गुरुवार, 7 मई 2015

औरतों का गांव बाराटांड इर्फ माओका वाद






लेखक--गौतम सरकार भागलपुर, बिहार से

प्रस्तुति-- रिद्धि सिन्हा नुपूर  

हम औरतों वाले गांव में थे. बाराटांड. टांड यानी अनुपजाऊ ज़मीन... रेणु ने सिमराहा को लेकर लिखा था-धूसर, वीरान, अन्तहीन प्रान्तर... नहीं-नहीं, बाराटांड की धरती तो ऐसी नहीं है. लेकिन इस गांव में लोगों के कलेजे ऐसे ही हो गये हैं. गांव की गलियों में खामोशी पसरी रहती है और घरों में हवा की भांय-भांय करती आवाज. गांव में जब आप घुसेंगे तो आपको केवल औरतें नज़र आएंगी... लेकिन सब की सब चुप.
कमली देवी

अब जैसे कमली देवी को ही लें. कमली देवी के लिये यह अजीब सा इंतजार है, जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेता. वे हर रोज बहुत उम्मीद के साथ अपने पति भोला तांती का इन्तजार करती हैं और गांव के देवी-देवताओं को याद करते हुये दूसरी औरतों की तरह अपने मांग के सिन्दुर को सहेजती हैं.

बिहार के बांका जिले के जंगल और पहाड़ियों के बीच बसे जिस बाराटांड गाँव में कमली देवी रहती हैं, वहां ऐसा करने वाली वे कोई अकेली औरत नहीं हैं. 49 परिवारों वाले इस गांव में 37 से ज्यादा घरों में औरतें ऐसा ही करती हैं. उनके मरद इस गांव में नहीं रहते. ये औरतें अपनी मांग के सिन्दुर को छूकर अपने-अपने सुहाग की रक्षा की कामना करती हैं. गांव में जब कोई डाकिया आता है या कहीं से कोई संदेश आता है तो सबकी छाती धड़कने लग जाती है. कौन जाने, किसकी कैसी खबर आई हो...!

दो साल पहले तक ऐसा नहीं था. बाराटांड भी देश के दूसरे गांवों की तरह ही था लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि गांव की यह कहानी बदल गई. गांव के सारे वयस्क पुरुष पलायन कर गये. यह रोजी-रोटी के लिये किया गया पलायन नहीं था. यह पलायन धमकी के कारण हुआ था. ऐसी धमकी कि जिसकी दहशत आज भी कायम है.

कमली देवी को वो तारीख आज भी याद है. 5 अक्टूबर 2010 की शाम. दीवाली का दिन था और लोग घरों में दीया-बाती की तैयारी कर रहे थे. गांव में माओवादियों के एक दस्ते ने धावा बोला और फिर वो दीवाली गांव की आखिरी दीवाली बन गई. कमली देवी के 22 साल के जवान बेटा गुलाबी तांती और गांव के घनश्याम तांती को वहीं मौत के घाट उतार दिया गया. इस हमले में घायल संजय तांती तो दो महीने तक मौत से लड़ता रहा लेकिन पटना के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उसने भी दम तोड़ दिया. कमली देवी खुद भी तीन महीने तक अस्पताल में भर्ती रहीं. लेकिन तीन महीने बाद जब वे गांव लौटीं तो इनका संसार बदल चुका था. जवान बेटे की मौत के बाद इनके पति भी गांव छोड़ कर जा चुके थे.

माओवादियों के इस हमले के पीछे की कहानी भी हमें कमली ने ही सुनाई.

अगस्त के महीने में गांव में भटक रहे एक अजनबी से गांव वालों का झगड़ा हो गया. अजनबी शाम को फिर गांव में जब पहुंचा तो उसके साथ हथियारबंद लोग थे. गांव के लोगों के साथ फिर विवाद हुआ और हथियारों की धौंस दिखाई गई. जब बात, बात से नहीं बनी तो हथियार सामने आये. लेकिन अधिक संख्या में मौजूद गांव वालों के सामने यह हथियारबंद दस्ता नहीं ठहर सका. भारी आक्रोश से भरे हुये गांव वालों ने एक हथियारबंद युवक को पीट-पीट कर मार डाला और उससे बरामद हथियार पुलिस को सौंप दिये गये. यह तो बाद में पता चला कि जो हथियारबंद दस्ता गांव में आया था, वह भाकपा माओवादी के लोग थे.

इसके बाद दीवाली की शाम माओवादियों ने गांव पर हमला बोल दिया. पड़ोस के धोबरणा गांव के एक निवासी अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं- “माओवादियों ने परचा छोड़ा कि इस गांव के हरेक ग्रामीण को सबक सिखाया जाएगा.”
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