्री को भी अपनी फिल्म में मौका देते उससे प्यार कर बैठते उनके निर्देशन में पहली फिल्म “अलहिलाल” 1935 में बनी जो सागर मुवीटोन वालो की फिल्म थी उसमे अभिनेत्री के साथ काम करते करते वह उनके प्यार में उलझ गये निम्मी की माँ वहीदन बाई भी महबूब से बहुत प्यार करती थी......1940 में महबूब खान सागर कम्पनी छोडकर नेशनल स्टूडियो में आ गये यहा आकर उन्होंने सर्वप्रथम फिल्म “औरत” का निर्देशन किया जिसकी नायिका सरदार अख्तर पर भी महबूब आशिक हो गये और उनका प्यार 24 मई 1942 को शादी में बदल गया उनकी कोई सन्तान नही हुयी तो उन्होंने साजिद खान ( मदर इंडिया का छोटा बिरजू ) को गोद लिया जिन्होंने भारतीय और अंग्रेजी फिल्मों में अभिनय किया है महबूब खान ने दो बार शादी की। पहली पत्नी फातिमा के साथ,उनके तीन बेटे थे अयूब, इकबाल और शौकत अपनी पहली पत्नी से अलग होने के बाद, उन्होंने 1942 में अभिनेत्री सरदार अख्तर (1915-1986) से शादी की


इसके पश्चात उनके निर्देशन में नेशनल फिल्म वालो की फिल्म “बहन” और “रोटी” आयी  1942 में उन्होंने अपनी निर्माण संस्था'' महबूब प्रोडक्शन '' की स्थापना की और निर्माता-निर्देशक के रूप में अभिनेता अशोक कुमार को लेकर पहली फिल्म “नजमा” का निर्माण किया ....शुरू से ही वो एक मेहनतकश इन्सान थे इसलिए उन्होंने अपने निर्माण संस्थान महबूब प्रोडक्शन का चिन्ह हंसिया हथौड़े को दर्शाता हुआ रखा इसके पश्चात तो महबूब प्रोडक्शन के अंतर्गत उन्होंने “तकदीर” “अनमोल घड़ी” “एलान” “अनोखी अदा” “अंदाज” “आन” “मदर इंडिया” “सन ऑफ़ इंडिया” जैसी फिल्मो का निर्माण किया उन्होंने फिल्म “औरत” को दोबारा “मदर इंडिया” के नाम से बनाया जो भारत की सरताज फिल्म कहलाई मदर इंडिया तीसरे पोल के बाद महज एक वोट से ऑस्कर अवॉर्ड जीतने से चूक गई थी ... प्रख्यात संगीतकार नौशाद का संगीत महबूब की फिल्मो की सफलता का मुख्य कारण था उनके संगीत ने उन्हें पहली पंक्ति के फिल्मकारों में ला खड़ा किया.उनकी आखिरी फिल्म “सन ऑफ़ इंडिया” बुरी तरह असफल रही भले ही इस फिल्म का गीत-संगीत काफी चर्चित रहा हो लेकिन महबूब को यह फिल्म घाटा दे गयी  इस सदमे से उनका स्वास्थ्य खराब होता गया और 27 मई 1964 को उनका निधन हो गया


सागर मूवीटोन वालो ने सर्वप्रथम फिल्म “अलहिलाल” में महबूब को निर्देशन का मौका दिया | इस फिल्म का संपादन करने के साथ साथ उन्होंने फिल्म में एक छोटा सा रोल भी किया था इसके पश्चात तो महबूब के निर्देशन में सागर कम्पनी वालो की “मनमोहन” “एक ही रास्ता” तथा “अलीबाबा” जैसी फिल्मे आयी ....शायद बहुत कम लोगो को पता होगा की भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा (1931 ) में पहले मास्टर विट्ठल की जगह महबू खान को नायक चुना गया था ...


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MEHBOOB KHAN


Born: 9 September 1907


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पवन मेहरा


#ब्लॉग_सुहानी_यादें_बीते_सुनहरे_दौर_की ✍️.


अख्तरी बाई रामलाल मूक सिनेमा का मुगलेआज़म

 संगीतकार 'रामलाल हीरा पन्ना ' की पुण्यतिथि 4 जुलाई पर विशेष

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दुश्मनी भुला कर प्यार और मोहब्बत का सन्देश देती फिल्म सेहरा (1963 ) व्ही शांताराम की एक उत्कृष्ट रोमांटिक ,ड्रामा फिल्म है राजस्थान की सूंदर पृष्ठभूमि पर बनी 'सेहरा 'की कहानी दो कबीलो की खानदानी दुश्मनी पर आधारित है कबीलो की खानदानी दुश्मनी तब और हिंसक हो जाती है जब इन कट्टर दुश्मन कबीलो के युवा प्रेमी आपस में प्यार कर बैठते है सेहरा के संगीतकार रामलाल हीरा पन्ना थे रामलाल हीरा लाल के बारे में एक बात मशहूर थी की उनके गाने एक ही टेक में रिकॉर्ड हो जाते थे वो मुख्यता अपनी बांसुरी और शेहनाई के कारण मशहूर थे फिल्म नवरंग के एक गाने ."तू छिपी है कहाँ "..गाने में शेहनाई वादक राम लाल की शहनाई से व्ही शांताराम प्रभावित थे इस का फल राम लाल मिला व्ही शांताराम जी ने उन्हें अपनी अगली फिल्म "सेहरा " का संगीतकार बना दिया ....


सेहरा (1963 ) को समीक्षकों ने सराहा लेकिन दर्शको का जो प्यार इस फिल्म को मिलाना चाहिए था वो नहीं मिला....हाँ रामलाल का संगीत जबरदस्त हिट रहा लेकिन राम लाल गुमनामी में खो गए ये कुछ अजीब लगता है कि करियर की इतनी शानदार शुरुआत के बाद इतने प्रतिभा सम्पन्न संगीतकार राम लाल को काम नहीं मिला होगा ?


[https://suhaniyadain2020.blogspot.com/2017/12/1963_9.html](https://suhaniyadain2020.blogspot.com/2017/12/1963_9.html?fbclid=IwAR0j3u_edcPdiCfI7nuuU9BzzKGIJJ87razMPTili9GsENnxZDTojIu6G2I)


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पवन मेहरा

[#ब्लॉग_सुहानी_यादें_बीते_सुनहरे_दौर_की](https://www.facebook.com/hashtag/%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%82_%E0%A4%AC%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A5%87_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%87_%E0%A4%A6%E0%A5%8C%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%80?__eep__=6&source=feed_text&epa=HASHTAG&__xts__[0]=68.ARDdOe2dYjgAcBsGJcR5h-2ezMifRx6yy7odMbtQfav1unQ7oBXvsB1YsBWcVjKFo-IiVEERzMPHNjshMd3e69QqBbpNpAfkLPZhKzp8cbFKSQzJd8HV4Qn9emZAzB0GogU6EwOtrC0Og3FgMbJO5m_e8TAMfSWJ5rfWnZxGwdB67zXFMDatdl06MN3506lMREwGxKYQXpV1aNfclSB0IAYmqMC2iQC0Ue40kt-FrmluNaXU9MYbKejqq7VHjHtWaTGYEoe1sQErEMKbWq7pcD-nUkvSrr2tBD5k197L6zFIyFcpkc6PLWHj3IX-yan9D3w&__tn__=*NK-R-R) ✍️

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छोड़ दें रस्म-ए-ख़ुदनिगरी को तोड़ दें अपना ईमाँ

ख़त्म किये देता है ज़ालिम रूप तेरी अंगड़ाई का


मैं ने ज़िया हुस्न को बख़्शी उस का तो कोई ज़िक्र नहीं

लेकिन घर घर में चर्चा है आज तेरी रानाई का..


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''अख्तरी बाई फ़ैज़ाबादी '' के नाम से मशहूर बेगम अख्तर को '' ग़ज़लों की मलिका '' कहा जाता है उन्हें कला के क्षेत्र में भारत सरकार पहले पद्म श्री तथा सन 1975 में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। आज अख्तरी बाई की 106 वी शुभ जयंती है .....


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BEGUM AKHTAR  


Born-7 October 1914



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पवन मेहरा ✒


#ब्लॉग_सुहानी_यादें_बीते_सुनहरे_दौर_की


प्रपंच पाश’ - A Throw of Dice (1929)


मूक सिनेमा की "मुगले-ए-आज़म" ..................


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'प्रपंच पाश’ हिंमाशु राय की एक शानदार मूक फिल्म है जिसे जर्मनी में जन्मे निर्देशक फ्रांज ऑस्टीन के निर्देशक में बनाया गया था ब्रिटिश काल होने के वजह से इसे अंग्रेजी नाम 'A Throw of Dice ' दिया गया ताकि हिंदी दर्शको के साथ साथ इसे विदेशी दर्शक भी देखे इसके जर्मनी वर्जन के लिए अलग से जर्मन भाषा में पोस्टर बनाये गए..... बेहद अफ़सोस है की भारतीय मूक सिनेमा के इस महाकाव्य को एक लंबे समय से भूला दिया गया था और इसका प्रिंट कई सालो तक ब्रिटेन में धूल फांकता रहा इसे रिस्टोर डिजिटल वर्जन में 31अगस्त 2007 को इसे डिजिटल करके री रिलीज़ किया गया 13 जून 2008 को टोरंटो, ओंटारियो, कनाडा में Luminato समारोह में ब्रिटिश भारतीय संगीतकार नितिन साहनी ने लाइव आर्केस्ट्रा के साथ फिर से रिलीज़ किया गया ठीक बिलकुल उसी तरह जैसे की उस समय में मूक फिल्मो को लाइव ऑर्केस्टा के साथ टाकीज़ में दिखाया जाता था .........ये फिल्म भारत के मूक फिल्मो के दौर का एक अनमोल रतन है भारत के कलाप्रेमी दर्शको को मूक फिल्मो के सुनहरे दौर की प्रपंच पाश’ जरूर देखनी चाहिए प्रिंट रिस्टोर करने और डिजिटल होने के कारण इसके प्रिंट में अद्भुत गुणवत्ता आ गई है प्रिंट क्रिस्टल क्लियर है इसकी DVD भी जारी की गई है हिमांशु राय द्वारा इतने भव्य स्तर पर बनाये जाने के कारण इसे साइलेंट युग की 'मुग़ले आज़म 'भी कहा जाता है...

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पवन मेहरा

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शहीद किसान कन्या खेमचंद प्रकाश और अन्य कथाएं

जब संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने इस फिल्म' महल 'के  गीत 'आएगा आने वाला' की धुन बनाई तो इसके बारे में दोनों निर्माताओं की राय विभक्त थी निर्माता सावक वाचा को यह धुन बिल्कुल पसंद नहीं आई जबकि अशोक कुमार को यह धुन 'आएगा आने वाला' अच्छी लगी अशोक कुमार और सवाक वाचा दोनों इस फिल्म के निर्माता थे ...

...खेमचंद्र प्रकाश के संगीत में बनी इस फिल्म के गाने बहुत लोकप्रिय हुए जब जब भी फिल्म महल में में घडी की पेंडलुम रुकती है तो ये गाना "आएगा आने वाला' आता" है जो दर्शको को भीतर तक सिहरन पैदा कर देता है ...


खेम चंद प्रकाश उन संगीत निर्देशकों में अग्रणी माने जाते है जिनकी संगीत निर्देशन में सुर कोकिला लता मंगेशकर ने अपने कॅरियर की शुरुआत की थी ...


आज संगीत निर्देशक खेम चंद प्रकाश की पुण्य तिथि पर विशेष ....


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Music Composer-  Khemchand Prakash


Died: 10 August 1950, Mumbai


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'पैगाम 'एक शानदार फिल्म है जो मनोरंजन के साथ साथ देश और समाज सबको साथ लेकर चलने का सन्देश देती है


जैमिनी फिल्म्स की 'पैगाम 'में मजदूरो और मिल मालिको के बीच के संघर्ष को एक प्रेम कहानी के साथ दिखाया गया था.....बाद में एस.एस. वासन और शिवाजी गणेशन ने Irumbu Thirai के रूप में तमिल में 'पैगाम' का रीमेक भी बनाया जो सफल रहा जिसमे दलीप कुमार का रोल शिवाजी गणेशन ने और वैजयंती माला का रोल सरोजा देवी ने निभाया फिल्म का कथानक हिंदी वाली पैगाम जैसा ही था शिवजी गणेशन की ये तमिल फिल्म दक्षिण भारत में आज भी बड़े चाव से देखी जाती इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी इसके गीत सुने जाते है लेकिन इस तमिल वर्जन में वामपंथ की छाया दिखती है


फ़िल्मी दुनिया के इतिहास में इस फिल्म को लंबे समय तक राजकुमार और दलीप कुमार जैसे महानायको की अदाकारी के लिए याद रखा जायेगा दोनों अभिनय के दिग्गज़ों को एक साथ सुनहरी परदे पर देखना सुखद लगता है राजकुमार और दलीप कुमार जब जब भी परदे पर आते है छा जाते है दोनों की अलग अलग शैली की संवाद अदायगी प्रभावित करती है लेकिन दुखद पहलू ये है की दर्शको को ऐसा मौका फिर दुबारा नहीं मिला क्योंकि अरसे बाद फिल्म 'सौदागर 'में दलीप साहेब की भाषा शैली बदली हुई थी उर्दू में महारत हासिल दलीप साहेब के संवाद ठेठ देहाती बोली में थे ऐसा क्यों हुआ ? इसका 'सौदागर 'के निर्माता सुभाष घई को बेहतर पता होगा ?


पवन मेहरा ✒

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संगीतकार बसंत देसाई के मधुर संगीत से सजी फिल्म 'गूँज उठी शहनाई ' हिंदी सिनेमा के संगीत प्रेमियों के लिए किसी अनमोल तोहफे से कम नहीं है....... इस फिल्म की सफलता में संगीतकार बसंत देसाई के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा उन्होंने फिल्म की साधारण से कहानी को फिल्म के गीतों के साथ बड़ी खूबसूरती से पिरोया है 'गूँज उठी शहनाई ' के सभी गीत क्लासिक है और बसंत देसाई ने शास्त्रीय रागो को आधार बना सूंदर गीतों की रचना की गई है जिसे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई एक अलग मुकाम देती है हालाँकि इस शहनाई वादन के असली हक़दार संगीतकार 'रामलाल' थे जिनको फिल्म में निर्माता विजय भट्ट ने उचित सम्मान नहीं दिया गया कहते है इस उपेक्षा से राम लाल इतने आहत हुए की उन्होंने फिल्म 'गूँज उठी शहनाई ' जीवन भर नहीं देखी ....


आज महान संगीतकार बसंत देसाई की जयंती ( 9 जून 1912 ) पर हम उन्हें उनकी फिल्म 'गूँज उठी शहनाई ' के माध्यम से अपनी श्रद्धांजलि पेश करते है ....🌹🌹🌹


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पवन मेहरा ✒

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मुबारक बेगम ...पुण्यतिथि पर विशेष (18 जुलाई 2016 )


मुबारक बेगम पैसे में ज्यादा संगीत में अधिक रुचि रखती थी यही कारण है की उनके हिस्से में कम फिल्में आई और जो फिल्में उन्होंने की उसमे जयादातर फिल्में सी और बी ग्रेड की थी  ....गाने भी चले पर उनका कोई विशेष लाभ मुबारक बेगम को नहीं मिला संगीतकारों और गायको की स्पर्धा में इंडस्ट्रीज़ में बने रहने की गुर उन्होंने सीखे नहीं लिहाज़ा वो उनकी राजनीति का शिकार भी हुई ....बॉलीवुड के साथ इतने साल गुजारने वाली मुबारक को वहां से भी कोई आसरा नहीं मिला और वह गुमनामी के अंधेरों में खोती चली गईं बेकारी के साथ मुफलिसी ने उनका दामन थाम लिया...... सैकड़ों गीतों और ग़ज़लों को मुबारक बेगम ने अपनी आवाज दी थी जिसके लिए उन्हें याद किया जाता रहेग ....भले ही मुबारक बेगम की आवाज के दीवाने दुनियाभर में फैले हुए हैं। लेकिन उनके अपने पड़ोसी विश्वास नहीं कर पाते कि थे यह बूढ़ी, बीमार और बेबस औरत वह गायिका थी जिसके गीत कभी कारगिल से कन्याकुमारी तक गूंजते थे।.....


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पवन मेहरा


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सआदत हसन मंटो के एक उपन्यास पर आधारित 'किसान कन्या' (1937 ) भारत की पहली रंगीन फिल्म है जिसमें मास्टर निसार और पद्मादेवी ने अभिनय किया था ........1933 में व्ही शांताराम द्वारा भारत की पहली रंगीन फिल्म सैरंधी (मराठी )' के बनाने का सपना असफल होने के 6 साल बाद अर्देशिर ईरानी की  'किसान कन्या' परदे पर आई  ...1933 में फिल्म सरैंधी को रंगीन बनाया जरूर गया था लेकिन भारत में रंगीन फिल्म प्रदर्शित करने वाले सिनेमा घर और शक्तिशाली कार्बन युक्त प्रोजेक्टर नहीं थे नहीं थे फिल्म रिलीज़ हुई तो परदे पर धुंधली दिखती थी वही शांताराम का प्रयोग असफल रहा इस प्रकार कुछ फिल्म समीक्षक 1932 में रिलीज़ हुई मदन फिल्म्स की मूक फिल्म 'बिल्वमंगल 'को भी रंगीन फिल्म कह प्रचारित कर रहे है ये सही नहीं है प्रिंसेज़ कूपर ,मोहम्मद इशाक ,अब्दुल रहमान काबुली अभिनीत फिल्म 'बिल्वमंगल ' ब्लेक एंड वाइट थी ....इस प्रकार अर्देशिर ईरानी को भारत में 'आलम आरा '(1931 )और 'किसान कन्या (1937)'फिल्मो के माध्यम से हमारी फिल्मो में आवाज़ देने और रंग भरने का गौरव हासिल है ...मगर इतनी मेहनत के बाद भी फिल्म 'किसान कन्या 'को जैसी व्यावसायिक सफलता मिलनी चाहिए थी वो नहीं मिली भारत की पहली रंगीन फिल्म 'किसान कन्या ' मास्टर निसार के जीवन में अंधकार ले कर आई 'किसान कन्या 'के असफल होने के बाद वो गुमनामी के अँधेरे में खो गए आर्थिक परेशानियों के चलते उन्हें दलीप कुमार के साथ लीडर ,कोहिनूर आज़ाद जैसी फिल्मो में छोटे छोटे रोल कर गुज़ारा करना पड़ा ..


 भारत की पहली रंगीन फिल्म होने का गौरव 'किसान कन्या 'को प्राप्त है लेकिन रिलीज़ से पहले से बवाल हो गया इस रंगीन फिल्म में बंगाली नायिका पद्मादेवी का सौन्दर्य परदे पर कुछ इस तरह उभर कर सामने आया की ब्रिटिश हकूमत को 'किसान कन्या 'उत्तेजक और अश्लील लगी और उन्होंने इसे पास करने से ही मना कर दिया ...मगर फिर भी आज रंगीन सिनेमा के मामले में हम भले ही डिजिटल युग में प्रवेश कर गए हो लेकिन मास्टर निसार की भारत की पहली रंगीन फिल्म की यादे भुलाये नही भूलती ....


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पवन मेहरा


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...शहीद -1965


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एक बार स्कूल में एक नाटक जब  मनोज कुमार भगत सिंह बने तो स्टेज पर घबराहट से उनके मुंह से कोई संवाद ही नहीं निकला उनके पिता जी ने मजाक में कहा '' जा यार तू तो नकली भगत सिंह भी नहीं बन सका '' ........ये बात मनोज कुमार के जेहन में थी इसलिए उन्होंने जब शहीद फिल्म बनाने की सोची तो भगत सिंह खुद बने ......उस समय इंटरनेट का युग का नहीं था इसलिए मनोज कुमार ने 'शहीदे आज़म भगत सिंह ' पर जितना भी साहित्य उपलब्ध था उसे पढ़ा और गहन रिसर्च की भगत सिंह के परिवार वालो से भी मिले फिल्म के प्रीमियर पर भगत सिंह जी की माता विद्यावती जी और लाल बहादुर शास्त्री जी को भी आमंत्रित किया गया था ......बस एक कमी ये हैं की 'शहीद 'फिल्म का रंगीन न होना  जबकि उस समय भारत में रंगीन फिल्मो के बनने का सिलसिला शुरू हो चुका था ..  बावजूद इसके भगत सिंह पर अभी तक बनी फिल्मो में से मनोज कुमार की 'शहीद 'सबसे अच्छी मानी जाती है


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अभिनेता 'मनोज कुमार 'के जन्मदिवस ( 24 जुलाई 1937 ) पर विशेष


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पवन मेहरा ✒


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एक नहीं अनेक कहानियाँ

अभिनेत्री नर्गिस के जन्म दिवस पर विशेष ......💐💐💐


1 जून 1929


आज 1 जून को मशहूर अभिनेत्री नरगिस का जन्मदिन है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को शुरूआती दौर में जिन अभिनेत्रियों ने एक अलग पहचान दी उनमें एक नाम उस दौर की खूबसूरत अभिनेत्री नरगिस का भी शामिल है। नरगिस ने अपने अभिनय से सबको प्रभावित किया था और वे पहली अभिनेत्री थीं जिन्हें राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया गया था और पद्मश्री पुरस्कार दिया गया था। आइये जानते हैं इस कमाल की अभिनेत्री के बारे में एक दिलचस्प किस्सा जब उन पर विदेश में अनजाने में चोरी का इल्ज़ाम लगा और उन्होंने कैसे चतुराई से इस मुसीबत से पीछा छुड़ाया ....

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अभिनेता 'राधाकिशन ' के जन्मदिवस पर विशेष ..🌹🌹🌹


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अभिनेता राधाकिशन ने फिल्म तलाक (1958 ) में राजेंदर कुमार के ससुर मूल चंद छब्बे का कॉमिक रोल किया था ये एक ऐसा किरदार था वो अपनी बेटी (कामिनी कदम ) के जीवन में ही जहर घोल देता है राधाकिशन ने फिल्म तलाक में उत्कृष्ट अभिनय किया दर्शक उन्हें परदे पर एक मिनट के लिए भी मिस नहीं करता मूल चंद छब्बे का ये रोल पंडित मुखराम शर्मा ने राधाकिशन को ही ध्यान में रख कर विशेष रूप से लिखा था और राधाकिशन ने भी .हमेशा की तरह मुखराम शर्मा को निराश नहीं किया .....


दिल्ली में 13 जून 1915 को जन्मे राधाकिशन अपने खास अंदाज़ में विलेन के रोल में हास परिहास को शामिल कर देते थे जिससे दर्शको के दिलो में वो खलनायक होकर भी के नायक बन जाते थे और इसमें उनकी संवाद आदायगी और नाक से' राम राम ' बोलने की अदा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी...... व्ही शांताराम की फिल्म पडोसी (1941 ) से अभिनय यात्रा शुरू करने वाले राधाकिशन के कई फिल्मो में विशेष अंदाज़ में बोले गए तकिया कलाम हिट हुए आज हम उनके जन्मदिवस पर उनकी शानदार फिल्म तलाक (1958) के माध्यम से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते है ....कुछ लोगो का मानना है राधाकिशन ने आमहत्या की थी लेकिन मुझे सन्दर्भ में जानकारी नहीं है अगर आप को जानकारी है तो शेयर करे....


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'नेशनल डॉक्टर दिवस ' (1 जुलाई ) पर विशेष लेख ....👩‍🔬👨‍🔬💊💉🎛


भारत में 'नेशनल डॉक्टर दिवस ' पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री डॉ बिधान चंद्र रॉय को सम्मानित करने के लिए पूरे भारत में 1 जुलाई को मनाया जाता है। डॉ बिधान चंद्र रॉय का जन्म 1 जुलाई 1882 को हुआ था और 1962 में इसी तारीख को उनकी मृत्यु हुई थी ......ये वाकया उस वक्त का है जब दादा मुनि अशोक कुमार की पत्नी शोभा देवी का इलाज डॉ बिधान चंद्र रॉय ने किया लेकिन अशोक कुमार उन्हें पहचान ही नहीं पाए .....


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प्रख्यात फिल्म निर्माता निर्देशक' महबूब  खान ' के जन्म दिवस ( 9 सितम्बर 1906 ) पर विशेष ..🌷🌷🌷


हिन्दी सिनेमा के महान फिल्म मेकर महबूब खान को लोग सदियों तक याद रखेंगे। उन्होंने कभी फिल्म निर्माण की कला में प्रशिक्षण नहीं लिया और न ही कभी ऐसी कोई शिक्षा ग्रहण की। वह इतने पढ़े-लिखे भी नहीं थे कि अंग्रेजी में बात कर सकें। उन्होंने साधारण वस्तुएं बेचने का काम भी किया। उन्होंने कई स्टूडियो में फालतू सी नौकरी भी की, लेकिन सिनेमा के प्रति अपने लगाव के कारण ही वह अंतत: महान फिल्म निर्माता बने।


महबूब खान में गजब का आत्मविश्वास था जो किसी बंधन को नहीं मानता था। उन्होंने वह कर दिखाया जो कई विशेषज्ञ भी नहीं कर सके। एक ऐसा की किस्सा है जब उन्होंने अपने काम के जूनून और उसूलो के प्रति समझौता नही करने कारण बलात्कार जैसे गंभीर विषय पर बनी   अपनी महत्वकांक्षी बोल्ड फिल्म ''अमर '' से उस समय की दिग्गज अभिनेत्री मीना कुमारी को बाहर का रास्ता दिखा दिया .....


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✒'सुनील दत्त 'का नाम फिल्म इंडस्ट्रीज़ में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है वो जितने अच्छे अभिनेता थे उतने ही बेहतर इंसान भी थे.... वो विरले ऐसे अभिनेता है जो राजनीति के कीचड़ में रहते हुए भी हमेशा कमल की तरह खिले रहे उन पर कभी कोई दाग नहीं लगा.... अपने से बड़े कलाकारों को सुनील दत्त कैसे सम्मान देते थे इस बात का पता फिल्म 'ज्वाला' की इस घटना से लगता है कैसे सुनील दत्त ने इस फिल्म 'ज्वाला' की नयिका मधुबाला के मरने के बाद भी उचित सम्मान दिया


ऐसे सिर्फ सुनील दत्त साहेब ही कर सकते थे ..


अभिनेता सुनील दत्त साहेब के जन्म दिवस 6 जून पर विशेष...

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पवन मेहरा ✒

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🎂 🎈🎊🎉 Happy Birthday Sadhana Jee 🎂 🎈🎊🎉

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.(...मनोज / साधना  वो कौन थी ✌️👌🙏)


ना जाने इन तेज हवाओं का मेरी जिंदगी से क्या वास्ता है ? .... आज की रात तो खेर कहानियों की रात है जो कहानियों में ही कट जाएगी ....एक रात ऐसी ही तूफानी हवा चल रही थी ....जैसे बहुत सी अनदेखी रूहे मिलकर चिल्ला रही हौ .... पेड़ों के साए भूतों की तरह नाच रहे थे कि अचानक हवा का एक तेज़ झोंका आया .....खिडकी का पर्दा उड़ा... यहाँ रखा गिलास गिर के चकनाचूर हो गया...उस वक्त मुझे टेलीफ़ोन आया एक बीमार को देखने जाना है ....में जल्दी से बिमार को देखने एक वीरान बंगले मे पहुंचा ....वो एक खूबसूरत लडकी थी जो मेरे पहुंचने से पहले ही मर चुकी थी ......वहां से वापस लौट रहा था तो पता चला कि बरसों से इस बंगले में कोई नहीं रहता ....डॉक्टर आते रहते हैं और वो लड़की मरती रहती है .... सन्ध्या जानती हो उस लड़की की शक्ल.....तुम ....यहां कैसे ?

..में पूछता हूँ ..कौन हो तुम ?...


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हिंदी फिल्मों की सबसे शानदार थ्रिलर फिल्म स्टोरी

मनोज कुमार ,साधना - 'वो कौन थी- 1964'

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Sadhana Shivdasani

Born: 2- September- 1941

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पवन मेहरा

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मल्हार की असफलता और मुकेश की गायकी का उदय

 ❤️...''बड़े अरमानो से रखा है सनम प्यार की दुनिया में ये पहला कदम "...❤️


भले ही फिल्म असफल रही लेकिन केवल इस गाने के लिए ही 'मल्हार 'को आज भी याद किया जाता है 'मल्हार 'को एक दूसरा सबसे बड़ा याद रखने का कारण यह है की गायक 'मुकेश'l

फिल्म मल्हार के निर्माता थे उन्होंने ये फिल्म बनाई थी इसके बाद मुकेश ने अनुराग (1956 ) फिल्मे भी बनाई बनाई थी वो भी असफल रही इस नाकामी के बाद मुकेश ने फिल्म फिल्म निर्माता बनने से तौबा कर ली और गायकी पर ही ध्यान देना शुरू कर दिया और उन्होंने अपनी विशिष्ट आवाज़ से गायकी में सफलता के आयाम गढ़े ....

.'मल्हार 'की असफलता का कारण कुछ फिल्म समीक्षक ये भी बताते है की इस फिल्म से जुडी ज्यादातर टीम अनुभवहीन थी लेकिन मैं इस बात से सहमत नहीं संगीतकार 'रोशन 'की भी तो ये पहली फिल्म थी तो फिर उनका संगीत क्यों सफल रहा ?


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गायक 'मुकेश' के जन्मदिवस 22 जुलाई 1923 पर विशेष ...


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पवन मेहरा ✒


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भारत रतन पंडित रविशंकर

 संगीत के क्षेत्र में सर्वोकृष्ठ कार्य हेतु पहले भारत रत्न सम्मान प्राप्त दिवंगत भारत रत्न पँडित रविशंकर जी का एक 7 अप्रैल को जन्मदिन पर शत शत नमन करते हुए उनके संगीत से सजे बॉलीवुड फिल्मों से कुछ सदाबहार नग़मों की सूची पेश है...👏👏


*पंडित रविशंकर जी के संगीत में सदाबहार नग़मे*

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*

१)-

हाये रे वो दिन क्यों नहीं आये- *लता-अनुराधा*

२)-

कैसे दिन बीते,कैसे बीती रतिया- *लता-अनुराधा*

३)-

जाने कैसे सपनो में खो गयी अँखियाँ,मैं तो हूँ जागी,मेरी सो गयी अँखियाँ- *लता-अनुराधा*

४)-

होरी खेलत नंदलाल,बिरज में होरी खेलत नंदलाल- *रफ़ी-गोदान*

५)-

पिपरा के पतवा,सरीखे डोले मनवा के जियरा में चढ़त हिलोर- *रफ़ी-गोदान*

६)-

मेरो तो गिरधर गोपाल- *वाणी जयराम-मीरा*

७)-

ऐसी मैं तो प्रेम दीवानी- *वाणी जयराम-मीरा*

८)-

श्याम माने चाकर राखो जी- *वाणी जयराम-मीरा*

९)-

जनम लिए ललना के चाँद मोरे- *आशा भोसले-गोदान*

१०)-

करुणा सुनो श्याम मोरी- *वाणी जयराम-मीरा*

११)-

करना फ़कीरी फिर क्या दिल्लगी- *वाणी जयराम-मीरा*

१२)-

माई बादल देख डारी- *वाणी जयराम-मीरा*

१३)-

राणा जी मैं तो गोविंद के गुण गाउँगी- *वाणी जयराम-मीरा*

१४)-

सुन मेरे लाल,यूँ न हो बेहाल- *मन्नाडे-अनुराधा*

१५)-

प्यारे दर्शन दीजो आये तुम किन जियो ना जाये- *वाणी जयराम-मीरा*

१६)-

किया जतन रहत दिन रैन हो रामा- *मुकेश-अनुराधा*

१७)-

चली आज गोरी पियाँ की नगरिया- *लता-गोदान*

१८)-

साँवरे साँवरे काहे करो जोरा जोरी- *लता-अनुराधा*

१९)-

बहुत दिन हुए,समाँ अलबेला- *लता,मन्नाडे व महेंद्र कपूर-अनुराधा*

२०)-

जाने काहे जियाँ मोरा डोले- *लता-गोदान*

२१)-

जो तुम तोड़ो पियाँ मैं नाही तोड़ू रे- *वाणी जयराम-मीरा*

२२)-

बहुत दिन हुए तारों के देश मे- *लता,मन्नाडे व महेंद्र कपूर*

२३)-

ओ बेदर्दी क्यों तड़पाये,जियरा मोरा रिझाए- *गोदान* *गीतादत्त व महेंद्र कपूर*

२४)-

अब ना जबान पर ताले डालो- *धरती के लाल* *शांति मुमताज़*

२५)-

बाला मैं बैरागन हूँगी- *वाणी जयराम- मीरा*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* -----

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कभी_किसी_को_मुक़म्मल_जहां_नहीं_मिलता / मीना कुमारी

 #कभी_किसी_को_मुक़म्मल_जहां_नहीं_मिलता / मीना कुमारी



उनकी पूरी ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं बल्कि दर्द की एक ऐसी दास्तां थी। जो उनकी मौत पे ही मुक़म्मल हुई। इनकी मौत पे इनके बेहद क़रीब रही 'नरगिस दत्त' जी ने कहा था 'मौत मुबारक़ हो मीना'


अपनी दमदार अदायगी और बेपनाह ख़ूबसूरती से लोगों को अपना दीवाना बना देने वाली वो अदाकारा मीना कुमारी जिन्हें हम सब ट्रेजडी क्वीन के रूप में जानते हैं। इनका जन्म १ अगस्त १९३३ को मुंबई में हुआ था। शोहरत की बुलंदियां छूने वाली ये अदाकारा मुफ़लिसी के ऐसे दौर से गुजरी, जब अस्पताल में इलाज़ के लिए पैसे भी न थे। उनकी मौत के बाद अस्पताल का बिल मीना जी के एक प्रसंशक डॉक्टर ने चुकाया था।


मीना शायद पहली अदाकारा होंगी, जिन्हें शोहरत , दौलत और अपने प्रशंसकों का भरपूर प्यार मिला। पर अपनी निजी जिंदगी में मरते दम तक सच्चे प्यार को तरसती रहीं। जिसपे भी यक़ीन किया उसी से उन्हें धोखा मिला या अपनी क़ामयाबी का ज़रिया बनाया। निजी ज़िंदगी में मिले धोखों ने उन्हें तोड़ कर रख दिया और उन्होंने अपने को शराब में डुबो दिया।


'मीना कुमारी' का असली नाम 'महजबीं बानो' था। उनके पिता अली बक्श पारसी रंगमंच के एक मँझे हुए कलाकार थे और उन्होंने फ़िल्म "शाही लुटेरे" में संगीत भी दिया था। उनकी माँ प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो), भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी। मीना कुमारी की बड़ी बहन खुर्शीद और छोटी बहन मधु (बेबी माधुरी) भी फिल्म अभिनेत्री थीं। कहा जाता है कि दरिद्रता से ग्रस्त उनके पिता अली बक़्श उन्हें पैदा होते ही अनाथाश्रम में छोड़ आए थे। हालांकि अपने नवजात शिशु से दूर जाते-जाते पिता का दिल भर आया और तुरंत अनाथाश्रम की ओर चल पड़े।पास पहुंचे तो देखा कि नन्ही मीना के पूरे शरीर पर चीटियाँ काट रहीं थीं।अनाथाश्रम का दरवाज़ा बंद था, शायद अंदर सब सो गए थे।यह सब देख उस लाचार पिता की हिम्मत टूट गई,आँखों से आँसु बह निकले।झट से अपनी नन्हीं-सी जान को साफ़ किया और अपने दिल से लगा लिया।अली बक़्श अपनी चंद दिनों की बेटी को घर ले आए।समय के साथ-साथ शरीर के वो घाव तो ठीक हो गए किंतु मन में लगे बदकिस्मती के घावों ने अंतिम सांस तक मीना का साथ नहीं छोड़ा।


मीना कुमारी की नानी हेमसुन्दरी मुखर्जी पारसी रंगमंच से जुड़ी हुईं थी। बंगाल के प्रतिष्ठित टैगोर परिवार के पुत्र जदुनंदन टैगोर ने परिवार की इच्छा के विरूद्ध हेमसुन्दरी से विवाह कर लिया। १८६२ में दुर्भाग्य से जदुनंदन का देहांत होने के बाद हेमसुन्दरी को बंगाल छोड़कर मेरठ आना पड़ा। यहां अस्पताल में नर्स की नौकरी करते हुए उन्होंने एक उर्दू के पत्रकार प्यारेलाल शंकर मेरठी (जो की ईसाई थे) से शादी करके ईसाई धर्म अपना लिया। हेमसुन्दरी की दो पुत्री हुईं जिनमें से एक प्रभावती, मीना कुमारी की माँ थीं।


घर के आर्थिक हालात के कारण इन्हें बतौर बाल कलाकार ही शुरआत करनी पड़ी। 'महजबीं बानो' पहली बार १९३९ में फिल्म निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म "लैदरफेस" में 'बेबी महज़बीं' के रूप में नज़र आईं। १९४० की फिल्म "एक ही भूल" में विजय भट्ट ने इनका नाम बेबी महजबीं से बदल कर 'बेबी मीना' कर दिया। १९४६ में आई फिल्म 'बच्चों का खेल' से बेबी मीना १३ वर्ष की आयु में 'मीना कुमारी' बनीं। मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थीं जिनमें हनुमान पाताल विजय, वीर घटोत्कच व श्री गणेश महिमा प्रमुख हैं।


वैसे तो फिल्मों में निभाये उनके सभी क़िरदार यादगार हैं। पर कुछ फ़िल्में जैसे 'पाकीज़ा' और 'साहिब, बीबी और गुलाम' की छोटी बहू ने उन्हें अमर कर दिया। वर्ष १९६२ में तो मीना को 'साहब बीबी और गुलाम', 'मैं चुप रहूंगी' और 'आरती' फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के तीन नामांकन एक साथ मिले।


फ़िल्म 'बैजू बावरा' के बाद मीना को कमाल अमरोही में अपना भविष्य दिखा और वे दोनों नज़दीक आ गए। बाद में निकाह भी कर लिया। लेकिन वे कमाल की दूसरी पत्नी ही रहीं। उनके निकाह के एकमात्र गवाह थे जीनत अमान के पिता अमान। दोनों की शादीशुदा ज़िंदगी दस सालों तक ही चली।


वर्ष १९६६ में आई फिल्म 'फूल और पत्थर' के नायक धर्मेन्द्र से मीना की नजदीकियां बढ़ने लगीं। जहां मीना स्थापित कलाकार थीं, वहीं धर्मेंद्र ख़ुद को स्थापित करने की कवायद कर रहे थे। ऐसे में मीना का मजबूत दामन झट से थाम लिया। दोनों के अफेयर की खबरें सुर्खियां बनने लगीं। इसका असर मीना और कमाल के रिश्ते पर भी पड़ा। कहते हैं जब दिल्ली में वे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन से एक कार्यक्रम में मीना कुमारी मिलीं तो राष्ट्रपति ने पहला सवाल यही पूछा कि तुम्हारा बॉयफ्रेंड धर्मेन्द्र कैसा है? इसी तरह फिल्मकार महबूब खान ने महाराष्ट्र के गर्वनर से कमाल अमरोही का परिचय यह कहकर दिया कि ये प्रसिद्ध स्टार मीना कुमारी के पति हैं। कमाल अमरोही यह सुन आग बबूला हो गए थे।


धर्मेन्द्र और मीना के चर्चे भी उन तक पहुंच गए थे। उन्होंने पहला बदला धर्मेन्द्र से यह लिया कि उन्हें 'पाकीजा' से आउट कर दिया और उनके स्थान पर राजकुमार की एंट्री हो गई। कहा तो यहां तक जाता है कि अपनी फ़िल्म 'रजिया सुल्तान' में उन्होंने धर्मेन्द्र को रजिया के हब्शी गुलाम प्रेमी का रोल देकर एक तरह से जलील करने का ही काम किया था।


मीना की बढ़ती शोहरत , धर्मेंद्र से नजदीकियां और क़माल का शक़्क़ी स्वभाव की वजह से मीना और क़माल में अलगाव हो गया था।


'पाकीजा' को बनने में १७ साल लगे, वजह था कमाल और मीना का अलगाव। लेकिन मीना जानती थी कि फ़िल्म 'पाकीजा' कमाल अमरोही का कीमती सपना है। इसलिए उन्होंने इसकी शूटिंग बीमारी के दौरान भी की। इस दौरान वे पूरी तरह बदल गई थीं। वे गुरुदत्त की 'साहिब, बीवी और गुलाम' की 'छोटी बहू' परदे से उतरकर मीना की असली जिंदगी में समा गई थी। वे छोटी-छोटी बोतलों में देसी-विदेशी शराब भरकर पर्स में रखने लगीं।


मशहूर बॉलीवुड अभिनेता अशोक कुमार, मीना कुमारी के साथ कई फ़िल्में कर चुके थे। मीना का इस तरह खुदकुशी करने की बात उन्हें रास नहीं आ रही थी। वे होम्योपैथी के अच्छे जानकार थे। वह मीना के इलाज के लिए आगे आए, लेकिन जब मीना का यह जवाब सुना 'दवा खाकर भी मैं जीऊंगी नहीं, यह जानती हूं मैं। इसलिए कुछ शराब के कुछ घूंट गले के नीचे उतर जाने दो' तो वे भी सहम गए।


वर्ष १९५६ में मुहूर्त से शुरू हुई 'पाकीजा' आखिरकार ४ फरवरी १९७२ को रिलीज हुई। 'पाकीजा' सुपरहिट रही और हिंदी सिनेमा में कमाल अमरोही का नाम हमेशा के लिए दर्ज हो गया, लेकिन 'पाकीजा' के रिलीज के कुछ ही दिनों बाद ३१ मार्च १९७२ को मीना कुमारी चल बसीं।


उनकी फ़िल्में रहीं १९३९ लैदरफ़ेस , अधुरी कहानी १९४० पूजा, एक ही भूल १९४१ नई रोशनी, बहन , कसौटी १९४२ गरीब , विजय १९४३ प्रतिज्ञा १९४४ लाल हवेली १९४६ बच्चों का खेल , दुनिया एक सराय १९४८ पिया घर आजा, बिछड़े बालम १९४९ वीर घटोत्कच १९५० श्री गणेश महिमा, मगरूर , हमारा घर १९५१ सनम , मदहोश , लक्ष्मी नारायण , हनुमान पाताल विजय १९५२ अलादीन और जादुई चिराग , तमाशा, बैजू बावरा १९५३ परिणीता, फुटपाथ , दो बीघा ज़मीन , दाना पानी, दायरा, नौलखा हार १९५४ इल्ज़ाम , चाँदनी चौक , बादबाँ  १९५५ रुखसाना, बंदिश , आज़ाद १९५६ नया अंदाज़, मेम साहिब , हलाकू, एक ही रास्ता, बंधन १९५७ शारदा, मिस मैरी १९५८ यहूदी, सवेरा, सहारा, फरिश्ता १९५९ सट्टा बाज़ार , शरारत , मधु, जागीर , चिराग कहाँ रोशनी कहाँ, चाँद , चार दिल चार राहें, अर्द्धांगिनी १९६० दिल अपना और प्रीत पराई , बहाना, कोहिनूर १९६१ ज़िंदगी और ख्वाब , भाभी की चूड़ियाँ, प्यार का सागर १९६२ साहिब बीबी और ग़ुलाम , मैं चुप रहूंगी, आरती १९६३ किनारे किनारे, दिल एक मन्दिर , अकेली मत जाइयो

१९६४ सांझ और सवेरा, गज़ल , चित्रलेखा, बेनज़ीर , मैं भी लड़की हूँ 

१९६५ भीगी रात , पूर्णिमा, काजल 

१९६६ पिंजरे के पंछी, फूल और पत्थर 

१९६७ मझली दीदी, नूरजहाँ, चन्दन का पालना, बहू बेगम 

१९६८ बहारों की मंज़िल , अभिलाषा

१९७० जवाब, सात फेरे 

१९७१ मेरे अपने, दुश्मन

१९७२ गोमती के किनारे (आखरी फ़िल्म) पाकीज़ा ( रिलीज़)


मीना कुमारी न सिर्फ़ अच्छी अदाकारा थीं, बल्कि वे बेहतरीन शायरा और गायिका भी थीं। उन्होंने बतौर बाल कलाकार फ़िल्म बहन में गाना गाया। इसके बाद दुनिया एक सराय (१९४६), पिया घर आजा और बिछड़े बलम (१९४८), पिंजरे के पंछी (१९६६) में गाने गाए। वो पाकीज़ा में भी सह-गायिका थी। फ़िल्म के लिए १६ गाने बनाये गए थे। पर फ़िल्म में सिर्फ ६ गाने रखे गए। बाद में १९७७ में बाकी ९ गानों का एक अल्बम "पाकीज़ा-रंग बा रंग" के नाम से रिलीज किया गया।


गुलजार को अपने बहुत क़रीब मानती थीं। इसलिए गुज़र जाने पर मीना कुमारी की शायरी की किताब जो उन्हें सबसे प्यारी थी, उसे छपवाने का जिम्मा उन्होंने अपनी वसीयत में गुलज़ार के नाम छोड़ा था।


३१ मार्च १९७२ गुड फ्राइडे वाले दिन दोपहर ३ बजकर २५ मिनट पर महज़ ३८ वर्ष की आयु में मीना कुमारी ने अंतिम सांस ली। उन्हें बम्बई के मज़गांव स्थित रहमताबाद कब्रिस्तान में दफनाया गया। मीना कुमारी अपनी लिखी इन पंक्तियों को अपनी कब्र पर लिखवाना चाहती थीं ~


"वो अपनी ज़िन्दगी को

एक अधूरे साज़,

एक अधूरे गीत,

एक टूटे दिल,

परंतु बिना किसी अफसोस के साथ 

समाप्त कर गई"

याद पिया की आए !

 याद पिया की आए !


भारतीय शास्त्रीय संगीत के पुरोधा मरहूम उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब संगीत जगत के शिखर पुरूषों में एक रहे हैं। धीर-गंभीर आवाज़ और विलक्षण अदायगी के लिए जाने जाने वाले खां साहब की संगीत-यात्रा सारंगी वादन से शुरू हुई थी। कालांतर में उन्होंने खयाल और ठुमरी गायन में महारत हासिल की। पटियाला घराने के खां साहब की भारतीय शास्त्रीय संगीत को सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने विभिन्न संगीत शैलियों - ध्रुपद, ग्वालियर घराने और जयपुर घराने के खूबसूरत संयोजन से गायकी की एक बिल्कुल नई शैली, नया अंदाज़ विकसित किया जिसमें मधुरता और लचीलेपन के साथ संक्षिप्तता का भी अनोखा गुण भी शामिल हुआ। दिखने में पहलवानी डील -डौल और बेहद कड़क मिज़ाज के खां साहब अपनी गायिकी और संवेदनाओं में बहुत मुलायम थे। भारत विभाजन के बाद परिस्थतिवश वे पाकिस्तान चले गए, लेकिन जल्द ही वहां की कट्टरता और धर्मांधता से निराश होकर भारत लौट आए। देश के बंटवारे पर उनकी संगीतमय टिप्पणी यह थी - अगर हर घर के एक बच्चे को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी गई होती तो इस मुल्क़ का बंटवारा कभी नहीं होता।


खां साहब की गाई कुछ ठुमरियां-याद पिया की आये, आये न बालम का करूं सजनी, नैना मोरे तरस गये, तिरछी नजरिया के बान, पिया बिना नाहीं चैन, कटे ना बिरहा की रात आदि आज भी ठुमरी के प्रेमियों की पहली पसंद बनी हुई हैं। उनके भजन ‘राधेकृष्ण बोल’ ने महात्मा गांधी को बहुत प्रभावित किया था। खां साहब को सिनेमा का अगंभीर माहौल कभी पसंद नहीं आया। तमाम प्रलोभनों के बावजूद फिल्मों से उन्होंने हमेशा एक दूरी बनाकर रखी, लेकिन अंततः फिल्म 'मुगल-ए-आज़म' के फिल्मकार के. आसिफ़ और संगीतकार नौशाद की ज़िद के आगे वे हार गए। वे 'मुग़ल-ए-आज़म' में तानसेन की आवाज़ बने थे। राग सोहनी और रागेश्वरी पर आधारित दो गीत - 'प्रेम जोगन बन के' तथा 'शुभ दिन आयो' गाकर उन्होंने उस फिल्म को गंभीरता और ऊंचाई दी थी। खां साहब की संगीत विरासत आज भी ग़ज़ल गायक गुलाम अली सहित उनके कई नामचीन शागिर्दों के रूप में जीवित है। आज मरहूम उस्ताद की जयंती  पर उन्हें खिराज-ए-अक़ीदत !


(चित्र में लता मंगेशकर के साथ उस्ताद बड़े गुलाम अली खां)


Dhruv Gupt

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

'रहें ना रहें हम महका करेंगे', सुचित्रा सेन

 *''रहें ना रहें हम महका करेंगे',

'

तेरे बिना जिंदगी से

कोई', 'छुप गया कोई रे',

 'रहते थे कभी जिनके दिल में हम',

 'तुम आ गए हो'................. यह तमाम गीत आज भी याद किए जाते हैं पर जिसके अभिनय ने इन गीतों में जान डाल दी वो अभिनेत्री सुचित्रा सेन थीं. लिए

सुचित्रा सेन ने बड़ी सादगी के साथ इस फिल्म में अभिनय किया था. केवल ‘ममता’ फिल्म ही नहीं बल्कि वो जिस किसी फिल्म में अभिनय करती थीं उस किरदार को निभाने में जी जान लगा देती थीं.


*आज सुचित्रा सेन हमारे बीच नहीं रहीं पर आज भी उनकी सादगी, कला, और अंदाज उनके चाहने वालों को याद है. पारम्परिक मूल्यों को मानने वाले शिक्षक करुनामोय दासगुप्ता की बेटी अभिनेत्री सुचित्रा सेन सादगी में विश्वास रखती थीं. मात्र 16 वर्ष की उम्र में साल 1947 में सुचित्रा सेन का विवाह दिबानाथ सेन से हुआ. सुचित्रा सेन ने `दीप ज्वेले जाई` और `उत्तर फाल्गुनी` जैसी मशहूर बांग्ला फिल्में कीं और हिंदी फिल्मों में `देवदास`, `बंबई का बाबू`, `ममता` तथा `आंधी` जैसी बेहतरीन फिल्में हिन्दी सिनेमा को दीं. साल 1972 में सुचित्रा सेन को पद्मश्री अवार्ड से भी नवाजा गया. सुचित्रा सेन फिल्मी दुनिया में मुकाम हासिल कर रही थीं पर साल 1978 के बाद उन्होंने गुमनामी को अपना साथी बना लिया.😢😭🙏🏻😘😘😘 आज मैं उनको सम्मान प्यार और श्रद्धांजलि देता हूं 🙏🏻 सच्ची मोहब्बत कहां मरती है कभी बस नाम फकत वो मेरे साथ रहती हैं 🙏🏻❤️❤️❤️


*#𝑲𝒊𝒏𝒈𝒐𝒇𝒆𝒓𝒂𝒗𝒂𝒓𝒖𝒏


The Love between us is never forgotten ❤️❤️❤️🙏🏻

Mamta.. aandhi❤️❤️

#SuchitraSen #love 

#Iamvarun 

#kingoferavarun 


🙏🏻🙏🏻

देशराज ज्योत के पीछे सबलोग

 तो एक अच्छी खबर बताऊँ? ये देशराज ज्योत सिंह हैं, उमर 74 की है. देशराज के दो बेटे थे, बीते सालों में दोनों की मौत हो गई. एक 6 साल पहले घर से लापता हुए थे और 6 दिन बाद एक ऑटो में लाश के रूप में पड़े मिले. फिर दो साल पहले एक और बेटे की मौत हो गई. देशराज ऑटो चला रहे थे, देशराज पर फ़ोन आया कि आपका बेटा platform पर पड़ा मिला है उसने सुसाइड कर लिया है. 


एक बूढ़े बाप के लिए बेटों की देह में आग लगाने से भारी क्या हो सकता है? पर ग़रीब मजलूमों को रोने का वक्त भी भगवान नहीं देता. सात लोगों के परिवार का ज़िम्मा बूढ़े बाप पर आ गया. देशराज के 4 नाती-पोते हैं. जब दूसरे बेटे की भी मौत हो गई तो उनकी बच्ची बोली “बाबा क्या मैं स्कूल छोड़ दूँगी?” बूढ़े बाबा ने कहा “नहीं कभी नहीं”. घर में कमाने के लिए देशराज अकेले पड़ गए थे. देशराज ने निकाला ऑटो और कमाने निकल पड़े. पर दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में रहने वाले जानते होंगे कि लॉकडाउन की वजह से ऑटो पर आश्रित परिवारों का क्या हुआ है. ऊपर से देशराज की बूढ़ी पत्नी बीमार पड़ गईं. सारा पैसा बीमारी, और चार बच्चों की पढ़ाई में लग जाता. 


एक दिन देशराज की पोती आई और बोली “बाबा मैं 80% से 12वीं पास हो गई हूं.” उस दिन देशराज उतने खुश हुए कि उस दिन फ़्री में ऑटो चलाया किसी से भी पैसे नहीं लिए, सबको फ़्री में घर छोड़ा. उसी बच्ची ने एक दिन देशराज से कहा कि उसे बीएड करनी है. बीएड करके टीचर बनना है. लेकिन बीएड की फ़ीस थी ज़्यादा. ऑटो चलाने वाले 7 लोगों के परिवार के लिए और भी ज़्यादा. सो देशराज ने अपने हिस्से वाला घर बेच दिया. अपने परिवार को अपने एक रिश्तेदार के घर गाँव में भेज दिया और खुद ऑटो में रहने लगे. 


देशराज की कहानी पर नज़र पड़ी Humans of Bombay नाम के फ़ेसबुक पेज की. इस प्यारे से पेज ने अपने पेज पर देशराज की स्टोरी डाल दी. लोगों ने देशराज को नया घर दिलाने के लिए पैसे इकट्ठा करना शुरू कर दिया. इसके लिए क्राउड फ़ंडिंग की गई, टार्गेट रखा गया 20 लाख का. लेकिन जनता तो जनता है. जनता ने बीस लाख की जगह चौबीस लाख दे दिए. अब जल्द ही मोती सी आँखों वाला ये बूढ़ा आदमी अपना घर ले लेंगे. आहा अपना घर 


श्याम मीरा सिंह

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आखेट : शिकार, शिकारी का

 आखेट : शिकार, शिकारी का

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जंगल में बाघ भला अब बचे कहाँ हैं? जंगल से लगे गाँवों में अलबत्ता मुफ़लिसी और भुखमरी अब भी बची हुई है। भूख बाघ से कुछ कम खतरनाक नहीं होती। वह जो कराए सो कम!


शहरी जीवन में जितनी सुविधाएं हैं, उतनी ही उकताहट भी। सब तरफ भीड़ है। एक अंधी दौड़ है। दिशाहीन। यहlo आजीविका के संघर्ष से शुरू होती है और आगे रहने की होड़ में कभी खत्म नहीं होती। इस भागमभाग में कभी पल भर ठहरकर सोचने पर भागने वाले को मालूम होता है, उसकी दौड़ उस चूजे की तरह है जो मेहनत तो बहुत करता है पर पहुँचता कहीं नहीं। ऐसे मौकों पर उसे गाँव-देहात, खेत-खलिहान और जंगल-बागों की खूब याद आती है। कभी अपराध-बोध के साथ, कभी नॉस्टैल्जिक होकर तो कभी 'एडवेंचर' की आतुरता के साथ। शहरी जीवन की एकरसता को तोड़ने के लिए यह जरूरी भी है!


शहर से जंगल आए सैलानियों को गाँव में उन सारी सुविधाओं को जरूरत होती है, जो शहर में मुहैया होते हैं। वे जंगल में भी जंगली होकर नहीं रह सकते! धैर्य की भी कमी होती है। उन्हें लगता है कि जंगल में प्रवेश करते ही उन्हें जंगल के जानवर चिड़ियाघर की तरह फौरन दिख जाएँ। न सिर्फ दिखें, बल्कि कुछ करतब भी करें। आखिरकार वे इतने पैसे खर्च कर यहॉं पर आए हैं! सुविधाएं मुहैया कराने की जिम्मेदारी गाँव वालों की है, क्योंकि अब यही उनका पेशा है। जंगल से लगे गाँवों में परंपरागत रोजगार अब खत्म ही गए हैं। जंगलों में जंगल वाले महकमे का कब्जा है और बाजार में सरमायेदारों का। गोबर के कंडे भी 'काऊ केक' नाम पर अब ऑनलाइन मिल जाते हैं। गाँव-देहात के लोग करें तो क्या करें? शहर से कोई सैलानी आए तो उस पर शिकारी की तरह टूट पड़ते हैं। चालाक सिर्फ शहर के लोग नहीं होते। यह गाँव वालों को भी आती है।  भूख सब सिखा देती है।


शहर से आए सैलानी (आशुतोष पाठक) को जंगल में बाघ दिखाने की जिम्मेदारी गाइड मुरशेद (नरोत्तम बेन) की है। सैलानी उस खानदान से ताल्लुक रखता है, जिसके पूर्वज कहते हैं कि अपने अच्छे दिनों बहुत बहादुर हुआ करते थे और इसीलिए कभी-कभी अपनी बहादुरी का सबूत देने के लिए बाघों का शिकार कर लिया करते थे। इसलिए नए कानूनों के बन जाने के बावजूद सैलानी को लगता है कि बाघ का आखेट उसका मौलिक अधिकार है। इस अधिकार की रक्षा के लिए वह घर की दीवार पर टँगी एक बन्दूक उठा लाया है, जो पता नहीं चलती भी है या नहीं। यह बात सिर्फ उसे पता है कि उसे शिकार नहीं करना है। वह एक फंतासी रच रहा है। यह फ़क़त एक थ्रिल है, एडवेंचर है। हकीकतन, बाघ के नाम से ही उसे पसीने छूटने लगते हैं।


बाघ भी सिर्फ नाम का है। बस नाम ही बचा है। बचे हुए बाघों की संख्या बहुत कम है। जिस जंगल मे सैलानी को घुमाया जा रहा है, वहाँ सालों पहले बाघों के सफाया हो चुका है। लेकिन सैलानी आते रहें, इसलिए जरूरी है कि बाघों का भरम बनाए रखा जाए। बाघों को लेकर झूठी कहानियाँ गाँव की फ़िज़ाओं में तैरती रहती हैं। इन कहानियों को रस लेकर सुनाया जाता है। पर्याप्त दहशत भरी और कांपती हुई आवाज में। कहानियाँ चलती रहेंगी तो सैलानी भी आते रहेंगे।


बाघ की कहानियाँ झूठी हैं। बाघ के शिकार के लिए लगाया गया मचान सिर्फ एक प्रहसन है। जिस बाघ का आखेट किया जाना है वह है ही नहीं। जिस बन्दूक से बाघ का आखेट किया जाना है, वह पता नहीं चलती भी है या नहीं। सब झूठ है। सच सिर्फ इतना है कि जो इलाके बाघ की दहाड़ से गूँजा करते थे वहाँ बाघ नहीं बचे। उन इलाकों में गरीबी, भूखमरी, अभाव, संघर्ष और जीने की जद्दोजहद बची हुई है। इस जद्दोजहद में पता नहीं चलता कि कौन शिकार हो रहा है और कौन शिकार कर रहा है। एक रसभरा गीत कानों में गूँजता है, "सैंया शिकारी शिकार हो गए।"


निर्देशक रवि बुले पिछले दिनों में लगातार अच्छी कहानियों पर काम कर रहे हैं। इस बार उन्होंने कुणाल सिंह की इस मर्मस्पर्शी कहानी को चुना। नरोत्तम बेन और आशुतोष पाठक अपने किरदारों में सहज-स्वाभाविक लगते हैं।

रवि बुले का आखेट

 खानदानी मूंछ और पुश्तैनी बंदूक के साथ रवि बुले

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एक हैं नेपाल सिंह। खानदानी आदमी हैं। उन्हें  मूंछें बहुत प्रिय हैं। झुक जाए तो ब्लड प्रेशर लो जैसा महसूस होता है। तन जाए तो दीवार पर टंगी पुश्तैनी बंदूक हाथ में आ जाती है। हवेली नुमा घर है। पोस्टऑफिस की लगभग बड़ी सी नौकरी है। जैसा कि खानदानी आदमी के साथ होता है, उनके बचपन में ही  उनके खानदानी पिता ने किसी और 'पिता' को  एक वचन दिया था ।  नेपाल सिंह की जिंदगी में शादी का मौसम आया तो  खानदानी पिता समेत पूरे घर को उस वचन की याद आई।  वचन देने वाला पिता और वचन लेने वाला पिता 'बैंड बाजे और बरात' के बीच समधी बन गए। शहर में पढ़े-लिखे और खानदान के नाम को रोशन करने के लिए बेकरार नेपाल सिर धुनते और पैर पटकते रह गए-"इतना पढ़ाया लिखाया , कम से कम ग्रेजुएट लड़की से तो शादी कराते।" लेकिन उस दिन उन्हें समझ में आ गया कि मूंछ ग्रेजुएशन से बड़ी चीज तो है ही,  परिवार में उससे भी एक बड़ी चीज है-"प्राण जाए पर वचन ना जाए!"

पिता के वचन निभाने के 'आन-बान और शान'  में अपने दाम्पत्य जीवन से करीब-करीब उखड़ चुके नेपाल सिंह के पास सुनाने के लिए खानदान के और भी कई किस्से हैं, जो पोस्टऑफिस में बैठे-बैठे अक्सर अपने साथियों को सुनाया करते हैं। उनके खानदानी शौर्यखाने में एक किस्सा बाघ के शिकार का भी है-"हमारे खानदान में किसने नहीं मारा बाघ....परदादा...दादा....बाप...सबने...एक हम ही रह गए।"


एक हम ही रह गए...इसी  मलाल पर दोस्त रवि बुले की नई फिल्म 'आखेट' खड़ी है। निर्देशन के साथ-साथ संवाद भी बुले जी ने ही लिखा है। कलाकारों में आशुतोष पाठक, रजनीकांत सिंह ,तनिमा भट्टाचार्य नरोत्तम बैन, प्रिंस निरंजन मुख्य हैं।


...और एक दिन अपनी जिंदगी के सबसे बड़े मलाल को पीछे छोड़ने के लिए नेपाल सिंह अपनी बंदूक के साथ बाघ के शिकार पर निकल पड़ते हैं। वह  बेतला के जंगलों में पहुंच जाते हैं। जंगल जाने के लिए उन्हें मुर्शिद का साथ मिलता है। इस प्रसंग में मुर्शिद की जिंदगी के कई अधढके प्रसंग सामने आते हैं। उसकी अघोषित पत्नी जुल्फिया के कई राज सामने आते हैं, लेकिन बार-बार जंगल में जाने के बावजूद बाघ सामने नहीं आता। 

अपने बिना चले बंदूक के साथ लौटते हुए नेपाल सिंह को मुर्शिद का एक वाक्य याद आता रहता है-"वहां जाकर किसी को बताइयेगा नहीं कि जंगल में बाघ नहीं बचे ।" 

नेपाल सिंह अपनी बंदूक फेंक देता है।

 इस कहानी को रवि बुले ने  'सहज साधन' के बल पर निर्देशित कर देखने और सोचने योग्य बनाया। उनके निर्देशीय कौशल को निश्चित रूप से एक बड़े बजट की फिल्म का इंतजार करना चाहिए। आशुतोष पाठक नेपाल सिंह के किरदार में जमे हैं। 


बाघ को बचाना क्यों जरूरी है और मुर्शिद ने ऐसा क्यों कहा-"वहां जाकर किसी को बताइयेगा नहीं कि जंगल में बाघ नहीं बचे? इसे रवि बुले आपने बहुत कलात्मक ढंग से समझाया है....बधाई!

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सोमवार, 5 अप्रैल 2021

क्रूरता और असमानता का रूपक है इन times

 पिछले दिनों मित्र और फिल्मकार व पटकथा लेखक अविनाश दास Avinash Das  के बाबूजी (पिता) और हमारे बाऊजी नहीं रहे। हम लोग मिले। हमने अविनाश से कहा कि हो सकता है हम लोग नहीं मरेंगे। हो सकता है, हमारे बुढ़ापे से पहले हमेशा जिंदा और जवान रहने वाली कोई वैक्सीन बन जाए। अविनाश ने तपाक से कहा कि तब भी तुम्हें मरना होगा। तुमने दुनिया के कारोबार को समझा ही नहीं शायद। अगर ऐसा हुआ तो दुनिया में सिर्फ पैसे वाले लोग जिंदा रहेंगे। गरीबों से उनकी उम्र, अमीरों के लिए छीन ली जाएगी।


मुझे नहीं पता कि अविनाश ने 2011 में आई अमेरिकन फिल्म ‘इन टाइम’ देखी है या नहीं। ...लेकिन एंड्रियू निकोलस की पटकथा और उन्हीं के द्वारा निर्देशित यह फिल्म यही बात कहती है कि दुनिया को चंद लोग नियंत्रित करते हैं। ये चंद लोग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बैठकर और कभी एकसाथ मिलकर भी दुनिया के खेल, उसके नियम तय करते हैं और बाकी दुनिया लंबे अरसे तक इस खेल को नहीं समझ पाती। कुछ लोग समझते हैं, उससे जूझते हैं और उसकी गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश करते हैं, तब तक एक नया खेल रच दिया जाता है। ऐसा ही एक खेल साइंस फिक्शन और फैंटसी की बुनियाद पर खड़ी फिल्म ‘इन टाइम’ है। साइंस फिक्शन और फैंटसी फिल्में अकसर ही हमें वास्तविक दुनिया से बाहर ले जाती हैं। वे एक ऐसी दुनिया रचती हैं, जहां हमें अंततः अच्छा लगने लगता है और कई बार डर और आशंकाओं से भी हम घिर जाते हैं। जब हम जेम्स केमराॅन की ‘अवतार’ जैसी फिल्में देखते हैं, तब अहसास होता है कि हमने एक ऐसी दुनिया बना ली है, जो हमने चाही नहीं थी। या कि जब हम स्पेनिश फिल्म ‘द प्लैटफाॅर्म’ देखते हैं तो एक भय से भर जाते हैं कि जीवन इतना क्रूर भी हो सकता है कि सर्वाइवल के लिए मानव विकास की अब तक हासिल की तमाम सभ्यता को तिलांजलि दे देते हैं। बहरहाल, ‘इन टाइम’ 2011 में आई थी और इसकी उस तरह चर्चा नहीं हुई, जिस तरह इस श्रंखला की इसके आसपास आईं कुछ दूसरी फिल्मों की हुई, लेकिन यह एक बहुत जरूरी फिल्म है। यह फिल्म कोई नई बात नहीं कहती, लेकिन अब तक कई बार कही जा चुकी बात को एक नए ढंग से इस तरह कहती है कि बात नई-सी लगती है। यह फिल्म सामाजिक गैरबराबरी और पूंजी के वर्चस्व का विद्रूप चेहरा दिखाती है।

इस फिल्म की कहानी सन् 2169 से शुरू होती है। एक ऐसी दुनिया की कल्पना जहां समय ही करंसी है। अमीर लोगों के पास लाखों साल की उम्र है। उन्होंने अपनी उम्रें बैंकों में जमा कर रखी हैं। वहीं गरीब लोगों के पास अधिकतम एक दिन की उम्र है। वह एक और दिन की जिंदगी कमाने के लिए मिलों में काम करता है, मजदूरी करता है, पुलिस की या कोई दूसरी नौकरी करता है या सेक्स वर्कर होता है। ...और जो यह सब नहीं करता, वह उम्र चुराता है। लोगों की कलाई पर रेडियम-सी चमकने वाली एक हरे रंग की घड़ी चलती रहती है। लोग दूसरों की कलाई पकड़कर उनकी उम्र खुद में ट्रांसफर कर सकते हैं। जिंदा बने रहने की जद्दोजहद हर रोज की है। बल्कि कई बार तो दिन में दो या तीन बार लगता है कि जिन्दगी चंद मिनट की मेहमान है। इस बेबसी को समझा जा सकता है कि उम्र के इस बंटवारे और गैरबराबरी के खिलाफ आवाज उठाने के लिए भी आपके पास समय नहीं है। एकदम बढ़ा दी गई मंहगाई और टैक्स से कुछ ही देर में जाने कितने लोगों की मौत हो जाती है और लोग उसके खिलाफ कुछ नहीं कह पाते। इसकी वजह यह है कि जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, उनके सुंदर-सुंदर शहर अलग बसे हुए हैं। उन शहरों में पहुंचने के लिए टोल टैक्स के रूप में ही महीनों की उम्र खर्च हो जाती है। मिलों में काम करने वाले मजदूरों को उनके मेहनताने के रूप में कुछ घंटों या एक दिन की उम्र मिलती है। ये लोग चाहकर भी विद्रोह नहीं कर सकते। अमीर लोगों ने अपनी उम्रें बैंकों में जमा कर रखी हैं। कुछ अमीर लोगों ने बैंक खोल रखे हैं, जहां मजदूरों या जरूरतमंदों को मोटे ब्याज पर समय लोन पर दिया जाता है। ये लोन इतने भी नहीं होते कि विद्रोह करने में मददगार साबित हों।

इस फिल्म का हीरो विल सालस (जस्टिन टिम्बरलेक) एक मिल मजदूर है और एकदम बढ़ा दी गई मंहगाई के चलते अपनी 50 साल की मां को खो देता है। मां के पास डेढ़ घंटे का समय बचा था। बस का किराया अचानक एक घंटे से बढ़ाकर दो घंटे कर दिया जाता है। मां को दौड़कर अपने बेटे की तरफ जाना पड़ा और इससे पहले कि बेटा अपनी उम्र में से कुछ उम्र उसे ट्रांसफर करता, मां का टाइम खत्म हो चुका होता है। वह मर जाती है। इससे पहले उसका विद्रोही पिता भी मर गया था। पहले तो विल सालस को लगता है कि यही सिस्टम है, ऐसा ही होता है। लेकिन बाद में उसे एक इंसान मिलता, जो अमीर है और जिसके पास सैकड़ों साल की उम्र है। वह सालस को बताता है कि यह कोई कुदरती नियम नहीं है, बल्कि कुछ लोग इसे नियंत्रित कर रहे हैं। चंद लोग अमर हो सकें, इसके लिए ज्यादातर का मरना जरूरी है। यह बात और उसकी मां की मौत विल सालस को इस सिस्टम के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार करती है।

इस फिल्म की एक खास बात और है कि इसमें सभी की उम्र 25 साल पर आकर थम जाती है। मतलब यह कि फिल्म में कोई बूढ़ा नहीं है। 50 साल, 100 साल या इससे अधिक उम्र के लोग भी 25 साल के ही दिखते हैं। इस फिल्म की डिटेलिंग के लिए एंड्रियू निकोलस की तारीफ की जानी चाहिए। फिल्म में आठ क्लास हैं। हर क्लास के अलग शहर-ठिकाने हैं। विल सालस का क्लास आखिरी है। वह झोपड़पट्टी में रहता है। यहां रहने वाले सभी लोग समय-समय पर अपनी उम्र वाली घड़ी देखते रहते हैं, वे तेज-तेेज चलते हैं, बल्कि दौड़ते हुए चलते हैं, वे चुटकियों में खाना खा लेते हैं, हर काम जल्दी करते हैं। वहीं, जो अमीर हैं, उन्हें किसी काम की जल्दबाजी नहीं है। वे कभी अपनी घड़ी नहीं देखते।

इस फिल्म को देखने के बाद एक डर भी पैदा होता है, कि जब दुनिया की तमाम पूंजी चंद लोगों की जेब में सिमट गई है, तब उम्र!, हवा और धूप जैसी प्राकृतिक रूप से सभी को मिलने वाली चीजों पर भी कुछ लोगों का नियत्रण हो गया, तो क्या होगा। मां-बाप और बच्चों, प्रेमी-प्रेमिकाओं के प्रेम को ग्लोरीफाई करने वाले इस समाज में अगर परीक्षा की ऐसी घड़ी आ गई कि उम्र बांटने पड़े हर रोज, तब क्या होगा। फिलहाल जीवन की खूबसूरती इस बात में है कि जीवन सभी के लिए अनिश्चित है। 


भगवान दादा

 आज के समय में भगवान दादा की पहचान सिर्फ दो हिस्सों में बंध गई हैं एक ओर उन्हें अमिताभ बच्चन के आइकॉनिक डांस का जनक माना जाता है दूसरी तरफ उनकी कहानी फिल्मी सितारों के अर्श से फर्श तक पहुंचने के एक बड़े उदाहरण के रूप में सुनाई जाती है  l

 की ये दोनों पहचानें अपनी-अपनी जगह पर बिलकुल पुख्ता हैं मगर हिंदी सिनेमा में बहुत कुछ ऐसा है जिसकी नींव भगवान दादा की रखी हुई है उनका असली नाम 'भगवान आभाजी पालव ' था आज उन्हें हास्य अभिनेता के रूप में याद किया जाता है मगर भगवान दादा  हिंदी सिनेमा में अपने एक्शन खुद करने वाले शुरुआती लोगों में से एक थे


1951 में ‘अलबेला’ के साथ दो फिल्मे और रिलीज हुईं, आवारा,और  बाजी तीनों फिल्मों ने हिंदी सिनेमा को तीन आइकॉनिक सुपरस्टार दिए. राजकपूर, गुरुदत्त और भगवान दादा.... इन फिल्मों में तीनों का अंदाज एक दूसरे से बिलकुल जुदा था और तीनों की किस्मत भी एक दूसरे से बिलकुल जुदा थी.....फिल्म ‘अलबेला’ ने दादा को खूब शोहरत दिलवाई. ‘शोला जो भड़के’ और ‘भोली सूरत दिल के खोटे’ जैसे गानों में किए गए अलबेले डांस को अमिताभ बच्चन, गोविंदा, मिथुन जैसे अभिनेता अपनाते रहे है  ...'अलबेला 'भगवान दादा के जीवन में पैसों की बरसात लेकर आई दादर की दो कमरों की चॉल से जुहू बीच पर 25 कमरों के बंग्ले का सफर दादा ने तय किया.....लेकिन ये कामयाबी ज्यादा समय तक नहीं रही और भगवान दादा को शोहरत चमत्कार की तरह मिली और उसी तरह से रूठी भी ......देखते ही देखते भगवान दादा दादर की उसी चॉल में वापस आ गए जहाँ से उन्होंने अपना सफर शुरू किया था .........मगर ग़ुरबत और मुसलिफी में भी उनकी लोकप्रियता का आलम ये था की हर साल दादर के गणपति विसर्जन के समय थोड़ी देर के लिए विसर्जन दादर की उस चॉल के सामने रुकता था. दादा बाहर निकलकर अपना सिग्नेचर डांस करते थे, फिर विसर्जन आगे बढ़ता था....


आज हिंदी सिनेमा की आइकॉन हस्ती 'भगवान दादा 'की जयंती (1-अगस्त 1913)  है ..🌷🌷🌷


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पवन मेहरा ✒


#ब्लॉग_सुहानी_यादें_बीते_सुनहरे_दौर_की.


गीतकार भरत व्यास

 हिंदी फिल्मो के मशहूर गीतकार भरत व्यास जी की पुण्यतिथि 4 जुलाई पर विशेष ...


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फिल्म 'जनम जनम के फेरे’ (1957 ) के गीतों ने लोकप्रियता की नई ऊँचाइयों को छुआ और हिट हुए' शायद आपको पता न हो इस संगीतमय फिल्म 'जनम जनम के फेरे 'के गीतकार भरत व्यास के जीवन से एक दर्दनाक वाकया भी जुड़ा है जिसे उन्होंने अपने गीत ‘ज़रा सामने तो आओ छलिये’ में व्यक्त भी किया......अगर आप ये गाना सुनेगे तो उनका दर्द महसूस भी करेंगे मोहम्मद रफ़ी और लता जी की आवाज़ में ये गाना अमर हो गया भरत व्यास जी ने पीड़ा से भरे ये शब्द इस गाने में लिखे जिसे संगीतकार एस.एन त्रिपाठी ने गाने में शामिल करके उनके दर्द का भी सम्मान किया ..

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पवन मेहरा

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कुंदन लाल सहगल

 आज 18 जनवरी को देश के पहले संगीत सम्राट दिवंगत के एक सहगल जी की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि.🙏.

जब कभी भी हिंदुस्तानी फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास को देखा जाएगा तो के.एल सहगल का नाम उन चंद हस्तियों में पाया जाएगा साल 1932 से लेकर 1946 के सिनेमा के समय को 'सहगल युग' के तौर पर जाना जाता है सहगल ने ‘जब दिल ही टूट गया’, ‘दिया जलाओ’, ‘चाह बर्बाद करेगी’, ख्याल, ठुमरी, चैती, दादरा, ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’ और ‘गम दिए मुस्तकिल’ जैसे गाने गाए थे के.एल सहगल की काफी इज्जत करने वालों में दिलीप कुमार भी शामिल थे। एक बार उन्होंने के एल सहगल के बारे में कहा था, ..... ''उस जमाने में फिल्मों में काम करने वाले लोगों को लोग इज्जत की नजरों से नहीं देखते थे'' 

 कुंदन लाल सहगल उन चुनिंदा हस्तियों में से हैं जिन्होंने इस कला को समाज के पटल पर स्थान दिलाया। 'कभी पंजाबी होने के कारण उन्हें बंगाली गाना गाने और एक्टिंग करने से मना कर दिया गया था लेकिन उन्होंने इसके बावजूद ऐसा मुकाम बनाया कि उनके बंगाली गायन को इस फिल्म में खूब पसंद किया गया। खुद रबीन्द्रनाथ टैगोर ने सहगल के तारीफ में कहा था..

 '' तुम्हारा गला कितना सुंदर है ''

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 Kundan Lal Saigal

Died: 18 January 1947

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 पवन मेहरा

#ब्लॉग_सुहानी_यादें_बीते_सुनहरे_दौर_की ✍️


 

रविवार, 4 अप्रैल 2021

Tv का सहारा tha...

 the great show man of the bollywood 

 🌷🌻🌷🌻🌷🌻

#raaj_kapoor ❣️❣️❣️❣️

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उन दिनों #टीवी ही एकमात्र #मनोरंजन का माध्यम था । 

हर रविवार को एक #सीरीज में फिल्में आती थी ।

#आरकेबैनर की फिल्में प्रति #रविवार को एक आती थी ।

मैंने कभी राज कपूर की कोई फ़िल्म नही देखी थी । न ही उन दिनों मुझे #ब्लैक एंड वाइट #फिल्मों आकर्षण नजर आता था ।

लेकिन #संयोग से जाने #अनजाने वह मुझे देखनी पड़ गई ..

टीवी मेरे सामने था तो देखनी पड़ी ।

#टीवी पर ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म चल रही थी ।

कभी कभी मैं टीवी की तरफ भी देख लेता था । लेकिन

जैसे ही मैंने देखना शुरू किया तो देखता चला गया ।

सबसे पहले मैंने जो फ़िल्म देखी वह आरके बैनर की #आह

फ़िल्म थी । बहुत पसंद आई , मै #राजकपूर का फैन बन गया । हर हफ्ते आने वाली #राजकपूर की फ़िल्म का बेताबी से इन्तजार करने लगा ।

मैंने क्रमशः #आह_आग_आवारा_श्री_420_अब_दिल्ली #दूर_नहीं_बूट_पोलिस_जिस_देश_मे_गंगा_बहती_है , #संगम_मेरा_नाम_जोकर_बॉबी_प्रेमरोग_सत्यम_शिवम #सुन्दरम_धर्मकर्म_हिना_राम_तेरीगंगा_मैली , आदि फिल्मे जिनमे खास रूप से राजकपूर का निर्देशन रहा सभी देख डाली ।


उनकी फिल्मों के #गीत , #संगीत , #कहानी , #लोकेशन्स , #एक्टिंग , #फोटोग्राफी , व #संदेश का जो #खूबसूरत तरीके से प्रदर्शन किया गया है,  वह अविस्मरणीय है , दुर्लभ है , सदा याद किया जाएगा । सभी फिल्मों की कहानियों , घटनाओं प्रसंगों गीतों को इस तरह गढ़ा गया है कि यथार्थ से जुड़ी कहानी सीधी दिल को छू जाती है 

#जन्मदिवस_14_दिसंबर_पर_ग्रेट_शोमैन_को_नमन 

   

       ____  #MUNEESH

        

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गुलाम अली. खां साहब

 याद पिया की आए !


भारतीय शास्त्रीय संगीत के पुरोधा मरहूम उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब संगीत जगत के शिखर पुरूषों में एक रहे हैं। धीर-गंभीर आवाज़ और विलक्षण अदायगी के लिए जाने जाने वाले खां साहब की संगीत-यात्रा सारंगी वादन से शुरू हुई थी। कालांतर में उन्होंने खयाल और ठुमरी गायन में महारत हासिल की। पटियाला घराने के खां साहब की भारतीय शास्त्रीय संगीत को सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने विभिन्न संगीत शैलियों - ध्रुपद, ग्वालियर घराने और जयपुर घराने के खूबसूरत संयोजन से गायकी की एक बिल्कुल नई शैली, नया अंदाज़ विकसित किया जिसमें मधुरता और लचीलेपन के साथ संक्षिप्तता का भी अनोखा गुण भी शामिल हुआ। दिखने में पहलवानी डील -डौल और बेहद कड़क मिज़ाज के खां साहब अपनी गायिकी और संवेदनाओं में बहुत मुलायम थे। भारत विभाजन के बाद परिस्थतिवश वे पाकिस्तान चले गए, लेकिन जल्द ही वहां की कट्टरता और धर्मांधता से निराश होकर भारत लौट आए। देश के बंटवारे पर उनकी संगीतमय टिप्पणी यह थी - अगर हर घर के एक बच्चे को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी गई होती तो इस मुल्क़ का बंटवारा कभी नहीं होता।


खां साहब की गाई कुछ ठुमरियां-याद पिया की आये, आये न बालम का करूं सजनी, नैना मोरे तरस गये, तिरछी नजरिया के बान, पिया बिना नाहीं चैन, कटे ना बिरहा की रात आदि आज भी ठुमरी के प्रेमियों की पहली पसंद बनी हुई हैं। उनके भजन ‘राधेकृष्ण बोल’ ने महात्मा गांधी को बहुत प्रभावित किया था। खां साहब को सिनेमा का अगंभीर माहौल कभी पसंद नहीं आया। तमाम प्रलोभनों के बावजूद फिल्मों से उन्होंने हमेशा एक दूरी बनाकर रखी, लेकिन अंततः फिल्म 'मुगल-ए-आज़म' के फिल्मकार के. आसिफ़ और संगीतकार नौशाद की ज़िद के आगे वे हार गए। वे 'मुग़ल-ए-आज़म' में तानसेन की आवाज़ बने थे। राग सोहनी और रागेश्वरी पर आधारित दो गीत - 'प्रेम जोगन बन के' तथा 'शुभ दिन आयो' गाकर उन्होंने उस फिल्म को गंभीरता और ऊंचाई दी थी। खां साहब की संगीत विरासत आज भी ग़ज़ल गायक गुलाम अली सहित उनके कई नामचीन शागिर्दों के रूप में जीवित है। आज मरहूम उस्ताद की जयंती  पर उन्हें खिराज-ए-अक़ीदत !


(चित्र में लता मंगेशकर के साथ उस्ताद बड़े गुलाम अली खां)


Dhruv Gupt

शशि चमकती रहेंगी सदा सदा

 बॉलीवुड की अब तक की सबसे ज्यादा ग्लैमरस,हसीन वेम्प,खलनायिका शशिकला जी का आज 4 अप्रैल को दुपहर में 88 वर्ष की आयु मर निधन हो गया,विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है।

  उनके फिल्मी जीवन से जुड़ी संक्षिप्त जानकारी संकलन से, निम्न अनुसार दी गयी है...

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*


*शशिकला जी का जन्म दिन 4 अगस्त 1933 है*


*जन्म नाम-शशिकला जावलकर(भावसार-नामदेव)*

*पहली फ़िल्म-करोड़पति (1936 बाल कलाकार)*

*पहली फ़िल्म-1952 में जीनत में कव्वाली सिन में*

*पहली फ़िल्म-सुजाता जिससे पहचान मिली*

*पहला फिल्मफेयर अवार्ड-आरती*

*दूसरा फिल्मफेयर अवार्ड-गुमराह*

*शादी-पति ओम प्रकाश सहगल (के एल सहगल परिवार)*

*प्रमुख फिल्में-सुजाता,आरती,गुमराह,अनपढ़,फूल और पत्थर, वक्त,खूबसूरत,तीन बहुरानिया, तीन बस्ती चार रास्ता*

*पद्मश्री अवार्ड से नवाज़ी गई*

*सबसे खूबसूरत खलनायिका-पहचान*

*फिल्मी नग़मे-प्रमुख*

1)-आगे भी जाने न तो पीछे भी जाने न तो

2)-शीशे से पी या पैमाने से पी,या मेरी आँखों के मैखाने से पी,तू पी दीवाने तू पी

3)-तुम जियो हजारों साल साल के दिन हो पचास हजार

4)-दिल जो न कह सका,वही राजे दिल कहने की रात आई

5)-कंकरिया मार के जगाया,कल तू मेरे सपनों में आया

6)-ये शहर बड़ा अलबेला लगा है हसीनों का मेला

7)-नैन तुम्हारे मजेदार ओ जनाबे आली

8)-भीगी भीगी फ़िज़ा, सुन सुन क्या कहे हवा

9)-ऊँचे हिमालय के नीचे

10)-आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैय्या

11)-प्यार मोहब्बत के सिवा ये जिंदगी क्या जिंदगी

12)-ये रास्ते है प्यार के चलना संभल संभल के

*सँकलनसे-संतोष कुमार मस्के*

शशि कला जो अब नही रही

 शशिकला.... खुबसूरत और  तुफानी  मुसकराहट की मालकिन...! 


शशिकला का जन्म ता.4.8.1932  के रोज  सोलापुर में एक महाराष्ट़ियन फेमीली में हुआ था.. उनके पिता जी अनंत राव जावलकर  कपडे़ के व्यापारी थे.. धनवान शिक्षीत और गौरवशाली फेमीली था... पर न जाने कया हुआ....!  जावलकर फेमीली के  बुरे दिन आये..! परिवार गरीब हो गया और  बडे परिवार को निभाने का फर्ज शशिकला को अदा करना पडा...! 


शशिकला के भाई को चार्टर एकाउंटेंट बनाने के लिए इंग्लैंड भेजा गया था.. आशा थी कि  वह परिवार की देखभाल करेगा.... पर अफ़सोस..! वह वापिस आया ही नहीं... परिवार को गरीबी में छोड़ कर वह इंग्लैंड में ही सेटल हो गया!. 


शशिकला को बचपन से ही अभीनय का शौक था.


शशिकला के पिताजी के एक मित्र ने शशिकला को फिल्मों में नशीब आजमाने की नशिहत दी.. 


और शशिकला और उनके पिताजी ने फिल्म स्टुडियो के चककर काटना शुरू किया..!. 


एक बार उस समय की  जानी मानी अभीनेत्री नूरजहां ने शशिकला को देखा और उसे फिल्म जीन्नत के लिए पसन्द करली...! इस तरह जीन्नत  शशिकला की पहेली फिल्म थी.


शशिकला  इस फिल्म में एक कव्वाली  आहे न भरी शिकवे न किये कुछ भी न जुबां से काम लीया..मे परदे पर दिखाई दी.. मेरा खयाल हे.. शायद अभीनेत्री शयामा भी इसी फिल्म में इसी कव्वाली में परदे पर दिखाई दी थी...! 


उसके बाद 1947 में नुरजहा दिलीप कुमार की फिल्म जुगनू आइ.. इस फिल्म में गायिका रोशन आरा बेगम का गाया हुआ   देश की पुरफेंक दिलकश हवा ओ मे रंगी.. गीत शशिकला पर फिलमाया गया... उस वक्त शशिकला बेहद खुबसूरत लगती थी तो उस गीत मे शशिकला के  बहोत सारे कलोज अप परदे पर दिखाये गये... फिल्म की हिरोइन नुरजहा से भी ज्यादा...! 


उसके बाद  1950 मे दिलीप कुमार कामीनी कौशल की फिल्म आरजू में भी शशिकला कमला के रोल में दिखाई दी.


शशिकला  बहोत ही प़तीभाशाली और खुबसूरत होते हुए भी उसे हिरोइन की भुमिकाए जयादा मिली नहीं.और जीस फिल्म में वह हिरोइन थी वह फिलमें फलोप हो गई..! 1953 में शम्मीकपुर के साथ शशिकला की एक  फिल्म जिवन जयोती आइ थी.इस फिल्म में  चांद उस्मानी और शशिकला हिरोइनें थी.शायद शम्मीकपुर की भी शुरूआत की फिल्म थी. फिल्म खास चली नहीं


शशिकला को हिरोइन के रोल न मिले तो उसने जो भी फिलमें मिले वह लेना शुरू कर दिया.. केरेक्टर रोल करने लगी.. घर जो चलाना था..! पैसे की बहोत जरूरत थी..! 


1962 में ताराचंद बडजातया की फिल्म आरती आइ. अशोक कुमार  मीना कुमारी और प़दिप कुमार भी थे इस फिल्म में.. एक मराठी नाटक पर आधारित थी इस फिल्म.शशिकला को फिल्म में झगडालू और कमिनी भाभी का रोल ओफर किया गया.. शशिकला के फेमीली वालों ने उस रोल को स्विकार लेने को दुराग्रह किया.. शशिकला ने रोल किया.. शशिकला के अभीनय की बहुत प़संसा हुइ..  फिल्म आरती के लिए शशिकला को सन 1962 का बेस्ट  सपोर्टिंग एकट़ेश का फिल्म फेर एवोर्ड भी मिला था..! 


फिर कया...! शशिकला को बहोत सारी फिलमें मिलने लगी.. जयादातर वेंप के रोल मिलते थे...! फिल्म फूल और पत्थर और अनुपमा के रोल के लिए  नोमीनेशन मिला पर फिल्म फेर एवोर्ड न मिलने से निराश भी हुई.....! पर  फिल्मों से पैसे मिलने से फेमीली को सेट कर शकी... 


1970 के दशक का पूर्वांध शशिकला के जीवन का सबसे खराब समय रहा... फिल्मों में काम मिलना कम हो रहा था.. शशिकला  व्यवसायीक और  पारावारिक समस्याओं से दुखी हो गई...! वह ईगतपुर चली गई.. ! 


कइ साल योगासन और ध्यानासन में गुजारे.. मधर टेरेसा के साथ रहे कर  दुखी लोगों की सेवा भी की. और मन की शांति  पाइ.. शशिकला की एक बेटी केंसर ग़सित होकर परलोक सिधार  ग इ.... लेकिन शशिकला ने अपने आप को संभाला...! 


उसके बाद... 


आठ साल के बाद  शशिकला ने फिल्म और  टीवी के छोटे परदे पर  फिर से पुरनागमन  किया... 


कूछ टीवी सीरीयलो और महाराजा.. लहुके दो रंग.. सलमा पे दिल आ गया जैसी फिलमों में भी काम किया... सावन कुमार ने कहा था.. मीना कुमारी के लिये जो रोल लिखा था वह शशिकला ने अदा किया...! 


शशिकला ने फिल्म आरती.. गुमराह.. हरियाली और रास्ता.. अनपढ़.. जंगली.. यह रास्ते हे प्यार के.. वक्त जैसी कई फिलमों में काम किया.. 


फिल्म पदमश्री लालू प्रसाद यादव में शायद शशिकला को आखिरी बार देखा था.


फिल्म वक्त 1965 की रानी साहेबा.. जिस के गले में से राजा(राजकुमार) हार चुराता हे.. और फिल्म फूल और पतथर का वह मशहूर गाना शिशे से पी या पैमाने से पी.. या मेरी आंखों के मैखाने से पी... वाले शशिकला के रोल आज भी नजर के सामने घुमते हे..! 


और...! 

फिल्म गुमराह की असली हिरोइन तो शशिकला ही थी..! कैसी हसीन लगती थी वोह..! Killer smile  के साथ उंगली में  चेइन हिलाते चलना.. फिल्म गुमराह में उनकी लाक्षणिक अदा थी..! फिल्म गुमराह में शशिकला का अभीनय जानदार था और उसके लिए शशिकला को सन 1964 में बेस्ट सपोर्टिंग एकट़ेस का फिल्म फेर एवोर्ड भी मिला था..! 


शशिकला ने ओम प्रकाश सयगल से शादी की हे.


शशिकला मेरी फेवरिट अदाकारा हे.


आज  तारीख 4.4.2021  के रोज  बंबई  मे शशीकला जी का देहांत हो गया...समाचार सुनकर बडा दुख हुआ. !!