मंगलवार, 19 जुलाई 2011

दिल्ली के गांवों का दर्द


दिल्ली को भले ही देश में प्रगति का पैमाना जाता हो और हरेक नाजुक फैसले के लिए सभी की निगाह यही टिकी होती है लेकिल देश की इस राजधानी में नगरीकरण की अंधी दौड में गांवों को बिसरा दिया गया है। गांव उजड गए हैं पर इनकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं
भूमि अधिग्रहण एक्ट 1894 एक पुरातन कानून था जिसका प्रयोग किसानों को उनकी भूमि से वंचित करने के लिए किया जाता है। कभी-कभार जनता से जुडे प्रोजेक्टों के लिए लेकिन अकसर ऐसे प्रोजेक्टों में जो कि कॉमर्शियल होते हैं। किसानों का हित , उनका बंदोबस्त , गांव का विकास और उनके भविष्य की जीविका का हल तलाशने जैसी बातों का ध्यान नहीं रखा जाता। भूमि अधिग्रहण बिल 2007 का ड्राफ्ट संसद में रखा हुआ है। इसमें कुछ सांकेतिक बदलाव किए गए हैं लेकिन ये किसानों के हित उनकी जमीन और उनकी भविष्य , रोजी-रोटी के बारे में कुछ भी कर पाने में असफल रहा है। यही नहीं यह वर्तमान दर से मुआवजा और समीक्षा के लिए स्पेसिफिक प्रावधान देने में भी विफल रहा है खासकर उस परिस्थिति में जब लोगों की जमीन जनता के उद्देश्य के लिए ले ली जाती है और उसका पूरी तरह कॉमर्शियल इस्तेमाल किया जाता है।
भूमि अधिग्रहण के विरोध में पूरे देश में लोगों ने अपनी आवाज बुलंद की है। उत्तर प्रदेश-ग्रेटर नोएडा , टप्पल , अलीगढ और आगरा में यमुना एक्सप्रेस वे के आस-पास टाऊनशिप बनाने के विरोध में हरियाणा-फतेहबाद , प्रस्तावित नाभिकीय प्लांट की वजह से उडीसा-कलिंगनगर में टाटा स्टील प्लांट के विरोध में , जगतसिंहपुर पास्को स्टील प्लांट का विरोध कर रहा है और पोर्ट प्रोजेक्ट को उसने पकड रखा है , कालाहांडी में वेदांत एल्युमिना रिफाइनरी प्रोजेक्ट के विरोध में , कियोझार में मित्तल स्टील प्रोजेक्ट के विरोध में , कंधाधर में माइनिंग के विरोध में। पश्चिम बंगाल में सिंगूर और नंदीग्राम में टाटा प्लांट के विरोध में।
दिल्ली विकास प्राधिकरण 1957 में बना था। इसे योजनाबद्घ विकास के लिहाज से बनाया गया था। लगातार मास्टर प्लान (1962 , 1982 , 2001) बनाए गए। इस एजेंसी को आदेश था कि शहर का विकास करें और जमीन को डिस्पोज करें। पिछले कुछ सालों में शहर की ग्रोथ रिंग और रेडियल पैटर्न में हुई। पिछले मास्टर प्लान में कॉमर्शियल सेंटर रिंग या रेडियल रोड पर बनाए गए थे जैसे कि ईस्ट ऑफ कैलाश , रोहिणी , वसंत कुंज और द्वारका। इसका निर्माण डीडीए ने किया था और इसके लिए उन्होंने किसानों से जमीन ली थी।
2005 तक डीडीए ने कुल 28,000 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की है और 3.05 लाख घर बनाए हैं। हालांकि डीडीए हाऊसिंग , कॉमर्शियल और इंडस्ट्रियल स्पेस की पूर्वघोषित मांगों पर खरा नहीं उतरा। परिणामस्वरूप कई अनाधिक्त विकास हुए। आकलन के मुताबिक शहर की तीस प्रतिशत जनता योजनाबद्घ क्षेत्रों में रहती है। जमीन के स्रोत पर दबाव के अतिरिक्त यहां पर कई इस्तेमाल न किए गए क्षेत्र हैं जो कि मध्य दिल्ली में हैं। इसमें सरकारी जमीन बहुतायत में है। सिर्फ तीस से पैंतीस प्रतिशत सरकारी कर्मचारियों को ही आसरा मिल सका है।
दिल्ली के गांवों की जमीन पिछले साठ सालों से कम दाम पर ली जाती रही और बिल्डरों और डेवलपरों को अधिक दाम पर बेची जाती रही। इसमें से कई मामले विवादों में रहे और उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा। संसद में भूमि अधिग्रहण बिल 2007 पर विचार चल रहा है। इसमें समीक्षा का एक प्रावधान होना चाहिए।
जिसमें जमीन का अधिग्रहण कहे गए मकसद के अनुरूप होना चाहिए- योजनाबद्घ दिल्ली का विकास और बाद में इसे किसी व्यक्तिगत या कंपनी को नॉन पब्लिक के प्रयोग के लिए दे दी गई। वास्तविक मालिक ने न केवल अपनी जमीन खोई वरन् उनकी जीविका का स्रोत भी छिन गया। मुआवजा तुलनात्मक तौर पर देखें तो हरियाणा में ये 20 लाख प्रति एकड निश्चित किया गया था। यह गुडगांव के लिए तय हुआ था। यह अपनी तरह की पहली एनुयिटी स्कीम थी जिसके तहत जमीन को प्रति एकड 15000 रुपये सालाना मिलते हैं। डीडीए ने 1990 और 2000 के दौरान 7000 एकड़ जमीन अधिग्रहित की और 275 एकड़ का प्रयोग 4 लाख स्लम परिवारों के रहने के लिए किया गया। 2021 तक दिल्ली में करीब 20 लाख आशियानों की आवश्यकता होगी। डीडीए ने दक्षिणी दिल्ली के लिए मेगा हाउसिंग स्कीम बनाई है और 13 गांवों की 5000 बीघा जमीन अधिग्रहित की है। ये गांव हैं- तुगलकाबाद , टिगरी , देवली , खानपुर , खिकरी , हौजखास , शैदुलाजाब , नेबसराय , मैदानगढी , राजपुर खुर्द , छतरपुर और सतबरी। यह जमीन सेक्शन 4 के तहत 1980 में अधिग्रहण के लिए नोटिफाइड हुई थी। मई-जून 1985 और जनवरी-फरवरी 1986 में सेक्शन 6 के तहत नोटिस जारी किया गया। इन नोटिसों को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 17 दिसंबर , 1996 को पूरे सेक्शन 6 को अमान्य करार दे दिया। आदर्श शहर वह है जो न केवल सभी आय वाली आबादी को घर प्रदान करे वरन् उसे वाटर सप्लाई , सेनीटेशन , सीवर ट्रीटमेंट , बिजली , कूडे का डिस्पोजल और पर्यावरण मैनेजमेंट का ख्याल रखें। इस बात को ध्यान में रखते हुए इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया जाना चाहिए।

ग्रामीण दिल्ली

दिल्ली में शुरुआत में 362 गांवों में से 135 गांवों का शहरीकरण कर दिया गया। सभी गांवों का अपना अलहदा इतिहास और परंपरा थी। आर.के.पुरम के पास बने मुनिरका गांव में सभी 36 समुदाय हिंदू समाज के थे। अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट के पास बने महिपालपुर गांव की स्थापना तोमर वंश के राजा महिपाल ने 1105 एडी में की थी। दिल्ली के गांवों ने अपना यूनिक चरित्र बनाए रखा है। उस गांव की स्वायत्ता और पहचान को ब्रिटिश भी पूरा सम्मान देते थे। हरे मैदान , स्वच्छ हवा जैसा माहौल यह 1970 के दौरान हुआ करता था पूरी तरह खत्म हो चुका है। वर्तमान में कहानी पूरी तरह अलग है और मौजूदा समय में ये गांव अपने उजडने , नजरंदाज करने और शोषण की कहनी बयां करते हैं। ये बताते हैं कि 60 के दशक में भूमि अधिग्रहण के दौरान गांवों का शोषण किस तरह हुआ।

दिल दहलाने वाली दिल्ली

दिल्ली में यमुना पुश्ता इलाके ललित पार्क में एक अवैध इमारत ढहने से 70 से अधिक लोगों की मौत हो गई । शहर की तीस लाख से अधिक इमारतों में से एक सीढ़ी के अनुसार , मात्र 5589 ही अवैध हैं। किंतु विशेषज्ञ बताते हैं कि भवन मापदण्डों पर एक भी इमारत खरी नहीं उतरती। 16 नवंबर को घटी इस घटना से संबंधित इमारत का नाम अवैध संपत्तियों में नहीं था। कागजों पर यह एक कमरे की इमारत है और उसी के अनुरूप हाऊस टैक्स दिया जाता था। दिल्ली में सरकार हजारों अवैध कालोनियों को नियमित कर चुकी है और अभी 1700 अवैध कालेानियों केा नियमित करने का मसला उच्चतम न्यायालय में लंबित है। कोर्ट ने फरवरी 2006 में ही सरकार से कहा था कि पहले सरकार इन कालोनियों में मूलभूत सुविधाओं का विकास करे और भवन निर्माण के नियमों का पालन कराए तभी इनके नियमन की अनुभूति देंगे किंतु दिल्ली सरकार व एमसीडी के कानों पर जूं भी नहीं रेंगती।
सच तो यह है कि अवैध बस्तियों में अवैध निर्माण का चलन पूरे देश में है और इस कार्य को सरकारी अधिकारियों व नेताओं की पूरी शह है। पूरा देश बेतरतीब विकास का उदाहरण बन गया है और विकृति का पर्याय हो गया है। आज बिल्डरों का जमाना है , रहने से ज्यादा किराए पर देने और बेचने के लिए घर बनाए जाते हैं और यह मुनाफे का व्यापार है । महानगरों में बिल्डर नेताओं से सांठगांठ कर सरकारी जमीन सस्ते में हथियाते हैं और अंधाधुध व बेतरतीब कालोनियां बनाते जा रहे हैं । नीयत हल्की हो तो आदर्श सोसाइटी बनती है और काम हल्का हो तो ललिता पार्क जैसी पांच मंजली अवैध इमारतें । आम आदमी तो छला ही जाता है। कारगिल की विधवाओं के मान-सम्मान और गरीबों की जान की कीमत पर यह बिल्डिंग माफिया पनप रहा है।
आदर्श सोसाइटी में 6 मंजिला बिल्डिंग 31 मंजिला बन गई और विधवाओं के फ्लैटों पर सैन्य अधिकारियों , नेताओं और नौकरशाहों ने कब्जे कर लिए। और पर्यावरणीय मापदण्डों का बाजा बजाया सो अलग। यही हाल ललिता पार्क की इमारतों का है यमुना के खादर में निर्माण का क्या मतलब , मगर खेलगांव और अक्षरधाम बस गए तो इन इमारतों को कौन पूछेगा ? अभी तक किस अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई क्या ? सारा ठीकरा भवन मालिक के सर ही फोड़ दिया गया।
नगर से महानगर बनते नगरों में भूमाफियाओं का नेताओं से गठजोड़ ही रातोंरात मुनाफा दिलाता है। जमीन असल में उस पर भरण पोषण करने वालों की होती है। विकास होगा तो इमारतें बनेंगीं यह समझ में आता है लेकिन वह कुछ के लिए विनाश का सबब क्यों बन जाती हैं ? क्या ऐसी प्रणाली नहीं बनाई जा सकती है जिसमें उस जगह के मूल निवासी वहां के भौगोलिक समीकरण और पर्यावरण का ध्यान रखते हुए विकास करें। जमीन पर बढ़ते बोझ को घटा सकने की प्रणाली से ही विकास होना चाहिए। न लोग सरकार पर बोझ बनें , न सरकार लोगों को लूट सके। सरकार लोगों के लिए काम करे और लूटने वालों से लोगों को बचाए।

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