गुरुवार, 7 मई 2015

धधकती आग पर झरिया में जीवन का सफर






 
प्रस्तुति-- रिद्धि सिन्हा नुपूर 
झरिया
झरिया कोयला खदानों में आग का फैलाव लगभग सवा सौ साल से जारी है.
झरिया के कोयला खदानों में 100 साल से भी लंबे अरसे से धधक रही आग की समस्या अब और गहरा गई है और प्रशासन ने नागरिकों को इलाके से हटाने का काम शुरू कर दिया है.
प्रशासन का कहना है कि वो नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है और उन्हें दूसरे क्षेत्र में बसाने के व्यापक इंतजाम किए गए हैं.
हालांकि 'कोकिंग कोल' के लिए प्रसिद्ध खदानों में उन्नीसवीं सदी के अंत से ही आग लगी हुई है लेकिन इससे पहले नागरिकों को वहां से हटाने की जरूरत नहीं महसूस की गई थी.
आज झरिया का आठ वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाका आग की चपेट में है जिनके बीच ऐसी अनगिनत बसाहटें मौजूद हैं जहां चारों तरफ सिर्फ आग, धूंए और जहरीली गैसों का बोलबाला है.
इस कारण लोग बड़ी तादाद में फेफड़े और दूसरी तरह की बीमारियों के शिकार हैं. जमीन के भीतर धधक रही आग से मकानों को धंसने का खतरा भी बराबर बना रहता है.

'धीमी मौत को मजबूर'

"आग प्रभावित आबादी वाले इन इलाकों में कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है जिसमें सैकड़ों जानें जा सकती हैं. इसके अलावा इन बस्तियों के आस-पास रिस रहे जहरीले गैस के कारण लोग गंभीर बीमारियों के शिकार होकर धीमी मौत मरने को मजबूर हैं."
सतीश पूरी, महानिदेशक, खनन सुरक्षा विभाग
धनबाद स्थिति खनन सुरक्षा विभाग के महानिदेशक सतीश पुरी कहते हैं, ''आग प्रभावित आबादी वाले इन इलाकों में कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है जिसमें सैकड़ों जानें जा सकती हैं. इसके अलावा इन बस्तियों के आस-पास रिस रहे जहरीले गैस के कारण लोग गंभीर बीमारियों के शिकार होकर धीमी मौत मरने को मजबूर हैं.''
सतीश पुरी का कहना है कि लोगों की सुरक्षा और राष्ट्रीय संपदा को बर्बाद होने से बचाने का एक ही रास्ता है कि लोगों को दूसरे इलाकों में बसाया जाए.
लेकिन सालों से कई तरह की समस्याएं झेल रहे नागरिक वहां से हटने को तैयार नहीं.
चारों तरफ आग से घिरी बस्ती बोकापहाड़ी में रहने वाली उमा देवी कहती है, ''जलते कोयले के बीच रहते हुए भी ये जगह मेरे लिए स्वर्ग है, मुझे यहीं रोजगार मिलता है, जिसकी सुविधा विस्थापित कॉलोनियों में नहीं.''
क्लिक करें इस कहानी को सुनने के लिए यहां क्लिक करें-
अब्दुल जब्बार कहते हैं, ''जिस बेलगड़िया कॉलोनी में उन लोगों को विस्थापित किया जा रहा है वहां की ना तो आबो-हवा अच्छी है ना ही माहौल. हम भी बहू-बेटी वाले हैं, ऐसी जगह कैसे चले जाएं जहां ना तो हमारे घर की महिलाएं सुरक्षित हैं और ना हीं हमारे बच्चों का विकास हो सकता है.''

रोजी-रोटी

कुजामा इलाके में अपने तीन बच्चों और पति के साथ रहने वाली अफसाना खातून कहती है, "मेरे पति किराए पर टेंपो चलाते हैं अगर प्रशासन विस्थापितों के लिए बनी बेलगढ़िया कॉलोनी में उन्हें एक टेंपो दे दे तो वो वहां अपने परिवार के साथ जा सकती है वर्ना हमारा घर कैसे चलेगा?"
लेकिन झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकरण का दावा है कि उसने विस्थापन के लिए कई योजनाएं चलाई हैं, जिनमें इन्हें छह महीने तक आर्थिक मदद देने, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, तकनीकी शिक्षा देने और इलाज की सुविधा है, लेकिन इसके बावजूद प्रशासन को लोगों का समर्थन नहीं मिल पा रहा है.
"मैं बोकापहाड़ी में एक प्राइवेट स्कूल चलाया करता था, जिससे इन गरीब मां-बाप के बच्चों को शिक्षा भी मिलती थी और मेरे बच्चे भी पल रहे थे. अगर मुझे बेलगढ़िया में स्कूल खोलने के लिए दो कमरा मिल जाए तो शायद अपने परिवार को भूखे मरने से बचा पाऊं."
अनंत प्रसाद, बोकापहाड़ी निवासी
झरिया पुनर्वास एवं विकास प्राधिकरण के प्रभारी गोपालजी कहते हैं, ''विस्थापन अपने आप में एक कष्टप्रद स्थिति है जिस कारण इन निजी कॉलोनियों में रहने वाले लोगों के मन में प्रशासन और बीसीसीएल के प्रति अविश्वास की भावना पैदा हो गई है जिस कारण वे इस पुनर्वास प्रक्रिया में सहयोग नहीं कर रहे हैं.''
लेकिन बेलगढ़िया में क्वार्टर मिलने के बाद भी वहां नहीं जाने वाले परिवारों में से एक मुन्नी देवी कहती हैं, ''प्रशासन हमें सिर्फ वहां जाकर छोड़कर आ रही है. फिर हम क्या खाते हैं, कैसे जीते हैं ये देखने कोई नहीं आता. जो आर्थिक मदद दी जा रही है उससे हमारा घर कब तक चलेगा, बेहतर ये होता कि हमारे लिए स्थायी रोजगार का इंतजाम किया जाता.''
वो कहती हैं कि मदद चाहे कितनी भी बड़ी क्यों ना हो जाए वो आपके जीने का साधन नहीं बनती.
एक विस्थापित परिवार के मुखिया अनंत प्रसाद कहते हैं कि, ''मैं बोकापहाड़ी में एक प्राइवेट स्कूल चलाया करता था, जिससे इन गरीब मां-बाप के बच्चों को शिक्षा भी मिलती थी और मेरे बच्चे भी पल रहे थे. अगर मुझे बेलगढ़िया में स्कूल खोलने के लिए दो कमरा मिल जाए तो शायद अपने परिवार को भूखे मरने से बचा पाऊं.''

आग का फैलाव

झरिया
इलाके में कुजामा बस्ती जैसी दर्जनों बसाहटें हैं जहां हर तरफ धधकती आग नजर आती है.
कहा जाता है कि भारत ही नहीं बल्कि पूरे एशिया में प्राइम कोकिंग कोल का 90 प्रतिशत उत्पादन झरिया में होता है. इसका इस्तेमाल इस्पात, लोहा, सीमेंट और बिजली के उत्पादन में किया जाता है.
लेकिन सवा-सौ साल से इस इलाके में जारी खनन के कारण कृषि भूमि का नाश भी हुआ है, धरती बंजर हुई है, खानों से जहरीले गैसों का रिसाव और खदानों में आग के विस्तार के कारण भू-धंसान की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.
सेंट्रल माइनिगं रिसर्च स्टेशन यानि सीएमआरआई के पूर्व निदेशक और सेवानिवृत वैज्ञानिक त्रिभूवन नाथ सिंह कहते हैं, ''साल 1973 में जब कोलफील्ड को राष्ट्रीयकृत किया गया तब भी यहां भूतल में 70 स्थानों पर आग सक्रिय थी लेकिन तब उन इलाकों में आबादी नहीं थी. इसलिए आग का बढ़ने और खनन का काम साथ-साथ चलता रहा और लोग बेफिक्र रहे.
"इसकी एक वजह ये भी रही कि उस समय अंडरग्राउंड माइनिंग की जाती थी.''
वो कहते हैं, ''आग का फैलाव साल भर में एक से 15 मीटर तक हो सकता है. इसलिए अगर कोई घर पच्चीस मीटर की जमीन पर बना है तो उसे धंसने में सामान्यत: तीन साल का वक्त लगता है.
इसी कारण लंबे समय तक इससे इक्का-दुक्का परिवार हीं प्रभावित हुए और लोगों में दहशत का माहौल भी नहीं तैयार हुआ. लेकिन इस बीच आग का विस्तार लगातार जारी रहा.''
आज झरिया का 8.9 वर्ग किलोमीटर इलाका आग की चपेट में है जो गंभीर स्थिति है.
समाजसेवी पीनाकी मजूमदार कहते हैं, ''हमें ध्यान रखना होगा कि इस पुनर्वास के दौरान दूसरी जगह ले जाकर बसाए जा रहे लोग शरणार्थी ना बन जाएं, क्योंकि देश में नर्मदा से लेकर बोकारो स्टील प्लांट तक के मामले में हुए विस्थापनों का उदाहरण लें तो पाएंगे कि लोगों को अपने ही देश में शरणार्थी बनने की स्थिति में पहुंचा दिया गया है.''
वो कहते हैं कि कोयला राष्ट्रीय संपत्ति है और उसे बचाना बेहद जरूरी है लेकिन जो लोग यहां दशकों से रहते आए हैं उनके लिए सम्मानजनक जीवन का इंतजाम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

इसी विषय पर और पढ़ें

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें