रविवार, 1 फ़रवरी 2015

बैंक और बीमा योजना में फंसा आम आदमी

 


















देवाशिष बसु /  January 27, 2015









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बैंकों द्वारा बीमा योजनाएं बेचने से बैंकों को तो कमाई हो रही है लेकिन इसका खमियाजा उपभोक्ताओं को चुकाना पड़ रहा है। इस समस्या से कैसे निपटा जाए, विस्तार से बताने का प्रयास कर रहे हैं देवाशिष बसु

आप बैंक में अपने सावधि जमा (फिक्स्ड डिपॉजिट या एफडी) को नए सिरे से निवेश करने की प्रतीक्षा में बैठे हैं तभी बैंक का एक कर्मचारी आपके पास आता है और आपको सुझाव देता है कि अपने पैसे को एफडी में ही निवेश करते रहने के बजाय आप बीमा योजनाएं क्यों नहीं खरीदते? वह आपको बताता है कि इन बीमा योजनाओं में कमाल की विशेषताएं हैं।

वह आपको बताता है कि अगर आप सालाना 2 लाख रुपये का प्रीमियम चुकाने को तैयार हों तो 25 साल बाद आपके पास एक करोड़ रुपये का कोष तैयार हो जाएगा। आप इन सारी बातों से आकर्षित हो जाते हैं और जब आप बैंक से बाहर निकलते हैं तो आपके पास एक ऐसी योजना होती है जिसमें आपको अगले 25 सालों के दौरान वार्षिक 5 फीसदी से भी कम की दर से प्रतिफल हासिल होता है। ध्यान से देखने पर आप पाएंगे कि यह प्रतिफल तो उस एफडी से भी खराब है जिसे करने से आपके बैंककर्मी ने आपको रोक दिया था। कई अन्य मामलों में तो लोगों को इससे भी बुरी स्थिति का सामना करना पड़ता है।

आखिर बैंकर आपको बीमा योजना खरीदने और अपना पैसा बैंक से निकालने के लिए क्यों प्रेरित करता है? दरअसल आपकी जानकारी के बिना ही बैंक बीमा कंपनियों के लिए बिक्री एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। बैंक अगर आपको बीमा योजना खरीदवाता है तो उसे आपकी एफडी की तुलना में कहीं अधिक कमीशन मिलेगा। इसके अलावा उसे विपणन सहयोग के नाम पर भी कमाई होगी। यह सिलसिला चलते एक दशक से अधिक वक्त बीत गया। बीमा नियामक ने अब तक इकलौता कदम यह उठाया है कि उसने बैंक जैसे संस्थानों द्वारा की जाने वाली लूट की मात्रा थोड़ा कम कर दी।

करीब दो सप्ताह पहले भारतीय रिजर्व बैंक ने बीमा योजनाएं बेचने वाले बैंकों के लिए नए दिशा निर्देश जारी किए जिन्हें बैंकएश्योरेंस का नाम दिया गया। चूंकि बैंक बतौर एजेंट काम कर रहे हैं इसलिए हमारे प्रति यानी बैंक के ग्राहकों के प्रति उनकी एक न्यूनतम जिम्मेदारी होती है। नए दिशानिर्देशों के तहत बैंकों को ब्रोकर के रूप में काम करने का विकल्प दिया गया है। सब जानते हैं कि बीमा ब्रोकर को हमेशा और अनिवार्य तौर पर उपभोक्ता के हितों का ध्यान रखना होता है न कि बीमा कंपनी के।

लेकिन बैंक चाहते हैं कि वे अपनी शाखाओं के नेटवर्क का इस्तेमाल करके बीमा कंपनी से फायदा उठाएं। वे बतौर ब्रोकर ऐसा कुछ नहीं कर सकते क्योंकि बीमा एजेंट की तरह ब्रोकर के लिए किसी एक कंपनी की बीमा योजनाओं की बिक्री करना सही नहीं है। इतना ही नहीं वे ब्रोकर के काम से जुड़ी जिम्मेदारियां और जवाबदेही भी नहीं उठाना चाहते। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या नए दिशानिर्देशों को ध्यान में रखते हुए बैंक बीमा ब्रोकर बनेंगे? इसका उत्तर न ही होना है लेकिन मैं आशा करता हूं कि कम से कम एक बैंक ऐसा होगा जो बीमा ब्रोकर की भूमिका निभाकर मुझे गलत साबित करेगा और उपभोक्ताओं के पक्ष में खड़ा होगा।

इस मॉडल को संक्षेप में देखें तो बैंकों के पास लाखों की संख्या में ग्राहक होते हैं और बीमा कंपनियां उन तक पहुंचना चाहती हैं। इसलिए वे कंपनियां बैंकों के साथ साझा कारोबार की शुरुआत करती हैं। एचडीएफसी बैंक और एचडीएफसी लाइफ इसका उदाहरण है। वे उपभोक्ताओं को प्रेरित करते हैं कि वे अपने साझेदार द्वारा दी जाने वाली बीमा योजनाएं ही खरीदें। जाहिर है इससे उपभोक्ता के समक्ष विकल्प एकदम सीमित हो जाते हैं। इस तरह बिना किसी जिम्मेदारी या दबाव के पूरा कमीशन व लाभ बैंक के पास पहुंच जाता है। इतना ही नहीं कुछ योजनाएं जो उपभोक्ता के लिए निहायत बुरी होती हैं, वे बैंकों के लिए पर्याप्त कमीशन जुटाने वाली साबित होती हैं।

इस मामले में एक अंदरूनी व्यक्ति की राय जानना बेहतर होगा। दीपक सतवालेकर वर्ष 2011 में ने केवल एचडीएफसी लाइफ को चला रहे थे बल्कि वे बैंकएश्योरेंस पर बीमा नियामक आईआरडीए की समिति के सदस्य भी थे। उन्होंने लिखा, 'अपने वितरण नेटवर्क के साथ बैंकों ने बीमा कंपनियों को लगभग बंधक बना लिया है। उन्होंने अपने लिए अधिक से अधिक लाभ कमाने के चक्कर में किसी खास बीमा कंपनी की योजनाओं में अधिक रुचि दिखाई है। ऐसे में अगर बैंकों को अलग-अलग इलाकों में दो अलग-अलग बीमा कंपनियों को चुनने का अधिकार दिया जाता है तो यह एक तरह से फिरौती को कानूनी बनाने जैसा होगा।' गौर कीजिए कि सातवेलकर केवल बीमा कंपनियों के दुख की बात कर रहे हैं, जरा सोचिए ग्राहकों का क्या हाल होता होगा?

संक्षेप में कहें तो बैंकएश्योरेंस मॉडल अपने मूल में उपभोक्ता विरोधी है। आरबीआई ने इस पर जो दिशानिर्देश दिए हैं उनमें बैंकों से कहा गया है कि वे एक ऐसी व्यवस्था विकसित करें जिसमें उपभोक्ताओं के लिए योजनाओं की निरंतरता का आकलन किया जा सके। उसने बैंकों से यह भी कहा है कि वह अपने उपभोक्ताओं के साथ निष्पक्षता, पारदर्शिता और ईमानदारी से पेश आए और ऐसी योजनाओं को किसी बैंक योजना के साथ जोड़कर न पेश करे। इसके अलावा शिकायत निस्तारण के लिए एक मजबूत आंतरिक व्यवस्था बनाने की बात भी कही गई। सवाल यह उठता है कि अगर बैंक इन बातों का अनुपालन नहीं करते हैं तो क्या होगा? इस पर आरबीआई का कहना है कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लिया जाएगा और बैंकों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

लेकिन अतीत में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के मामले में आईआरडीए और आरबीआई का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है। आरबीआई ने कभी ग्राहकों के साथ गलत व्यवहार के लिए बैंकों पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की है। कोबरापोस्ट स्कैंडल के खुलासे के बाद भी बैंकों को हल्के में जाने दिया गया। इन दिशानिर्देश में ऐसा कुछ नया नहीं है जिसके चलते बैंक अपने मौजूदा आक्रामक व्यवहार को बदलें और बीमा योजनाएं बेचने में थोड़ी सभ्यता का परिचय दें। जब बैंक ब्रोकर बनने से इनकार कर देंगे तो यह बात जल्दी ही सबके सामने आ जाएगी।

आरबीआई को क्या करना चाहिए था? उसे अधिकांश विकसित देशों की तर्ज पर सैद्घांतिक तौर पर वित्तीय सेवा कंपनियों के आचरण और उपभोक्ताओं के हितों को नियामकीय व्यवस्था के केंद्र में ला देना चाहिए। लेकिन चूंकि भारतीय नियामक ऐसा नहीं करेंगे इसलिए अब वक्त आ गया है कि वित्त मंत्रालय का वित्तीय सेवा विभाग इसमें दखल दे और विभिन्न नियामकों के शिकायत निवारण विभाग को अलग करके एक स्वतंत्र संस्था बनाए जो सभी वित्तीय सेवा कंपनियों के आचरण पर नजर रखे और उनको ग्राहकों के प्रति जवाबदेह बनाए। वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) ने इस विचार की अनुशंसा की थी और संभावित संस्था को फाइनैंशियल रिड्रेसल एजेंसी का नाम भी दिया था। अब वक्त आ गया है कि जितनी जल्दी संभव हो ऐसी एजेंसी का गठन किया जाए।

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