सोमवार, 8 मई 2017

आज भी खरे हैं तालाब (एक कालजयी पुस्तक)



रचनाकार
अनुपम मिश्र
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प्रकाशक
गांधी शांति प्रतिष्ठान,
नई दिल्ली
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पृष्ठ - १२०
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मूल्य :  ७५ रुपये
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प्राप्ति-स्थल
गांधी शांति प्रतिष्ठान,
२२१ दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली-११० ००२
ऐसी विरली ही पुस्तकें होती हैं जो न केवल पाठक तलाशती हैं, बल्कि तलाशे पाठकों को कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तराशती भी हैं। अपनी प्रसन्न जल जैसी शैली तथा देश के जल स्रोतों के मर्म को दर्शाती एक पुस्तक ने भी देश को हज़ारों कर्मठ कार्यकर्ता दिए हैं। पुस्तक का नाम है 'आज भी खरे हैं तालाब'। श्री अनुपम मिश्र द्वारा लिखित तथा गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक का पहला संस्करण १९९३ में छपा। पाँचवाँ संस्करण २००४ में छपा और कुल प्रतियाँ २३००० छपीं। लेकिन ९३ से २००४ के बीच पुस्तक ने देश भर में आवारा मसीहा की तरह घूम-घूम कर अपने-अपने क्षेत्र के जल स्रोतों को बचाने की अलख जगा दी और यह सिलसिला आज भी जारी है।
अपने देश में बेजोड़ सुंदर तालाबों की कैसी भव्य परंपरा थी, पुस्तक उसका पूरा दर्शन कराती है। तालाब बनाने की विधियों के साथ-साथ अनुपम जी की लेखनी उन गुमनाम नायकों को भी अंधेरे कोनों से ढूँढ़ लाती है, जो विकास के नए पैमानों के कारण बिसरा दिए गए हैं।
पुस्तक के बारे में मूर्धन्य पत्रकार प्रभाष जोशी ने इसके छपने के तुरंत बाद ही जो लिखा था वही शायद इस पुस्तक को सही स्थान देने की सही कोशिश कर पाता है। प्रभाष जी के लेख के कुछ अंश ज्यों के त्यों दायीं तरफ़ दिए गए बक्से में है।
पुस्तक के पहले संस्करण के बाद देशभर में पहली बार अपने प्राचीन जल स्रोतों को बचाने की बहस चली, लोगों ने जगह-जगह बुजुर्गों की तरह बिखरे तालाबों की सुध लेनी शुरू की। इसकी गाथा बेशक लंबी है, लेकिन फिर भी देखने का प्रयास करते हैं।
मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित जल राणा राजेंद्र सिंह बताते हैं कि राजस्थान की उनकी संस्था तरुण भारत संघ के पानी बचाने के बड़े काम को सफल बनाने में इस पुस्तक का बहुत बड़ा हाथ है। मध्यप्रदेश के सागर जिले के कलेक्टर श्री बी. आर. नायडू, जिन्हें हिंदी भी ठीक से नहीं आती थी, पुस्तक पढ़ने के बाद इतना प्रभावित हुए कि जगह-जगह लोगों से कहते फिरे, 'अपने तालाब बचाओ, तालाब बचाओ, प्रशासन आज नहीं तो कल अवश्य चेतेगा।' श्री. नायडू की ये मामूली अलख सागर जिले के १००० तालाबों को निरंजन कर गई। ऐसी ही एक और अलख के कारण शिवपुरी जिले के लगभग ३४० तालाबों की सुध ली गई। मध्यप्रदेश के ही सीधी और दमोह के कलेक्टरों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में इस पुस्तक की सौ-सौ प्रतियाँ बाँटी।
पानी के लिए तरसते गुजरात के भुज के हीरा व्यापारियों ने इस पुस्तक से प्रभावित होकर अपने पूरे क्षेत्र में जल-संरक्षण की मुहिम चलाई। पुस्तक से प्रेरणा पाकर पूरे सौराष्ट्र में ऐसी अनेक यात्राएँ निकाली गईं। पानी बचाने के लिए सबसे दक्ष माने गए राजस्थान के समाज को भी इस पुस्तक ने नवजीवन दिया। राजस्थान के प्रत्येक कोने में पुस्तक के प्रभाव के कारण सैकड़ों जल-यात्राओं के साथ-साथ हज़ारों पुरातन जल-स्रोत सँभाले गए। ऐसी अनेक यात्राएँ आज भी जारी हैं।
जयपुर जिले के ही सालों से अकालग्रस्त लापोड़िया गाँव ने इस पुस्तक को आत्मा में बसाया। लापोड़िया गाँव ने पुस्तक से प्रेरणा पाकर न केवल अपनी जलगाहें बचाईं, बल्कि अपने प्रदेश की चारागाहें तथा गोचर भी बचाए। लापोड़िया के सामूहिक प्रयासों का नतीजा यह रहा कि आज ३०० घरों का लापोड़िया, जयपुर डेयरी को चालीस लाख वार्षिक का दूध दे रहा है। जल-जंगल संरक्षण के ऐसे ही आंदोलनों से लापोड़िया को लक्ष्मण सिंह जैसा नेतृत्व क्षमता वाला नायक मिला। उनकी इन्हीं क्षमताओं के कारण आज लापोड़िया के आसपास के ३०० गाँव अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं। शहरों की ओर पलायन में निरंतर गिरावट आई है।
पुस्तक का प्रभाव उत्तरांचल में भी हुआ। यहाँ पौड़ी-गढ़वाल के उफरेखाल क्षेत्र के दूधातोली लोक विकास संस्थान के श्री सच्चिदानंद भारती ने पुस्तक से प्रेरणा पाकर पहाड़ी क्षेत्रों की विस्तृत चालों (पानी बचाने के लिए पहाड़ी तलाई) को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया। इस दौरान पिछले १३ सालों में उन्होंने १३ हज़ार चालों को बचाया-बनाया। उनके इन्हीं प्रयासों से उजड़े हिमालय के शीश पर फिर से हरियाली का मुकुट दिखने लगा है।
गैर हिंदी भाषी राज्य कर्नाटक में इस पुस्तक का सीधा प्रभाव राज्य सरकार पर पड़ा। कर्नाटक सरकार ने तालाब बचाने का काम सीधे अपने ही हाथ में ले लिया और वहाँ एक जल १संवर्धन योजना संघ' बनाया गया तथा विश्व बैंक की मदद से पूरे राज्य के तालाब बचाने की योजना तैयार की गई है। इसी राज्य की ही इंफोसिस कंपनी के मालिक श्री नारायणमूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति ने इस पुस्तक का कन्नड़ में अनुवाद किया है और ५० हज़ार प्रतियाँ छपवाकर कर्नाटक की प्रत्येक पंचायत में भिजवाने की योजना बनाई है।
हरित क्रांति के जेहादी नारे के बाद निरंतर रेगिस्तान की ओर अग्रसर पंजाब में इस पुस्तक का नाद सुनाई दिया। सर्वप्रथम इसका पंजाबी अनुवाद मालेरकोटला से प्रकाशित 'तरकश' नामक पत्रिका में शुरू हुआ। फिर इसका एक संक्षिप्त पंजाबी संस्करण छपा जो मुफ्त में बाँटा गया। कुछ वर्षों बाद इसके अनुवाद के साथ पंजाब के सुख-दुख जोड़कर एक पुस्तक की शक्ल दी गई। इस नए अनुवाद का व्यापक प्रभाव रहा। पंजाब के साहित्यकारों, आलोचकों, लोकगायकों, सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं के साथ-साथ प्रमुख संतों, यहां तक कि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्यों पर भी इसका खासा प्रभाव पड़ा। पंजाबी अनुवाद का श्री गुरुनानक देव जी की नदी का उद्धार करने वाले संत बलवीर सीचेवाल जी ने बेहद रचनात्मक उपयोग किया। वे अब नदी किनारे होने वाले वार्षिक साहित्यिक सम्मेलनों में पुस्तक ख़रीद कर रचनाधर्मियों को भेंट करते हैं। पंजाब के लोकगायकों ने इस पुस्तक को पढ़ने के बाद अपने तरीके से जलस्रोतों को बचाने की मुहिम शुरू की है। देश के अधिकतर लेखक तथा प्रकाशक पुस्तकें न पढ़ने वाले पाठकों का रोना रोते हैं। पर वे शायद ये भूल जाते हैं कि पुस्तकों का सच्चा अर्थ समाज के नाम लिखा प्रेम-पत्र होता है। और कितनी पुस्तकें ऐसी होती हैं, जिनमें समाज के लिए प्रेम भरा होता है? श्री अनुपम मिश्र की इस कृति ने यही काम किया है। 'आज भी खरे हैं तालाब' पुस्तक न केवल धरती का, बल्कि मन-माथे का अकाल भी दूर करती है।
बंगाल का किस्सा भी मज़ेदार है। जहाज़ से हथियार गिराए जाने के बाद सूर्खियों में आए पुरुलिया नामक कस्बे की एक घुमक्कड़ पत्रकार निरुपमा अधिकारी वहाँ के एक अकाल क्षेत्र का दौरा करती-करती अचानक हरियाली देखकर ठिठक गईं। गाँव वालों से पता चला कि उस गाँव में कुछ तालाब ज़िंदा थे, इसलिए वहाँ धरती के भीतर की नमी अभी शेष थी। तालाबों की उपयोगिता के बारे में निरुपमा की दृष्टि साफ़ होती चली गई। इसी बीच निरुपमा के एक मित्र ने उन्हें तालाब पुस्तक भेंट की। निरुपमा का जीवन पुस्तक पढ़ते-पढ़ते बदलता गया। रोजी-रोटी का पक्का प्रबंध न होने के बावजूद निरुपमा ने इसका बांग्ला अनुवाद किया। अब इस अनुवाद का दूसरा संस्करण भी छप चुका है।
कई राज्यों से गुजरते हुए पुस्तक के किस्से महाराष्ट्र भी पहुँचे। कभी जलसंसाधन मंत्रालय के सचिव रह चुके औरंगाबाद के प्रसिद्ध इंजीनियर माधव चितले की आँखों के सामने से जैसे ही यह पुस्तक गुजरी, उन्होंने इसके मराठी अनुवाद की तत्काल ज़रूरत महसूस की। बेशक यह पुस्तक आज की इंजीनियरिंग शिक्षा पद्धति को आईना दिखाता है, फिर भी माधव जी ने इसका मराठी अनुवाद 'औरंगाबाद संस्कृति मंडल' के सौजन्य से छापा।
भूकंप में ध्वस्त हो चुके गुजरात में भी इस पुस्तक का अनुवाद किया गया। श्री दिनेशभाई संघवी ने पुस्तक का अनुवाद किया तथा गुजराती समाचार पत्र 'जन्मभूमि प्रवासी' ने इसे धारावाहिक रूप में छापा।
देशभर में अमृत छिड़कने के बाद यह पुस्तक फ्रांस की एक लिखिका एनीमोंतो के हाथ लगी। एनीमोंतो ने इसे दक्षिण अफ्रीकी रेगिस्तानी क्षेत्रों में पानी के लिए तड़पते लोगों के लिए उपयोगी समझा। फिर उन्होंने इसका फ्रेंच अनुवाद किया। ताज़ा जानकारी के अनुसार पुस्तक के प्रभाव के कारण इस क्षेत्र में पानी की सँभाल में काफी तेज़ी आई है।
भारत ज्ञान-विज्ञान परिषद ने इसकी २५ हज़ार प्रतियाँ छापकर मुफ्त में बांटी। मध्यप्रदेश जनसंपर्क विभाग ने भी २५ हज़ार प्रतियाँ छापकर प्रदेश की प्रत्येक पंचायत तक पहुँचाया। भोपाल के राज्य संसाधन केंद्र ने इसकी ५०० प्रतियाँ ५०० गाँवों में बाँटी। अहमदाबाद की 'उत्थान माहिती' नामक संस्था ने ५०० प्रतियाँ छापकर सामाजिक संस्थाओं में मुफ्त बाँटी। नागपुर के स्वराज प्रकाशन ने ५ हज़ार प्रतियाँ छापकर मुफ्त में बाँटी। बिहार के जमालपुर की संस्था 'नई किताब' ने भी इसकी ११ सौ प्रतियाँ बाँटी। देशभर के १६ रेडियो स्टेशन पुस्तक को धारावाहिक रूप में ब्रॉडकास्ट कर चुके हैं। कपार्ट की सुहासिनी मुले ने इस पुस्तक पर बीस मिनट की फ़िल्म भी बनाई है। सीमा राणा की बनाई फिल्म दूरदर्शन पर आठ बार प्रसारित हो चुकी है।
भोपाल के शब्बीर कादरी ने पुस्तक का उर्दू अनुवाद किया और मध्यप्रदेश के मदरसों में मुफ्त में बाँटी। उर्दू तथा पंजाबी अनुवाद पाकिस्तान भी पहुँच चुके है।
गुजरात की एक संस्था 'समभाव' के श्री फरहाद कांट्रैक्टर पर इस पुस्तक का गहरा प्रभाव पड़ा। श्री फरहाद राजस्थान के बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, अलवर, जोधपुर, महाराष्ट्र तथा गुजरात के कई हिस्सों में पुराने जल स्रोतों को बचाने के एक विराट काम में जुटे हैं। गुजरात की ही श्रीमती डेजी कांट्रेक्टर इस पुस्तक के अंग्रेज़ी अनुवाद कर रही हैं।
सदियों से ऐसी मान्यता है कि मनुष्य जाति का विकास मीठे जल-स्रोतों के मुहानों पर ही हुआ। जीवन के राग-विराग मनुष्य ने वहीं पर सीखे, लेकिन विकास की अंधी होड़ में मनुष्य के चारों ओर अंधेरा बढ़ता जा रहा है। इस अंधेरे की बाती को हम सब तथा हमारी तरह-तरह की नीतियाँ-प्रणालियाँ दिन-ब-दिन बुझाने की कोशिश में लगी हुई हैं।
देश के अधिकतर लेखक तथा प्रकाशक पुस्तकें न पढ़ने वाले पाठकों का रोना रोते हैं। पर वे शायद ये भूल जाते हैं कि पुस्तकों का सच्चा अर्थ समाज के नाम लिखा प्रेम-पत्र होता है। और कितनी पुस्तकें ऐसी होती हैं, जिनमें समाज के लिए प्रेम भरा होता है?
श्री अनुपम मिश्र की इस कृति ने यही काम किया है। 'आज भी खरे हैं तालाब' पुस्तक न केवल धरती का, बल्कि मन-माथे का अकाल भी दूर करती है।
सुरेंद्र बंसल
८ सितंबर २००८

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