शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

एकता परिषदः इस चेतावनी को सिर्फ रैली न समझें




वर्ष 2007 में जब 25 हज़ार लोग ग्वालियर से पैदल चलकर दिल्ली आए, तब तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री ने इन्हें आश्वासन दिया. 2009 में जब एक बार फिर ये लोग दिल्ली आए, तब भी इन्हें आश्वासन ही मिला. हर बार स़िर्फ आश्वासन. नतीजतन, इस बार 15 हज़ार लोग जब दिल्ली आए, तब कोई मांग लेकर नहीं आए. आए तो स़िर्फ चेतावनी देने. चेतावनी इस बात की कि अगर नई भूमि सुधार नीतियों का पालन ठीक से नहीं किया गया, अगर नेशनल लैंड रिफॉर्म काउंसिल को सक्रिय नहीं किया गया तो हम लाखों की संख्या में दिल्ली आकर बैठ जाएंगे. और तो और, अब एकता परिषद ने, जिसे कल तक गांववालों का आंदोलन माना जाता था, ख़ुद को इंडिया अगेंस्ट करप्शन जैसी मुहिम से जोड़ कर भ्रष्टाचार के ख़िला़फ भी हल्ला बोल दिया है. कल तक स़िर्फ जंगल और ज़मीन पर ग़रीबों, भूमिहीनों एवं आदिवासियों के हक़ के लिए लड़ाई लड़ने वाली एकता परिषद अब जन लोकपाल बिल लाने के लिए भी आवाज़ बुलंद कर रही है.
पहले पदयात्रा, फिर चेतावनी रैली और 2012 में एक लाख लोग दिल्ली में. आख़िर पिछले चार साल से इस देश की आम जनता को क्यों बार-बार दिल्ली आकर अपनी बात कहनी पड़ती है. आख़िर उसकी ऐसी कौन सी मांग है, जिसे सरकार पूरी नहीं कर रही या फिर करना नहीं चाहती?
बीते 6 से 8 मार्च यानी लगातार तीन दिनों तक दिल्ली के रामलीला मैदान में हज़ारों की संख्या में लोग एकत्र थे. ये लोग राष्ट्रीय भूमि नीति बनाने की दिशा में केंद्र सरकार के वादे के अनुसार क़दम न उठाने के विरोध में यहां आए थे. एकता परिषद के बैनर तले आए इन लोगों की बस एक ही मांग है, जो सीधे-सीधे इनके जीने के अधिकार से जुड़ी हुई है. ये सारे लोग भूमिहीन हैं. बहुत से लोगों को खनन, टाइगर रिज़र्व और अन्य विकास परियोजनाओं के नाम पर इनकी ज़मीन से बेदख़ल कर दिया गया है. एकता परिषद के राजगोपाल पी वी ने चौथी दुनिया को बताया कि नेशनल लैंड रिफॉर्म काउंसिल गठित हुए तीन साल से ज़्यादा बीत गए, लेकिन अब तक भूमि सुधार नीति के संबंध में कोई भी ठोस क़दम नहीं उठाया गया है. वह आगे कहते हैं कि इस मसले पर सरकार इतनी असंवेदनशील है कि इस काउंसिल की बैठक तक नहीं होती. इसलिए इस बार हम सरकार को चेतावनी देने आए हैं कि 2012 तक अगर नई भूमि सुधार नीति और राष्ट्रीय भूमि सुधार समिति द्वारा सुझाए गए उपायों को लागू नहीं किया गया तो हम एक लाख लोगों के साथ आएंगे और फिर यहीं बैठकर तब तक शांतिपूर्ण धरना देते रहेंगे, जब तक हमारी मांगें नहीं मान ली जाएंगी.
भूमि एक ऐसी पूंजी है, जो जीवन के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तंत्र का मूल आधार है. ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन का आधार आज भी भूमि और प्राकृतिक संसाधन ही हैं. भूमि अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों तक आम आदमी की पहुंच केवल आर्थिक अधिकार का ही प्रश्न नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बसने वाले सभी लोगों के आत्मविश्वास से जुड़ा अधिकार है.
इस पूरे आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं जंगल और आदिवासी. राष्ट्रीय भूमि सुधार समिति ने अपनी एक रिपोर्ट में सरकार को वन अधिकार क़ानून (फारेस्ट राइट एक्ट) को कारगर ढंग से लागू करने की भी सलाह दी थी. समिति ने अपनी स़िफारिश में कहा कि आदिम जनजाति समुदायों के भूमि क़ब्ज़े को मान्यता दे दी जाए. फारेस्ट राइट एक्ट भी आदिवासियों को जंगल एवं वन भूमि पर अधिकार देने की बात करता है. बावजूद उसके आज भी लाखों आदिवासियों को जंगल पर उनके पारंपरिक अधिकार से वंचित किया जा रहा है. राजगोपाल कहते हैं कि जबसे यह एक्ट लागू हुआ है, तबसे ज़मीन के लिए लगभग 30 लाख आवेदन ग़रीब आदिवासियों की तऱफ से आए. इन 30 लाख आवेदनों में से 19 लाख आवेदनों को वन विभाग ने निरस्त कर दिया. वन विभाग के लोग खुलेआम दादागिरी कर रहे हैं, ग़रीबों से इनकी भूमि छीनी जा रही है.
हमें भ्रष्टाचार के ख़िला़फ भी संघर्ष करने की ज़रूरत है. हमारी लड़ाई केवल समुचित भूमि सुधार क़ानून बनवाना नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार जैसी बीमारी को भी ख़त्म करना है. जब तक भ्रष्टाचार है, तब तक कोई भी क़ानून ग़रीबों और वंचितों को उनका वाजिब हक़ नहीं दिला सकता. हम ग्रामीण आंदोलन को शहरी आंदोलन से भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
- राजगोपाल पी वी, एकता परिषद
वर्ष 2007 में 25 हज़ार से अधिक ग़रीब, भूमिहीन लोगों के साथ राजधानी पहुंचे राजगोपाल से सरकार ने शीघ्र ही राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति बनाने का वादा किया था, जिससे भूमिहीनों और वनवासियों को प्राकृतिक संसाधनों पर इनके अधिकार मिल सकें, लेकिन सरकार तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद समुचित क़दम नहीं उठा पाई है. यहां तक कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद की एक भी बैठक अब तक नहीं हो सकी है. इस चेतावनी रैली में आए लोगों से जब बात हुई तो सबका यही कहना था कि हम यहां अपनी रोटी-अपनी खेती के लिए आए हैं. मध्य प्रदेश के डुमरिया से आई दुअसिया देवी कहती हैं कि हम एकता परिषद से इसलिए जुड़े हैं, क्योंकि हमें ज़मीन चाहिए. कटनी की पुष्पा तो कहती हैं कि हम यहां एकता परिषद के लिए आए हैं. ज़ाहिर है, पेट के लिए रोटी और रोटी के लिए ज़मीन की यह लड़ाई एक आम आदमी की ख़ुद की पहचान से भी जुड़ी है. राष्ट्रीय भूमि सुधार समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भूमि एक ऐसी पूंजी है, जो जीवन के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तंत्र का मूल आधार है. ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन का आधार आज भी भूमि और प्राकृतिक संसाधन ही हैं. भूमि अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों तक आम आदमी की पहुंच केवल आर्थिक अधिकार का ही प्रश्न नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बसने वाले सभी लोगों के आत्मविश्वास से जुड़ा अधिकार है. यानी आम आदमी की पहचान और उसके आत्म विश्वास का रिश्ता ज़मीन के इस टुकड़े से भी है, जिसके लिए यह लड़ाई लड़ी जा रही है.
भ्रष्टाचार का सीधा ख़ामियाज़ा ग़रीब जनता को भुगतना पड़ता है. रोज़गार, राशन और ज़मीन पर हक़ जैसे मसले सामने हैं. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ एकता परिषद भी इस लड़ाई में हमारे साथ है. हम जन लोकपाल बिल चाहते हैं, ताकि भ्रष्टाचार के ख़िला़फ कार्रवाई हो. हम लोग प्रधानमंत्री से मिले और उनसे कहा कि भ्रष्टाचार के ख़िला़फ कार्रवाई किए बिना विकास का कोई अर्थ नहीं है.
- अरविंद केजरीवाल, सामाजिक कार्यकर्ता
राजगोपाल पी वी के नेतृत्व में एकता परिषद के क़रीब 15 हज़ार कार्यकर्ताओं ने पहले 7 मार्च को राजधानी के रामलीला मैदान से संसद भवन तक रैली निकाली, जिसके बाद प्रधानमंत्री ने राजगोपाल को शीघ्र ही राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद की बैठक बुलाने और भूमि नीति में सुधार की बात कही. चेतावनी रैली के अंतिम दिन यानी 8 मार्च को 15 राज्यों से आए क़रीब 15 हज़ार भूमिहीन, आदिवासी और दलित महिला-पुरुषों ने जंगल और ज़मीन की मांग के साथ भ्रष्टाचार के ख़िला़फ भी संघर्ष करने का संकल्प लिया. एकता परिषद, महिला मंच और भ्रष्टाचार के ख़िला़फ बिगुल बजाने वाले अभियान इंडिया अगेंस्ट करप्शन के संयुक्त तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर राजधानी के रामलीला मैदान में आयोजित एक सभा में भूमि अधिकार के लिए संघर्ष कर सफलता हासिल करने वाली 26 महिलाओं को सम्मानित किया गया.
रैली में पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी, सीपीआई की अमरजीत कौर, जुझारू पुलिस अधिकारी सुरेंद्रजीत कौर, अनिता बस्सी, सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश, तरुण भारत संघ के राजेंद्र सिंह, सर्व सेवा संघ की राधा भट्ट, पूर्व सांसद आऱिफ मोहम्मद ख़ान एवं सूचना अधिकार के लिए काम करने वाले अरविंद केजरीवाल ने भूमिहीन लोगों के आंदोलन का समर्थन करते हुए भ्रष्टाचार के ख़िला़फ एकजुट होने का आह्वान किया. रैली में बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, हरियाणा, उड़ीसा, असम, मणिपुर एवं नागालैंड आदि 15 राज्यों से आए ग़रीब, भूमिहीन और आदिवासी लोग शामिल थे. बहरहाल, एकता परिषद की इस चेतावनी रैली ने इस बार कुछ नए संदेश दिए हैं. एक संदेश तो चेतावनी के रूप में सरकार को और दूसरा अलग-अलग दिशाओं में विभिन्न मांगों को लेकर चल रहे आंदोलनों के लिए है. राजगोपाल जब यह कहते हैं कि हम ज़मीन के साथ भ्रष्टाचार के ख़िला़फ भी लड़ाई करेंगे तो इसका सीधा अर्थ यही निकलता है कि अब व़क्त एक होने का है. यानी देश में जितने भी आंदोलन जनता की भलाई से जुड़े मुद्दों को लेकर चल रहे हैं, उन सभी को अब एक मंच पर आ जाना चाहिए, ताकि इस सरकार को, जो जानबूझ कर जनता की आवाज़ नहीं सुनना चाहती, नींद से जगाया जा सके.

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One Response to “एकता परिषदः इस चेतावनी को सिर्फ रैली न समझें”

  • राज गोपाल जी भ्रष्ट्राचारियों को साथ लेकर भ्रष्ट्राचार के खिलाफ़ लडाई नही लडी जा सकती । आप लोग नामचीन लोगों को महान समझ बैठते हैं , यह भी पता नही लगाते की वह लोकप्रिय , नामचीन कहीं प्रोपगंडा की देन तो नही है। मैने आपके एक पदाधिकारी को जब नवादा पुलिस ने नक्सलवादी बताकर पिटा था तो उसकी लडाई लडी थी और उसी दरम्यान आपके आंदोलन की खामियों से भी अवगत हुआ । नमक को पुरा नमक रहने दें , ज्यादा आयोडीन डालेंगे तो उसका नमकिनापन कम हो जायेगा । आंदोलन के स्टेज पर मनभावन , आकर्षित करनेवाले चेहरे की जरुरत नही है यह तो शादी – ब्याह मे होता है , जहां सुन्दर नाचने गाने वालों की जरुरत होती है या फ़िर राजनितिक दलों की रैलियों में लोगो की भीड भाग न जाय उसके लिये ये नामचीन , लोकप्रिय महान लेकिन अंदर से भ्रष्ट लोगों की जरुरत पडती है । आप अभी पुरी तरह गांधीवादी नही बने है । प्रयास करे बनने का।

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