बुधवार, 14 सितंबर 2022

पितरों के प्रति श्रद्धा का अनुष्ठान -4

 


*श्राद्ध-कर्म में प्रयुक्त पात्र


अर्घ्य देने, श्राद्ध-भोजन पकाने, परोसने एवं ग्रहण करने के पात्रों (बर्तनों) के विषय में भी धर्मग्रंथों में व्यापक दिशा-निर्देश हैं।


कात्यायन के श्राद्ध सूत्र (2) में निर्देश है कि अर्घ्य-जल यज्ञीय वृक्षों (पलाश, अश्वत्थ, उदुम्बर) से बने चमसों (प्यालों एवं कटोरों) अथवा सोने, चांदी, ताम्र, खड्ग (गेंडे के सींग के पात्रों) रत्नों अथवा पत्तों के दोनों में दिया जाना चाहिए।


अधिकांश धर्मशास्त्रों ने श्राद्ध-कर्म में धातु, विशेषतः चांदी के पात्रों का प्रयोग निर्दिष्ट किया है। मार्कण्डेय (31/65) एवं वायु पुराण 74/3) का कथन है कि पितरों ने चांदी के पात्र में स्वधा दुही थी, अतः चांदी का पात्र पितृगणों को असीम संतुष्टि देता है। अर्घ्य, पिण्डदान तथा भोजन परोसने के लिए चांदी के बर्तनों को प्रधानता देने के निर्देश हैं, किन्तु देव-कृत्यों के लिए चांदी शुभ नहीं कही गई है।


पद्म पुराण (सृष्टि 9/145-151) में आया है कि पात्र यज्ञीय काष्ठ, पलाश, चांदी अथवा समुद्री सीप-शंख आदि के होने चाहिए; चांदी शिव की आंख से उत्पन्न होने के कारण पितरों को अत्यंत प्रिय है।


प्रजापति (111) ने कहा है कि तीन पिण्डों को सोने, चांदी, तांबे, कांसे अथवा गेंडे के सींग के पात्र में रखना चाहिए, मिट्टी अथवा काठ के पात्र में नहीं। इसमें आगे (112) निर्देश है कि पकाने के पात्र तांबे अथवा अन्य धातुओं के होने चाहिए, किन्तु शोधित मिट्टी के पात्र (पकाने के लिए) सर्वोत्तम हैं। लोहे के पात्र में पका भोजन कौए के मांस के समान बताते हुए सर्वथा वर्जित किया गया है। कहा गया है कि श्राद्ध-भोजन लोहे के बर्तन में पकाने वाला रौरव नरक की यातनाएं सहता है।


*पाक-क्रिया एवं परोसना


श्राद्ध-भोजन पकाने तथा उसे परोसने के विषय में भी शास्त्रों में अनेक नियम हैं। प्रजापति स्मृति (57-62) में आया है - पत्नी, कर्ता के गोत्र की कोई सौभाग्यवती या सुन्दर स्त्री, जो पति वाली हो, भाई वाली हो और गुरुजन की आज्ञा का पालन करने वाली हो; कर्ता के गुरु की पत्नी, मामी, फूफी या मौसी, बहन, पुत्री, वधू - ये सभी सधवाएं श्राद्ध-भोजन बना सकती हैं। अच्छे कुल की नारियां, जिनकी संतानें अधिक हों, जो सधवा हों और जो पचास वर्ष के ऊपर हों, चाहे वे विधवा हो चुकी हों, चाची, मामी, माता या पितामही - श्राद्ध-भोजन बना सकती हैं। किन्तु वह नारी नहीं, जो श्वेत अथवा नीले वस्त्र पहने हो, जिसके केश खुले हों, जो चोली नहीं पहनती हो, जो रुग्ण हो अथवा जिसने सिर को धो लिया हो (अनुशासन 29/15)। अपना भाई, चाचा, भतीजा भान्जा, पुत्र, शिष्य, बहन का पुत्र तथा बहनोई भी इसके योग्य हैं।


विष्णु धर्मसूत्र (27/13-14) के अनुसार सबसे पहले विश्वेदेव ब्राह्मण को भोजन परोसना चाहिए, किन्तु एक बार भोजन प्रारम्भ हो जाए, तो यह प्राथमिकता समाप्त हो जाती है; तब जहां आवश्यकता हो, वहां परोसा जा सकता है। परोसने वाला उपवीत पद्धति से जनेऊ धारण किया होना चाहिए। सभी प्रकार का खाद्य एवं नमक (किसी पात्र से ही) खाली हाथ से नहीं परोसा जाना चाहिए।


*श्राद्ध के प्राचीन रूप


अति प्राचीनकाल में मृत पूर्वजों के निमित्त केवल तीन कृत्य किए जाते थे -


1. पिण्ड पितृ यज्ञ : यह उनके द्वारा किया जाता था, जो श्रौताग्नियों में यज्ञ करते थे, अथवा

मासिक श्राद्ध, यह उनके द्वारा किया जाता था, जो श्रौताग्नियों में यज्ञ नहीं करते थे (आश्वलायन गृह्य सूत्र 215/10)।


2. महा पितृ यज्ञ : यह चातुर्मास अथवा साकमेध में संपन्न किया जाता था।


3. अष्टका श्राद्ध : यह पूर्णिमा के पश्चात आठवें दिन किया जाता था। गौतम (8/19) ने इस श्राद्ध को सात पाकयज्ञों एवं चालीस संस्कारों में परिगणित किया है और इसका विशेष महत्व है, किन्तु इसके सम्पादन के दिन, मासों, अधिष्ठाता देवों, आहुतियों एवं विधि के विषय में मतैक्य नहीं है।


पार्वण श्राद्ध : यह श्राद्ध बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि इसकी विधि ही अन्य श्राद्धों, यहां तक कि अष्टकाओं की भी विधि मानी गई है। सूत्रकाल से लेकर अब तक इसके विषय में विभिन्न मत प्रकाशित हुए हैं। यद्यपि प्रमुख बातें एवं स्तर समान ही हैं, किन्तु प्रयुक्त मंत्रों, विस्तारों एवं कतिपय विषयों के क्रम में भेद पाया जाता है।


शतपथ ब्राह्मण (2/4/2) में पिण्ड पितृ यज्ञ (अर्थात पार्वण श्राद्ध विधि) का विस्तृत तथा लगभग सर्वमान्य वर्णन मिलता है -


जब चंद्र पूर्व या पश्चिम में नहीं दिखाई पड़ता, तब वह (दर्श यज्ञ का कर्ता) प्रत्येक मास में पितरों को भोजन देता है। वह ऐसा अपराह्न में करता है। गाह्र्यत्य अग्नि के पृष्ठ भाग में बैठ कर दक्षिणाभिमुख होकर एवं यग्योपवीत दाहिने कंधे पर रख कर वह (गाड़ी से अर्पण के लिए) सामान ग्रहण करता है। इसके उपरान्त वह वहां से उठता है और दक्षिणाग्नि के उत्तर में खड़ा होकर एवं दक्षिणाभिमुख होकरभूसी हटा कर चावल निकलता है। वह चावल केवल एक ही बार स्वच्छ करता है। तब वह उन्हें उबालता है, वह (दक्षिणाग्नि पर) खड़ा रह कर ही उसमें घृत डालता है। वहां से हट कर वह अग्नि में दो आहुतियां डालता है। ... वह पितृ यज्ञ में संलग्न है; (उससे) वह देवों को प्रसन्न करता है और देवों से अनुमति लेकर वह पितरों को भोजन देता है। वह अग्नि एवं सोम दोनों को देता है। ... वह कव्यवाह (पितरों की आहुतियों को ढोने वाले) अग्नि को 'स्वाहा' मन्त्र के साथ आहुति देता है। यह मन्त्र भी कहता है - 'पितरों के साथ रहने वाले सोम को स्वाहा।' वह तब मेक्षण (चम्मच) को अग्नि पर रखता है, वह स्विष्टकृत के प्रतिनिधिस्वरूप अर्थात उसके स्थान पर ऐसा करता है।


इसके उपरान्त वह दक्षिणाग्नि के दक्षिण स्पय से एक रेखा खींच देता है, जो वेदी के अभाव की पूर्ति करती है। तब वह और दक्षिण की ओर रेखा के अंत भाग पर अग्नि रखता है, क्योंकि ऐसा न करने से पितरों के भोजन को असुर एवं राक्षस अशुद्ध कर देंगे। ... ऐसा करते हुए वह कहता है - "विभिन्न रूप धारण करके, छोटे या बड़े शरीर में जो असुर स्वधा (पितरों की आहुति) से आकृष्ट होकर इधर-उधर विचरण किया करते हैं, उन्हें अग्नि इस संसार से हटा दो।" ... तब वह जल-पात्र उठाता है और पितरों के हाथ धुलाता है। (ऐसा करते हुए वह पिता, पितामह, प्रपितामह का नाम भी लेता है।) यह उसी प्रकार किया जाता है, जैसे कि अतिथि को खिलाते समय किया जाता है।


इसके उपरान्त दर्श को एक बार में अलग करता है और जड़ से काट लेता है। वह उन्हें रेखा से सटा कर ऊपरी भाग को दक्षिण में करके रखता है। इसके उपरान्त वह पितरों को भात के तीन पिण्ड देता है। 'आपके लिए यह', ऐसा कह कर यजमान के पिता को देता है (नाम लिया जाता है)। कुछ लोग जोड़ देते हैं - 'उनके लिए जो पश्चात आएंगे', किन्तु वह ऐसा न करे, क्योंकि वह भी तो बाद में आने वालों में सम्मिलित है। अतः वह केवल इतना ही कहे -अमुक, अमुक, यह आपके लिए है।' ऐसा ही वह पितामह एवं प्रपितामह के लिए भी करता है। ... तब वह कहता है - 'हे पितर, यहां आनन्द मनाओ, बैलों के समान अपने-अपने भाग पर जुट जाओ।' इसके उपरान्त वह दक्षिणाभिमुख हो जाता है, क्योंकि पितर लोग मनुष्यों से दूर रहते हैं, अतः वह भी इस प्रकार (पितरों से) दूर है। उसे सांस रोक कर खड़ा रहना चाहिए या जब तक कि सांस न टूटे तब तक ..., एक क्षण खड़े रहने के पश्चात वह दाहिनी ओर घूम जाता है और कहता है - 'पितर लोग संतुष्ट हो गए हैं, बैल की भांति वे अपने-अपने भाग पर आ गए हैं।


इसके उपरान्त वह पिण्डों पर जल डाल कर पितरों के हाथों को स्वच्छ करने को कहता है। इस प्रकार वह अलग-अलग नाम लेकर पिता, पितामह एवं प्रपितामह को स्वच्छ करता है। ... तब वह (यजमान) अपना कटिवस्त्र खींच कर नमस्कार करता है। ऐसा करना पितरों को प्रिय है। नमस्कार छह बार किया जाता है, क्योंकि ऋतुएं छह हैं और पितरगण ऋतुएं हैं। वह कहता है -'हे पिता, हमें घर दो', क्योंकि पितर घरों के शासक होते हैं और यह यज्ञ-सम्पादन के समय कल्याण के लिए स्तुति है। जब पिण्ड किसी थाली में अलग रख दिए जाएं, तो यजमान उन्हें सूंघता है; यह सूंघना ही यजमान का भाग है। एक बार में काटे गए दर्भ (दर्श) अग्नि में रख दिए जाते हैं और वह रेखा के अंत वाले उल्मुक (अग्निखंड) को भी अग्नि में डाल देता है (वाजसनेयी संहिता 2/30, 2/31)।


इस मौलिक विधि को किसी कारण नहीं कर पाने की स्थिति में कई विकल्प हैं। यदि पार्वण श्राद्ध के लिए एक भी ब्राह्मण न मिल सके, तो ब्राह्मण बटुओं की कुशाकृतियां बना लेनी चाहिए और कर्ता को स्वयं प्रश्न करना चाहिए तथा पार्वण श्राद्ध में प्रयुक्त होने वाले उत्तर देने चाहिए। यदि कोई ब्राह्मण न मिले, श्राद्ध सामग्री नहीं हो, व्यक्ति यात्रा में हो अथवा पुत्र उत्पन्न हुआ हो या पत्नी रजःस्वला हो, तो आमश्राद्ध (जिसमें बिना पका हुआ अन्न दिया जाता है) किया जाना चाहिए, किन्तु मासिक एवं सांवत्सरिक श्राद्धों में ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। यदि बिना पका हुआ अन्न दिए जाने की स्थिति भी नहीं हो, तो हेयश्राद्ध (धन देकर) किया जा सकता है। आमश्राद्ध में भोजन में लगने वाले अन्न से दोगुना अन्न तथा हेयश्राद्ध में उसका चार गुना मूल्य दिया जाता है।


एकोद्दिष्ट श्राद्ध :


'एकोद्दिष्ट श्राद्ध' पार्वण श्राद्ध का एक संशोधित अथवा परिमार्जित रूप मात्र है। अंतर केवल यह है कि पार्वण श्राद्ध में तीन पितर उद्दिष्ट रहते हैं एकोद्दिष्ट श्राद्ध में केवल एक पितर उद्दिष्ट होता है। इस श्राद्ध में एक अर्घ्य दिया जाता है, एक ही पवित्र होता है और एक ही पिण्ड दिया जाता है। इसमें आवाहन नहीं होता था अग्नौकरण नहीं किया जाता है और विश्वे देवों के प्रतिनिधित्व के लिए ब्राह्मणों को आमंत्रण नहीं दिया जाता।


इसके तीन प्रकार हैं - नव, नवमिश्र एवं पुराण। नवश्राद्ध मृत्यु के 10वें या 11वें दिन तक, नवमिश्र श्राद्ध मृत्यु के उपरान्त 11वें दिन से एक वर्ष तक किए जाते हैं।


आभ्युदिक श्राद्ध :


यह श्राद्ध मांगलिक अवसरों पर संपन्न होता है, अतः ब्राह्मणों को सम संख्या में निमंत्रित किया जाता है और कृत्य बाएं से दाएं किए जाते हैं तथा तिल के स्थान पर यव (जौ) का प्रयोग किया जाता है। अपरार्क (पृ. 514) के मत से यह श्राद्ध पार्वण का ही संशोधित रूप है, अतः इसमें पार्वण के ही नियम, विशिष्ट संकेतों को छोड़ कर प्रयुक्त होते हैं। इसके अलावा शुभ अवसरों पर नांदी श्राद्ध अथवा वृद्धि श्राद्ध भी होता है, जिसे प्रकारांतर से इसी का थोड़ा लघु रूप माना गया है।


महालय श्राद्ध :


पुराणों में चर्चित यह एक अत्यंत प्रसिद्ध श्राद्ध है। इसके लिए भाद्रपद (आश्विन) का कृष्ण पक्ष विशेष रूप से चुना गया है। किन्तु इसका सम्पादन इस पक्ष की प्रथम तिथि से लेकर अमावस्या तक किसी भी तिथि को किया जा सकता है। मार्कण्डेय पुराण के मत से इसका सम्पादन पार्वण श्राद्ध की पद्धति से ही होता है।

किन्तु स्मृत्यर्थसार के अनुसार यदि ऐसा संभव नहीं हो, तो इसे संकल्प विधि से भी किया जा सकता है, जिसमें आवाहन, अधर्म, होम एवं पिण्डदान को छोड़ कर पार्वण श्राद्ध की सारी बातें यथासम्भव सम्पादित होनी चाहिए। महालय श्राद्ध के विश्वेदेव हैं धुरि एवं लोचन। यह श्राद्ध न केवल पितृ वर्ग एवं मातृ वर्ग के पितरों, बल्कि अन्य सम्बन्धियों एवं लोगों के लिए (उनकी पत्नियों के लिए) भी होता है। यह श्राद्ध मलमास में नहीं किया जा सकता।


अन्य श्राद्ध :


अब तक वर्णित अधिकांश श्राद्ध वर्तमान में बहुत कम किए जाते हैं, किन्तु मातामह श्राद्ध अथवा दौहित्र प्रतिपदा श्राद्ध तथा अविधवानवमी श्राद्ध आज भी संपन्न होते हैं। दौहित्र प्रतिपदा श्राद्ध केवल दौहित्र (जिसके माता-पिता जीवित हों) अपने नाना के लिए आश्विन के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि पर कर सकता है। इसके लिए उसका उपनीत होना भी आवश्यक नहीं है। अविधवानवमी श्राद्ध अपनी माता या कुल की अन्य सधवा रूप में मृत नारियों के लिए भाद्रपद (आश्विन) के कृष्ण पक्ष की नवमी को होता है, किन्तु उस नारी के पति की मृत्यु हो जाने पर बंद कर दिया जाता है।


पृथ्वी चंद्रोदय जैसे कुछ श्राद्ध सम्बन्धी ग्रंथों में संघात नामक एक श्राद्ध का वर्णन भी है। एक ही दिन विभिन्न कालों में परिवार के कई व्यक्तियों की मृत्यु अथवा एक ही काल में (यथा नाव डूबने से) परिवार के कई व्यक्तियों की मृत्यु की स्थिति में संघात श्राद्ध उसी कालक्रम से होता है। कालक्रम का निर्धारण मृत-सम्बन्धियों की सन्निकटता से होता है।


जीवितावस्था में स्वयं का श्राद्ध :


जीवश्राद्ध अथवा जीवच्छाद्ध अनेक धर्मग्रंथों में उल्लेखित है, किन्तु इसका सबसे प्राचीन उल्लेख बौधायन में है। इसे कोई भी व्यक्ति अपने कल्याण की इच्छा से और अपने उत्तराधिकारी के जीवित रहते भी कर सकता है। जीवश्राद्ध में प्रेत शब्द का उल्लेख कहीं नहीं होता तथा व्यक्ति की आकृति 50 कुशों से निर्मित की जाती है और दूसरे व्यक्ति द्वारा 'ऋव्यादमग्निम' (ऋ. 10/16/9) मंत्र के साथ जलाई जाती है। इस श्राद्ध के अस्तित्व के बावज़ूद इसे श्राद्ध सम्बन्धी प्राचीन विचारधारा का विलोमत्व मात्र माना गया है।

✍🏻आलोक ब्रजनाथ

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