सोमवार, 10 अक्तूबर 2022

रवि अरोड़ा की नजर से...

 झूठ के वो दिन  / रवि अरोड़ा  


वैसे झूठ बोलना तो हम सभी ब चपन में ही सीख जाते हैं मगर यदि कोई पूछे कि पहला झूठ कब बोला था तो अधिकांश लोग जवाब नहीं दे पाएंगे। हालांकि मैं दावे से तो नहीं कह सकता कि मेरे जीवन का यह पहला झूठ था मगर अनुमान तो यही है कि झूठ बोलने की शायद वह पहली घटना थी। ननिहाल मुजफ्फरनगर में था और वहां से मेरी मौसी अक्सर चिट्ठी भेजती थी और घर के कामों में व्यस्तता के चलते मेरी मां चिट्ठी का जवाब कई बार नहीं दे पाती थीं और अकसर झूठ बोल देती थीं कि मुझे चिट्ठी मिली ही नहीं । साल में एक बार मौसी के हमारे घर आने पर मां हम बच्चों को पहले ही अच्छी तरह सिखा पढ़ा देती थीं कि मौसी पूछे तो कह देना फलां फलां चिट्ठी तो हमें मिली ही नहीं थी। इस पर मौसी अगली बार जब चिट्ठी भेजती तो घर के पते के साथ इतने लैंड मार्क भी लिख देती कि पढ़ कर हम लोग हंसते हंसते लोटपोट हो जाते। पोस्ट कार्ड में पते के स्थान पर पिता जी के नाम और घर के पते के अलावा मार्केट के पास, ऊपर वाला घर, चक्की के पीछे और पंडित जी के घर के सामने जैसी निशानियां पढ़ कर डाकिया भी हंसता था । अख़बार से पता चला कि रविवार को विश्व डाक दिवस था । ज़ाहिर है कि ऐसे में चिट्ठियों से जुड़ी यादों का पिटारा सा खुलना ही था ।  अब पिछली सदी में पैदा हुआ ऐसा कौन होगा जिसकी डाक से जुड़ी मीठी यादें न हों। उस दौर में जब लैंड लाइन फोन भी किसी मध्य वर्गीय परिवार के लिए बड़ी बात होते थे तब चिट्ठियां ही तो एक मात्र ऐसी शय थीं जो लोगों को अपनों से जोड़े रखती थीं। 


याद आता है कि जब थोड़ा बड़ा हुआ था तो रिश्तेदारों को चिट्ठी लिखने का काम परिवार की ओर से मुझे ही मिला था । मां बोलती थीं और मैं लिखता था । पोस्ट कार्ड का चलन ज्यादा था और उसमें बामुश्किल पंद्रह बीस लाइनें ही लिखी जा सकती थीं मगर आधी से अधिक लाइनें तो रटी रटाई औपचारिकताओं में ही खर्च हो जाती थीं। मेरे विरोध के बावजूद भी मां जबरन लिखवाती थीं ' फलां फलां को सादर चरण स्पर्श और फलां फलां को आशीर्वाद। हम सब यहां कुशल पूर्वक हैं आशा है कि आप लोग भी कुशल पूर्वक होंगे तथा आपकी कुशलता भगवान जी से नेक चाहते हैं। फलां फलां दुआओं और कामनाओं के बाद समाचार यह है कि ' और उसके बाद खत का असली मजमून शुरू होता ।


 उस दौर में डाकिया सबके पसंदीदा चेहरों में से एक होता था और अपने घर की दिशा में उसकी साइकिल मुड़ते ही हम बच्चे इस उम्मीद में उसके पीछे हो लेते थे कि शायद हमारे घर की भी कोई चिट्ठी हो । आस पड़ौस के वे लोग कुछ महान टाइप ही लगते थे, जिनके घर अधिक चिट्ठियां आती थीं। किसी खास चिट्ठी के इंतजार में हम डाक बंटने से पहले ही पोस्ट ऑफिस पहुंच जाते थे और कई घंटा पहले अपनी चिट्ठी हासिल कर खुद को तुर्रम खां समझते थे । स्कूलों में बाकायदा चिट्ठियां लिखना सिखाया जाता था । रोचक तथ्य यह भी है कि प्रेम पत्र पकड़े जाने पर अकसर जवान होते लड़के लड़कियां घर वालों से पिटते भी खूब थे । डाक टिकिट एकत्र करना हर दूसरे बच्चे का प्रिय शगल होता था साल में दो चार फिल्में ऐसी भी जरूर आती थीं जिनमें चिट्ठियों से संबंधित कोई गाना होता था । अब क्या क्या याद करूं, ऐसी हज़ार बातें हैं जो मोबाइल फोन व इंटरनेट के इस युग में स्वप्न सरीखी सी लगती हैं। चलिए बाकी सब तो फिर भी ठीक है मगर अब वाट्स एप पर डबल टिक का निशान झूठ क्यों नहीं बोलने देता कि आपका मैसेज तो नहीं मिला ।


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