बुधवार, 22 जुलाई 2020

एनकाउंटर / आलोक यात्री




(सुविधा हेतु मूल पाठ संलग्न)

पुलिस डिक्शनरी का सबसे
पसंदीदा शब्द है : "एनकाउंटर"

  विकास दुबे प्रकरण के बाद आज हम एक बार फिर उस महत्वपूर्ण सवाल के मुहाने पर खड़े हैं कि हमारी पुलिस का चरित्र, चेहरा और चाल कैसे बदले? यूं तो दुनिया भर‌ में अपराध और समाज का चोली दामन का साथ है लेकिन "इस सहजीवन में कानूनी अन्याय ही सर्वोपरि न हो जाए" यह आज भी मानवाधिकारियों की चिंता का मूल विषय है। दुनिया के अधिकांश देशों में कानून व्यवस्था एक चुनौती है। सख्त कानून और सजा के बावजूद कई समृद्ध राष्ट्र आज भी गंभीर अपराधों से जूझ रहे हैं। इसके विपरीत दुनिया में कुछ मुल्क ऐसे भी हैं जो "झटपट" कानून के पक्षधर हैं। झटपट कानून के समर्थक देशों में सड़क पर सजा-ए-मौत तक का प्रावधान है। हमारे देश में ऐसा कोई कानून न होने के बावजूद "मुठभेड़" या "एनकाउंटर" को इस दायरे में सर्वोपरि माना जा सकता है।
  जघन्य अपराधों की कड़ी में आम आदमी की संवेदनाएं जब दम तोड़ने लगती हैं तब वह भी झटपट न्याय का पैरोकार बन जाता है। कानून व्यवस्था की नाकामी झेल रही पुलिस के लिए दबाव से मुक्त होने का सबसे सरल मार्ग भी झटपट न्याय से होकर ही जाता है। इसके बाद दबाव मुक्त होने के लिए वही होता है जो तेलंगाना या बीते दिनों कानपुर में देखने को मिला। कानून की किताब में झटपट न्याय की कोई परिभाषा नहीं है, लेकिन पुलिस की भाषा में इसे मुठभेड़ या "एनकाउंटर" कहते हैं। एनकाउंटर शब्द युद्ध में दुश्मन से आमने-सामने की मुठभेड़ के लिए इस्तेमाल होता है, लेकिन पिछले करीब चार दशकों से यह पुलिस डिक्शनरी का सबसे लोकप्रिय शब्द है।
  युद्ध के मैदान से आया एनकाउंटर शब्द पुलिस के लिए खासा मुफीद है। एक जमाना था जब कानून व्यवस्था कायम रखने के लिए पुलिस या प्रशासन को मुनादी का सहारा लेना पड़ता था। मुनादी करवा कर बदमाश को ताकीद किया जाता था कि वह इलाका छोड़ जाए। यह नौबत भी किसी खास जगह पर साल, दो साल में तब आती थी जब सुल्ताना डाकू जैसे अपराधियों का वर्चस्व कायम था। लेकिन आज एनकाउंटर पुलिस के लिए आम बात हो गई है। किसी अपराधी से भले ही छुरा, तमंचा, सुल्फा, गांजा, अफीम कुछ भी बरामद हो, रिकॉर्ड में उसे मुठभेड़ यानी एनकाउंटर ही दर्शाया जाता है।
  इतिहास का सबसे लंबा एनकाउंटर पुलिस और चंदन तस्कर वीरप्पन के बीच का रहा है। जो करीब दो दशक तक चला। यूं तो पुलिस हर एनकाउंटर को वास्तविक दिखाने की कोशिश करती है लेकिन हर एनकाउंटर असली नहीं होता। बीते चार दशकों में करीब तीन हजार दुर्दांत अपराधियों का सफाया एनकाउंटर के नाम पर पुलिस अब तक कर चुकी है। महकमे में कई जांबाज अधिकारी ऐसे रहे हैं जिन्हें एनकाउंटर स्पेशलिस्ट माना गया है। लेकिन दया नायक जैसे गिनती के ही पुलिसकर्मी होंगे जिन्हें एनकाउंटर के लिए याद रखा जाता है। पुलिस अमले के सामने विकास दुबे के दुस्साहस दिखाने की वजह शायद यही है कि आज देश भर में गली मोहल्ले में लगभग हर दिन हो रहे एनकाउंटर ने अपराधियों और बदमाशों में इस शब्द की दहशत ही खत्म कर दी है।
  लंबे समय से अपराध संवाददाता के रूप में काम करने और सौ से अधिक एनकाउंटर का चश्मदीद होने के बावजूद अपनी स्मृति के आधार पर मैं स्वयं एनकाउंटर करने या उसमें मरने वाले गिनती के नाम ही याद रख पाता हूं। कहने का अभिप्राय यह है कि प्रोफेशनल जर्नलिस्ट होने के बावजूद एनकाउंटर मेरे लिए बहुत अधिक मायने नहीं रखता तो अपराधियों में इसका खौफ कितनी देर रहता होगा? इसके अलावा देर-सवेर एनकाउंटर पर सवालिया निशान लगते रहते हैं। देश के पहले एनकाउंटर से ही इस पर उंगलियां उठने का सिलसिला शुरू हो गया था। गौरतलब है कि देश का पहला एनकाउंटर 11 जनवरी 1982 को मुंबई के वडाला कॉलेज में हुआ था। जब मुंबई पुलिस की एक स्पेशल टीम ने गैंगस्टर मान्या सुरवे को 6 गोलियां मारी थीं। आजाद भारत का पहला एनकाउंटर ही विवादों में घिर गया था। इस कड़ी का सबसे चर्चित एनकाउंटर उत्तर प्रदेश पुलिस ने ही किया था। इस एनकाउंटर को करने के लिए सूबे की सरकार को स्पेशल टास्क फोर्स का गठन करना पड़ा था। इस टास्क फोर्स ने 23 सितंबर 1998 को गाजियाबाद में सूबे के सबसे चर्चित डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला को एनकाउंटर में मौत की नींद सुलाया था।
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