शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

पुरानी दिल्ली की पुरानी बातें -1


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अंधेरे में चमकती लालटेन और बुलंद आवाज

डा.रामेश्वर दयाल 

पुरानी दिल्ली (शाहजहांनाबाद) में रमजान और ईद के दौरान का माहौल देखने लायक होता है। इस पर्व को पहले की तरह ही उल्लास और उमंग से मनाया जाता है, लेकिन बदलते वक्त के साथ इसे मनाने के तरीकों में कुछ बदलाव हो गया है। पुराने वक्त में इस शहर में सहरी और इफ्तार देखने लायक हुआ करती थी। आज तो सब लोगों को इनके वक्त का पता चल जाता है। लेकिन जब अधिकतर घरों में घड़ियां नहीं हुआ करती थी, तब दूसरे तरीकों से इनकी जानकारी ली जाती थी। सहरी का वक्त चूंकि अलसुबह होता था, इसलिए लोगों को इसकी जानकारी देने के लिए उस दौरान कोई जुनूनी व्यक्ति इस काम को करता था। अलसुबह मुस्लिम बहुल इलाकों में उसको देखा जा सकता था। उसके एक हाथ में डंडा होता था और दूसरे हाथ में जलती लालटेन। उसकी आवाज खासी बुलंद होती थी और वह रोजा रखने वालों को यह कहकर जगाता था कि उठ जाओ सहरी का वक्त होने वाला है। उसकी आवाज से घरों में जाग हो जाती थी और रोजा रखने वाले लोग नित्यकर्म में लग जाते थे। इस व्यक्ति को रोजा रखने वाले लोग रोज शुक्रिया बोलते थे।
शाम होते वक्त भी इफ्तार खोलने के वक्त दूसरे तरीके अपनाए जाते थे। उस वक्त जामा मस्जिद के अंदर बम का गोला (आतिशबाजी) फोड़ा जाता था। वह खासा बड़ा होता था और उसकी आवाज पुरी पुरानी दिल्ली में सुनी जा सकती थी। इस गोले की आवाज के साथ दूसरे इलाकों में भी लोग छोटे-बड़े बम फोड़ते थे, ताकि सबको पता चल जाए कि इफ्तार का वक्त हो गया है। उस वक्त इफ्तार खोलने से पहले बाजारों का माहौल देखने लायक होता था। दुकानदार आपस में मिलकर इफ्तार खोलने के लिए बड़ी-बड़ी परातों में फल काटकर उन्हें सजाकर दुकानों के बाहर रख देते थे। साथ में घड़ों या जग में मीठा शरबत भी रख लिया जाता था। जैसे ही उन्हें बम की आवाज सुनाई देती। लोग इफ्तार खोलना शुरू कर देते। इस दौरान कोई व्यक्ति रोजा खोलने के लिए घर की ओर भागा जा रहा है तो ये दुकानदार उसे रोक लेते और अपने साथ बिठाकर उसका रोजा खुलवाते। इस खानपान में हिंदुओं को भी शामिल करना सामान्य बात हुआ करती थी।
ईद से एक दिन पहले चांद रात को पूरी रात बाजारों में रौनक होती। उस दिन घरों की महिलाओं को खरीदारी करने की छूट मिली होती थी। घर के घर उठकर बाजारों में पहुंच जाते और मनपसंद सामान खरीदा जाता। सुबह होते ही सजने-संवरने की तैयारी शुरू हो जाती और साथ में मस्जिदों में नमाज पढ़ने की गहमागहमी भी। नमाज अदा होने के बाद गले मिलने का दौर शुरू होता। सभी धर्म के लोग एक दूसरे को बधाई देते। घरों से खुशबू निकलती थी। ईदी देने का दौर शुरू हो जाता और फिर खाने-पीने और घूमने की चाहत उठने लगती। पुरानी दिल्ली में ईद का त्योहार कम से कम चार दिन चलता था। इस दौरान दूसरे घरों में जाकर ईद की बधाई और पकवान भेजे जाते। फिर फिल्में देखने का दौर शुरू हो जाता। उसके बाद पूरी दिल्ली का भ्रमण किया जाता और मेलों-ढेलों का मजा लिया जाता।

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