शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

भारत में बढ़ रहे हैं टीबी मरीज


टीबी को हराने की तैयारी

सौ सालों के लम्बे इंतजार के बाद आखिरकार अब लग रहा है वैज्ञानिक टीबी के लिए टीका विकसित करने के करीब पहुंच रहे हैं. फिलहाल हर साल 14 लाख लोग टीबी से मारे जाते हैं.
दुनिया भर के विशेषज्ञ मेडिकल ट्राएल के नतीजों का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. एमवीए85ए के नाम से जानी जाने वाली यह दवा दुनिया भर में कई और जगह भी विकसित की जा रही दवाइयों में से एक है. इन सभी रिसर्चों के पीछे मकसद एक ही है, माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरक्यूलॉसिस के संक्रमण को रोकना. एमवीए85ए से वैज्ञानिकों को काफी उम्मीदें हैं. अगर परीक्षण सफल नहीं भी हुआ तो भी यह वैज्ञानिकों को टीके की खोज की दिशा में आगे बढ़ने में बहुत मदद करेगा.
सिएटल में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन में काम करने वाले पेगी जॉनस्टन कहते हैं, "मुझे लगता है कि इस दवाई का ट्रायल ही अपने आप में बड़ी बात है. भले ही परिणाम वह न निकले जिसकी हम उम्मीद कर रहे हैं, मगर यह तो साफ है कि हम इस दिशा में सही बढ़ रहे हैं. अगर परिणाम सकारात्मक आता है तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी."
टीबी क्यों है खतरनाक
टीबी के खिलाफ टीका विकसित करने में कई और बड़ी कंपनियां भी लम्बे डग भर रही हैं जिनमें जॉनसन एंड जॉनसन भी शामिल है. वैज्ञानिक मानते हैं कि टीके का विकसित होना टीबी से लड़ने के सबसे बड़े हथियार का विकसित होने जैसा होगा. यह बीमारी हर साल 90 लाख लोगों को अपनी चपेट में ले लेती है.
अमेरिका के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीजेज में काम करने वाली क्रिस्टीन साइजमोर कहती हैं, "जिस हिसाब से आजकल शरीर में दवाइयों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती जा रही है उसे देखते हुए दवाओं का विकास बहुत धीमे हो रहा है. हम हमेशा इस बात के पीछे नहीं भाग सकते कि अब कौन सी दवाई का असर होना बंद हो गया है और हम उससे अधिक प्रभावशाली दवाई कैसे विकसित करें." मैरीलैंड की डॉक्टर एन गिंसबर्ग के अनुसार जब तक हमें इस बात का पता चलता है कि किसी इंसान को टीबी है तब तक वह पहले ही कम से कम 10 लोगों को संक्रमित कर चुका होता है.
नई उपलब्धि
टीबी के लिए इस टीके को ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की लैब में विकसित किया गया है. एमवीए85ए वैक्सीन के विकास की दिशा में ज्यादातर कामयाबी पिछले 10 सालों में दवाओं को भी हरा देने वाले यानि ड्रग प्रतिरोधी टीबी के पनपने के बाद हासिल की हुई है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ड्रग प्रतिरोधी टीबी को अगर रोका नहीं गया तो 2015 तक 20 लाख लोग इससे जूझ रहे होंगे.
टीबी का इलाज लंबा होता है. शुरुआती 6 महीनों तक कई सारी एंटीबायोटिक दवाइयां खाने की जरूरत पड़ती है. कई बार मरीज लगातार इलाज नहीं कर पाते हैं और ऐसी स्थिति में ड्रग प्रतिरोधी टीबी को पनपने का मौका मिल जाता है. भारत में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें टीबी पूरी तरह प्रतिरोधी क्षमता हासिल कर चुका है, जिसके इलाज के लिए कोई दवाइयां मौजूद नहीं हैं. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के जॉनस्टन के अनुसार पहले इस बीमारी को इतना नजरअंदाज किया गया कि अब इसे हराना बड़ी चुनौती बन गया है.
बेहतर टीके का विकास
फिलहाल टीबी से बचने के लिए बच्चों को बीसीजी का टीका लगाया जाता है, लेकिन इससे मिलने वाला रक्षा तंत्र कुछ सालों में अपना असर खो देता है. इसके बाद यह खांसने, छींकने से भी आप तक पहुंच सकता है. एमवीए85ए विकसित करते समय वैज्ञानिकों ने दक्षिण अफ्रीका में 3,000 बच्चों की बीसीजी जांच की. इनमें से कुछ को बीसीजी दिया गया और कुछ को प्रायोगिक दवा दी गई. उन्होंने पाया कि जिन बच्चों को दोनो दवाइयां मिली थीं, वे उके मुकाबले ज्यादा सुरक्षित थे जिन्हें केवल बीसीजी दिया गया था.
केपटाउन विश्विद्यालय में प्रोफेसर विलेम हानेकॉम के अनुसार दक्षिण अफ्रीका में टीबी के मामलों को लेकर बहुत बुरी हालत है. जहां अमेरिका में हर साल .01 फीसदी आबादी टीबी से ग्रसित होती है वहीं दक्षिण अफ्रीका में एक फीसदी.
टीके के लिए विकसित की जा रही इस दवाई में रूपांतरित स्मॉल पॉक्स वाइरस का इस्तेमाल हो रहा है. इससे इम्यूनिटी यानि प्रतिरोध की क्षमता पैदा करने की कोशिश की गई है.
एसएफ/ओएसजे (रॉयटर्स)

DW.COM

WWW-Links

संबंधित सामग्री

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें