रविवार, 10 जुलाई 2011

राष्‍ट्रमंडल खेलः सिर्फ पैसे की घपलेबाजी ही नहीं यह इंसानियत पर काला धब्‍बा है



भारत आज विश्व की एक उभरती महाशक्तिहै. इसलिए अगर यहां राष्ट्रमंडल खेल हो रहे हैं तो यह ख़ुशी और गर्व की बात है, लेकिन सवाल है कि इस खेल के पीछे जो खेल चल रहा है, वह कितना जायज़ है? खेल के नाम पर ग़रीबों की ज़िंदगी से आख़िर क्यों खेला जा रहा है? मसलन दिल्ली श्रमिक संगठन के मुताबिक़, 2003 से 2008 के बीच दिल्ली में 350 मलिन बस्तियों को ज़बरन उजाड़ दिया गया. इन 350 मलिन बस्तियों में लगभग 3 लाख लोग रहते थे. अपना आशियाना खो चुके परिवारों में से महज़ एक तिहाई का ही पुनर्वास हो पाया. दिल्ली में तक़रीबन 3 लाख स्ट्रीट वेंडर्स हैं, जिनका सामूहिक रूप से सालाना टर्न ओवर 3500 करोड़ रुपये का है. आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि दिल्ली की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने में इन स्ट्रीट वेंडर्स का कितना बड़ा योगदान है. लेकिन फिर भी दिल्ली सरकार इन स्ट्रीट वेंडर्स को यहां नहीं रहने देना चाहती. नई दिल्ली नगर पालिका परिषद चाहती है कि इन अतिक्रमणकारियों (स्ट्रीट वेंडर्स) को बाज़ार से हटा दिया जाए. तभी तो जनवरी 2010 तक दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के लाइसेंस विभाग के पास रेहड़ी-पटरी पर दुकान खोलने के लिए एक लाख से ज़्यादा आवेदन आए, लेकिन एमसीडी ने स़िर्फ 14 हज़ार लाइसेंस ही जारी किए. जबकि सुप्रीम कोर्ट तक ने अपने कई निर्णयों में स्ट्रीट वेंडिंग पेशे को क़ानूनी ठहराया है. दिल्ली शहर में क़रीब 20 हज़ार ढाबे हैं, जिनमें से 80 फीसदी ढाबों को सरकार ग़ैरक़ानूनी मान चुकी है. ज़ाहिर है, राष्ट्रमंडल खेल के मद्देनज़र दिल्ली सरकार नहीं चाहती कि यहां कोई झुग्गी, स्ट्रीट वेंडर या ग़रीब आदमी विदेशी मेहमानों को दिखे.
राष्ट्रमंडल खेल 2010 में भ्रष्टाचार के मामले एक-एक कर सामने आ रहे हैं. ज़्यादातर मामले पैसों से जुड़े हैं, लेकिन इस पूरे खेल का एक दर्दनाक पक्ष भी है. अधिकारियों का क्रूर व्यवहार, जिसने इंसान को जानवर से भी कमतर समझा. उनके अमानवीय चेहरों पर तब भी शिकन नहीं आई, जब राष्ट्रमंडल खेल से जुड़े निर्माण कार्यों के दौरान 49 मज़दूरों की मौत हो गई. किसी को मुआवज़ा तक नहीं मिला. दिल्ली को सुंदर बनाने के लिए लाखों लोगों को बेघर कर दिया गया. एक तरह से ग़रीबों को दिल्ली से भगाने की मुहिम छेड़ दी गई. राष्ट्रमंडल खेल के पीछे चल रहे एक अमानवीय और क्रूर खेल पर रिपोर्ट तैयार की है हाउसिंग एंड लैंड राइट्‌स नेटवर्क ने.
लेकिन सरकार की यह सारी कोशिशें स़िर्फ उसकी असफलता की कहानी ही कहती हैं. 1982 में हुए एशियाड खेलों के बाद से ही दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या में इज़ा़फा होने लगा था. उस व़क्त निर्माण कार्य के लिए आए प्रवासी मज़दूर यहीं बस गए, क्योंकि सरकार के पास इन लोगों के लिए न तो कोई नीति थी और न ही कोई योजना. लेकिन दु:ख की बात यह है कि जिन लोगों की मेहनत की बदौलत एशियाड खेलों का सफल आयोजन संभव हो सका था, निर्माण कार्य हुए थे, उन्हीं लोगों को राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर दिल्ली से भगाने की साज़िश की जाने लगी. आज दिल्ली में डेढ़ लाख से ज़्यादा लोग बेघर हैं, क्योंकि यहां के सौंदर्यीकरण के नाम पर झुग्गी-झोपड़ियों को तोड़ दिया गया. जब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दख़ल दिया, तब सरकार की नींद खुली. फटाफट अस्थायी आश्रयस्थल बनाए गए. बावजूद इसके स़िर्फ 4 से 5 फीसदी बेघर लोगों को ही छत नसीब हो सकी. अभी भी 95 फीसदी लोगों के सिर पर छत नहीं है. लेकिन जब बात राष्ट्रमंडल खेल की आई तो इस बार भी दिल्ली को सजाने-संवारने के लिए प्रवासी मज़दूरों की ज़रूरत पड़ी. सरकार अपने पूर्व के अनुभव से कुछ नहीं सीखना चाहती थी. क्या सरकार को अंदेशा नहीं था कि 1982 (एशियाड) का इतिहास फिर से ख़ुद को दोहरा सकता है. यानी इस बात की क्या गारंटी है कि इस बार निर्माण कार्य के लिए जो प्रवासी मज़दूर दिल्ली आएं हैं, वे यहां नहीं बस जाएंगे. बावजूद इसके क़रीब 3 लाख से ज़्यादा मज़दूरों को राष्ट्रमंडल खेल की तैयारी के काम में लगाया गया.
ये ग़ैरक़ानूनी ढाबे तो बिना किसी पूर्व सूचना (नोटिस) के हटा देने लायक हैं, क्योंकि इन्हें अतिक्रमण के तौर पर देखा गया है. एमसीडी स़िर्फ वैसी ही दुकानों को लाइसेंस जारी कर सकता है, जो खाने-पीने की हैं और जिनके पास छत है. हम लोगों को राष्ट्रमंडल खेल से पहले ऐसे सभी अतिक्रमण हटाने के लिए कहा जा चुका है.
दीप माथुर, निदेशक, प्रेस और सूचना, एमसीडी (एचएलआरएन की रिपोर्ट में प्रकाशित बयान)
एचएलआरएन की रिपोर्ट में इन मज़दूरों के बारे में जो कुछ लिखा गया है, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को एक बार सोचने पर मजबूर करता है. लेकिन ऐसा लगता है कि राष्ट्रमंडल खेल से जुड़े अधिकारियों के लिए इन मज़दूरों और जानवरों में कोई अंतर नहीं था. खेल गांव स्थल पर 10×10 के एक टीनशेड में 10 मज़दूरों को एक साथ रहना पड़ता था. शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं थी. इंदिरा गांधी स्टेडियम में 107 मज़दूरों के लिए एक शौचालय था. मज़दूर अपने लिए बनाए गए घरों को मुर्गीखाना कहते थे. एक जनहित याचिका के मुताबिक़, गेम्स साइट पर काम कर रहे मज़दूरों में से अब तक 49 की मौत हो चुकी है. किसी भी परिवार को उसके सदस्य की मौत पर मुआवज़ा नहीं दिया गया. इसके अलावा मज़दूरों को न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जाता था. आठ घंटे काम करने के बदले जहां एक अकुशल मज़दूर के लिए 142 रुपये न्यूनतम वेतन बनता था, वहीं उसे 85 से 100 रुपये दिए जाते थे. यही हाल कुशल कामगारों का भी था. महिला मज़दूरों को तो और भी कम वेतन दिया जाता था. साथ ही वेतन देने में भी देरी की शिक़ायत की बात इस रिपोर्ट में है. मज़दूरों को कोई यात्रा भत्ता भी नहीं दिया जाता था. मज़दूरों से 12 घंटे से ज़्यादा काम लिया गया, क्योंकि आयोजन समिति को डेडलाइन का अनुसरण करना था. मज़दूरों को काम के दौरान कोई सुरक्षा उपकरण मुहैया नहीं कराया गया. सबसे दु:ख की बात यह है कि राष्ट्रमंडल खेल को सफल बनाने के लिए बालश्रम का भी इस्तेमाल किया गया. ज़ाहिर है, यह सब कंस्ट्रक्शन वर्कर्स एक्ट 1996 का उल्लंघन ही था.
बहरहाल यह आयोजन सफल होता है या नहीं, इसका जवाब तो समय आने पर पता चल जाएगा, लेकिन खेल के नाम पर इन ग़रीबों के साथ जो कुछ भी हुआ, उसका भी इतिहास लिखा जाएगा और यह इतिहास का वह काला पन्ना होगा, जिसमें लाखों बेघर लोगों की कहानी होगी. उन मज़दूरों की कहानी होगी, जिन्होंने अपने ख़ून-पसीने से दिल्ली को सुंदर और समृद्ध बनाया. उन लोगों की भी कहानी होगी, जिन्होंने इन मज़दूरों और ग़रीबों की ज़िंदगी को जीते जी नरक बना दिया.
मज़दूरों का शोषण
  • एक जनहित याचिका के मुताबिक़, गेम्स साइट पर  अब तक 49 मज़दूरों की मौत हो चुकी है.
  • किसी भी मौत पर मुआवज़ा नहीं दिया गया.
  • नहीं मिला मज़दूरों को न्यूनतम वेतन.
  • महिला मज़दूरों को कम वेतन मिला.
  • वेतन देने में भी देरी की शिक़ायत.
  • टेंट में रहना पड़ता था मज़दूरों को.
  • आईजी स्टेडियम में 107 मज़दूरों के लिए स़िर्फ एक शौचालय.
  • कोई यात्रा भत्ता भी नहीं दिया गया.
  • मज़दूरों ने 12 घंटे से ज़्यादा काम किया.
  • मज़दूरों को सुरक्षा उपकरण नहीं दिए गए.
  • बालश्रम का भी किया गया इस्तेमाल.
  • मज़दूरों का रजिस्ट्रेशन नहीं कराया गया.
  • यह कंस्ट्रक्शन वर्कर्स एक्ट का उल्लंघन था.
सिर पर छत नहीं
दिल्ली में स्थिति (2010)
जिनके पास घर नहीं है              1,50,000
सरकारी आश्रय (स्थायी)         19
सरकारी आश्रय (अस्थायी)     8
(न्यायिक हस्तक्षेप से पहले)
सरकारी आश्रय (अस्थायी)     45
(अदालती आदेश के बाद)
जिन्हें छत मिली                       6000-8000
(अदालती हस्तक्षेप के बाद)    (4-5%)
जिन्हें छत नहीं मिली               95%
(अदालती हस्तक्षेप के बाद)

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