दिल्ली भले ही देश का दिल हो, मगर इसके दिल का किसी ने हाल नहीं लिया। पुलिस मुख्यालय, सचिवालय, टाउनहाल और संसद देखने वाले पत्रकारों की भीड़ प्रेस क्लब, नेताओं और नौकरशाहों के आगे पीछे होते हैं। पत्रकारिता से अलग दिल्ली का हाल या असली सूरत देखकर कोई भी कह सकता है कि आज भी दिल्ली उपेक्षित और बदहाल है। बदसूरत और खस्ताहाल दिल्ली कीं पोल खुलती रहती है, फिर भी हमारे नेताओं और नौकरशाहों को शर्म नहीं आती कि देश का दिल दिल्ली है।
![]() यह ग़रीबी लगातार बढ़ती गई तो मियो किसानों को यह अनुभव होने लगा कि साहूकार उनकी मजबूरियों का केवल फायदा ही नहीं उठा रहे, बल्कि इसके कारण भी वही हैं. साहूकारों को आमतौर पर उच्चवर्गीय हिंदू समुदाय का प्रतिनिधि माना जाता था. जैसे-जैसे मियो किसानों में उनके ख़िला़फ असंतोष बढ़ता गया, वे हिंदूवादी परंपराओं से भी दूर होने लगे और इस्लाम के प्रति उनके आकर्षण में लगातार वृद्धि होती गई. इसकी एक वजह और थी. मियो राजपूत समुदाय से संबंधित होने के कितने भी दावे क्यों न करें, साहूकार उनके इस दावे को नहीं मानते थे.एक सूत्र के अनुसार, ग़रीबी से पीड़ित जो मियो किसान बनिया- साहूकारों से क़र्ज़ लेते थे, उनसे हर महीने 5 फीसदी यानी हर साल 60 फीसदी की दर से ब्याज वसूला जाता था. (डब्ल्यू.खान 1988:34) ज़्यादातर मियो किसान क़र्ज़ चुकाने में असमर्थ होते गए, नतीजा उनकी गिरवी रखी ज़मीन पर बनिया-साहूकारों ने अपना क़ब्ज़ा जमाना शुरू कर दिया. 1910 के आते-आते मियो किसानों की क़रीब 40 फीसदी ज़मीन बनिया-साहूकारों के पास गिरवी हो चुकी थी.(राठी:43) ज़मीन पर साहूकारों द्वारा क़ब्ज़ा जमाने की यह प्रथा अंग्रेजों द्वारा ज़मीन पर मालिकाना हक़ को लेकर शुरू की गई नई सोच का नतीजा था, जिसमें ज़मीन को ऐसी चीज़ और निजी संपत्ति के रूप में देखा जाता था, जिसे ख़रीदा, बेचा और गिरवी रखा जा सकता था. पहले जहां मियो किसान खेतों में लगी फसल को गिरवी रखकर उधार लेते थे, अब ज़मीन को ही गिरवी रखने लगे. यह मियो किसानों की बढ़ती ग़रीबी और दरिद्रता का नतीजा था. यह ग़रीबी लगातार बढ़ती गई तो मियो किसानों को यह अनुभव होने लगा कि साहूकार उनकी मजबूरियों का केवल फायदा ही नहीं उठा रहे, बल्कि इसके कारण भी वही हैं. साहूकारों को आमतौर पर उच्चवर्गीय हिंदू समुदाय का प्रतिनिधि माना जाता था. जैसे-जैसे मियो किसानों में उनके ख़िला़फ असंतोष बढ़ता गया, वे हिंदूवादी परंपराओं से भी दूर होने लगे और इस्लाम के प्रति उनके आकर्षण में लगातार वृद्धि होती गई. इसकी एक वजह और थी. मियो राजपूत समुदाय से संबंधित होने के कितने भी दावे क्यों न करें, साहूकार उनके इस दावे को नहीं मानते थे. और तो और, वे उनके हाथ का खाना नहीं खाते थे और उन्हें नीची निगाहों से देखते थे. बदली हुई परिस्थितियों में मियो मुगल या अन्य मुस्लिम शासकों की बजाय उच्चवर्गीय हिंदुओं को अपने दुश्मन के रूप में देखने लगे. तबलीगी जमात में मियो समुदाय का प्रवेश इसी का एक नतीजा था. दरअसल अपनी सामुदायिक पहचान को मुस्लिमों के साथ जोड़ने के लिए यह उनकी एक सोची-समझी रणनीति थी. सामाजिक विस्थापन ख़ुद किसी आंदोलन को जन्म नहीं देता. समुदाय से बाहर का कोई करिश्माई नेता भी आम लोगों को तब तक लामबंद नहीं कर सकता, जब तक कि समुदाय के अंदर के कुछ प्रभावशाली लोग उसकी बातों को पसंद न करें और फिर उन्हें स्थानीय लोगों की भाषा में उन तक न पहुंचाएं. मेवात में तबलीगी जमात के नज़रिए से देखें तो यह काम इस्लामी मदरसों एवं प्राथमिक विद्यालयों की बढ़ती संख्या ने किया. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही अंग्रेज अपने अधिकार क्षेत्र वाले मेवाती इलाक़ों में प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना को प्रोत्साहित कर रहे थे. इन विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम उर्दू था, क्योंकि इस भाषा में पाठ्य सामग्री बहुतायत में उपलब्ध थी. इसका परिणाम मियो समुदाय के बीच युवाओं के एक नए वर्ग के उदय के रूप में सामने आया, जो इस्लामिक साहित्य से भलीभांति परिचित था. 1910 के आते-आते प्राथमिक शिक्षा प्राप्त मियो युवाओं की संख्या इतनी हो चुकी थी कि इस इलाक़े में एक हाईस्कूल की मांग जोर पकड़ने लगी. मेवात में पहले माध्यमिक विद्यालय की स्थापना वर्ष 1923 में गुड़गांव के नूह में हुई और इसका नामकरण इसके संस्थापक फ्रैंक ल्यूगार्ड ब्रायन के नाम पर ही किया गया था. ब्रायन गुड़गांव के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर थे. यहां से शिक्षा प्राप्त कई मियो युवा बाद के सालों में उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली के जामिया मिलिया एवं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी पहुंचे. मेवात में तबलीगी जमात की शुरुआत से पहले मुस्लिमों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो चुका था, जो मुस्लिम भाईचारे और एकता की भावनाओं से वाक़ि़फ था. इसी वर्ग ने तबलीगी जमात के संदेश को आम मियो जनता के बीच फैलाने में अहम भूमिका निभाई. ख़ुद इलियास भी थोड़ी-बहुत शिक्षा प्राप्त इस समुदाय और ग्रामीण प्रशासनिक व्यवस्था में नंबरदार, जेलदार, मुंशी एवं चौधरी जैसे पदों पर कार्य कर रहे लोगों पर भरोसा करने लगे. इसके अलावा मदरसों में पढ़ाई कर रहे छात्रों ने भी मेवात इलाक़े में तबलीगी जमात के संदेश को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इनके पास उच्चस्तरीय धर्म निरपेक्ष शिक्षा का नितांत अभाव था, ये तो इलाक़े में चल रहे इस्लामिक विद्यालयों से बाहर निकले थे. गौरतलब है कि इस समय तक मेवात इलाक़े में ऐसे शिक्षण संस्थानों की संख्या लगातार बढ़ रही थी. शिक्षा के प्रसार ने मियो समुदाय को एक नई पहचान देने का कार्य किया, सामाजिक स्तर पर उनकी कमज़ोर स्थिति से उन्हें रूबरू कराया एवं इस्लाम धर्म के साथ उनके रिश्ते को और मज़बूत बनाने में महती भूमिका निभाई. कलीमा के प्रति मियो लोगों की अनभिज्ञता की चर्चा करते हुए एक ब्रिटिश प्रशासक ने लिखा है, यह केवल अलवर और उसके आसपास के इलाक़ों के लिए ही सच है. ब्रिटिश प्रभाव वाले इलाक़ों में इन विद्यालयों का मुख्य उद्देश्य मियो लोगों को इस्लामिक धार्मिक परंपराओं के ज़्यादा नज़दीक लाना है. (एसए हक 1972:105) अलवर के हिंदू राजा ने अपने इलाक़े के स्कूलों में उर्दू की बजाय हिंदी को शिक्षा का माध्यम घोषित किया था. उस समय हिंदी भाषा में इस्लामिक साहित्य का नितांत अभाव था. इसकी वजह यह थी कि हिंदी को हिंदुओं की भाषा के रूप में देखा जाता था. इस तरह ब्रिटिश प्रभाव वाले इलाक़ों में रहने वाले मियो लोग हिंदू शासित अलवर और भरतपुर क्षेत्र के निवासी स्वजातीय लोगों के मुक़ाबले इस्लामिक विचारधारा से ज़्यादा परिचित हो चुके थे. बाद के सालों में गुड़गांव क्षेत्र में रहने वाले इन्हीं लोगों ने पूरे मेवात इलाक़े में तबलीगी जमात के संदेश के प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभाई. इसे भी पढ़े...
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