रविवार, 4 अप्रैल 2021

गुलाम अली. खां साहब

 याद पिया की आए !


भारतीय शास्त्रीय संगीत के पुरोधा मरहूम उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब संगीत जगत के शिखर पुरूषों में एक रहे हैं। धीर-गंभीर आवाज़ और विलक्षण अदायगी के लिए जाने जाने वाले खां साहब की संगीत-यात्रा सारंगी वादन से शुरू हुई थी। कालांतर में उन्होंने खयाल और ठुमरी गायन में महारत हासिल की। पटियाला घराने के खां साहब की भारतीय शास्त्रीय संगीत को सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने विभिन्न संगीत शैलियों - ध्रुपद, ग्वालियर घराने और जयपुर घराने के खूबसूरत संयोजन से गायकी की एक बिल्कुल नई शैली, नया अंदाज़ विकसित किया जिसमें मधुरता और लचीलेपन के साथ संक्षिप्तता का भी अनोखा गुण भी शामिल हुआ। दिखने में पहलवानी डील -डौल और बेहद कड़क मिज़ाज के खां साहब अपनी गायिकी और संवेदनाओं में बहुत मुलायम थे। भारत विभाजन के बाद परिस्थतिवश वे पाकिस्तान चले गए, लेकिन जल्द ही वहां की कट्टरता और धर्मांधता से निराश होकर भारत लौट आए। देश के बंटवारे पर उनकी संगीतमय टिप्पणी यह थी - अगर हर घर के एक बच्चे को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी गई होती तो इस मुल्क़ का बंटवारा कभी नहीं होता।


खां साहब की गाई कुछ ठुमरियां-याद पिया की आये, आये न बालम का करूं सजनी, नैना मोरे तरस गये, तिरछी नजरिया के बान, पिया बिना नाहीं चैन, कटे ना बिरहा की रात आदि आज भी ठुमरी के प्रेमियों की पहली पसंद बनी हुई हैं। उनके भजन ‘राधेकृष्ण बोल’ ने महात्मा गांधी को बहुत प्रभावित किया था। खां साहब को सिनेमा का अगंभीर माहौल कभी पसंद नहीं आया। तमाम प्रलोभनों के बावजूद फिल्मों से उन्होंने हमेशा एक दूरी बनाकर रखी, लेकिन अंततः फिल्म 'मुगल-ए-आज़म' के फिल्मकार के. आसिफ़ और संगीतकार नौशाद की ज़िद के आगे वे हार गए। वे 'मुग़ल-ए-आज़म' में तानसेन की आवाज़ बने थे। राग सोहनी और रागेश्वरी पर आधारित दो गीत - 'प्रेम जोगन बन के' तथा 'शुभ दिन आयो' गाकर उन्होंने उस फिल्म को गंभीरता और ऊंचाई दी थी। खां साहब की संगीत विरासत आज भी ग़ज़ल गायक गुलाम अली सहित उनके कई नामचीन शागिर्दों के रूप में जीवित है। आज मरहूम उस्ताद की जयंती  पर उन्हें खिराज-ए-अक़ीदत !


(चित्र में लता मंगेशकर के साथ उस्ताद बड़े गुलाम अली खां)


Dhruv Gupt

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