गुरुवार, 29 सितंबर 2022

भारत ??


भारत ?? 


 मुसलमान ना आये होते तो भारत की भसड़, इसकी भीड़, किसी को 'आप' पुकारने की तमीज सीख ही ना पाती। भारत की संस्कृति और संस्कार में, अंग्रेजों की तरह ही 'आप' का आदर नहीं, बस 'तुम' और 'तू' की हिकारत है।  


प्राचीन संस्कृत हो या प्राचीनतम क्षेत्रीय भाषाएं और बोलियां... सब से अगर मुसलमानों का प्रभाव हटा दीजिए तो वे उज्जड़, बदतमीज और बदजुबान बोलियां हो जातीं हैं। 


भारतीय भाषाओं में, और तो और... मां और पिता तक तुम होते हैं। जहां... बड़ों और छोटों के लिए आदर सूचक संबोधन और क्रिया, इस्लामिक हमलावरों की लाई बोलियों का हिस्सा हैं। 


भारत के जिस भी हिस्से में इस्लामिक प्रभाव नहीं या कम हैं (वैसे ऐसे किसी भी विशुद्ध और अछूते इलाके का होना संभव नहीं।) आप वहां की बोलियों और भाषा पर गौर कीजिए। आपको.. वे असभ्य, असामाजिक, अक्खड़ और उज्जड़ दिखेंगे। 


आदरपूर्ण सामूहिक जीवन, भारत के प्राचीन परिवारों और संस्कृति में अभ्यासित नहीं थे। परिवार का एक साथ बैठ कर खाना, सामूहिक विश्राम, एक जगह सोना, यह सब प्राचीन भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं। 


भारत की संस्कृति और धर्म एकाकी व्यक्ति का है, अकेले का। जहां परस्पर आदर की जरूरत ही नहीं होती। कोई भी साधु या सन्यासी किसी गृहस्थ को सम्मान से 'आप' नहीं, हिकारत से 'तुम' ही संबोधित करता है। वेदों, उपनिषदों में सब जगह ही 'तुम' का ही प्रयोग है। देवताओं और ईश्वर तक को 'तुम' ही कहा गया है वहां। 


तो आज जिसको, भारत का महान आदरपूर्ण संस्कार और संस्कृति माना और समझा जाता है, वह भारत की प्राचीनतम मौलिक संस्कृति है ही नहीं।

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